भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक १६७

नवम लम्बक १६७ तब राजा त्रिभुवन ने सोये हुए उसके पास जाकर उस खड्ग को उठा लिया और उसके साथ ही उस राजा को दिव्य प्रभाव भी प्राप्त हो गया ॥२२७॥ तब राजा ने मदोन्मत्त होकर सोये हुए उस पाशुपत को लात मारकर उठाया और खूब डाँटा-फटकारा। किन्तु, वीर होने के कारण राजा ने उसका वध नहीं किया ॥२२८॥ और, सहेलियों के सहित अपनी उस असुर-कन्या के साथ वह बिल में चला गया ॥२२९॥ सिद्धि से भ्रष्ट वह पाशुपत अत्यन्त दुःखी हुआ। कृतघ्न व्यक्ति चिरकाल में निधि प्राप्त करके भी अवश्य भ्रष्ट हो जाते हैं ॥२३०॥ इस घटना को अपनी आँखों से देखकर भ्रमण करता हुआ मैं यहाँ आया हूँ। इसलिए, हे देवि चिरकाल के बाद भी तुझे पति का समागम अवश्य होगा ॥२३१॥ जैसे कि त्रिभुवन राजा को हुआ। क्योंकि कल्याण करनेवाला व्यक्ति कभी कष्ट नहीं पाता। इस प्रकार ब्राह्मण का उपदेश सुनकर बन्धुमती को कुछ सन्तोष हुआ ॥२३२॥ और उसने बहुत धन देकर उसे कृतार्थ किया। दूसरे दिन वहाँ दूर देश का रहनेवाला एक और ब्राह्मण रानी के पास आया ॥२३३॥ उत्कंठिता बन्धुमती ने परिचय और नाम बताकर उससे भी पति का समाचार पूछा। तब उस ब्राह्मण ने उससे कहा— ॥२३४॥ हे देवि मैंने तेरे पति को तो कहीं नहीं देखा किन्तु यथार्थ नामवाला मैं सुमन तेरे घर पर आया हूँ इसलिए शीघ्र ही तेरा मन प्रसन्न होगा। ऐसा मेरा मन कहता है। क्योंकि चिरकाल के वियोगियो का भी समागम होता ही है ॥२३५-२३६॥

नल और दमयन्ती की कथा

मैं इस सम्बन्ध में तुझे एक कथा सुनाता हूँ सुनो। प्राचीन काल में नल नाम का एक राजा था ॥२३७॥ वह राजा इतना सुन्दर था कि उसके रूप से अपमानित होकर कामदेव मानो (उसी दुःख से) क्रुद्ध शिवजी के नेत्र की आग में जलकर भस्म हो गया ॥२३८॥ पत्नी-रहित उस राजा ने अपने ही समान सुन्दरी पत्नी की खोज करते हुए विदर्भ देश के राजा भीम की कन्या दमयन्ती का नाम सुना ॥२३९॥

