कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक ६१
नवम लम्बक ६१ तदनन्तर शत्रुओं पर विजयी हुए राजा समरबल अपनी उस कंटक-रहित और समृद्धि- सम्पन्न राज्य का चिरकाल तक शासन करता रहा और अप्सराओं से भी अधिक रूप-लावण्यवाली विजय-पताका के समान यशोलेखा के साथ आनन्द भी उठाया ॥२३८॥ इस प्रकार, आवेग से प्रवृत्त द्वेष से व्याकुल और अपने-पराये स्वरूप को न जाननेवालों और असाधारण पुरुषार्थ के आगे चूर-चूर घमंडवालों को नीचक और पुंश्चल जीत लेता है ॥२३९॥ इस प्रकार गोमुख से कही गई यथार्थता से भरी कथा को सुनकर उसकी प्रशंसा करता हुआ नरवाहनदत्त अपने स्नान आदि दैनिक कृत्यों में लग गया ॥२४०॥ नरवाहनदत्त ने अपनी सभी पत्नियों के साथ संगीत-रस का पान करते हुए उस रात को भी बिताया। आकाश में गूँजती हुई उनकी स्वर-सरस्वती 'चिरजीवी हों' मानों ऐसा आशीर्वाद देती थी ॥२४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का चौथा तरंग समाप्त पञ्चम तरंग मरुभूति की कथा किसी एक दिन अलंकारवती के निवास-भवन में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास सभी मन्त्रियों की उपस्थिति में आकर मरुभूति के सेवक ने निवेदन किया। वह सेवक राजा के रनिवास के रक्षक कंचुकी का सहोदर भाई था ॥१-२॥ उसने कहा- महाराज मैंने दो वर्षों तक मरुभूति की सेवा की और इसने उन दो वर्षों तक तात्त्विक मुझे भोजन-वस्त्र दिया ॥३॥ इसने कहा था कि प्रतिवर्ष तुम पचास दीनार (सोने की मुहरें) दिया करूँगा किन्तु इसने वे मुझे नहीं दिये ॥४॥ मेरे माँगने पर इसने मुझे पैरों से ठोकर मारी इसलिए मैं आपके सिंहद्वार पर अनशन करने के लिए बैठा हूँ। यदि आप मेरा विचार न करेंगे तो मैं अग्नि प्रवेश करूँगा क्योंकि यह मेरा स्वामी है ॥५-६॥ ७६
६२ कथासरित्सागर
६२ कथासरित्सागर
इत्युक्त्वा विरतं तस्मिन् मरुभूतिरभाषत । देया ममास्मै दीनाराः साम्प्रतं तु न सन्ति मे ॥७॥ इत्युक्तवन्तं सर्वेषु प्रहसत्सु स्वमन्त्रिणम् । नरवाहनदत्तस्तं मरुभूतिमभाषत ॥८॥ किमेवं मूर्खमाधत्से नाधिकेयं मतिस्तव । उत्तिष्ठ दीनारशतं दद्यास्मा अविशङ्कितम् ॥९॥ एतत्प्रभोर्वचः श्रुत्वा मरुभूतिर्विलज्जितः । तदैवानीय दत्तस्मै स दीनारशतं ददौ ॥१०॥ ततोऽत्र गोमुखोऽवादीन्न वाच्या मरुभूतिवत् । विचित्रचित्तवृत्तिर्यत् सर्गो देव प्रजापतेः ॥११॥ युष्माभिरेषा किञ्चात्र चिरदातुर्महीपतेः । तत्सेवकस्य च कथा प्रसङ्गाख्यस्य न श्रुता ॥१२॥
चिरदातुर्नृपस्य तद्भृत्यस्य प्रसङ्गाख्यस्य च कथा
चिरदातेत्यभूत् पूर्वं राजा चिरपुरेश्वरः । सुजनस्यापि तस्यासीत् परिवारोऽतिदुर्जनः ॥१३॥ देशान्तरागतस्तस्य प्रसङ्गो नाम भूपतेः । मित्राभ्यां सहितो द्वाभ्यां बभूव किल सेवकः ॥१४॥ सेवां च कुर्वतस्तस्य व्यतीतं वर्षपञ्चकम् । न स राजा ददौ किञ्चिन्निमित्तेऽप्युत्सवादिके ॥१५॥ स च तस्य न सम्प्राप विज्ञप्त्यवसरं प्रभोः । परिवारस्य दौरात्म्यात् सख्योः प्रेरयतोः सदा ॥१६॥ एकदा तस्य राज्ञश्च बालः पुत्रो व्यपद्यत । दुःखितं यस्य सर्वेऽपि भृत्यास्तं पर्यवारयन् ॥१७॥ तन्मध्यं च प्रसङ्गाख्यः शोकादेव स सेवकः । शस्त्रिभ्यां वार्यमाणोऽपि राजानं तं व्यजिज्ञपत् ॥१८॥ बहुकालं वय देव सेवका न च नस्त्वया । दत्तं किञ्चित्तथापीह स्थिता स्मस्त्वत्सुताशया ॥१९॥ त्वया यदि न दत्तं तत्स्वपुत्रोऽस्मासु दास्यति । सोऽपि दैवेन नीतश्चेत् तन्न किञ्चिदिह साम्प्रतम् ॥२०॥
नवम लम्बक ६३
नवम लम्बक ६३ इतना कहकर उसके चुप हो जाने पर मरुभूति ने कहा—'महाराज मुझे इसे दीनार देने हैं, किन्तु इस समय मेरे पास नहीं हैं। मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और अन्य सभी मन्त्रियों के हँसने पर नरवाहनदत्त ने मरुभूति से कहा—'यह क्या तुम्हारी मूर्खता है? तुम्हारी ऐसी बुद्धि अच्छी नहीं है। जाओ इसे तुरन्त दीनार दो' ॥७-९॥ स्वामी की यह बात सुनकर मरुभूति लज्जित हुआ और उसने उसी समय लाकर सौ दीनार उसे दिये ॥१०॥ तब गोमुख ने कहा— इस सम्बन्ध में मरुभूति निन्दनीय नहीं हो सकता क्योंकि यह ब्रह्मा की सृष्टि ही विचित्र चित्तवृत्तियों की है ॥११॥ आप लोगों ने विलम्ब से वेतन देनेवाले राजा और उसके सेवक के प्रसंग की कथा नहीं सुनी? ॥१२॥ राजा चिरदाता और उसके प्रसंग नामक भृत्य की कथा पूर्वकाल में चिरपुर नगर का राजा विलम्ब से वेतन देनेवाला था। उसके स्वयं सज्जन होने पर भी उसका परिवार अत्यन्त दुष्ट था ॥१३॥ किसी दूसरे देश से आकर प्रसंग नाम का सेवक अपने दो मित्रों के साथ उस राजा के यहाँ आकर सेवा करने लगा ॥१४॥ सेवा करते हुए उसके पाँच वर्ष व्यतीत हो गये किन्तु राजा ने उत्सव त्यौहार आदि के समय भी उसे कुछ नहीं दिया। उस सेवक का दोनों साथियों के प्रेरित करने पर भी अन्य अधिकारियों की दुष्टता के कारण अपने स्वामी से निवेदन करने का अवसर नहीं मिला ॥१५-१६॥ एकबार उस राजा का छोटा-सा पुत्र मर गया। उस समय दुःखित राजा का सभी नौकरों ने आकर घेर लिया ॥१७॥ उसी समय वह प्रसंग नामक सेवक साथियों के रोक जाने पर भी शोक के आवेश में राजा से बोला—॥१८॥ 'स्वामिन् ! हमलोग बहुत समय से सेवक हैं किन्तु आपने कभी हम कुछ नहीं दिया। फिर भी हमलोग आपके इस पुत्र की आशा से आश्वासित रहते थे कि यदि आपने हम कभी कुछ नहीं दिया तो यह हम लोगों को देगा पर उसे भी इस दैव ने ले लिया तब यहाँ अब हमारा क्या रह गया ? ॥१९-२०॥
६४ कथासरित्सागर
६४ कथासरित्सागर
व्रजाम इति जल्पित्वा पतित्वा सोऽस्य पादयोः। राज्ञः प्रसङ्गतो निरगात् मन्त्रिद्वययुतस्ततः ॥२१॥ महो पुत्रेष्वपि बद्धास्था सेवका मे दृढा इमे। सर्वत ममन त्याज्या इति सञ्चिन्त्य तत्क्षणम्॥२२॥ स राजा तान् प्रसङ्गादीनानाय्यैव तथा धनैः। अपूरयद्यथा भूयो नतान् दारिद्र्यमस्पृशत्॥२३॥ एवं विचित्रा दृश्यन्त स्वभावा देव वहिनाम्। यत्कार्ये स नृपो नादावकाल तु ददौ तथा॥२४॥ इत्याख्याय कथास्थानपटुर्भूयः स गोमुखः। वत्सेश्वरसुतादेशादिमामक्कथयत्कथाम् ॥२५॥
राज्ञः कनकवर्षस्य कथा
आसीद् गङ्गातटे पूर्व पूतपौरं तदम्बुभिः। सौराज्यरम्यं कनकपुराख्यं नगरोत्तमम्॥२६॥ यत्र बन्धः कविगिरां छव पत्रेष्वदृश्यत। भङ्गोऽलकेषु नारीणां सम्यक्संग्रहणे खलः॥२७॥ तत्र वासुकिनागेन्द्रतनयात् प्रियदर्शनात्। जाता यशोधराख्यायां राजपुत्र्यां महायशाः॥२८॥ आसीत् कनकवर्षाख्यो नगरे नृपतिः पुरा। हरत्नभूभारवोढापि योऽशेषगुणभूषितः॥२९॥ मुग्धो यशसि न त्वर्थे भीतः पापान्न शत्रुतः। मूर्खः परापवादेषु न च शास्त्रेषु योऽभवत्॥३०॥ अल्पस्य यस्य कोपोऽभून्न प्रसादः महार्घ्यतः। चापे च बद्धमुष्टित्वं न दाने धीरचेतसः॥३१॥ यमात्यदम्भुसम्पन्नं रक्षता चाखिलं जगत्। मारव्यथाकुलं चक्र दृष्टेनैवावलाजनः॥३२॥
१ काव्येष्वेव गोमूत्रिकाकमलादयो बन्धा दृश्यन्ते स्मतापराधिनां बान्धवमभूत्। राज्येऽपराधाभावात्। २ खलः -यत्र ह्वलंकैस्तरंतंगृहः क्रियते क्षेत्रादानीप। अन्यत्र खतो दुर्जनं मूर्तः। ३ अनिर्णीतव्येति भावः।
मदन मञ्चुक ६५ हम सब जाते हैं। ऐसा कहकर और राजा के पैरों में पड़कर वह प्रसंग अपने दोनों साथिया के साथ निकलकर चला गया ॥२१॥ ओह ! ये मेरे सेवक मेरे पुत्र पर भी आशा बाँध हुए थे अतः इन्हें न छोड़ना चाहिए, इस प्रकार राजा उसी समय सोचने लगा ॥२२॥ और, उन प्रसंग आदि सेवकों को बुलाकर उसने धन से इतना भर दिया कि फिर उन्हें दरिद्रता ने कभी छुआ तक नहीं ॥२३॥ महाराज ! मनुष्यों के इस प्रकार विचित्र स्वभाव देखे जाते हैं कि राजा ने उत्सव आदिदान के अवसरों पर तो उन सेवकों को कुछ नहीं दिया किन्तु पुत्र-शोक के समय उन्हें धन से इस प्रकार परिपूर्ण कर दिया ॥२४॥ ऐसा कहकर, कथा कहने में कुशल गोमुख ने वत्सराज के पुत्र की आज्ञा से दूसरी कथा आरम्भ की ॥२५॥ राजा कनकवर्ण की कथा प्राचीन काल में गंगा के तट पर गंगाजल से पवित्र नाभरिकोंवाला कनकपुर नाम का एक उत्तम नगर था ॥२६॥ उस नगर में यदि बन्ध था तो कवियों की वाणी में नियम और चरित्र में नहीं। यदि छेदन था तो मञ्जर (मत्स्यन्दकार आदि) के पत्तों में छिद्र और वृत्ति में नहीं भंग था। तो नारियों के केशों में बन्धन या प्रतिज्ञा में नहीं। खल (खलिहान) धान्यों के संग्रह के लिए थ जगता में नहीं ॥२७॥ उस नगर का राजा कनकवर्ण महायशस्वी था जो नागराज वासुकि के पुत्र राजा प्रियदर्शन से यशोधरा नाम की राजकुमारी से उत्पन्न हुआ था और जो समस्त भूमि के भार को वहन करते हुए भी अ-शेष (समस्त गुणों से भूषित) था ॥२८-२९॥ राजा कनकवर्ण यश का लोभी था धन का नहीं पाप से डरता था शत्रुओ से नहीं दूसरो की निन्दा करने मे मूर्ख था शास्त्रो में नहीं ॥३०॥ जिस महात्मा राजा के हाथ में अन्यता थी प्रगल्भता में नहीं और जिसकी मुट्ठी धनुष में बँधी रहती थी दान में नहीं ॥३१॥ जिस आश्चर्यजनक सौन्दर्यशाली और संसार की रक्षा करनेवाले राजा के देखने मात्र से सुन्दरियां काम-वेदना से विह्वल हो जाती थीं ॥३२॥
