कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक १७१ और वह हँसता हुआ संन्यासी उसी वृक्ष के नीचे बैठा रहा और उसने वृक्ष के अन्दर से अपनी स्त्री के साथ विनोद करते हुए उस वृक्ष-निवासी यक्ष की बातचीत सुनी ॥२०॥ साधु ने कान लगाकर सुना कि यक्ष ने हँसी-हँसी में माला से स्त्री को मारा। इतने में ही उस धूर्ता स्त्री ने अपने को झूठे ही मृतवत् बना लिया और उसके परिवार के व्यक्ति रोते-चिल्लाते हुए स्तब्ध हो गये ॥२१ २२॥ बहुत समय के पश्चात् मानों फिर से जीवन आने पर उसने आँख खोली तब उसके पति ने उससे पूछा कि तूने इतने समय तक आँखें बन्द करके क्या देखा ? ॥२३॥ तब वह झूठ ही कहने लगी कि 'जब तूने माला से मुझे मारा तब मैं चेतना-हीन हो गई और मैंने एक काले पुरुष को आये हुए देखा ॥२४॥ वह पुरुष डरावना और लम्बा था उसके सिर के केश खड़े थे। वह इतना काला था कि उसकी छाया से चारों ओर अँधेरा हो रहा था। उसके हाथ में पाश था और आँखें उसकी जल रही थीं ॥२५॥ उस दुष्ट द्वारा मैं यम के घर ले जाई गई। किन्तु, वहाँ जाने पर उसके अधिकारियों से म छुड़ा दी गई' ॥२६॥ यक्षिणी के ऐसा कहने पर यक्ष हंसता हुआ बोला-आश्चर्य है कि माया के बिना स्त्री की कोई भी चेष्टा नहीं होती ॥२७॥ भला पुष्पों की मार से कैसी मृत्यु ! और यम-मन्दिर से लौटना कैसा ? अरी मूर्ख तूने तो पाटलिपुत्र की स्त्रियों का अनुकरण किया ॥२८॥ उस (पाटलिपुत्र) में सिंहाख नाम का जो राजा है उसकी रानी किसी समय मन्त्री सेनापति पुरोहित और वैद्य की पत्नियों के साथ शुक्लपक्ष की त्रयोदशी के दिन पाटलिपुत्र को अनुगृहीत करनेवाली सरस्वती के दर्शन को गई ॥२९ ३०॥ उस यात्रा के मार्ग में बहुत-से कुबड़े अन्धे कोढ़ी और पंगु रोगी भीख माँग रहे थे। उन्होंने उन स्त्रियों से प्रार्थना की कि 'हम रोग से पीड़ित अनाथों को औषधि दो जिससे हमलोग इन रोगों से छूट सकें। पीड़ितों और दीनों पर दया करो। हमारी रक्षा करो ॥३१ ३२॥ यह संसार, बिजली की चमक के समान क्षण भर में नष्ट होनेवाला है और यात्रा मेला आदि उत्सव भी क्षण-भर के लिए ही सुन्दर हैं ॥३३॥ इसलिए, संसार में सार यही है कि दीनों पर दया करना और दरिद्रों को दान देना। गुण वान् व्यक्ति कहाँ नहीं सुख भोगता ? ॥३४॥