१६८ कथासरित्सागर

१६८ कथासरित्सागर

भीमेनापि विचित्य क्ष्मां ववृषे तेन राजसु। न नलादपरो राजा तुल्यः स्वदुहितुः पतिः ॥२४०॥ अत्रान्तरे स्वनगरं दमयन्ती सरोवरम्। भीमात्मजा जलक्रीडाहेतोरवततार सा ॥२४१॥ तत्रैकं राजहंस सा दृष्ट्वा दष्टोत्पलाम्बुजम्। बबन्ध क्रीडया बाला युक्तिक्षिप्तोत्तरीयका ॥२४२॥ स बद्धो दिव्यहंसस्तामुवाच व्यक्तया गिरा। राजपुत्र्युपकारं ते करिष्यामि विमुञ्च माम् ॥२४३॥ नैषधोऽस्ति नलो नाम राजा भुवि वहन्ति यम्। सद्गुणैर्गुम्फितं हारमिव दिव्याङ्गना अपि ॥२४४॥ तस्य त्वं सदृशी भार्या भर्ता स सदृशस्तव। तदत्र तुल्यसंयोगे कामदूतो भवामि वाम् ॥२४५॥ तच्छ्रुत्वा दिव्यहंसं सा मत्वा सत्याभिभाषिणम्। मुमोच दमयन्ती तमेवमस्त्विति वादिनी ॥२४६॥ न मया वरणीयोऽन्यो नलादिति जगाद च। श्रुतिमार्गप्रविष्टेन तेनापहृतमानसा ॥२४७॥ स च हंसस्ततो गत्वा निषधेष्वथ शिप्रिये। जलक्रीडाप्रवृत्तेन नलेनाध्यासितं सरः ॥२४८॥ नलः स राजा दृष्ट्वा तं राजहंसं मनोरमम्। बबन्ध स्वोत्तरीयेण लीलाक्षिप्तेन कौतुकात् ॥२४९॥ सोऽथ हंसोऽब्रवीन्मुञ्च नृपते मामहं यतः। इह त्वदुपकारार्थमागतः शृणु वच्मि ते ॥२५०॥ विदर्भेष्वस्ति भीमस्य राज्ञः क्षितितिलोत्तम। दमयन्तीति दुहिता स्पृहणीया सुरैरपि ॥२५१॥ त्वमेव च श्रवात्तद्गुणो बद्धानुरागया। तया भर्ता वृतस्त्वञ्च त्वाहं वक्तुमागतः ॥२५२॥ इति हंसोत्तमस्यास्य वचोभिः सत्कृतोऽभवत्। विधिवच्च स पुष्पोपेतेऽर्के सममभिष्यत ॥२५३॥ अब्रवीत् स च हंसं तं धन्योऽहं विहगोत्तम। यो मनोरथसम्पत्त्या मूर्त्येव वृतस्तया ॥२५४॥

नवम लम्बक ५९९

नवम लम्बक ५९९ सारी पृथ्वी पर ढूँढ़ते हुए राजा भीम को भी राजा नल के सिवा अपनी कन्या के योग्य दूसरा पति नही मिला ॥२४ ॥ इसी बीच एक बार राजा भीम की कन्या दमयन्ती जलक्रीड़ा के लिए एक तालाब में उतरी ॥२४१॥ उस सरोवर में उसने कमल की नाल को खाते हुए एक राजहंस को युक्ति से अपनी चादर फेंककर पकड़ लिया ॥२४२॥ उससे इस प्रकार पकड़ा गया वह दिव्य राजहंस मनुष्यों की वाणी में उससे कहने लगा- 'हे राजकुमारी मैं तेरा उपकार करूँगा। मुझे छोड़ दे। निषध देश का राजा नल है। अच्छे गुणों से गूँथे हुए हार के समान जिसे दिव्य रमणियाँ भी हृदय में धारण करती हैं ॥२४३-२४४॥ तू उसके समान पत्नी है और वह तेरे समान पति है। अतः यह समान पति-पत्नी-संयोग कराने में मैं तेरा प्रणय-दूत बनूँगा' ॥२४५॥ यह सुनकर और उस दिव्य हंस को सत्य बोलनेवाला समझकर, दमयन्ती ने 'ठीक है, तुम दूत बनो' यह कहते हुए उसे छोड़ दिया ॥२४६॥ और बोली कि 'मैं नल के सिवा दूसरे को नहीं करूँगी क्योंकि उसने कान के मार्ग से प्रविष्ट होकर, मेरा मन हर लिया है' ॥२४७॥ उस हंस ने वहाँ से चलकर शीघ्र ही जलक्रीडा में लगे हुए नलवाले सरोवर का आश्रय लिया ॥२४८॥ राजा नल ने भी उस मनोहर राजहंस को देखकर खिलाड़ के साथ फेंके हुए अपने दुपट्टे से उसे बाँध लिया ॥ २४९॥ तदनन्तर, वह हंस उससे बोला-'राजन् मुझे छोड़ दो। मैं तो तुम्हारे उपकार के लिए ही यहाँ आया हूँ। सुनो तुम्हें कहता हूँ—॥२५ ॥ विदर्भ देश में राजा भीम की पृथ्वी की तिलोत्तमा और देवताओं से भी चाही जानेवाली दमयन्ती नाम की कन्या है॥२५१॥ मेरे द्वारा तेरे गुणों का बखान करने पर तुझमें सुदृढ़ प्रेम रखनेवाली उस दमयन्ती ने तुझे ही अपने पति के रूप में वरण किया है। यही कहने के लिए मैं आया हूँ' ॥२५२॥ इस प्रकार शुभ फल को प्रकट करनेवाले हंस के वचनों से और कामदेव के पुष्प-बाणों से वह राजा नल एक साथ ही बिंध गया ॥२५३॥ और उस हंस से बोला-हे पक्षिश्रेष्ठ मैं धन्य हूँ मूर्तिमती मनोरथ-सम्पत्ति के समान जिसने मुझे वरण कर लिया है' ॥२५४॥

