भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक १५१ राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११९६॥ उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये और उसे कारागार में डाल दिया ॥११९७॥ कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिकुमार के अवतार उस सर्प का स्मरण किया। स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११९८॥ उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा- मैं जाता हूँ और पैर से सिर तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९९॥ जबतक तुम जाकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२००॥ तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२०१॥ ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन फैला दिये॥१२०२॥ तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि- सत्त्व ने कहा—मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२०३॥ उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—॥१२०४॥ 'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा ले तो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और तेरी इस बात के साक्षी हैं' ॥१२०५॥ यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा— राजा को शीघ्र छोड़ दो' ॥१२०६॥ तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२०७॥ सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने आश्रम को चला गया ॥१२०८॥ इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार वाले महान् व्यक्तित्व को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२०९॥ अविश्वास की पात्र स्त्रियों के हृदय में ज्ञान होने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१२१०॥