भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पंचम लम्बक ५७ राजा ने उसी समय मुझे बुलाकर पूछा कि 'यह क्या है ?' मैंने भी उसी दिशा की ओर अपनी दो अँगुलियाँ दिखा दीं और हाथ अन्तर्हित हो गया ॥९॥ इस प्रकार उस हाथ के तिरोहित हो जाने पर राजा ने अत्यन्त विस्मय के साथ मुझसे फिर पूछा तब मैंने कहा—॥१० ॥ पाँचों अँगुलियों को दिखाते हुए उस हाथ ने कहा कि पाँच के मिलने पर कौन-सा काम सिद्ध नहीं हो सकता ॥११॥ इसीलिए मैंने उसे दो अँगुलियाँ दिखाईं कि यदि दो का एकचित्त हो तो संसार में असाध्य क्या है ? ॥१२॥ राजा योगनन्द का अन्तःपुर मरी मछली का हँसना इस प्रकार गूढ़ विज्ञान बतलाने पर राजा अति प्रसन्न हुआ और सपत्नीक मेरी बुद्धि को सुवर्ण लगाकर सुखी हुआ ॥१३॥ एक बार राजा योगनन्द ने ऊपर मुँह किये हुए एक ब्राह्मण अतिथि को झरोखे से देखती हुई अपनी महारानी को देखा ॥१४॥ राजा ने ब्राह्मण को दुराचारी जानकर उसके वध की आज्ञा दे दी। क्योंकि ईर्ष्या विवेक की विरोधिनी होती है। ॥१५॥ राजाज्ञानुसार जब ब्राह्मण वध्यभूमि में ले जाया जा रहा था तब बाजार में रखा हुआ मृत मत्स्य उसे देखकर हँसने लगा ॥१६॥ जब राजा को यह मालूम हुआ तब उसने ब्राह्मण का वध रोक दिया और मुझसे मछली के हँसने का कारण पूछा ॥१७॥ 'सोचकर कहूँगा' ऐसा कहकर मैं राजभवन से चला गया। जब एकान्त में मैंने सरस्वती का ध्यान किया तब सरस्वती ने उपस्थित होकर यह कहा ॥१८॥ उस ताल के पेड़ पर रात को छिपकर बैठो तब वहाँ मछली के हँसने का कारण निश्चय ही सुनोगे ॥१९॥ यह जानकर मैं रात में वहाँ जाकर ताल-वृक्ष पर बैठा और रात को छोटे-छोटे बालकों के साथ आई हुई एक भीषण राक्षसी को देखा ॥२० ॥ बच्चों के भोजन माँगने पर वह राक्षसी बोली कि अभी प्रतीक्षा करो। प्रातःकाल तुम्हें ब्राह्मण का मांस दूँगी। आज वह मारा नहीं गया ॥२१॥ बच्चों ने पूछा कि आज वह क्यों नहीं मारा गया ? तब राक्षसी ने कहा कि उसे देख कर मरा हुआ मत्स्य भी हँसन लगा इसलिए नहीं मारा गया ॥२२॥ बालकों के यह पूछने पर कि 'वह मृत मत्स्य क्यों हँसा ?' राक्षसी बोली कि 'राजा की सभी रानियाँ भ्रष्ट हो गई हैं' ॥२३॥ ८