१७० कथासरित्सागर

१७० कथासरित्सागर इत्युक्त्वा तेन मुक्तः स हंसो गत्वा शशंस तत् । दमयन्त्यै यथावस्तु यथाकामं जगाम च ॥२५५॥ दमयन्ती च सोत्कण्ठा युक्त्या मातर्मुखेन सा। पितुः स्वात्प्रार्थयामास नलप्राप्त्यै स्वयंवरम् ॥२५६॥ अनुमेने स तस्याश्च स्वयंवरकृते पिता। भीमः पृथिव्यां सर्वेषां राज्ञां दूतान्विसृष्टवान् ॥२५७॥ प्राप्तदूताश्च निश्चिक्यू विदर्भान्प्रति भूमिपाः। व्रजन्ति स्म नलोऽप्युत्को रथास्तम्भनचारु सः ॥२५८॥ ततश्च दमयन्त्यास्तो नलप्रेमस्वयम्बरौ। इन्द्रादयो लोकपालाः शुश्रुवुर्नारदाम्मुनेः ॥२५९॥ तपा च भसमिद्धायुर्यमाग्निवरुणास्ततः। सम्मन्त्र्य दमयन्त्युक्त्वा नलस्याभ्यान्तिकं ययुः ॥२६०॥ ऊचुश्च प्राप्य तं प्रह्वं विदर्भान्प्रस्थितं पथि। गत्वास्मद्वचनाद् ब्रूहि दमयन्तीमिदं नृप ॥२६१॥ पञ्चानां वरयैकं नः किं मर्त्येन नलेन ते। मर्त्या मरणधर्माणस्त्रिदशास्त्वमरा इति ॥२६२॥ अस्मत्प्रभावाच्च तत्पार्श्वमदृष्टोऽन्यैः प्रवेक्ष्यसि। तथेत्येतां च वशाज्ञां प्रतिपदे नलोऽथ सः ॥२६३॥ गत्वा चान्तःपुरं तस्याः प्रविष्ट्यावृष्ट एव च। दमयन्त्या शशंसेच देवादेशं तथैव तम् ॥२६४॥ सा तं श्रुत्वाब्रवीत्साध्वी देवास्ते सन्तु तादृशाः। तथापि मे नलो भर्त्ता न कार्यं त्रिदशैर्मम ॥२६५॥ इति सम्यग्वचस्तस्याः श्रुत्वात्मानं प्रकाश्य च। नलो गत्वा तथैवैतदिन्द्रादिभ्यः शशंस सः ॥२६६॥ वश्या वयमिदानीं ते स्मृतमात्रोपगामिनः। तथ्यवादित्विति च ते तुष्टास्तस्मै ददुर्वरान् ॥२६७॥ ततो हृष्टे नले याते विदर्भान्बिम्बसत्सुभिः। दमयन्त्याः सुरेशाद्यैर्नलरूपमकारि तैः ॥२६८॥ गत्वा च भीमस्य सभां मर्त्यधर्मानुपाश्रिताः। स्वयम्बरे प्रस्तुते ते नलसान्तिक उपाविशन् ॥२६९॥

