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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सप्तम लम्बक १२१

सप्तम लम्बक १२१ तदनन्तर अपनी पत्नी रूपशिखा के विद्या-वैभव की प्रशंसा करता हुआ राजकुमार निर्भय होकर धूमपुर पहुँच गया ॥१४९॥ उसके बाद रूप शिखा का घोड़ा वापस करते हुए प्रसन्न हृदया उससे जैसी घटना हुई, कह सुनाई। तदनन्तर वह अग्नि शिख के पास गया ॥१५०॥ जब उसने अग्निशिख से कहा कि मैंने तुम्हारे भाई धूमशिख का निमन्त्रित कर दिया। ऐसा कहते हुए शृंगभुज को घबराया हुआ अग्निशिख बोला कि यदि तुम यहाँ गये थे तो वहाँ का कुछ चिह्न (निशानी) बताओ ऐसा कहते हुए उस कुटिल राक्षस से शृंगभुज बोला ॥१५१ १५२॥ 'सुनो ! मैं उस मन्दिर का चिह्न बतलाता हूँ। उसमें शिवजी के बायें पार्वती और दाहिने गणपति बिराजते हैं ॥१५३॥ यह सुनकर विस्मित अग्निशिख सोचने लगा कि आश्चर्य है कि मेरा भाई इस मनुष्य को क्यों खा न सका ! अतः मैं समझता हूँ कि यह मनुष्य नहीं निश्चय ही कोई देवता है। इसलिए, यह मेरी कन्या के लिए उपयुक्त वर है ॥१५४ १५५॥ ऐसा सोचकर उसने उस सफल राजकुमार को रूपशिखा के पास भेज दिया किन्तु उसे बाण मारकर अपना अंग-भंग करनेवाला नहीं समझ सका ॥१५६॥ विवाह के लिए उत्सुक शृंगभुज ने खा-पीकर रूपशिखा के साथ किसी तरह रात बिताई ॥१५७॥ प्रातःकाल ही अग्निशिख ने अपने वैभव के अनुसार दान-दहेज आदि देकर अग्नि के साक्ष्य में रूपशिखा का विवाह कर दिया ॥१५८॥ कहाँ राजकुमार और कहाँ राक्षस की पुत्री—उन दोनों का विवाह एक विचित्र दैवी घटना ही है ॥१५९॥ वह राजपुत्र उस प्यारी राक्षस-कन्या को प्राप्त कर इस प्रकार शोभित हुआ जैसे हंस ग्रीष्म में उत्पन्न कमलिनी को पाकर शोभित होता है ॥१६०॥ इस प्रकार राक्षस की सिद्धि द्वारा प्राप्त भोगों को भोगता हुआ शत्रुंजय शृंगभुज रूपशिखा के साथ श्वशुर-गृह में रहने लगा ॥१६१॥ कुछ दिनों के व्यतीत होने पर उसने एकबार एकान्त में रूपशिखा से कहा—'प्रिये ! चलो वर्धमान नगर को चलो। वह हमारी राजधानी है। उससे इस प्रकार दूर रहना मेरे लिए सहन नहीं किया जा सकता क्योंकि मेरे जैसे व्यक्ति का वह धर्म ही है ॥१६२—१६३॥ १६

१२२ कथासरित्सागर

१२२ कथासरित्सागर तमूचे जन्मभूमिं स्वमटव्यामपि मत्कृते । आवेद्य पितुस्तं च हस्ते ह्यम्बर कुरु ॥१६४॥ इति शृङ्गभुजेनोक्ता सा स रूपशिखाब्रवीत् । यदादिशसि तत्कार्यमार्यपुत्र मयाधुना ॥१६५॥ क्व जन्मभूः क्व स्वजनः सर्वमेतद् भवान् मम । न पतिव्यतिरेकेण सुस्त्रीणामपरा गतिः ॥१६६॥ तातस्यावेदनीयं तु नैतत्सोऽस्मान्हि न त्यजेत् । तस्मादविदितं तस्य गन्तव्यं क्रोधनस्य सः ॥१६७॥ आगमिष्यति यत् पश्चाद् बुद्ध्वा परिजनात्ततः । मोहयिष्याम्यबुद्धिं तं भीततुल्यं स्वविद्यया ॥१६८॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा प्रहृष्टः सोऽमरद्युतिः । दत्तरत्न्यार्धमानर्घरत्नपूर्णसमुद्गया ॥१६९॥ तयैवानीततन्पादसुवर्णक्षरया सह । आरुह्य खरवेगाख्यं तदीयं तुरगोत्तमम् ॥१७०॥ वञ्चयित्वा परिजनं स्वैरोद्यानभ्रमच्छलात् । ततः शृङ्गभुजः प्रायादर्धमानपुरं प्रति ॥१७१॥ गतयोर्दूरमध्वानं बुद्ध्वा सोऽग्निश्शिखस्तयोः । दम्पत्योराययौ पश्चाद्भ्रमसा राक्षसः क्रुधा ॥१७२॥ तस्यागमनवगोत्थं शब्दं श्रुत्वा च दूरतः । मार्गे रूपशिखा साध्व तं शृङ्गभुजमब्रवीत् ॥१७३॥ आर्यपुत्रागतस्तातो निवर्तयितुमेष नः । तत्त्वमास्वेह निःशङ्कः पश्यैतं वञ्चये कथम् ॥१७४॥ नैष द्रक्ष्यति साश्वं त्वां विद्ययाच्छादितं मया । इत्युक्त्वाश्वादवतीर्णा सा पुरुषं माययाऽकरोत् ॥१७५॥ इहायाति महद्रक्षस्तत्त्वं तूष्णीं क्षणं भव । इत्युक्त्वा काष्ठिकं चात्र वार्धं वनमागतम् ॥१७६॥ तत्कुठारेण काष्ठानि पाटयन्ती किलास्त सा । तदा रूपशिखा शृङ्गभुजे पश्यति सस्मिते ॥१७७॥ तावत् सोऽग्निशिखस्तत्र प्राप्यैव काष्ठिकाकृतिम् । दृष्ट्वावतीर्य भगनाम्मुङ पप्रच्छ राक्षसः ॥१७८॥