६६ कथासरित्सागर
६६ कथासरित्सागर स कदाचिच्छरत्काले सोष्मप्युन्मदवारणः। राजहंसपरीवारे सोत्सवानन्दितप्रजे ॥३३॥ आत्मतुल्यगुणं रन्तुं चित्रप्रासादमविशत्। आकृष्टपद्मदामोदवहन्मारुतशीतलम् ॥३४॥ तत्र निर्वर्णयन् यावत्तच्चित्रं स प्रशसति। तावत् प्रविश्य भूपं तं प्रतीहारो व्यजिज्ञपत् ॥३५॥ इहागतो निवर्त्तेभ्योऽपूर्वश्चित्रकरः प्रभो। अनन्यसममात्मानं चित्रकर्मण्युदाहरन् ॥३६॥ रोलदेवाभिधानेन सिंहद्वारेऽत्र तेन च। एतदेवाभिलिख्याद्य चीरिकोल्लम्बिता१ किल ॥३७॥ तच्छ्रुत्त्वादराद् भूपेनादिष्टानयनः स तम्। आनिनाय प्रतीहारो गत्वा चित्रकरं क्षणात् ॥३८॥ स प्रविश्य ददर्शात्र चित्रावलोकनलीलया। स्थितं कनकवर्णं तं नृपं चित्रकरो रहः ॥३९॥ वरनारीकुचासङ्गसमर्पिततनूभरम् । सहेलोदञ्चितकरोपात्तताम्बूलवीटिकम् ॥४०॥ प्रणम्य चोपविष्टस्तं राजानं विहितादरम्। शनैर्विज्ञापयामास रोलदेवः स चित्रकृत् ॥४१॥ चीरिकोल्लम्बिता यद्यत् त्वत्पादाब्जदिदृक्षया। मया न विज्ञानमदात् तत्क्षन्तव्यमिदं मम ॥४२॥ आदिश्यतां च चित्रं किमालिखामीह रूपकम्। भवत्प्रत्यक्षतादिशायत्नो मे सफलो प्रभो ॥४३॥ इति चित्रकरोक्ते स राजा निजगाद तम्। उपाध्याय यथाकामं किञ्चिन्नालिख्यतां त्वया ॥४४॥ ह्लाद्यामो वयं यद्यद्भ्रान्तिस्तत्त्वोपगते तु का। इत्युक्तं तेन राज्ञाऽत्र तत्पार्श्वस्था बभाषिरे ॥४५॥ राज्ञोऽविकलतामन्यैरित्थं प्रोक्ते किं प्रयोजनम्। तच्छ्रुत्वा चित्रकृत् प्रा तं राजानमालिखत् ॥४६॥ १ पुरातने विज्ञापनार्थं पटे विलिख्य लम्ब्यते स्म। साम्प्रतं साईनबोर्ड 'बोलर' इत्यादि कथ्यते।
नवम लम्बक ६७
नवम लम्बक ६७ वह राजा कनकवर्ष एक समय जब प्रकृति में कुछ ऊष्मा रहती है हाथी मदोन्मत्त हो जाते हैं, राजहंसों के परिवार, अपनी प्रसन्नता से प्रजाजनों को आनन्दित करते रहते हैं ऐसे अपने गुणों के समान गुणवाले शरत्काल में विहार करने के लिए चित्र-मण्डप में गया जो कमल के पराग से सुगन्धित और शीतल वायु से रमणीय हो रहा था ।।३३-३४।। उस चित्र-भवन में राजा जबतक एक चित्र को भली भाँति देखकर उसकी प्रशंसा कर रहा था तबतक द्वारपाल ने आकर निवेदन किया— 'महाराज विदर्भ देश से एक चित्रकार यहाँ आया है वह चित्रकला में अपने को अद्वितीय कुशल बताता है ।।३५ ३६।। उस रोलदेव नामक चित्रकार ने राजभवन के द्वार पर चित्रपट में एक चित्र बनाकर लटका रखा है।।३७।। यह सुनकर राजा ने आदर के साथ उसे बुलाने के लिए आदेश दिया और द्वारपाल भी क्षण-भर में उस चित्रकार को लेकर वहाँ उपस्थित हो गया ।।३८।। उस चित्रकार ने चित्र-भवन में प्रवेश करके चित्रों को देखने के विनोद में लगे हुए राजा कनकवर्ष को एकान्त में देखा ।।३९।। तदनन्तर, सुन्दरी स्त्री के कुचों के बीच शरीर का भार दिये हुए, आसन पर बैठे हुए और हाथ में पान का बीड़ा उठाये हुए राजा से उस चित्रकार रोलदेव ने नम्रतापूर्वक निवेदन किया।।४०-४१।। महाराज मैंने आपके चरण-कमलों के दर्शन के लिए राजद्वार पर एक चित्र लटका रखा था न कि अपने कौशल के घमंड से। आप आज्ञा दें कि चित्र में किसका रूप अंकित करूँ जिससे चित्रकला सीखने का मेरा यत्न सफल हो ।।४२ ४३।। चित्रकार के ऐसा कहने पर राजा ने उससे कहा-हे उपाध्याय जो तुम्हारी इच्छा हो लिखो। हमें तो अपनी आँखों को आनन्दित करना है। तुम्हारी कुशलता में सन्देह ही क्या है। राजा के इस प्रकार कहने पर उनके समीप बैठे (दरबारी) लोग कहने लगे-'तुम राजा का ही चित्र बनाओ। अन्य किसी विरूप का चित्र बनाने से क्या काम ? यह सुनकर सन्तुष्ट चित्रकार ने पट पर राजा का चित्र बनाया ।।४४-४५।।