नवम लम्बक १७१

नवम लम्बक १७१ ऐसा कहकर राजा से छोड़े गये उस हंस ने उसी समय विदर्भ देश में जाकर दमयन्ती से सच्ची बात बता दी और वह इच्छानुसार चला गया ॥२५५॥ नल के लिए उत्कण्ठित दमयन्ती ने माता द्वारा नल की प्राप्ति के लिए पिता से अपना स्वयंवर कराने की प्रार्थना की ॥२५६॥ राजा ने भी इस बात की स्वीकृति देकर, दमयन्ती के स्वयंवर के लिए, पृथ्वी के सभी राजाओं के पास दूत भेज दिये ॥२५७॥ दूतों के द्वारा स्वयंवर-समाचार प्राप्त होने पर सभी राजा विदर्भ के प्रति जाने लगे और उत्कण्ठित नल भी रथ पर सवार होकर विदर्भ के लिए चला ॥२५८॥ तदनन्तर, नल-दमयन्ती के प्रेम-स्वयंवर का समाचार इन्द्र आदि सभी लोकपालों ने नारद मुनि से सुना। यह सुनकर इन्द्र वायु यम आदि बहल पाँचों लोकपाल आपस में सम्मति करके नल के पास गये ॥२५९-२६०॥ और, विदर्भ को जाते हुए विप्रलम्भ नल से मार्ग में ही मिलकर वे बोले— तुम हमारी ओर से हमारे सन्देश दमयन्ती को जाकर सुना दो ॥२६१॥ कि तू हम पाँचों में से किसी एक लोकपाल को वर ले। मानव नल से तुझे क्या सुख मिलेगा ? क्योंकि मनुष्य मरणधर्मा होते हैं और देवता अमर हैं ॥२६२॥ और तू हमारे वरदान से अदृश्य होकर उसके पास जा सकेगा। दूसरे व्यक्ति तुझे न देख सकेंगे। नल ने देवताओं की इस आज्ञा को 'ठीक है' कहकर मान लिया ॥२६३॥ और, दमयन्ती के भवन में अदृश्य रूप से जाकर उसे देवताओं का सन्देश उसी प्रकार उसने सुना दिया ॥२६४॥ यह सुनकर वह पतिव्रता बोली—'वह देवता भले ही अमर हों मेरा पति तो नल ही होगा। मुझे देवताओं से क्या प्रयोजन ? ॥२६५॥ दमयन्ती का यह उत्तर सुनकर नल ने उसके सामने अपने को प्रकट कर दिया फिर जाकर इन्द्र आदि लोकपालों से उसका उत्तर उसी प्रकार कह दिया ॥२६६॥ तब प्रसन्न देवताओं ने नल से कहा—हे सत्यवादी हमलोग तेरे वश में हैं। तू जब भी हमें स्मरण करेगा तभी हम तेरे समीप आयेंगे। इस प्रकार का वर उसे देकर वे देवता चले गये ॥२६७॥ तब नल के प्रसन्न होकर विदर्भ की ओर चले जाने पर दमयन्ती को ठगने की इच्छा से देवताओं ने नल का रूप धारण कर लिया ॥२६८॥ और राजा भीम की सभा में जाकर मनुष्यों का-सा व्यवहार करनेवाले वे देवता स्वयंवर प्रारम्भ होने पर, नल के पास ही बैठ गये ॥२६९॥

