भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक १२१ तदनन्तर अपनी पत्नी रूपशिखा के विद्या-वैभव की प्रशंसा करता हुआ राजकुमार निर्भय होकर धूमपुर पहुँच गया ॥१४९॥ उसके बाद रूप शिखा का घोड़ा वापस करते हुए प्रसन्न हृदया उससे जैसी घटना हुई, कह सुनाई। तदनन्तर वह अग्नि शिख के पास गया ॥१५०॥ जब उसने अग्निशिख से कहा कि मैंने तुम्हारे भाई धूमशिख का निमन्त्रित कर दिया। ऐसा कहते हुए शृंगभुज को घबराया हुआ अग्निशिख बोला कि यदि तुम यहाँ गये थे तो वहाँ का कुछ चिह्न (निशानी) बताओ ऐसा कहते हुए उस कुटिल राक्षस से शृंगभुज बोला ॥१५१ १५२॥ 'सुनो ! मैं उस मन्दिर का चिह्न बतलाता हूँ। उसमें शिवजी के बायें पार्वती और दाहिने गणपति बिराजते हैं ॥१५३॥ यह सुनकर विस्मित अग्निशिख सोचने लगा कि आश्चर्य है कि मेरा भाई इस मनुष्य को क्यों खा न सका ! अतः मैं समझता हूँ कि यह मनुष्य नहीं निश्चय ही कोई देवता है। इसलिए, यह मेरी कन्या के लिए उपयुक्त वर है ॥१५४ १५५॥ ऐसा सोचकर उसने उस सफल राजकुमार को रूपशिखा के पास भेज दिया किन्तु उसे बाण मारकर अपना अंग-भंग करनेवाला नहीं समझ सका ॥१५६॥ विवाह के लिए उत्सुक शृंगभुज ने खा-पीकर रूपशिखा के साथ किसी तरह रात बिताई ॥१५७॥ प्रातःकाल ही अग्निशिख ने अपने वैभव के अनुसार दान-दहेज आदि देकर अग्नि के साक्ष्य में रूपशिखा का विवाह कर दिया ॥१५८॥ कहाँ राजकुमार और कहाँ राक्षस की पुत्री—उन दोनों का विवाह एक विचित्र दैवी घटना ही है ॥१५९॥ वह राजपुत्र उस प्यारी राक्षस-कन्या को प्राप्त कर इस प्रकार शोभित हुआ जैसे हंस ग्रीष्म में उत्पन्न कमलिनी को पाकर शोभित होता है ॥१६०॥ इस प्रकार राक्षस की सिद्धि द्वारा प्राप्त भोगों को भोगता हुआ शत्रुंजय शृंगभुज रूपशिखा के साथ श्वशुर-गृह में रहने लगा ॥१६१॥ कुछ दिनों के व्यतीत होने पर उसने एकबार एकान्त में रूपशिखा से कहा—'प्रिये ! चलो वर्धमान नगर को चलो। वह हमारी राजधानी है। उससे इस प्रकार दूर रहना मेरे लिए सहन नहीं किया जा सकता क्योंकि मेरे जैसे व्यक्ति का वह धर्म ही है ॥१६२—१६३॥ १६