सप्तम लम्बक १२३

सप्तम लम्बक १२३ इसलिए, न त्यागने के योग्य भी इस अपनी जन्मभूमि को मेरे लिए छोड़ दे। अपने पिता से कह दे और उस सुगुहस्त ज्ञान को अपने हाथ में कर ले' ॥१६४॥ शृंगभुज के यह कहने पर रूपशिखा बोली—'हे प्राणप्रिय ! तुम जो आज्ञा देते हो उसे मैं अभी करती हूँ ॥१६५॥ जन्मभूमि क्या है ? और बन्धु-बान्धव क्या हैं ? मेरे तो तुम्हीं सब कुछ हो। सदाचारिणी स्त्रियों के लिए अपने पति के सिवा और क्या गति है ॥१६६॥ यहाँ से प्रस्थान की बात पिता से न कहनी चाहिए। वह हम लोगों को नहीं छोड़ेगा। इसलिए, उस पापी के बिना जाने ही चल देना चाहिए ॥१६७॥ यदि सबकों से समाचार जानकर पीछे आयेगा भी तो मैं उस मूर्ख राक्षस को अपनी माया से ठग लूँगी ॥१६८॥ रूपशिखा की बातें सुनकर दूसरे दिन शृंगभुज पिता का आधा राज्य पाई हुई और रत्नों से भरी हुई पिटारी साथ ली हुई एवं राजकुमार के मान के बाण का अभिभूत की हुई उस रूपशिखा के साथ उसीके शरवेग¹ नामक घोड़े पर चढ़कर बाग़ों में घूमने-टहलने के बहाने अपने सेवकों को ठगकर, वर्धमानपुरी की ओर चल पड़ा ॥१६९-१७१॥ उन दोनों के कुछ दूर निकल जाने पर उनके जाने का समाचार जानकर राक्षस अग्निशिख क्रोध में उनके पीछे आकाश-मार्ग से दौड़ा ॥१७२॥ उसके आने के वेग का शब्द दूर से सुनकर रूपशिखा शृंगभुज से बोली—'प्रिय ! मेरा पिता हम लोगों को लौटाने के लिए आया है। तुम तो यहाँ निश्शंक होकर बैठो। देखो मैं कैसे इसे ठगती हूँ॥१७३-१७४॥ मैं अपनी विद्या से तुझे ऐसा छिपा दूँगी कि वह घोड़े के साथ तुझे नहीं देख सकेगा । ऐसा कहकर रूपशिखा ने घोड़े से उतरकर पुरुष का रूप बना लिया ॥१७५॥ 'यहाँ एक बड़ा राक्षस आ रहा है तू कुछ दूर चल बैठ'—ऐसा कहकर लकड़ी काटने के लिए वन में आये हुए एक लकड़हारे से कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने लगी। उसे देखकर मूर्ख राक्षस आकाश से उतरा और पूछने लगा—॥१७६-१७८॥ १. तीर के समान तेज चलनेवाला।

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सप्तम लम्बक १२५

सप्तम लम्बक १२५

'क्यों भाई ! तुमने इस रास्ते से जाते हुए स्त्री और पुरुष को देखा है' ? तब पुरुष वेशधारिणी वह रूपशिखा कुछ खिन्न-सी हो कर बोली—'परिश्रम के पसीने से आँखें बन्द रहने के कारण हम दोनों ने किसी को नहीं देखा। 'हम आज राक्षसराज अग्निशिख को जलाने के लिए अधिक लकड़ियाँ काटने में व्यस्त हैं। यह सुनकर वह परममूर्ख राक्षस सोचने लगा—ओह ! मैं कैसे मर गया यदि ऐसा है तो उस कन्या से क्या करूँगा। जाता हूँ अपने घर पर अपने आदमियों से पूछता हूँ ॥१८ –१८२॥

ऐसा सोचकर वह अग्निशिख तुरन्त घर को लौटा और उसकी लड़की हँसती हुई पहले के समान स्त्री-वेश में आ गई और पति के साथ आगे चली ॥१८३॥

कुछ ही क्षणों में मुस्कराते हुए अपने कुटुम्बियों से मृत्यु का निश्चय करके राक्षस फिर लौटा वह अपन को जीवित समझकर और सुनकर प्रसन्न था ॥१८४॥

भयंकर शब्द के कारण राक्षस-पिता को फिर आते हुए जानकर घोड़े से उतरी रूपशिखा पति को अपनी माया से छिपा दिया और रास्ते में आते हुए किसी पत्रवाहक के हाथ से पत्र लेकर फिर पुरुष बन गई ॥१८५ १८६॥

इतने में ही राक्षस ने आकर उससे पूछा कि क्या तुमने स्त्री के साथ जाते हुए किसी पुरुष को देखा है ? ॥१८७॥

तब पुरुषरूपा रूपशिखा लम्बी साँस भरती हुई बोली— शीघ्रता के कारण मैंने किसी को नहीं देखा। आज युद्ध में शत्रु से मारे गये और अन्तिम श्वास लेते हुए राक्षसराज अग्निशिख से जम्बुखण्ड से रहनेवाले अपने भाई धूम्रशिख के पास राज्य-ग्रहण करने के लिए पत्र देकर भेजा गया मैं दूत हूँ ॥१८८–१९ ॥

यह सुनकर अग्निशिख घबराया और सोचने लगा कि 'क्या मुझे शत्रुओं ने मार डाला ? यह जानने के लिए वह फिर अपने घर को लौटा ॥१९१॥

'कहाँ मारा गया ? मैं तो स्वस्थ हूँ'—ऐसा उसने नहीं सोचा। ब्रह्मा की मूर्ख सृष्टि भी एक महान् आश्चर्य है ॥१९२॥

घर पहुँचकर, लोगों को हँसानेवाले समाचार को सुनकर मोह से बचा हुआ राक्षस फिर कन्या की खोज में नहीं लौटा ॥१९३॥