१७२ कथासरित्सागर

१७२ कथासरित्सागर अथैत्य दमयन्ती सा भ्रात्रा स्वनेकशो नृपान्। आवेद्यमानानुज्झन्ती क्रमात् प्राप नलान्तिकम् ॥२७०॥ दृष्ट्वा छायानिमेषादिगुणांस्तत्र च पञ्चसान्। सा भ्रातरि समुद्भ्रान्ते व्याकुला समचिन्तयत् ॥२७१॥ नूनं मे लोकपालैस्तैर्मयिषा पञ्चभिः कृता। षष्ठो मये नलो ह्यत्र न चान्यत्रास्ति मे गतिः ॥२७२॥ इत्यालोच्यैव साध्वी सा नलैकासक्तमानसा। आदित्याभिमुखी भूत्वा दमयन्त्येवमब्रवीत् ॥२७३॥ भो लोकपालाः स्वप्नेऽपि नलादन्यत्र चेन्न मे। मनस्तत्तेन सत्येन स्वं दर्शयत मे वपुः ॥२७४॥ वरात्पूर्ववृताच्चान्ये कन्यायाः परपूरुषाः। परदाराश्च सा तेषां तत्कथं मोह एष वः ॥२७५॥ श्रुत्वैतच्च शक्राद्याः स्वेन रूपेण तेऽभवन्। षष्ठः सत्यनलश्चाभूत्स्वरूपस्य स भूपतिः ॥२७६॥ तस्मिन् सा दमयन्ती तां फुल्लन्दीवरसुन्दरीम्। बुध्वा वरणमालां च सृष्टा राज्ञि नले व्यधात् ॥२७७॥ पपात पुष्पवृष्टिश्च नभोमध्यात्ततो नृप । विवाहमङ्गलं भीमश्चक्रे तस्या नलस्य च ॥२७८॥ विहितोचितपूजाश्च तेन वैदर्भभूभृता। नृपा यथागतं जग्मुर्देवाः शक्रादयश्च ते ॥२७९॥ शक्रादयस्तु ददृशुर्द्वा कलिद्वापरौ पथि। श्रुत्वा च दमयन्त्यर्थमागतौ तौ च तेऽब्रुवन् ॥२८०॥ न गन्तव्यं विदर्भेषु तत एवागता वयम्। वृत्तः स्वयंवरो राजा दमयन्त्या नलो वृतः ॥२८१॥ तच्छ्रुत्वैवोदतुः पापौ तौ कलिद्वापरौ रुषा। देवानामस्मदादीनांत्यक्त्वा यत्स मर्त्यो वृतस्तया ॥२८२॥ तदवश्यं करिष्यावो वियोगमुभयोस्तयोः। एवं कृतप्रतिज्ञौ तौ निवत्र्य ययतुस्ततः ॥२८३॥ नलश्च सप्त दिवसान् स्थित्वा श्वशुरवेश्मनि। दमयन्त्या समं बध्वा कृतार्थो निजधामगात् ॥२८४॥

नवम लम्बक १७४

नवम लम्बक १७४ तदनन्तर, अपने भाई के द्वारा एक-एक करके परिचित कराये जाते हुए अनेक राजाओं को छोड़ती हुई दमयन्ती क्रमशः नल के पास पहुँची ॥२७०॥ वहाँ जाकर छाया (परछाई) पलक गिरना आदि मानव गुणों से युक्त छह नलों को देखकर भाई के व्याकुल हो जाने पर दमयन्ती सोचने लगी-॥२७१॥ अवश्य ही उन पाँचों लोकपालों ने यह माया फैलाई है। इसलिए, इनमें छठे को ही मैं वास्तविक नल समझूँ और कोई दूसरा उपाय नहीं है ॥२७२॥ ऐसा सोचकर एकमात्र नल में लगे हुए मनवाली दमयन्ती सूर्य की ओर मुंह करके इस प्रकार बोली-॥२७३॥ 'हे लोकपालो यदि स्वप्न में भी मेरा मन नल को छोड़कर किसी दूसरे पुरुष में न गया हो तो इसी सत्य के प्रभाव से मुझे अपना स्वरूप दिखलाओ ॥२७४॥ विवाह से पहले ही वर लिये गये पुरुष के अतिरिक्त कन्या के लिए और सभी पर-पुरुष हैं और दूसरों के लिए, वह कन्या परस्त्री के समान है। तब तुम लोगों का यह कैसा अज्ञान है ॥२७५॥ यह सुनकर इन्द्र आदि पाँचों लोकपाल अपने वास्तविक रूप में आ गये और छठा राजा नल अपने यथार्थ रूप में स्पष्ट हुआ ॥२७६॥ तब प्रसन्न दमयन्ती ने खिले हुए नीलकमलों के समान अपनी दृष्टि और वरमाला दोनों ही राजा नल को डाल दिये ॥२७७॥ इतने में आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई। तब राजा भीम ने दमयन्ती का नल के साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया ॥२७८॥ इसके बाद भीम के द्वारा उचित शिष्टाचार और सत्कार किये गये अन्यान्य राजा और इन्द्र आदि देवता भी अपने-अपने स्थानों को गये ॥२७९॥ इन्द्र आदि देवताओं ने जाते हुए मार्ग में द्वापर और कलियुग को देखा। उन दोनों को दमयन्ती के स्वयंवर के निमित्त आये हुए जानकर उनसे वे देवता बोले-॥२८०॥ 'अब तुमलोग विदर्भ की ओर न जाओ। हम लोग वहीं से आ रहे हैं। स्वयंवर हो गया और दमयन्ती ने राजा नल को वर लिया ॥२८१॥ यह सुनते ही वे दोनों भारी क्रोध से बोले-'आप लोगों के समान देवताओं को छोड़कर उसने मनुष्य का वरण किया इसलिए हम उन दोनों का वियोग अवश्य करायेंगे' इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे दोनों वहीं से लौट गए ॥२८२-२८३॥ उधर राजा नल सात दिनों तक ससुराल में रहकर नई वधू दमयन्ती के साथ निषध देश को आ गया ॥२८४॥ ८५