तुङ्गेन नासावंशेन दीर्घरक्तेन चक्षुषा। विपुलेन ललाटेन कुन्तलैः कुञ्चितासितैः ॥४७॥ विस्तीर्णेनोरसा रुद्धबाणाविव्रणशोभिना। भुजयुग्मेन दिग्वन्तिकराकारेण हारिणा ॥४८॥ मध्येन मुष्टिमेयेन केसरीन्द्रकिशोरवत्। उपायनीकृतेनेव पराक्रमपराजितैः ॥४९॥ यौवनद्विरदालानानिरुतेनोरुयुगेन च। अशोकपल्लवनिभनाङ्घ्रिद्वययुग्मेन चारुणा ॥५०॥ दृष्ट्वैव स्वानुरूपेण रूपेणालिखितं नृपम्। साधुवादं ददुः सर्वे तस्य चित्रकृतस्तदा ॥५१॥ जगदुस्तं च नेच्छामो द्रष्टुमेकाकिनं प्रभुम्। चित्रभित्तौ तदेतस्यामेतास्वालिखितास्विह ॥५२॥ राज्ञीषु मध्यादेकां स्वं सुविधायोनुरूपिकाम्। स्निग्धोपाध्याय पार्श्वस्थ पूर्णो नेत्रोत्सवोऽस्तु नः ॥५३॥ तच्छ्रुत्वा स विलोक्यात्र चित्रं चित्रकरोऽब्रवीत्। भूयसीष्वपि नैतासु तुल्या राज्ञोऽस्ति काचन ॥५४॥ [L17: जाने च पृथ्व्यामेवास्य तुल्यरूपान्ति नाङ्गना। अस्त्येक राजपुत्री तु शृणुताख्यामि तां च वः ॥५५॥ विश्वम्भवस्ति नगरं धीमत्कुण्डिनमञ्चपम्। दृढशक्तिरिति ख्यातस्तत्रास्ति च महीपतिः ॥५६॥ तस्यानङ्गवतीत्यस्ति राज्ञी प्राणाधिकप्रिया। तस्यां तस्य सुतोत्पन्ना नाम्ना मदनसुन्दरी ॥५७॥ यस्या वर्णयितुं रूपमस्या जिह्वाऽनया। मत्ता च प्रगल्भेत किं स्वेतावद्वाग्यहम् ॥५८॥ तां निर्भाय विधिर्मन्ये गच्छातच्छाऽपि सङ्गात्। निर्मान्तुमया तन्वी युगरपि न शक्ष्यति ॥५९॥ तेवान्य राज गेहेशी पृथिव्यां राजकन्यका। रूपलावण्यविनयैर्यया च तुलनं यः ॥६०॥ अतः तया हि तत्रत्यः कदाचित् प्रप्य पत्रिकांम्। आन्तोन्तःपुरं गत्वा राजपुत्र्या गतोऽभवम् ॥६१॥
नवम लम्बक ६१
नवम लम्बक ६१ चित्रकार ने राजा के शरीर के अनुसार उसकी उठी हुई साफ बनाई लम्बी और साफ बाँहें ऊँचा और चौड़ा ललाट तथा घुँघराले कच बनाये। चौड़ी छाती बनाई जिसमें बाण आदि शस्त्रों के घाव स्पष्ट दीख रहे थे। दिग्गजों की सूँडों के समान उसने सुन्दर भुजाएँ बनाईं ॥४७-४८॥ कमर इस प्रकार पतली बनाई मानों सिंह-शावकों ने (राजा के पराक्रम से) पराजित होकर उपहार-स्वरूप भेंट कर दी हो। जवान हाथियों के बाँधने के निमित्त बने खम्भों की तरह पतली जांघें बनाई और अशोक के नये पत्तों के समान सुन्दर दोनों पैर बनाये ॥४९-५०॥ सामने ही राजा के सर्वथा अनुरूप चित्र को बने देखकर सभी लोग उस चित्रकार को धन्यवाद देने लगे ॥५१॥ और बोले—हम अकेले राजा का देखकर सन्तोष नहीं है। इसलिए दीवार में चित्रित इन रानियों में से किसी एक का चित्र राजा के साथ बनाओ। जिससे हमारी आँख को आनन्द मिले' ॥५२ ५३॥ यह सुनकर और दीवार पर चित्रित रानियों के चित्रों को देखकर चित्रकार ने कहा- इन रानियों में राजा के समान रूपवाली एक भी रानी नहीं है ॥५४॥ मैं समझता हूँ कि सारे भूमण्डल में राजा के समान रूपवाली सुन्दरी स्त्री है ही नहीं। हाँ एक राजकुमारी है सुनिए, मैं बताता हूँ —॥५५॥ विदर्भ देश में कुण्डिनपुर नाम का एक सम्पन्न नगर है वहाँ पर रुक्मरुचि नाम से प्रसिद्ध एक राजा है ॥५६॥ उसकी प्राणों से भी प्यारी अनंगमंजरी नाम की रानी है। उस रानी से राजा से उत्पन्न मदनसुन्दरी नाम की कन्या है। एक ही जिह्वा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए मेरे जैसा व्यक्ति समर्थ नहीं है। फिर भी मैं इतना ही कहता हूँ कि ब्रह्मा उसे बनाकर अब पुनः इच्छा होने पर भी यथा शक ऐसी सुन्दरी को नहीं बना सकता ॥५७—५८॥ सारी पृथ्वी में वही एक इस राजा के सदृश सुन्दरी कन्या है। रूप लावण्य अवस्था कुल आदि सभी में वह इस राजा के उपयुक्त है ॥५९॥ एक बार वहाँ रहते हुए मैं दाइयों द्वारा बुलाये जाने पर उनके रनिवास में गया था ॥६१॥ ७३
