भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ६१५ यह कन्या किसी को तो देनी ही है, राजा कनकध्वज उसके लिए उपयुक्त वर है। फिर, वह हमारे ऐसों से कन्या की मांग करता है। अतः उसे ही कन्या देता हूँ—इस प्रकार, विचार कर राजा देवशक्ति ने संगमस्वामी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ॥९०-९१॥ और राजा ने उस कन्या के रूप के समान उस कन्या का मूल्य भी संगमस्वामी को दिखाया ॥९२॥ तब हर्ष से प्रसन्न संगमस्वामी को कन्या देने की स्वीकृति प्रदान करके और उसका यथोचित सत्कार करके राजा ने उसे भेज दिया ॥ ९३॥ और, संगमस्वामी के साथ ही अपना सन्देश देकर अपने दूत को भी भेजा कि लग्न का निश्चय करके आप बारात के साथ विवाह के लिए आइए ॥९४॥ तब राजा के दूत के साथ आकर संगमस्वामी ने राजा कनकध्वज को कार्य-सिद्धि की बात उससे निवेदित की ॥९५॥ तदनन्तर, लग्न का निश्चय करके और राजा के दूत का सत्कार करके उस मदनसुन्दरी को अपने प्रति अनुरक्त जानकर वह प्रचण्ड बलशाली राजा कनकध्वज विवाह के लिए कुण्डिनपुर गया ॥९६-९७॥ राजा कनकध्वज ने सीमान्त के वनों में रहनेवाले सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं और भील आदि दस्युओं को मार्ग में मारते हुए विदर्भ देश में प्रवेश किया ॥ ९८॥ विदर्भ में आकर राजा देवशक्ति से अगवानी किये जाते हुए कनकध्वज ने कुण्डिनपुर नगर में प्रवेश किया ॥९९॥ उस नगर की नागरिक स्त्रियों के नेत्रों का आनन्द बना हुआ वह विवाह की सज्जाओं से सुसज्जित राजभवन में गया ॥१००॥ राजा देवशक्ति द्वारा किये गये उदारतापूर्ण आतिथ्य-सत्कार से प्रसन्न राजा कनकध्वज अपने बारातियों के साथ उस दिन आनन्दपूर्वक वहीं रहा ॥१०१॥ दूसरे दिन देवशक्ति ने उस मदनसुन्दरी कन्या को केवल एक राज्य को छोड़कर सर्वस्व के साथ उसे प्रदान किया ॥१०२॥ विवाह के उपरान्त राजा कनकध्वज उस विशाल गजबलों सैन्यदल को वधू मदनसुन्दरी के साथ अपने नगर को वापस आया ॥१०३॥ चन्द्रिका के साथ चन्द्रमा के समान मदनसुन्दरी के साथ अमृत का आह्लाद देनेवाला राजा कनकध्वज के अपने नगर में पहुँचने पर सारा नगर उत्सवमय हो रहा था ॥१०४॥

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