१२६ कथासरित्सागर

१२६ कथासरित्सागर सापि संमोह्य पितरं प्राग्वद्रूपधिया पतिम्। तमभ्यगात् पतिहितादन्यत् साध्व्यो न जानते ॥१९४॥ ततस्तया समं शृङ्गभुजः पत्न्या स सत्वरम्। आश्चर्यतुरगारूढो वर्धमानपुरं ययौ ॥१९५॥ तत्र बुद्ध्वा तमायान्तं युक्तं शृङ्गभुजं तया। पिता वीरभुजस्तस्य हृष्टोऽग्रे निर्ययौ नृपः ॥१९६॥ स दृष्ट्वा शोभितं बध्वा तं शौरिमिव भामया। प्राप्तां तदा नवां मेने नरेन्द्रो राज्यसम्पदम् ॥१९७॥ अश्वावतीर्णमेनं च पादलग्नं सवल्लभम्। उत्थाप्यालिङ्ग्य तनयं हर्षबाष्पाम्बु बिभ्रता ॥१९८॥ वधूप्रवेशकृतोदार निर्विच्छन्नममङ्गलः¹। प्रावेशयद्राजधानीं स ततो विहितोत्सवः ॥१९९॥ क्व गतोऽभूस्त्वमित्यत्र तेन पृष्टः सुतोऽथ सः। निजमाद्यन्तं शृङ्गभुजो वृत्तान्तमब्रवीत् ॥२००॥ आहूय तत्समक्षं च भ्रातृभ्यस्तत्समर्पयत्। स निर्वासभुजादिभ्यस्तेभ्यो हेममयं शरम् ॥२०१॥ तच्छ्रुत्वा च दृष्ट्वा च तेषु वीरभुजो नृपः। व्यरज्यत्सर्व्वेषु सुतेष्वेकं मेने च तं सुतम् ॥२०२॥ अथ स राजा मतिमान् सम्यगेवमचिन्तयत्। ज्ञातं यथैष विद्वेष्यादमूद्भिः प्रवासितः ॥२०३॥ पापैर्निरपराधोऽपि शत्रुभिर्भ्रातृनामभिः। तथैव नूनमेतेषां जननीभिर्मम प्रिया ॥२०४॥ मातास्य सा गुणवरा निर्दोषा दूषिता मृषा। तत्किं चिरेण पश्यामि यावदद्यैव निश्चयम् ॥२०५॥ इत्यालोच्य यथासद्दिनं नीत्वाभ्यगाद्भिशि। जिज्ञासुरयशोलेखां राज्ञीं तां स नृपोजशराम् ॥२०६॥ तदभ्यागमहृष्टा सा मद्यं तेनातिपायिता। रतान्तसुप्ता व्यस्पन्दामि तस्मिन् सजागरे ॥२०७॥ मिथ्या गुणवरायाश्चेत्साऽवदिष्याम दूषणम्। तत्किमेवमुपायास्यदयं राजा मामिह ॥२०८॥ १ निर्विन् निर्द्वन्द्व तस्यान्न राजननेव मङ्गलम्।

सप्तम लम्बक १२७

सप्तम लम्बक १२७ वह रूपशिखा इस प्रकार पिता को ठगकर और पति को लेकर चली गई। पतिव्रता स्त्रियाँ पति के हित को छोड़कर और कुछ नहीं जानतीं ॥१९४॥ तब शृंगभुज भी पत्नी के साथ शीघ्र ही उस आश्चर्यमय घोड़े पर चढ़ा हुआ शीघ्र ही वर्धमानपुर पहुँचा ॥१९५॥ यहाँ रूपशिखा के साथ आते हुए पुत्र शृंगभुज का पता पाकर उसका पिता वीरभुज प्रसन्न होकर उसकी अगवानी करने के लिए नगर से बाहर निकला ॥१९६॥ वहाँ पर सत्यभामा के साथ विष्णु के समान रूपशिखा के साथ शृंगभुज को देखकर राजा ने मानों नई राज्य-सम्पत्ति प्राप्त की ॥१९७॥ घोड़े से उतरकर पत्नी के साथ पैरों पर गिरते हुए पुत्र को उठाकर, आलिंगन करके आनन्द के आँसुओं से भरे नेत्रों से शोक-शमन रूपी मगल करता हुआ राजा हर्ष के साथ राजधानी में प्रविष्ट हुआ ॥१९८ १९९॥ 'तू कहाँ चला गया था ? —राजा से इस प्रकार पूछने पर शृंगभुज ने आरम्भ से सारा वृत्तान्त सुनाया। और अपने भाइयों को बुलाकर निर्भासभुज को वह सोने का बाण लौटा दिया ॥२ २ १॥ यह सब समाचार जानकर और पूछकर राजा वीरभुज अन्य सभी पुत्रों से विरक्त हो गया और केवल शृंगभुज को ही एकमात्र पुत्र मानने लगा ॥२ २॥ उस बुद्धिमान् राजा ने सोचा कि इसे द्वेष के कारण इन भाइयों ने भगा दिया था ॥२ ३॥ इन भाई कहलाने वाले पापी शत्रुओं ने जैसे इस निरपराध के साथ किया वैसे ही इसकी माता के साथ इनकी माताओं ने द्वेष के कारण पाप किया है ॥२ ४॥ इसकी माता गुणवरा निर्दोष है, उसे झूठा कलंकित किया गया है। तो देर क्यों करूँ ? आज ही इसका निश्चय करता हूँ ॥२ ५॥ ऐसा सोचकर सारे दिन पूर्व दिनों के समान कार्य करके राजा पता लगाने के लिए अयशोलेखा नाम की रानी के पास गया ॥२ ६॥ राजा के आकस्मिक आगमन से अति प्रसन्न अयशोलेखा को राजा ने अधिक शराब पिला दी। इस कारण शान्त-काल में सोई हुई वह रानी राजा के जागते रहने पर नशे में प्रलाप करने लगी ॥२ ७॥ यदि मैं गुणवरा को झूठा कलङ्क न लगाती तो क्या आज राजा इस प्रकार स्वयं मेरे पास आता ॥२ ८॥

१२८ कथासरित्सागर

१२८ कथासरित्सागर इति तस्या वचः श्रुत्वा सुप्ताया दुष्टचेतसः। उत्पन्ननिश्चयो राजा क्रोधादुत्थाय निर्ययौ ॥२०९॥ गत्वा स्वावासमानाय्य स जगाद महत्तरान्। उद्बुध्य तां गुणवरां स्नातामानयत द्रुतम् ॥२१ ॥ अयं क्षणो ह्यद्यतनो ज्ञानिनानिष्टशान्तये। तस्या मृग्गूढवासस्य कथितोऽभूत् किलावधिः ॥२११॥ तच्छ्रुत्वा तैस्तथेत्युक्त्वा गत्वा स्नाता विभूषिता। राज्ञी गुणवरा क्षिप्रमानिन्ये सा तदन्तिकम् ॥२१२॥ सतस्तौ दम्पती दीर्घविरहार्णवनिर्वृतौ। अन्योन्यालिङ्गनामृतौ निन्यतुस्तो विभावरीम् ॥२१३॥ अवर्णयत् स राजात्र देव्यै तस्यै मुदा तदा। तं शृङ्गभुजवृत्तान्तं तदेवं निजसूनवे ॥२१४॥ साच प्रबुद्धा राजानं गतं बुद्ध्वा सवाश्छलम्। सम्भाव्येवायशोभीता विषादमगमत्परम् ॥२१५॥ प्रातश्च स नृपो वीरभुजो गुणवरान्तिकम्। वानामयच्छृङ्गभुजं सुतं रूपशिखायुतम् ॥२१६॥ सोऽभ्येत्य मातरं दृष्ट्वा हृष्टो मृद्गृहनिर्गताम्। तयोर्ववन्दे चरणौ पित्रोर्नववधूततः ॥२१७॥ अभ्योत्तीर्णं समाश्लिष्य पुत्रं गुणवरापि सा। तां च स्नुषां तथा प्राप्तामुत्सवादुत्सवं ययौ ॥२१८॥ तत पितुर्निवेशात् स तस्यै शृङ्गभुजोऽब्रवीत्। विस्तरेण स्ववृत्तान्तं यच्च रूपशिखाकृतम् ॥२१९॥ ततो गुणवरा राज्ञी सा प्रहृष्टा जगाद तम्। किं किं न रूपशिखया कृतं पुत्र त्वदानया ॥२२ ॥ हित्वा स्वजीवितं बन्धून् देशं बहु यदेतया। भीष्योतानि प्रवृत्तानि तुभ्यं चित्रचरित्रया ॥२२१॥ त्वदर्थमवतीर्णैषा कापि देवी विधेर्वशात्। पतिव्रतानां सर्वासाम् यया मूर्ध्नि पदं कृतम् ॥२२२॥ एवमुक्ते तया राज्ञ्या सद्वाक्यमभिनन्दति। राज्ञि रूपशिखायां च विनयानतमूर्धनि ॥२२३॥