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तत्रापश्यमहं तां च चन्दनाद्र्रविलेपनाम्। मृणालहारां बिसिनीपत्रशय्याविवर्त्तिनीम् ॥६२॥ कदलीपत्रपवनैर्वीज्यमानां सखीजनैः। पाण्डक्षामामभिव्यक्तस्मरज्वरलक्षणाम् ॥६३॥ हे सख्यश्चन्दनालेपकदलीदलमारुतैः । कृतमभिः किमेतेन विफलेन श्रमेण वः॥६४॥ एते हि मन्दपुण्यां मां दहन्ति शिशिरा अपि। एवं निवारयन्तीं च सखीराश्वासनाकुलाः॥६५॥ विलोक्य तदवस्थां तां तद्वितर्कसमाकुलः। कृतप्रणामस्तस्याश्च पुरतोऽहमुपाविशम् ॥६६॥ उपाध्यायेतृगास्मिंश्च चित्रे मे देहि रूपकम्। इत्युक्त्वा वेपमानेन पाणिना धृतवर्त्तिका॥६७॥ शनैरालिख्य सा भूमौ दर्शयन्ती नृपात्मजा। अलेखयन् मया कश्चिद्युवानं रूपवत्तरम्॥६८॥ आलिख्य सुन्दरं तं च देवं चिन्तितवानहम्। काम एवानया साक्षादयमालिखितो मया॥६९॥ किन्तु पुष्पमयश्चापो हस्त यन्नास्य लेखितः। तेन जाने न कामोऽयं तद्रूपः कोऽप्यसौ युवा ॥७०॥ अय च नूनमनया दृष्टः क्वापि श्रुतोऽपि वा। एतन्निबन्धनं चेवमस्याः स्मरविजृम्भितम् ॥७१॥ तदितो मेऽप्रमातव्यमुग्रदण्डो ह्ययं नृपः। एतत्पिता देवशक्तिर्युयुच्छेदं न क्षमेत मे ॥७२॥ इत्यालोच्यैव नत्वा तामहं मदनसुन्दरीम्। राजकन्यां निरगमं तया सम्मानितस्ततः ॥७३॥ श्रुतं चात्र महाराज मया परिजनामिषः। स्वैरं कथयतो यत्सा सानुरागा श्रुते त्वयि॥७४॥ ततश्चित्रपटे गुप्तं लिखितां तां नृपात्मजाम्। आदायाहं भवत्पादमूलं त्वरितमागतः॥७५॥
१ मूर्च्छन्तीं स्मरसन्तापेन।
नवम लम्बक ६११
नवम लम्बक ६११ वहाँ उसे मैंने शरीर म चन्दन का लेप किये हुए मृणाल का हार पहने हुए, कमल के पत्तों की शय्या पर करवटें बदलते हुए और सखियों द्वारा केले के पत्ता से हवा की जाती हुई, पीली और दुर्बल शरीरवाली तथा प्रकट होते हुए कामज्वर के लक्षणावाली देखा। वह सखियों से कह रही थी--'सखियो 'चन्दन के लेप और कदलीदल की वायु आदि से किये गये सब उपचार ठंढे होने पर भी मुझे जलाते हैं। इन्हें बन्द करो। इन निष्फल प्रयत्नो से क्या लाभ ? धीरज देती हुई सखियों को वह इस प्रकार मना कर रही थी ।।६२-६५।। इस अवस्था मे पड़ी हुई उसे देखकर और उसी म सम्बद्ध विभिन्न तर्कों स व्याकुल मैं उस प्रणाम कर उसके सामने बैठ गया ।।६६।। 'उपाध्याय ऐसा चित्र बनाकर मुझे दो। इस प्रकार कहकर कांपते हुए हाथ म कूची लिये हुए उसने धीरे-धीरे पृथ्वी पर चित्र लिखकर दिखाते हुए मुझे किसी अनन्त रूपशाली युवा को लिखवाया ।।६७-६८।। महाराज उसके निर्देशानुसार चित्र बनाकर मैंने सोचा कि उसने मुझसे साक्षात् कामदेव का ही चित्र लिखवाया है। किन्तु, उसने चित्र के हाथ में काम का बाण नहीं लिखवाया इससे मैं समझता हूँ वह कामदेव नही किन्तु उसी के समान रूपवाला कोई युवा मनुष्य है।।६९-७० ॥ उसने इस युवक को अवश्य कही देखा या सुना है और इसी के सम्बन्ध से उस यह काम- ज्वर की व्यथा भी है ।।७१।। अब मुझ यहाँ से शीघ्र ही चला जाना चाहिए क्योकि यह राजा उग्र दण्ड देनेवाला है। यदि इसके पिता देवशक्ति को पता लगा तो वह कदापि क्षमा न करेगा ।।७२।। ऐसा सोचकर और उस मदनसुन्दरी का नमस्कार करके उससे सम्मानित मैं वहाँ से निकल गया ।।७३।। और महाराज मैंने उसके चरित्रता से यह भी समझा कि वह आपका जानकर आपके लिए प्रेम करती है ।।७४।। इसीलिए चित्रपट पर गुप्त रूप से उसे लिखकर और लेकर तुरन्त आपकी सेवा म आया हूँ ।।७५।।
६१२ कथासरित्सागर
६१२ कथासरित्सागर दृष्ट्वा च देवस्याकारं निवृत्तः संशयो मम। देव एव तया चित्रे मठस्तनामलिखितः ॥७६॥ सा पादसङ्गे सदृशी शक्या लिखितुमित्यहम्। चित्रं देवस्य पार्श्वे तां न लिखामि समामपि ॥७७॥ इत्युक्तवन्तं स रोल्देवं राजा जगाद सः। तर्हि त्वया सा तच्चित्रपटस्था दर्शयतामिति ॥७८॥ ततो वंशगुलिकातस्तं १ कृष्ट्वा पटमदर्शयत्। स चित्रकृतां चित्रस्यां राज्ञे मदनसुन्दरीम् ॥७९॥ राजा कनकवर्षोऽपि तां स चित्रगतामपि। विचित्ररूपामालोक्य सद्यः स्मरवशो ययौ ॥८०॥ पूरयित्वा च बहुना हेम्ना चित्रकरं स तम्। आप्तप्रियाचित्रपटो विवशाभ्यन्तरं नृपः ॥८१॥ तत्र तद्रूपलावण्यदर्शनातृप्तलोचनः। त्यक्तसर्वक्रियस्तस्थौ तदेकमयमानसः ॥८२॥ वबाधे धैर्यहारी च निर्मोत्सृष्टान्तरे शरैः। रूपस्पर्द्धासमुद्भूतमत्सर्य इव मन्मथः ॥८३॥ या वक्ता रूपलुब्धानां स्मरार्त्तिस्तन योषिताम्। फलितेव च साभास्य दातस्यान महीक्षितः ॥८४॥ ततो दिनैश्च विरहम्लानपाण्डुः शनैस्स सः। आप्तेभ्यः सचिवेभ्यस्तत्पृच्छद्भ्यः स्वं मनोगतम् ॥८५॥ मन्त्रयित्वा च तैः सार्द्धं कन्यां मदनसुन्दरीम्। याचितुं प्राहिणोद्दूतं स राज्ञे देवशक्तये ॥८६॥ सङ्गमस्वामिनामानं कार्यज्ञं कार्यवेदिनम्। विप्रमाप्तं कुलीनं च मधुरोदात्तभाषिणम् ॥८७॥ स गत्वा सुमहार्हेण विप्रः परिकरेण सान्। विद्रमन् सङ्गमस्वामी प्राविशत्कुण्डिनं पुरम् ॥८८॥ यथावत् तत्र राजानं देवशक्तिं ददर्श तम्। स स्वामिनोऽर्थे तस्माच्च प्रार्थयामास तत्सुताम् ॥८९॥ १ पुराकाले पुस्तकपत्रादिरक्षणार्थं वंशस्य लोहस्य वा गोलाकारं किमपि प्रवर्त्तन्ते स्म तदेव वंशगुलिका भवेत्। पटचित्राणां कृते वेष्टनदण्डोऽपि भवति। तदेव वा भवेत्।
