भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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एकादश लम्बक १९९ यदि मैं हार गया तो मेरा पक्ष (दाँव) वही हथिनी है और यदि वह हार गया तो इसके पक्ष में ही दोनों घोड़े ॥८॥ उनके वेग का अन्तर आपके सिवा दूसरा नहीं जान सकता इसलिए हे प्रभो हमारे घर पर पधारकर इसकी परीक्षा कीजिए ॥९॥ आप कृपा करें। आप सभी प्रकार की प्रार्थनाओं के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं। इसीलिए हम दोनों प्रार्थी होकर दूर से आपके पास आए हैं ॥१० ॥ इस प्रकार रुचिरदेव से प्रार्थित नरवाहनदत्त ने घोड़े और हथिनी की प्रतियोगिता के शौक से उसकी बात मान ली ॥११॥ और, वह उसी समय लाये हुए तेज झांझोंवाले रथ पर चढ़कर उन दोनों के साथ वैशाखपुर को चला ॥१२॥ चलते-चलते वह क्रमशः वैशाखपुर नगर में पहुँचा। उसके नगर में प्रवेश करते ही उसे देखकर दीवानी और एकटक निहारती हुई नागरिक स्त्रियाँ नाना प्रकार के तर्क-वितर्क करने लगीं 'यह कौन है ? क्या रति को बिना प्राप्त किया नवीन कामदेव तो नहीं है ? अथवा दिन में दीखनेवाला निष्कलंक चन्द्र तो यह नहीं है या ब्रह्मा ने पुरुष के आकार में कामदेव को निर्मित किया है ? इत्यादि ॥१३-१५॥ वहां (वैशाखपुर में) युवराज नरवाहनदत्त ने शृंगार रसमय और प्राचीन लोगों से प्रतिष्ठित किया गया कामदेव का एक मन्दिर देखा ॥१६॥ रति और प्रीति देनेवाले उस कामदेव के मन्दिर में जाकर और मूर्ति को नमन करके कुछ समय तक विश्राम करके उसने मार्ग की श्रान्ति दूर की ॥१७॥ विश्राम कर लेने के पश्चात् अगवानी किया जाता हुआ वह देवमन्दिर के समीप स्थित रुचिरदेव के घर में प्रेम के साथ प्रवेश किया ॥१८॥ नरवाहनदत्त के आगमन के उत्सव में हाथी और घोड़े की कमी नहीं थी। उनकी विराट् शोभा को देखकर नरवाहनदत्त बड़ा प्रसन्न हुआ ॥१९॥ वहाँ पर रुचिरदेव द्वारा समुचित सत्कार किये गये नरवाहनदत्त ने अत्यन्त आश्चर्य- मय रूपवाली रुचिरदेव की अविवाहिता बहन को देखा ॥२० ॥ उस कन्या के रूप-सौन्दर्य से आकृष्टहृदय और नेत्रवाले नरवाहनदत्त ने प्रवास में होने- वाले अपनी रानियों के विरह का अनुभव नहीं किया। वह उन्हें भी भूल गया ॥२१॥ उस कन्या ने भी नीलकमल की माला के सदृश प्रेम से उसके ऊपर डाली हुई दृष्टि से मानो उसे स्वयं वर लिया ॥२२॥