१७४ कथासरित्सागर

१७४ कथासरित्सागर

तत्रासीत् प्रेम दम्पत्योर्गौरीशर्वोर्बिकं तयोः। शर्वस्य गौरी देहार्धं तस्य त्वात्मैव साभवत् ॥२८५॥ कालेन चन्द्रसेनाख्यं दमयन्ती नखात्सुतम्। प्रसूते स्म तदन्वेकामिन्द्रसेनां च कन्यकाम् ॥२८६॥ तावच्च स कलिश्छिद्रं तस्यामुच्छास्त्रवर्तिनः। मस्र्स्यासीच्चिरं चिन्वन्प्रतिज्ञातार्थनिश्चितः ॥२८७॥ वर्षेकवानुपास्यैव सन्ध्यामक्षालिताङ्घ्रिकः। स सुष्वाप नलः पानमदेन मुषितस्मृतिः ॥२८८॥ छिद्रमेतदवाप्यैव दत्तदृष्टिर्दिवानिशम्। कलिस्तस्य शरीरान्तर्नलस्य प्रविवेश सः ॥२८९॥ तेन देहप्रविष्टेन कलिना स नलो नृपः। विहाय धर्म्यमाचारमाचचार यथारुचि ॥२९०॥ मक्षैरदीव्यद्दासीभिररस्तासत्यमब्रवीत् । असेवत दिवा स्वप्नं स जगागार रात्रिषु ॥२९१॥ अकारात्कारणं कोपमन्यायेमार्थमाददे। अवमानं सतां चक्रे सम्मानमसतां च सः ॥२९२॥ तद्भावं पुष्करास्मै सथैवोक्तास्तत्सखम्। छिद्रं प्राप्य शरीरान्तःप्रविष्टो द्वापरो व्यधात् ॥२९३॥ कदाचित्पुष्कराख्यस्य गृहे तस्यानुजस्य सः। नलो ददर्श दान्ताख्यं सुन्दरं धवलं वृषम् ॥२९४॥ लोभामृग्यमानाय त तस्मै ज्यायसे न सः। द्वापरप्रस्ततद्बुद्धिः पुष्कराख्यो वृषं ददौ ॥२९५॥ जगाद च यद्यस्ति वाञ्छास्मिन्वृषभे तव। तद्द्यूतेन विजित्यैनं मस स्वीकुरु मा चिरम् ॥२९६॥ तच्छ्रुत्वा स नलो मोहान् प्रतिपेदे तथेति तत्। घत प्रवृत्ते द्यूतं तयोर्भ्रात्रोः परस्परम् ॥२९७॥ पुष्कराख्यस्य स वृषो नलस्यैमादय पणः। जिगाय पुष्कराख्यश्च नलो मुहुर्जीयत ॥२९८॥ न्निदेद्मित्रबले कोष हारितेऽपि दुरोदरात्। न नलो वार्यमाणोऽपि चचाल कलिबिप्लुतः ॥२९९॥

