भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बर १११ यह सुनकर वीर शृंगभुज उन कपटियों से बोला—'धीरज रखो। घबराओ मत। डरो मत। मैं उस नीच राक्षस को मारकर उस बाण को लाऊँगा। ऐसा कहकर शृंगभुज अपने धनुष-बाण लेकर ज़मीन पर गिरती हुई रक्त-धारा का अनुकरण करता हुआ चला ॥७४-७६॥ इस प्रकार प्रसन्न होकर अन्य राजपुत्रों के अपनी माताओं के समीप चले जाने पर वह शृंगभुज जिस दिशा को बगुला भागा था उस दिशा की ओर बगुले के पीछे-पीछे जंगल में चला गया ॥७७॥ उसने उस घोर जंगल में बगुले को खोजते हुए उसके भीतर एक महान् नगर को ऐसे देखा जैसे मानों पुण्य-रूपी वृक्ष का भोग के लिए आया हुआ फल हो ॥७८॥ उस नगर के उद्यान में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उसने आश्चर्यमय रूपवाली आती हुई कन्या को देखा ॥७९॥ विरह में प्राण हरण करनेवाली और संगम म अमृतमयी वह कन्या विधाता ने विचित्र रूप से विष और अमृत के सम्मिश्रण से बनाई थी ॥८०॥ धीरे-धीरे समीप आई हुई और अमृत बरसानेवाली आँखों से देखती हुई उससे राजकुमार ने पूछा ॥८१॥ 'हे मृगनयनी ! इस नगर का क्या नाम है ? यह नगर किसका है और तू कौन है ? और यहाँ कैसे आई है। यह सब कहो ॥८२॥ तब मुख को कुछ टेढ़ी की हुई भूमि पर आँखें गड़ाई हुई वह सुन्दर दाँतोंवाली कन्या मीठी और स्नेह-भरी भाषा में बोली—॥८३॥ यह धूमपुर नामक नगर है। यह समस्त सम्पत्तियों का घर है। इस नगर में राक्षसों में श्रेष्ठ अग्निदिश नामक राक्षस रहता है ॥८४॥ मैं उसी के नाम के अनुसार रूपवाली रूपशिखा नाम की कन्या हूँ। तुम्हारे असाधारण रूप से आकृष्ट होकर यहाँ आई हूँ ॥८५॥ अब तुम बताओ कि तुम कौन हो ? और यहाँ कैसे आये हो ? उसके ऐसा कहने पर शृंगभुज ने अपना अपने पिता का और बगुले पर बाण चलाने आदि का सारा वृत्तान्त कह सुनाया और बताया कि वह पिता का सुनहरा बाण लाने के लिए धूमपुर आया है ॥८६-८७॥ तब उसके विचार को जानकर रूपशिखा उससे बोली कि तुम्हारे समान धनुर्धारी तीनों लोक में नहीं है ॥८८॥