नवम लम्बक ६१३
नवम लम्बक ६१३ ... रहूरहा गया है। उस राजकुमारी के घर होना न आपका ही लिखाया था ॥३६॥ उस में बार-बार नहीं लिख सकता इसलिये आपके सम्मुख आने पर भी निष्कपट वा आपके साथ छल नहीं किया जा सकता ॥३७॥ इस प्रकार कहते हुए तैलङ्ग से राजा ने कहा—'चित्रपट पर लिखी गई उस मुझे सुता दे डाला। तब चित्रकार ने आले(अङ्गूसा) से उस चित्र पट को सादर निकाला और मदनसुन्दरी का वह रूप राजा को दिखा दिया ॥३८-३९॥ राजा कनकवर्ष चित्र में लिखी रहने पर भी विचित्र लावण्यमयी उसे देखकर उसी क्षण काम के वशीभूत हो गया ॥४०॥ तब राजा ने उस चित्रकार का प्रचुर सुवर्ण-मुद्राओं से सम्मानित करके तुरन्त अपनी चित्रशाला का चित्र लाने का अपने विश्वस्त दूत को भेजा गया ॥४१॥ वह चित्रकार उस उत्सव और लावण्य का नेता तैलङ्गप्रभृत सेवावाला वह राजा राज्य व रानी के साथ हाथ जोड़कर चित्रपट पुत्री के सम्मुख होकर प्रणाम करने लगा ॥४२॥ उसी समय अवसर पाकर रूप का अपने को ईर्ष्या करनेवाला कामदेव ने भी बाणों का मार से राजा को अधीर बना दिया ॥४३॥ उस राजा ने अपने रूप पर आत्मश्लाघा का नैया। राजनीतिज्ञ उसका राज्य न देख परिणाम शून्य का भय स्थिर रहा था ॥४४॥ इस प्रकार कुछ ही दिनों में राजा विरह से दुर्बल होकर पीला पड़ गया और दुबला हो गया। यह देखकर मन्त्री ने गुप्त मन्त्रणा का निश्चय रूप शान्ति किया और चित्रकार को वहां से उसने अपने गृह पर का प्रस्थान कर दी ॥४५॥ या इस भांति न सम्मर्जित करके मदनमञ्जरी के पिता का पार्वणार्थिक विना राज्य दे देने पर के दाता रूप में उसका निष्कास दिया गया ॥४६॥ दृष्टान्त से डर कर राजा को एक दूत विशेष दूत रूप कनकप्रभा आवश्यक रूप में देकर मदनमञ्जरी के पास देने के लिए भिजवाया ॥४७॥ ... ...
६१४ कथासरित्सागर
६१४ कथासरित्सागर देया साऽयमयान्यस्मै दुहित्रेषा स चोचितः। भूपः कनकवर्षोऽस्मावृक्षोऽप्यतां च याचत ॥९१॥ तदेतस्मै ददाम्येनामिति सम्मन्त्र्य सोऽपि च। हृद्यं देवशक्तिस्तत्सङ्गमस्वामिनो वचः ॥९२॥ दर्शयामास तस्मै च तस्या रूपमिवाद्भुतम्। नृत्तं मदनसुन्दर्याः सुतायाः स महीपतिः ॥९२॥ स तस्तद्दर्शनप्रीतः सङ्गमस्वामिनं स तम्। प्रतिपन्नसुतादानं सम्मान्य प्राहिणोन्नृपः ॥९३॥ निश्चित्य लग्नमुद्वाहहेतोरागम्यतामिह। सन्दिशनिति मम तेन प्रतिदूतं ससर्ज च ॥९४॥ आगत्य सङ्गमस्वामी प्रतिदूतयुतोऽथ सः। राज्ञे कनकवर्णाय सिद्धं कार्यं न्यवेदयत् ॥९५॥ ततो लग्नं विनिश्चित्य प्रतिदूतं प्रपूज्य तम्। असकृत्सा च विज्ञाय रक्तां मदनसुन्दरीम् ॥९६॥ सद्दिवाहाय दुर्व्वारधैर्य्यो निश्शङ्कमानसः। राजा कनकवर्णोऽसौ प्रायातत्कुण्डिनं पुरम् ॥९७॥ अशोकल्नतयाच्छ- प्रत्यन्तारण्यवासिनः। प्राणिप्राणहरांस्तित्तम्निहादीम्श्शबरानिव ॥९८॥ विदर्भान् प्राप्य नगरं कुण्डिनं तद्विवेश सः। निर्गतेनाग्रतो राज्ञा सहितो देवशक्तिना ॥९९॥ तत्र पौरपुरन्ध्रीणां विलब्धनयनोत्सवः। मज्जितोद्वाहसम्भारं प्राविशद्राजमन्दिरम् ॥१००॥ विधापयति स्म तत्रतत् म् न्नि सपरिच्छदः। दशनशितनुपादाश्कृताषागनुगज्जितः ॥१०१॥ अथयद्यैवशक्तिस्तस्मै तदा मदनसुन्दरीम्। गता गज्यकणापणं सर्वस्वन गम ददौ ॥१ २॥ स्थित्वा च तत्र राजाहं ग राजा नगरे निजम्। आगात् कनकवर्णोऽथ नववध्वा समं तया ॥१०३॥ प्राप्य मान्याथ सम्भिन् जगदानन्दायिनि। गरोमुर्रे शनिमीयागीत्सणागपं पुर्म् ॥१ ०॥
नवम लम्बक ६१५