नवम लम्बक १७५

नवम लम्बक १७५ यहाँ उन दोनों का प्रेम गौरी और शंकर के प्रेम से भी अधिक था क्योंकि गौरी शंकर का आधा (आधाँ) भाग थी किन्तु दमयन्ती तो नल का सर्वस्व ही अर्थात् पूरी आत्मा थी ॥२८५॥ कुछ समय के अनन्तर दमयन्ती ने नल से पहले चन्द्रसेन नामक पुत्र और उसके उपरान्त इन्द्रसेन नाम की कन्या को जन्म दिया ॥२८६॥ इतने दिनों तक कलियुग अपनी पूर्व प्रतिज्ञा पर दृढ रहकर शास्त्र-मर्यादा का पालन करने- वाले नल का छिद्र (दोष) खोजने में लगा रहा ॥२८७॥ कुछ दिनों के अनन्तर एक बार मद्य के नशे की मस्ती में स्मृतिहीन राजा नल बिना सन्ध्या दिये और बिना पैर धोये ही खाकर सो गया ॥२८८॥ रात-दिन मौका ढूँढ़ते हुए कलि ने यह अच्छा अवसर देखकर नल के शरीर में प्रवेश किया ॥२८९॥ इस प्रकार कलियुग के अपने शरीर में प्रविष्ट हो जाने से वह नल धार्मिक आचार-विचारों को छोड़कर मनमाना आचरण करने लगा ॥२९०॥ जैसे जुआ खेलने लगा दासियों के साथ रमण करने लगा झूठ बोलने लगा दिन में सोने और रात्रि में जागने लगा ॥२९१॥ बिना कारण क्रोध करने लगा अन्याय से धन कमाने लगा सज्जनों का अपमान और दुष्टों का सम्मान करने लगा ॥२९२॥ ऐसे ही उसके भाई पुष्कर के भी सन्मार्ग का परित्याग करने पर, अवसर पाकर, द्वापर ने उसके भी शरीर में प्रवेश किया ॥२९३॥ एक बार, नल ने अपने छोटे भाई पुष्कर के घर पर दान्त नाम के सुन्दर श्वेत बैल को देखा ॥२९४॥ लोभ के कारण उस बैल को माँगते हुए बड़े भाई नल को द्वापर से ग्रसे हुए पुष्कर ने वह बैल नहीं दिया ॥२९५॥ और बोला—'यदि इस बैल पर तुम्हारी इच्छा है, तो तुम जूए में जीतकर मुझसे इसे ले लो। देर न करो'। यह सुनकर कलि से ग्रसे हुए नल ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया और उन दोनों भाइयों का परस्पर जूआ आरम्भ हुआ ॥२९६-२९७॥ पुष्कर की ओर से बैल दाँव पर था और नल की ओर से हाथी-घोड़े आदि दाँव पर लगाये गये थे। अन्त में पुष्कर जीत गया और नल हार गया ॥२९८॥ इस प्रकार दो-तीन दिनों तक निरन्तर चलते हुए जूए में सारी सेना खजाना आदि हार जाने पर भी नल ने कलिग्रस्त होने के कारण मना किये जाने पर भी किसी की एक न मानी ॥२९९॥

१७६ कथासरित्सागर

१७६ कथासरित्सागर तेन मत्वा गतं राज्यं दमयन्ती निजौ शिशू। रथोत्तमे समारोप्य प्राहिणोत्स्वपितुर्गृहम् ॥३००॥ सावशेषेन राज्यं स्वं समग्रमपि हारितम्। ततः स पुष्कराख्येन जगदे जितकाशिना ॥३०१॥ त्वयाद्यहारितं सर्वं सतस्योष्णः पणस्य मे। दमयन्तीमिदानीं त्वं द्यूते प्रतिपणं कुरु ॥३०२॥ इत्युक्तिवातव्याधूतस्तस्य नलोऽनल इव ज्वलन्। न चाकालेऽब्रवीत्किञ्चिन्न च चक्रे पणक्रियाम् ॥३०३॥ ततः स पुष्कराख्यस्तमवादीन्न करोषि चेत्। भार्यां पणं तदस्मान्मे देशान्निर्याहि तत्समः ॥३०४॥ सच्छुरेकैव नलो दशाहमयनत्या समं ततः। निरगाद्राजपुरुषा सीमान्तं प्रवासितः ॥३०५॥ हा नलस्यापि यत्रैवंभावस्था कठिना कृता। तत्रोच्यतां किमप्यर्शां क्रिमीणामिव देहिनाम् ॥३०६॥ धिग्धिग्छिन्नधर्मं निस्नेहं राजर्षीणामपीदृशाम्। विपवामास्पदं द्यूतं कस्तित्वापरजीवितम् ॥३०७॥ अथ भ्रातृहतैश्वर्यो विदेशं स नलो व्रजन्। दमयन्त्या सह प्राप क्षुधाक्लान्तो वनान्तरम् ॥३०८॥ तत्र साकं तया दर्शमिक्षपक्षरुपावया। स विद्यान्तं सगस्तीरे हंसौ दार्णशतागतौ ॥३०९॥ आहाराय च स तयोर्ग्रहणायाोत्तरीयकम्। चिक्षेप तच्च हृत्वैव हंसौ तौ तस्य जग्मतुः ॥३१०॥ हंसरूपेण तावेतावक्षौ वासोऽप्यपहृत्य ते। हृत्वा गताविति नभः स वाच माशृणोद्दिवः ॥३११॥ उपविश्यैकवस्त्रोऽथ स युक्त्या विमना नृपः। पन्थानं दर्शयामास दमयन्त्याः पितुर्गृहे ॥३१२॥ अयं मार्गो विदर्भेषु प्रिये पितृगृहे तव। अयमङ्गेषु मार्गोऽयमपरः कोशलेषु च ॥३१३॥ तच्छ्रुत्वा दमयन्ती सा शङ्कितेवामवत्तदा। त्यक्ष्यत्यिकार्यं पुत्रो मे मार्गं वि बकरयसाविति ॥३१४॥