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१५ कथासरित्सागर

१५ कथासरित्सागर आययौ स तयैव प्रागयशोलिखया नृपा । दूषितोऽन्तःपुराध्यक्षो भ्रान्ततोयं सुरक्षितः ॥२२४॥ क्षत्रा निवेदितः स च प्रहृष्टः घरणानतम् । ज्ञातार्थोऽपूजयद्राजा भृशं धीरभुजोऽप्य सः ॥२२५॥ तेनैवानाय्य चान्यास्ता राज्ञीरेव दुर्जनीः । तमवोवाच गच्छैता भूगृहे निशिराः क्षिप ॥२२६॥ तच्छ्रुत्वा तासु भीतासु क्षिप्तासु कृपया नृपम् । तं सा गुणवरा देवी पादलग्ना व्यजिज्ञपत् ॥२२७॥ देव मामेव भूयोऽपि चिरं स्थापय भूगृहे । प्रसीद नैवमेता हि भीताः शक्नोमि वीक्षितुम् ॥२२८॥ इति प्रार्थ्य नृपं तासां वधनं सा न्यवारयत् । महतामनुकम्पा हि विरुद्धेषु प्रतिक्रिया ॥२२९॥ ततस्ताः प्रेषिताः राज्ञा लज्जिताः स्वगृहान् ययुः । अनिष्टमपि वाञ्छन्त्यो दीयमानं मुजान्तरम् ॥२३०॥ तां च राजा गुणवरां बहु मेने महाशयाम् । आत्मानं च तया पत्न्या कृतपुण्यममन्यत ॥२३१॥ अथानाय्य सुतानन्यान् स निर्वासिभुजादिकान् । निर्वासयिष्यन् युक्त्या तान् राजा कृतकमभ्यधात् ॥२३२॥ श्रुतं मया वणिक पापैर्भवद्भिः पथिको हतः । तद्वभास्तु सर्वतीर्थानि यात मा स्मेह तिष्ठत ॥२३३॥ तच्छ्रुत्वा त च शेकुस्ते नृपं बोधयितुं नृपाः । प्रभौ दृढप्रभूते हि कस्य प्रत्ययना भवेत् ॥२३४॥ ततस्तान् गच्छतो दृष्ट्वा भ्रातृन् शृङ्गभुजोऽप्य सः । कृपोद्भूताश्रुपूर्णाक्षः पितरं तं व्यजिज्ञपत् ॥२३५॥ तातापराधमेकं त्वं क्षमस्वैषां कृपां कुरु । इत्युक्त्वा पादयोस्तस्य निपपात स भूपतेः ॥२३६॥ सोऽपि मत्वा मरेन्द्रस्तं भूभृद्भारसहं सुतम् । यनोदयाधित बाष्पऽप्यवतारे हरेरिव ॥२३७॥ गुडांगया गैररथी वचस्तस्य तथाकरोत् । तेऽपि तं भ्रातरः सर्वे प्राणान् ममिरे निजम् ॥२३८॥

सप्तम लम्बक १९१

सप्तम लम्बक १९१ इतने में ही अशोकलत्ता रानी के द्वारा झूठा कलंकित किया गया रनिवास का अध्यक्ष सुरक्षित तीर्थयात्रा करके आ पहुँचा ॥२२४॥ प्रतिहार से सूचित और पैरों पर गिरे हुए उस प्रशंसित सुरक्षित को सच्ची बात जानते हुए राजा वीरभुज ने बहुत सम्मानित किया ॥२२५॥ सारी दुष्ट रानियों को बुलाकर वहीं पर राजा ने उस सुरक्षित से कहा—'जाओ इन सब को भू-गृह में डाल दो। यह सुनकर उन सब को ले जाकर भू-गृह (तहखान) में डाल देने पर दया- वती रानी गुणवरा राजा के चरणों में गिरकर प्रार्थना करने लगी—'हे आर्यपुत्र ! तुम फिर मुझे ही भू-गृह में डाल दो प्रसन्न हो जाओ ! मैं इन डरी हुई सौतों को नहीं देख सकती' ॥२२६-२२८॥ इस प्रकार, प्रार्थना करके महारानी ने उन्हें बन्धन से छुड़ा लिया। उच्च कोटि के व्यक्तियों की विरोधियों पर कृपा ही बदला लेने के रूप में होती है ॥२२९॥ रानी गुणवरा का अनिष्ट चाहती हुई भी उसके द्वारा बचाई गई सभी रानियां लज्जित होकर अपने-अपने भवन को लौट गईं ॥२३०॥ राजा उदारहृदय उस गुणवरा रानी को भी बहुत मानने लगा और उस पत्नी के कारण अपने-आपको पुण्यवान समझने लगा ॥२३१॥ तब युक्तिपूर्वक निर्वासित करने के निमित्त निर्वासभुज आदि दूसरे पुत्रों को बुलाकर उस राजा ने यह बनावटी बात कही—॥२३२॥ 'मैंने सुना है कि आप अधम बनिकों ने एक पथिक को मार डाला है। इसलिए, आप सभी तीर्थ में घूमने के लिए चले जायें यहाँ न रहें' ॥२३३॥ यह सुनकर वे राजकुमार राजा को (निर्दोष होने का) विश्वास नहीं दिला पाये। क्योंकि प्रभु के हठ पकड़ लेने पर किसको विश्वास दिखाया जा सकता है ? २३४॥ तत्पश्चात् शृंगभुज ने भाइयों को जाते हुए देखा और उसकी आँखें दया से भर आईं। तब उसने अपने पिता से प्रार्थना की—॥२३५॥ 'पिता जी मेरे एक अपराध को आप क्षमा कर दें। इनपर कृपा करें'। यह कहकर वह उस राजा के चरणों पर गिर पड़ा ॥२३६॥ वह राजा भी उस पुत्र को राज्य-भार के उठाने में समर्थ और बचपन में भी यश और दया का आश्रय जानकर समझने लगा कि यह बचपन में गोवर्धन पर्वत के भार को उठानेवाले यशोदा माता से आश्रित भगवान् कृष्ण का अवतार है ॥२३७॥ गंभीर-हृदयवाले उस राजा ने बेटे को बचाने के लिए उसकी प्रार्थना मान ली। उन सभी भाइयों ने भी उस भाई को अपना प्राणदाता मान लिया ॥२३८॥

