भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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ऐसा सुनकर वैद्य को लज्जित और स्तब्ध देखकर राजा ने पाचक से कहा—'क्या उस बकरे का कुछ भी मांस शेष है' ? ॥१५॥ 'हाँ देव! दो सींग बचे हैं' पाचक के ऐसा कहने पर वैद्य बोला—'ठीक है, सींगों के अन्दर का मांस तो बहुत उत्तम होगा उसे पकाओ। ऐसा कहकर और सींगों के मांस से रस बनवाकर वैद्य ने चूर्ण मिलाकर रानी गुणवरा को दिया ॥१६—१७॥ उस ओषधि के सेवन से राजा की निन्यानब्बे रानियां एक साथ ही गर्भवती हुईं और साथ ही उन्होंने पुत्रों का प्रसव किया ॥१८॥ सबसे अन्त में रस-पान करने के कारण रानी गुणवरा ने सम्पूर्ण शुभलक्षणों से युक्त पुत्र को सबसे पीछे प्रसव किया ॥१९॥ यह बालक शृंग के मग मांसरस में उत्पन्न हुआ था इसलिए राजा ने इसका नाम शृंगभुज रख दिया ॥२०॥ क्रमशः भाइयों के साथ बड़ा होता हुआ शृंगभुज रूप से अवस्था में छोटा होने पर भी गुणों में उनसे बहुत बड़ा मालूम होता था ॥२१॥ क्रमशः वह राजकुमार शृंगभुज रूप में कामदेव के समान धनुर्वेद में अर्जुन के समान और बल में भीमसेन के समान हुआ ॥२२॥ इस प्रकार, गुणवाले पुत्र के साथ उसकी माता गुणवरा को सन्तुष्ट देखकर राजा वीरभुज की अन्य रानियाँ उससे डाह करने लगीं ॥२३॥ इनमें सबसे दुष्ट रानी अयशोलेखा ने इस स्थिति को देखकर सभी रानियों से मिलकर एक सम्मति की और राजा के घर आने पर बुरे ही मुँह को मलिन बना लिया और राजा के पूछने पर बड़ी ही कठिनाई से बोली—'आर्यपुत्र ! तुम घर के भीतर का कलंक कैसे सहन करते हो ? दूसरों की बुराई की रक्षा करते हो और उस (बुराई) से अपनी रक्षा क्यों नहीं करते हो ? ॥२४—२६॥ यह जो गुहा इस नाम का रतिपाल का प्रधान नौकर है उससे तुम्हारी रानी गुणवरा आसक्त है ॥२७॥ नपुंसिका द्वारा गुहोक्त रतिपाल के अन्तःपुरस्थी इन्दिरा के साथ स्त्री की सम्भावना रही है इसलिए यह रानी उसी गुहा से संभोग करती है ॥२८॥