नवम लम्बक ६१५ यह कन्या किसी को तो देनी ही है, राजा कनकध्वज उसके लिए उपयुक्त वर है। फिर, वह हमारे ऐसों से कन्या की मांग करता है। अतः उसे ही कन्या देता हूँ—इस प्रकार, विचार कर राजा देवशक्ति ने संगमस्वामी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ॥९०-९१॥ और राजा ने उस कन्या के रूप के समान उस कन्या का मूल्य भी संगमस्वामी को दिखाया ॥९२॥ तब हर्ष से प्रसन्न संगमस्वामी को कन्या देने की स्वीकृति प्रदान करके और उसका यथोचित सत्कार करके राजा ने उसे भेज दिया ॥ ९३॥ और, संगमस्वामी के साथ ही अपना सन्देश देकर अपने दूत को भी भेजा कि लग्न का निश्चय करके आप बारात के साथ विवाह के लिए आइए ॥९४॥ तब राजा के दूत के साथ आकर संगमस्वामी ने राजा कनकध्वज को कार्य-सिद्धि की बात उससे निवेदित की ॥९५॥ तदनन्तर, लग्न का निश्चय करके और राजा के दूत का सत्कार करके उस मदनसुन्दरी को अपने प्रति अनुरक्त जानकर वह प्रचण्ड बलशाली राजा कनकध्वज विवाह के लिए कुण्डिनपुर गया ॥९६-९७॥ राजा कनकध्वज ने सीमान्त के वनों में रहनेवाले सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं और भील आदि दस्युओं को मार्ग में मारते हुए विदर्भ देश में प्रवेश किया ॥ ९८॥ विदर्भ में आकर राजा देवशक्ति से अगवानी किये जाते हुए कनकध्वज ने कुण्डिनपुर नगर में प्रवेश किया ॥९९॥ उस नगर की नागरिक स्त्रियों के नेत्रों का आनन्द बना हुआ वह विवाह की सज्जाओं से सुसज्जित राजभवन में गया ॥१००॥ राजा देवशक्ति द्वारा किये गये उदारतापूर्ण आतिथ्य-सत्कार से प्रसन्न राजा कनकध्वज अपने बारातियों के साथ उस दिन आनन्दपूर्वक वहीं रहा ॥१०१॥ दूसरे दिन देवशक्ति ने उस मदनसुन्दरी कन्या को केवल एक राज्य को छोड़कर सर्वस्व के साथ उसे प्रदान किया ॥१०२॥ विवाह के उपरान्त राजा कनकध्वज उस विशाल गजबलों सैन्यदल को वधू मदनसुन्दरी के साथ अपने नगर को वापस आया ॥१०३॥ चन्द्रिका के साथ चन्द्रमा के समान मदनसुन्दरी के साथ अमृत का आह्लाद देनेवाला राजा कनकध्वज के अपने नगर में पहुँचने पर सारा नगर उत्सवमय हो रहा था ॥१०४॥
साद्य प्राणाधिका तस्य राज्ञो मदनसुन्दरी। आसीदग्रमहिष्यस्याप्यच्युतस्येव रुक्मिणी ॥१०५॥ अन्योन्यवदनासक्तलोचने स्मरसायकैः । पीडिताविव तौ चास्तां दम्पती चारुपक्ष्मभिः ॥१०६॥ एकदा चाजगामात्र विकसत्केसरावलीः। वलयन् मानिनीमानमातङ्गमधुकेसरी ॥१०७॥ लग्नालिमाला मौर्वीका पुष्पेषोः कुसुमाकरः। सञ्जीचकार चोत्फुल्लचूतवल्लीधनुर्लताः ॥१०८॥ वभौ घोपवनानीव चेतांस्यध्वगयोषिताम्। समुद्दीपिकामानि कम्पयन्मरुदानिलः ॥१०९॥ पूर्वा नवीनां पुष्पाणि तरूणां शशिनः कलाः। क्षीणानि पुनरायान्ति यौवनानि न देहिनाम् ॥११०॥ भो मुञ्चतमानकलहा रमध्वं दयितान्विताः। इतीव मधुरालापाः कोकिला जगदुर्जनान्' ॥१११॥ तत्कालं च मधूद्यानं विहर्तुं प्रविवेश सः। राजा कनकवर्षोऽत्र सर्वैरन्तःपुरैः सह ॥११२॥ मूर्च्छत्स्निग्धमणिकानां रक्तैः परिजनोज्ज्वलैः । गीतैर्वरवराङ्गानां च कोकिलभ्रमरध्वनिम् ॥११३॥ दय्या मदनसुन्दर्या समं तत्र स भूपतिः। चिक्रीड सावरोधोऽपि कुसुमावचयादिभिः ॥११४॥ विहृत्य चात्र सुचिरं स्नातुं गोदावरीं नृपः। अवतीर्य जलक्रीडां सान्तःपुरजनो व्यधात् ॥११५॥ मुखैः पद्मानि नयनैरुत्पलानि पयोधरैः। रथाङ्गनाम्नां युग्मानि नितम्बैः पुलिनस्थलीः ॥११६॥ विजित्य तस्याः सरितः शोभमामासुराशयम् । तरङ्गोच्छितामर्षभूम हायासावद्धनाः ॥११७॥ अम्भोविहारविगलद्वस्त्रव्यक्ताङ्गयष्टिषु । रेमे कनकवर्षस्य त्वाग तस्य सदा मनः ॥११८॥
१ माघेन तुलना कार्या—'उपजघ्रतु मानमलं शतः! विपदिनैः पुनरेति वयं वपुः पद। वामृताभिरितीव समीरिते स्मरकते रमते स्म वधूजनः॥'-माघ
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६१८ कथासरित्सागर
६१८ कथासरित्सागर एकां चाताडयद्राज्ञीं हेमकुम्भद्वयोपमे। कुचयुग्मे च विस्रस्तवसने करवारिणा ॥११९॥ तद्दृष्ट्वा सा चुकोपास्यै सेर्ष्या मदनसुन्दरी। कियत्क्षोभ्या नदीयेव सोद्वेगेव जगाद च ॥१२०॥ उत्तीर्य चाम्भसः प्रायादासन्नवस्त्रान्तरा रुषा। प्रियापराधं शंसन्ती तं सखीभ्यः स्वमन्दिरम् ॥१२१॥ ततो ज्ञाताक्षमस्तस्या जलक्रीडां विमुच्य सः। राजा कनकवर्षोऽपि तद्वासगृहमभ्ययौ ॥१२२॥ वार्यमाणो रुषा तत्र पञ्जरस्थैः शुकैरपि। प्रविश्य स ददर्शान्तर्देवीं तां मन्युपीडिताम् ॥१२३॥ वामहस्ततलन्यस्तविषण्णवदनाम्बुजाम् । स्वच्छमुक्ताफलनिभैः पतद्भिर्बाष्पबिन्दुभिः ॥१२४॥ 