१३२ कथासरित्सागर

१३२ कथासरित्सागर सर्वाः प्रकृतयोऽप्यत्र तस्य शृङ्गभुजस्य तम्। गुणातिशयमालोक्य दधुस्तद्बहुरागिताम् ॥२३९॥ ततोऽन्यदुर्गुणज्येष्ठ तज्ज्येष्ठेष्वपि सत्सु सः। पिता वीरभुजो राजा यौवराज्येऽभिषिक्तवान् ॥२४०॥ स च प्राप्ताभिषेकः सन् दिग्विजयाय ययौ ततः। विज्ञाप्य पितरं सर्वबलैः शृङ्गभुजः सह ॥२४१॥ बाहुवीर्यजिताशेषवसुधाधिपमण्डलम् । आदाय जायतौ दिक्षु प्रविकीर्य यशःश्रियम् ॥२४२॥ ततो वहन् राज्यभारं प्रणतैर्भ्रातृभिः सह। निश्चिन्तभोगसुखितौ रञ्जयन् पितरौ कृती ॥२४३॥ दानं ददद् ब्राह्मणेभ्यस्तस्थौ शृङ्गभुजः सुखी। रूपवत्यार्थसिद्धयेश स रूपशिखया सह ॥२४४॥ इत्यनया पतिं साध्व्यः सर्वकारमुपासते। एते गुणवरारूपशिखे श्वश्रूसूनू यथा ॥२४५॥ इति नरवाहनदत्तो हरिशिखमुखात् कथामिमां श्रुत्वा। रत्नप्रभासमेतः साध्विति जल्पंस्तुतोष परम् ॥२४६॥ उत्थाय चाह्निकमथाशु विधाय गत्वा वत्सेश्वरस्य निकटं स पितुः सभायाम्। भुक्त्वापराह्णमतिवाह्य च गीतवाद्यैः स्वान्तःपुरे सदयितो रजनीं निनाय ॥२४७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके पञ्चमस्तरङ्गः।

षष्ठस्तरङ्गः मघवद्गवियोगदुःखयोः परस्परं वाग्विलासः ततः प्रातः पुनर् रत्नप्रभासद्मनि तं स्थितम्। नरवाहनदत्तं ते गोमुखाद्या उपागमन् ॥१॥

सप्तम लम्बक ११५

सप्तम लम्बक ११५ इस स्थिति में सभी प्रजाओं ने भी उस शृंगभुज के ऐसे विशिष्ट गुण को देखा और उसके प्रति उनका अनुराग दृढ़मूल हो गया ।।२४१।। तब दूसरे दिन उस पिता राजा वीरभुज ने उसके दूसरे जेठे भाइयों के रहने पर भी गुणों से ज्येष्ठ उस शृंगभुज को ही युवराज-पद पर अभिषिक्त किया ।।२४२ ।। और तब वह शृंगराज युवराज-पद पर अभिषिक्त होकर पिता की आज्ञा लेकर घनी प्रकार की सेना के साथ दिग्विजय के लिए चला गया ।।२४३।। वह अपने बाहु-बल से समग्र पृथ्वी के राजमण्डल को जीत कर वापस चला आया साथ ही अपनी कीर्त्तिश्री को भी दिग्दिगन्त में बिखेर आया ।।२४४।। तत्पश्चात् कृतकृत्य वह शृंगभुज अपने विप्रज्ञ भाइयों के साथ राज्य-भार को सँभालता हुआ निश्चिन्त होकर भोग-सुख में लगे हुए माता-पिता को अनुरञ्जित करता रहा ब्राह्मणों को दान देता रहा और अर्थसिद्धि के समान रूपवती रूपशिखा के साथ दिन बिताने लगा ।।२४५-२४६।। इस प्रकार पतिव्रता स्त्रियाँ सभी अवस्थाओं में अपने पतियों की अनन्य भक्ति से उपासना करती हैं, जैसे ये दोनों सास-पतोहू गुणवरा और रूपशिखा करती थीं ।।२४७।। इस प्रकार, नरवाहनदत्त हरिमुख के मुख से इस कथा को सुनकर रत्नप्रभा के साथ मिलकर 'साधु-साधु' कहता हुआ अत्यन्त संतुष्ट हुआ ।।२४८।। तब वह उठकर और शीघ्र दैनिक कृत्य करके अपनी पत्नी के साथ पिता वत्सराज के पास गया। तानन्तर अपराह्न में संगीत से दिन बिताकर उसने प्रियतमा के साथ अपने अन्त पुर में रात बिताई ।।२४९।। महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का पंचम तरंग समाप्त षष्ठ तरंग भवभूति और गोमुख का पारस्परिक वाक्कलह तदनन्तर प्रातः काल रत्नप्रभा के महल में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास गोमुख आदि मन्त्री पुनः आये ॥१॥

