कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्च स्तबक ७६१ बिलाव से दूर रहने पर तो उल्लू और नवला दोनों ही मुझे मार देंगे। इसलिए इस प्रकार शत्रुओं के संकट में पड़ा हुआ मैं कहाँ जाऊँ ॥११०॥ अच्छा हो कि विपत्ति में पड़ा हुआ मैं बिलाव की ही शरण में जाऊँ। मुझे जाल काटने में ज्ञानी जानकर सम्भव है वह अपनी रक्षा के लिए मेरी भी रक्षा करे ॥११२ ॥ ऐसा सोचकर और धीरे-२ उसके पास जाकर चूहा उससे कहने लगा — तुम्हारे बंधन से मुझे अत्यन्त दुःख है। इसलिए मैं तुम्हारा जाल काटता हूँ ॥१२१॥ सरस व्यक्तियों का साथ रहने के कारण शत्रुओं पर भी प्रेम हो जाता है। किन्तु, तुम्हारे प्रेम को न जाननेवाले मुझे तुम पर विश्वास नहीं है ॥१२२॥ यह सुनकर बिलाव कहने लगा 'भद्र ! तुम्हें मुझ पर विश्वास करना चाहिए। आज से मेरे प्राण बचानेवाले तुम मेरे मित्र हुए ॥१२३॥ बिलाव से ऐसा सुनकर चूहा उसकी गोद में जा छिपा। यह देखकर उल्लू और नेवला दोनों निराश होकर वहाँ से चल गये ॥१२४॥ तब जाल से बँधा हुआ बिलाव चूहे से कहने लगा 'मित्र ! रात बीतती गई है। इसलिए मेरे बंधनों को शीघ्र काटो ॥१२५॥ बहेलिये के आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करता हुआ चूहा झूठे ही दाँत फटफटाता हुआ बन्धनों को काटने में विलम्ब करने लगा ॥१२६॥ प्रातःकाल होने और बहेलिये के निकट आ जाने पर और बिलाव के दीनतापूर्वक प्रार्थना करने पर, चूहे ने तुरन्त जाल के बंधन काट डाले ॥१२७॥ जाल काटने के पश्चात् बहेलिये के भय से बिल्ली के भाग जाने पर मृत्यु से छूटा हुआ चूहा भी भागकर बिल में घुस गया ॥१२८॥ बिलाव द्वारा फिर विश्वास दिलाकर बुलाने पर भी उसने उसका विश्वास नहीं किया और कहने लगा— 'समय आने पर ही शत्रु मित्र बनता है सदा नहीं ॥१२९॥ इस प्रकार चूहे ने और भी बहुत-से पशुओं ने अपने शत्रुओं से बुद्धिमानी के साथ आत्म रक्षा की मनुष्यों की तो बात ही क्या है ॥१३ ० ॥ जो तुमने मुझसे सुना है वही मुझसे कहा गया राजा अपनी बुद्धि से महारानी की रक्षा करते हुए अपने कार्य की भी रक्षा कर सकता है ॥१३१॥ बुद्धि ही सर्वत्र प्रधान मित्र है पुरुषार्थ नहीं। हे योगेश्वर ! इस कथा को भी सुनो ॥१३२। १ यह कथा महाभारत के १२वें पर्व में तथा पंचतंत्र में भी मिलती है।—अनु