'जइ विरहो ण सहिज्जइ माणो (सुहा वि) परिवज्जणीओ से। विरहो हिअअ सहिज्जइ माणो (एव्व) परिवड्ढणीओ से ॥१२५॥ इअ आणिऊण णिउण चिट्ठसु ओलम्बिऊण इक्कवरम्। उहयतडदिण्णपाओ मज्झणिबिडिओ धुव विणिस्सिहिसि ॥१२६॥ इतीमं द्विपदीखण्डं पठन्तीं साश्रुगद्गदम्। निर्यद्दन्तांशुहारिण्या गिरापभ्रंशमुग्धया ॥१२७॥ विलोक्य च तथाभूतां तां कोपेऽपि मनोरमाम्। उपाययौ सलज्जश्च सभयश्च स भूपतिः ॥१२८॥ पराङ्मुखीमवाश्लिष्य वचोभिः प्रीतिपेशलैः। प्रवृत्तोऽभूत्सभिनयंस्तां प्रसादयितुं च सः ॥१२९॥ वक्रोक्तिसूचितार्थे परिहारे पपात च। तस्याश्चरणयोर्निन्दन्नात्मानमपराधिनम् ॥१३०॥ १ यदि विरहो न सह्यते मानः (सुखादपि) परिवर्जनीयस्ते। विरहो हृदय सह्यते मानः (एव) परिवर्धनीयस्ते॥ इति ज्ञात्वा निपुणं तिष्ठस्वावलम्ब्यैकतरम्। उभयतटदत्तपादो मध्यनिपतितो ध्रुवं विनंक्ष्यसि इति च्छाया।
नवम स्तम्बक ६१९ इसी समय वह राजा एक रानी के दो स्वर्ण-कलशों के समान वस्त्ररहित उत्तुंग कुचों को पानी के छींटा से मारने लगा ॥११९॥ यह देखकर मदनसुन्दरी के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वह कहने लगी 'तुम नदी का कितना क्षोभ करोगे' इतना कहकर और जल से बाहर निकलकर, क्रोध के साथ वस्त्र बदलकर अपनी सखियों से राजा की शिकायत करती हुई वह अपने भवन को चली गई॥ १२०-१२१॥ तब उसके भाव को समझकर राजा भी जलक्रीड़ा छोड़कर उसके (मदनसुन्दरी) निवास भवन को गया ॥१२२॥ वहाँ पर पिंजराँ में टँगे हुए शुकौँ से भी रोके जाते हुए राजा ने भीतर जाकर क्रोधातुर रानी को देखा ॥१२३॥ बायें हथेली पर खिन्न और म्लान मुख-कमल को रखी हुई, आँखों से बड़े-बड़े स्वच्छ मोतियों के समान आँसुओं की बूँदों को गिराती हुई, बँधे हुए कण्ठ से अस्पष्ट उच्चारण करती हुई और दाँतों की किरणों से मनोहर लगती हुई वह रानी अपभ्रंश भाषा में सुन्दर द्विपदी के इस टुकड़े को गा रही थी- यदि विरह नहीं सहा जाता तो तुम्हें मान छोड़ना चाहिए। हे हृदय ! यदि विरह सहा जाय तो मान को बढ़ाओ। ऐसा जानकर दोनों में से एक का निश्चय कर लो। अन्यथा दोनों किनारों पर पैर रखने से बीच में गिरकर अवश्य नष्ट हो जाओगे ॥१२४-१२७॥ इस प्रकार क्रोध में भी मनोहर लगती हुई मदनसुन्दरी के पास राजा कन्दर्प डरता और लजाता हुआ गया ॥१२८॥ मुँह फेरकर बैठी हुई उसे वह राजा अपने आभिधान और मधुर वचनों द्वारा नम्रता के साथ मनाने लगा ॥१२९॥ नवोत्कण्ठा से उसके अनुराग को बताती हुई सखियों के सामने ही मदनसुन्दरी के चरणों पर वह राजा अपने अपराधी आत्मा की निन्दा करता हुआ गिर पड़ा ॥१३०॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर स्तनस्तमयुनेवाम्बुवारिणा गलितेन सा। सिञ्चन्ती कण्ठलग्नास्य प्रसाद्य महीपतिं ॥१३१॥ अथैष हृष्टो नीत्वा तद्दिनं कुपिततुष्टया' । राजा तया सहासेव्य रत निशामगाभिशि॥१३२॥ सुप्तो ददर्श चाकस्मात् स्वप्ने विकृतया स्त्रिया। हृतामेकावलीं कण्ठाच्चूडारत्नं च मूर्धतः ॥१३३॥ ततोऽप्यपश्यद्वेताल नानाप्राप्यङ्गविग्रहम्' । बाहुयुद्धे प्रवृत्तं च त स भूमावपातयत् ॥१३४॥ पृष्ठोपविष्टश्छोड्डीय पक्षिणेव विहायसा। नीत्वा तेन नृपोऽम्भोधी वेतालेन स विक्षिपे ॥१३५॥ तत्र कथञ्चिदुत्तीर्ण परमेकावलीं गले। चूडामणिं च तं मूर्ध्नि पूर्ववत्स्थितमैक्षत ॥१३६॥ एतद्दृष्ट्वा प्रबुद्धः स प्रातः परिचयागतम्। अस्य क्षपणकं राजा फलं स्वप्नस्य पृष्टवान् ॥१३७॥ । न वाच्यमप्रियं किं तु कथं पृष्टो न वच्मि य ॥१३८॥ या त्वयैकावली दृष्टा हृता चूडामणिस्तथा। सैष देव्या वियोगस्ते पुत्रेण च भविष्यति ॥१३९॥ प्राप्ते चैकावलीरत्नं यदुत्तीर्णाब्धिना त्वया। दुःखान्ते सोऽपि भावी ते देवीपुत्रसमागमः ॥१४०॥ इति क्षपणकेनोक्ते विमृश्य स नृपोऽब्रवीत्। पुत्रो मेऽद्यापि नास्त्येव स तावज्जायतामिति ॥१४१॥ अथोपयाताद्योपौरस रामायणपाठकात् । पुत्रार्थं विहितक्लेदं राजा ददर्श नृपम् ॥१४२॥ ततोऽमृतसुतप्राप्तिश्चिन्त क्षपणक गतः। राजा कनकवर्षस्तद्दिनाय विमना दिगम् ॥१४३॥ १ आदौ कुपिता पश्चात् तुष्टा तया । २ 'मोहम्-त्रो-बद्धो'स्थाने पुस्तरान्तरमवमितिः नानाप्राप्यङ्ग विग्रहा मूर्तकः समुत्पन्नतः तदि ३ मूलपुस्तके भ्रटितमिदं यथार्थम्।