१३४ कथासरित्सागर

१३४ कथासरित्सागर मरुभूतिः स तु मनाक्पीतासवमदालसः। बद्धपुष्पोज्झितस्रज विलम्बित उपाययौ ॥२॥ प्रस्खलत्पद्यया गत्या हासयंस्त गिरा तदा। तत्प्रीतिरञ्चितमुखो नर्मणोवाच गोमुखः ॥३॥ यौगन्धरायणसुतो भूत्वा नीतिं न वेत्सि किम्। प्रात पिबसि मद्य यन्मत्त प्रभुपैषि ध ॥४॥ तच्छ्रुत्वा तं रुषा क्षीबो मरुभूतिर्जगाद सः। एतन्मे प्रभुणा वाच्यममुना गुरुणापि वा ॥५॥ त्वं तु क शिक्षयसि मामित्याकार्मज रे वद। इत्युक्तवन्तं तं भूयो हसन्नाह स्म गोमुखः ॥६॥ भर्त्सयन्त्यविनीत किं स्वभावा प्रभविष्णवः। अवश्य तस्य वक्तव्य यत्पादस्पर्शयोचितम् ॥७॥ सत्यं चटकपुत्रोऽहं त्वं मन्त्रिवृषम पुनः। भक्ति ते जाल्ममेवैतद्द्रिवाण स्त परं न ते ॥८॥ इत्युक्तो गोमुखेनाथ मरुभूतिरभाषत। तवेव शृण्मत्वं हि गोमुखस्योपपद्यते ॥९॥ तथापि यदचान्तोऽसि सोऽयं ते जातिसङ्करः। एतच्छ्रुत्वा च सर्वेषु हसत्सूवाच गोमुखः ॥१ ॥ मरुभूतिरयं रत्न जातु यत्नशतैरपि। अवश्यं वयमेतस्मिन्गूण को हि प्रचक्षतेत् ॥११॥ सिकतासेतुवृत्तान्तः मन्यत्युक्षरत्नं तद्यदयरत्नन वध्यत। सिकतासेतुवृत्तान्तं शृणु चात्र निदर्शनम् ॥१२॥ आसीत्कोऽपि प्रतिष्ठाने तपोदत्त इति द्विजः। स पित्रा क्लिश्यमानोऽपि विद्यां नाभ्यस्त शैशवे ॥१३॥ अनन्तरं गृहंमाज सर्वैरनुशयान्वितः। स विद्यासिद्धय यप्तुं तपो गङ्गातटं ययौ ॥१४॥ तत्राश्रितोग्रतपसस्तस्य तं वीक्ष्य विस्मितः। बारयिष्यन्दिजश्छद्मा शत्रे निकटमाययौ ॥१५॥ आगत्य च स गङ्गायास्तटाद्भिरोप भारिणि। उद्यतोदस्य सिकता पद्यतन्तम्स्य भोर्भिणि ॥१६॥

सप्तम लम्बक १३५

सप्तम लम्बक १३५ किन्तु, मरुभूति मन्त्री मद्यके-मद में कुछ अलसाता हुआ फूलों का गजरा डाले और इत्र आदि लगाये हुए लड़खड़ाती हुई गति और जबान से अन्य मित्रों को हँसाता हुआ कुछ देर से आया उसकी इस दशा से मुस्कराते हुए गोमुख ने मजाक करते हुए कहा- ॥१३॥ 'तुम यौगन्धरायण के पुत्र होकर भी नीति नही जानते। प्रातःकाल शराब पीते हो और नशे की बेहोशी में राजा के पास आते हो ? ॥१४॥ यह सुनकर क्रोध से बेहोश मरुभूति गोमुख से बोला- यह बात तो या मेरे स्वामी (राजा) या मेरे पिता कह सकते हैं ॥१५॥ अरे द्वारपक (द्वारपाल) के बच्चे ! बोलते तो सही। तुम मुझे शिक्षा देते हो? ऐसा कहते हुए मरुभूति से गोमुखने फिर कहा- क्या प्रभुजन अविनीत (उद्दण्ड) को अपनी बातों से फटकारते हैं। ऐसी बातें तो राजा के पार्श्ववर्ती व्यक्ति ही कह रहे हैं। यह सच है कि मैं द्वारपक (द्वारपाल) का पुत्र हूँ और तुम मन्त्रिवृषभ (बैल और श्रेष्ठ) हो। तुम्हारी यह स्थिति ही तुम्हारी मूर्खता (बैलपन) बता रही है। केवल दो सींग ही तो नहीं हैं। ॥१६-८॥ गोमुख से ऐसा कहा गया मरुभूति बोला--'बैलपन तो तुम्हें ही अधिक सजता है तुम्हारा नाम ही गौ-मुख है। फिर भी जो तुम्हारी उद्दण्डता है, उसका कारण तुम्हारी वर्णसंकरता ही है' यह सुनकर सब लोगों के हँस देने पर गोमुख फिर बोला-॥१९-१॥ यह मरुभूति वह रत्न है जिसमें सैकड़ों यत्न करने पर भी इस अभेद्य रत्न में बाण (गुण) का प्रवेश कौन करा सकता है॥ ११॥ दूसरा कोई पुरुष रत्न हो तो उसका बेधन बिना प्रयत्न के ही हो जाता है। इस प्रसंग में चिरन्ता-शत्रु का उदाहरण सुनाता हूँ।-॥१२॥ चिरन्ता-शत्रु की कथा प्रतिष्ठान नामक नगर में तारादत्त नाम का कोई ब्राह्मण था वह पिता के अनेक कष्ट देने पर भी बाल्यावस्था में अध्ययन नहीं कर सका ॥१३॥ पिता के मरने पर सभी लोगों से तिरस्कृत किया जाता हुआ वह अत्यन्त विरक्त होकर विद्या की सिद्धि के लिए श्मशान पर जप करने गया ॥१४॥ वहाँ पर अत्यन्त उग्र तपस्या में लगे हुए उस देखकर आश्चर्य चकित दूसरे ब्राह्मण ने वट- बेल से वहाँ गया ॥१५॥ वहाँ पर बैठकर दूर संन्यासीने गंगा के जल से बाल गुण लगाकर पैंजन लगा और वह ब्राह्मण उसे देखता रहा ॥१६॥

१६६ कथासरित्सागर

१६६ कथासरित्सागर तद्दृष्ट्वा मुक्तमौनस्तं तपोदत्तः स पृष्टवान्। अथान्तः किमिदं ब्रह्मन्करोषीति सकौतुकम् ॥१७॥ निर्बन्धपृष्टः स च तं शक्रोऽब्रवीद् द्विजाकृतिः। सेतुं बध्नामि गङ्गायां ताराय प्राणिनामिति ॥१८॥ ततोऽब्रवीत्तपोदत्तः सेतुः किं मूर्ख बध्यते। गङ्गायामोघहार्याभिः सिकताभिः कदाचन ॥१९॥ तच्छ्रुत्वा समुवाचैनं शक्रोऽथ द्विजरूपधृक्। यद्येवं वेत्सि तद्विद्यां विना पाठं विना श्रुतम् ॥२०॥ कस्माद्व्रततपःसाध्यैस्त्वं साधयितुमुद्यतः। इयं शशविषाणेच्छा व्योम्नि वा चित्रकल्पना ॥२१॥ अनक्षरो लिपिन्यासो यदिच्छाध्ययनं विना। एवं यदि भवेदेतन्नाधयीत कश्चन ॥२२॥ इत्युक्तः स तपोदत्तः शकेण द्विजरूपिणा। विचार्य तत्तथा मत्वा तपस्त्यक्त्वा गृहं ययौ ॥२३॥ एवं सुधीः सुखं बोध्यो मरुभूतिस्तु दुर्मतिः। न शक्यते बोधयितुं बोध्यमानश्च कुप्यति ॥२४॥ इत्युक्ते गोमुखेनाऽत्र मध्ये हरिशिखोऽभ्यधात्। भवन्ति सुखसम्बोध्याः सत्यं देव सुमेधसः ॥२५॥ विरूपशर्मणो ब्राह्मणस्य कथा तथा च पूर्वमभवद् वाराणस्यां द्विजोत्तमः। कश्चिद् विरूपशर्माख्यो विरूपो निर्धनस्तथा ॥२६॥ स च वैरूप्यदौर्गत्यनिर्विण्णस्तत्तपोवनम्। गत्वा तीव्रं तपश्चक्रे रूपद्रविणकाङ्क्षया ॥२७॥ अथ सुरपतिः कृत्वा विकटव्याधिताकृतेः। जम्बुकस्याधमं रूपमस्याग्रे तस्य तन्मियान् ॥२८॥ तं विलोक्य परीताङ्गमक्षिकाभिरसृक्स्रवम्। विरूपशर्मा धनकर्मणसा विममर्श सः ॥२९॥ ईदृशा अपि जायन्ते संसारे पूर्वकर्मभिः। तन्ममाल्पमिदं धात्रा कृतं यन्मद्वपुः कृत ॥३०॥ को दैवविलिखितं भोगं रुद्धयेदित्यवेक्ष्य सः। विरूपशर्मा धतकैस्तपःस्थानाद्ययौ गृहम् ॥३१॥

