भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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[Header] षष्ठम लम्बक १४९

तब (फल मूल आदि के अभाव में) भूख से मूच्छित बोधिसत्त्व ने सबसे पहले सिंह का स्मरण किया। स्मरण करते ही आये हुए सिंह ने मृगों का मांस लाकर बोधिसत्त्व का जीवन- निर्वाह किया ॥१११॥ कुछ समय तक मांस खिलाकर उस महात्मा को स्वस्थ बनाकर सिंह ने कहा—'अब मेरा शाप नष्ट हो गया मैं जाता हूँ' ॥११२॥ ऐसा कहकर वह सिंह शरीर का त्यागकर विद्याधर हो गया और महात्मा से आज्ञा लेकर उन्हें प्रणाम करके अपने स्थान को गया ॥११३॥ उसके चले जाने पर भोजन के अभाव से म्लान उस बोधिसत्त्व ने स्वर्णचूड़ का स्मरण किया और स्मरण करते ही वह उसके पास उपस्थित हो गया ॥११४॥ महात्मा द्वारा उसे अपनी पीड़ा बताने पर, उस पक्षी ने तुरन्त जाकर रत्नों से जड़े आभूषणों से भरी एक पिटारी लाकर उसे दी ॥११५॥ और बोला—'इतने धन से सदा के लिए तुम्हारा जीवन-निर्वाह चलेगा। अब मेरे शाप का अन्त हो गया तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाता हूँ' ॥११६॥ ऐसा कहकर और विद्याधरकुमार बनकर वह अपने लोक को चला गया और जाने पर उसने पिता का राज्य प्राप्त किया ॥११७॥ वह बोधिसत्त्व भी उन रत्नों को बेचने के लिए घूमता हुआ उसी नगर में जा पहुँचा जहाँ वह कुएँ से निकाली हुई स्त्री रानी की दासी के रूप में काम कर रही थी ॥११८॥ उस नगर में जाकर बोधिसत्त्व ने एकान्त में एक वृद्धा के घर में रत्न आभूषणों को रख दिया और उनमें से कुछ लेकर वह बाजार में बेचने के लिए गया ॥११९॥ उसने बाजार में जाते हुए सामने से आती हुई उस स्त्री को देखा जिसे उसने कूप से निकाला था। परस्पर बात होने पर उस स्त्री ने अपने को महारानी की दासी बतलाया ॥१२०-१२१॥ उसके द्वारा अपना हाल-समाचार पूछने पर उस सरल महात्मा ने स्वर्णचूड़ पक्षी से रत्नों से मण्डित आभूषणों का प्राप्त होना बताया और उस वृद्धा के घर में ले जाकर आभूषण भी दिखा दिये उस दुष्टा ने जाकर अपनी स्वामिनी से सब कह दिया। सुवर्णचूड़ पक्षी ने उस रानी के घर के भीतर से उसके हँसते-खेलते गहनों की पेटी छत से उठा ली थी। उस पिटारी को फिर उस स्त्री के द्वारा अपने नगर में आई हुई जानकर रानी ने राजा से कह दिया ॥१२२-१२५॥