सप्तम लम्बक [१३७]

सप्तम लम्बक [१३७]

उसके इस खेल को देखकर वह ब्राह्मण तपस्या मौन भंग करके बोला—'हे ब्राह्मण ! बिना रुकावट के यह तुम क्या कर रहे हो ? ॥१७॥ आग्रहपूर्वक पूछने पर ब्राह्मण बना हुआ इन्द्र बोला—'जीवों को गंगा पार जाने के लिए पुल बाँध रहा हूँ'। ॥१८॥ यह सुनकर तपोदत्त बोला—'हे मूर्ख ! लहरों से इधर-उधर बिखरनेवाली बालू से भला कहीं पुल बँधता है ? ॥१९॥ यह सुनकर ब्राह्मण-रूपी इन्द्र बोला—'यदि तुम यह समझते हो तो तुम बिना पढ़े-सुने विद्या कैसे प्राप्त करोगे ? ॥२० ॥ व्रत और उपवास आदि से तुम विद्या प्राप्त करने के लिए क्यों उत्सुक हो रहे हो। यह तो खरगोश के सींग के समान या आकाश में चित्र रचना के समान व्यर्थ बात है॥२१॥ बिना अक्षर जाने लिखना और बिना अध्ययन के विद्या प्राप्ति हो जाय तो कोई भी कभी अध्ययन न करे'॥२२॥ ब्राह्मण-रूपी इन्द्र से इस प्रकार कहा गया तपोदत्त ब्राह्मण उसकी बात पर विचार कर और उसे ठीक मानकर तप करना छोड़कर घर चला गया ॥२३॥ इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति को सरलता से ज्ञान कराया जा सकता है, किन्तु मरुभूति तो दुष्टबुद्धि है। इसे जताया नहीं जा सकता। कुछ बताने या ज्ञान देने पर क्रुद्ध हो जाता है॥२४॥ गोमुख के ऐसा कहने पर हरिशिख ने बीच में ही कहा—'राजन् ! यह सच है बुद्धिमान् व्यक्ति को सरलता से ही समझाया जा सकता है' ॥२५॥ इस प्रसंग में कथा सुनें—

विरूपशर्मा ब्राह्मण की कथा पूर्वकाल में वाराणसी नगरी में विरूपशर्मा नाम का एक दरिद्र ब्राह्मण था॥२६॥ वह अपनी कुरूपता और दरिद्रता से अत्यन्त विरक्त होकर जंगल में जाकर रूप और धन की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने लगा ॥२७॥ तब देवराज इन्द्र बिगड़े और बीमार सियार का रूप धारण करके उसके आश्रम में आकर उसके समीप पड़े हुए। सड़े-गले और मक्खियों से भरे शरीरवाले उस सियार को देखकर विरूपशर्मा अपने मन में सोचने लगा ॥२८-२९॥ संसार में अपने पूर्व कर्मों के कारण ऐसे प्राणी भी होते हैं। इस दृष्टि से दैव ने मुझे बहुत अल्प मात्रा में कुरूप और कुत्सित बनाया है। दैव के लिखे हुए भागों का कौन उल्लंघन कर सकता है ? ऐसा समझकर विरूपशर्मा तपस्या के स्थान से अपने घर वापस आ गया ॥३०-३१॥

१५८ कथासरित्सागर

१५८ कथासरित्सागर इत्थं सुबुद्धिरल्पेन दैव यत्नेन बोध्यते। न कृच्छ्रेणापि महता निर्विचारमतिः पुनः ॥३२॥ एवं हरिशिखनोक्ते श्रद्दधाने च गोमुखे। मरुभूतिरनात्मज्ञः क्षीबोऽतिकुपिरतोऽब्रवीत् ॥३३॥ वरं गोमुख वाच्यं न तु बाह्योर्भवादृशाम्। वाचालैः कुरुह क्लीबैनेत्रपाङ्गबाहुशालिनाम् ॥३४॥ इति ब्रुवाणं युध्यन्तुं मरुभूतिं स्मिताननः। नरवाहनदत्तोऽथ प्रभुः स्वयमसान्त्वयत् ॥३५॥ विसृज्य तं च स्वगृहं तं बालसखिवत्सलः। कुर्वन् दिवसकार्याणि निनाय सदहः सुखम् ॥३६॥ प्रातश्च सर्वेष्वायातेष्वथ मन्त्रिषु च प्रिया। रत्नप्रभा जगादैवं मरुभूतौ त्रपानते ॥३७॥ त्वमार्यपुत्र सुकृती यस्य च सचिवा इमे। आबाल्यस्नेहनिगडबिडाः शुद्धचेतसः ॥३८॥ एते च धन्या येषां त्वमीदृक स्नेहपरः प्रभुः। प्राक्कर्मोपार्जिता यूयमन्योन्यस्य न संशयः ॥३९॥ एवमुक्ते तया राज्ञ्या वसन्तकसुतोऽब्रवीत्। नरवाहनदत्तस्य नर्ममित्रं तपन्तकः ॥४०॥ सत्यं पूर्वाजितोऽयं नः स्वामी सच हि तिष्ठति। पूर्वकर्मवशादेव तथा च श्रूयतां कथा ॥४१॥ तरणचन्द्रवैद्यस्य राज्ञः अजस्य च कथा अभूच्छ्रीकण्ठनिलये विलासपुरनामनि। पुरे विनयशीलाख्या मान्धाज्यर्धेन भूपतिः ॥४२॥ तस्य प्राणसमा देवी बभूव कमलप्रभा। तया साकं च भोगैकसक्तस्तस्थौ चिराय सः ॥४३॥ अथ कालेन भूपस्य जरा सौन्दर्यहारिणी। तस्याविरासीत् तां दृष्ट्वा स चासीद्विदुःखितः ॥४४॥ हिमाहतमिवाम्भोजं पलितं म्लानमाननम्। दर्शयामि कथं वध्वे हा धिङ्मे मरणं वरम् ॥४५॥ इत्यादि चिन्तयन्सोऽथ सदस्याहूय भूपतिः। वैद्यं तरणचन्द्राख्यं विजगाद कृतादरः ॥४६॥

सप्तम लम्बक १६१

सप्तम लम्बक १६१ 'हे राजन्! इस प्रकार अच्छी बुद्धिवाले व्यक्ति साधारण प्रयत्न से ही समझाये जा सकते हैं। अविवेकी और दुर्बुद्धि व्यक्ति अत्यन्त कठिनाई से भी नहीं समझाये जा सकते ॥३२॥ हरिशिख के ऐसा कहने पर और गोमुख के समर्थन करने पर अनार्यमना मरुभूति अत्यन्त क्रोध करके बोला— हे गोमुख ! तुम्हारे ऐसे व्यक्तियों की वाणी में ही बल होता है भुजाओं में नहीं। इसलिए बकवादी नपुंसकों के साथ झगड़ा करना भुजबलग्रामी वीरों के लिए उचित नहीं है' ऐसा कहते हुए और युद्ध के लिए उद्यत मरुभूति को मुसकराते हुए स्वामी नरवाहनदत्त ने स्वयं शान्त किया ॥३३-३५॥ और, बालमित्रों पर प्रेम करनेवाले राजा नरवाहनदत्त ने उसे अपने घर वापस भेजकर दैनिक कार्यों में अपना दिन मजे में व्यतीत किया ॥३६॥ दूसरे दिन प्रातःकाल पुनः मित्रों के आने पर और मरुभूति के सिर नीचा किये रहने पर रत्नप्रभा युवराज से बोली— हे आर्यपुत्र ! तुम धन्य हो तुम्हारे ये सभी मन्त्री बाल्यकाल से स्नेह-सूत्र में बँधे और सुशिक्षित हैं ॥३७-३८॥ और ये भी धन्य हैं जिनके तुम सम स्नेहमय स्वामी हो। तुम लोग पूर्वजन्म के संस्कारों से परस्पर मिले हो इसमें सन्देह नहीं ॥३९॥ उस रानी रत्नप्रभा के ऐसा कहने पर कमलगर्भ का पुत्र एवं नरवाहनदत्त का नर्म-सचिव तान्डक बोला— यह सत्य है कि हमारे स्वामी पूर्वजन्म के अर्जित हैं। यह सब कुछ पूर्वजन्म के संस्कार-वश ही हुआ है। इस प्रसंग में एक कथा सुनें—॥४०-४१॥

तरङ्गदत्त वणिक और राजा अजर की कथा

पूर्वकाल में हिमालय में विद्याधरपुर नामक नगर में यथार्थ नामवाला विनयशील नामक राजा था ॥४२॥ उसकी प्राणों के समान प्यारी कमलप्रभा नाम की रानी थी। राजा उसके साथ सांसारिक सुखों के भोग में चिरकाल तक रहा ॥४३॥ कुछ समय के अनन्तर राजा अपने शरीर में सौन्दर्य का नाश करनेवाली वृद्धावस्था को आई देख अत्यन्त दुःखी हुआ ॥४४॥ सिर (केस) में सफेदी रूप चन्दन के समान सफेदी से मण्डित अपने मुख को देखकर— 'हाय! धिक्कार है! मैं अपना मुँह अपनी रानी को कैसे दिखाऊँ?' हृदय में ऐसा सोच कर लज्जा से अन्तः शान्त हुआ राजा ने तरङ्गदत्त नामक वैद्य को दरबार में बुलाकर आदर के साथ कहा ॥४५-४६॥

१४० कथासरित्सागर

१४० कथासरित्सागर भद्र भवत्स्वमस्मासु कुशलश्छेति पृच्छ्यसे। अप्यस्ति काचिद्युक्तिः सा ययेयं वार्यते जरा ॥४७॥ तच्छ्रुत्वैव कलामात्रसारो वाञ्छन् स पूर्णताम्। वक्रस्तरुणचन्द्रोऽत सत्यनामा व्यचिन्तयत् ॥४८॥ मूर्खोऽयं नृपतिर्मोघ्यो मया वेत्स्यामि च क्रमात्। इति सञ्चिन्त्य स भिषक् तमेवमवदन्नृपम् ॥४९॥ एकस्त्वं गूढे मासानष्टौ यदिदमोषधम्। उपयुङ्क्षे ततो दव जरामपनयामि ते ॥५०॥ एतच्छ्रुत्वैव स नृपस्तद्भूगृहमकारयत्। क्षमन्ते न विचारं हि मूर्खा विषयलोलुपाः ॥५१॥ राजन् सत्त्वेन पूर्वेषां तपसा च दमेन च। रसायनानि सिद्धानि प्रभावेण युगस्य च ॥५२॥ अद्यत्वे च श्रुतान्येव रसान्येतानि भूपते। सामर्थ्याभावात् कुर्वन्ति यत्प्रत्युत विपर्ययम् ॥५३॥ तन्न युक्तमिदं धूर्ताः क्रीडन्त्येव हि बालिशैः। किं श्व समतिक्रान्तमागच्छति पुनर्वयः ॥५४॥ इत्यादि मन्त्रिणां वाक्यं न लेभे तस्य चान्तरम्। आवृते हृदये राज्ञो गाढया मोगतृष्णया ॥५५॥ विवेश च गिरा तस्य भिषजस्तत् स भूगृहम्। एकाकी वारिताशेषराजोचितपरिच्छदः ॥५६॥ एको वैद्यः स्वभृत्येन सहैकेनव तस्य सः। तत्रौषधादिचर्यायां बभूव परिचारकः ॥५७॥ तस्थौ च तत्र स नृपो भूमिगर्भे तमामय। अज्ञान इव भूयस्त्वात् प्रसूते ह्वययाद्वहिः ॥५८॥ गतेषु चात्र मासेषु षण्मापध्वस्य भूपतेः। विलोक्याभ्यधिकीभूतां तां जरां स शठो भिषक् ॥५९॥ आजहार वमप्येवं पुत्रं तावदृशाकृतिम्। राजानं त्वां करोमीति युवानं कृतमंविदम् ॥६०॥ तत गुरुद्धा भूगृहे दूरात्स्थाप्य तं नृपम्। गुप्तं कृत्वा तया नीत्या गोत्रपन्नृपेतिक्षिपत्प्रिति ॥६१॥