नवम लम्बक १७७

नवम लम्बक १७७ तब दमयन्ती ने राज्य को चौपट हुआ समझकर दोनों बच्चों को उत्तम रथ में बैठाकर अपने पिता के घर भेज दिया ॥३ १॥ धीरे-धीरे, नल सारा राज्य हार गया। तब उससे जितन्द्रिय पुष्कर ने कहा-'तुम सब कुछ तो हार चुके हो अब उस बैल के दाँव पर दमयन्ती को लगाओ ॥३ १ २॥ उसकी इन बातों की आँधी से भाप की तरह जलता हुआ नल उस बुरे समय में भी उससे कुछ नहीं बोला और न दमयन्ती को ही दाँव पर लगाया ॥३ ३॥ तब उसके भाई पुष्कर ने कहा-यदि दाँव पर दमयन्ती को नहीं लगाते हो तो तुम उसके साथ ही मेरे देश से निकल जाओ' ॥३ ४॥ तब राजा नल दमयन्ती के साथ उस देश से निकल गया और राज्य के सिपाही उसे राज्य की सीमा तक छोड़ आये ॥३ ५॥ 'हाय ! जहाँ कलि ने नल की भी ऐसी दुर्दशा कर डाली वहाँ अन्यान्य कीड़ों के समान साधारण प्राणियों की कथा ही क्या है ॥३ ६॥ ऐसे धर्महीन और स्नेह-रहित जूए को बार-बार धिक्कार है, जो नल-जैसे राजर्षियों को भी विपत्ति में डाल देता है और जो कलि तथा द्वापर का जीवन है ॥३ ७॥ तदनन्तर, भाई द्वारा निर्जित विदेश को जाता हुआ भूख से व्याकुल वह नल एक वन के मध्य में एक तालाब पर पहुँचा ॥३ ८॥ वहाँ पर कुशों से कटे हुए कोमल पैरोंवाली दमयन्ती के साथ उस जंगली सरोवर के तट पर उस नल ने दो हंसों को देखा ॥३ ९॥ उनको पकड़ने के लिए उसने उन पर अपना दुपट्टा डाला परन्तु वे हंस उसे भी अपने साथ लेकर उड़ गए ॥३१०॥ तब नल ने आकाश से यह वाणी सुनी कि ये दोनों हंस जूए के दो पासे थे जो तेरा वस्त्र भी ले गये ॥३११॥ अब केवल एक वस्त्र (धोती) ही पहना हुआ नल कुञ्चित मन से बैठा हुआ दमयन्ती को उसके पिता के घर का मार्ग बताने लगा—॥३१२॥ 'हे प्रिये यह मार्ग विदर्भ की ओर तेरे पिता के घर को जाता है और यह कोशल देश की ओर ॥३१३॥ यह सुनकर दमयन्ती को यह शंका हुई कि क्या आर्यपुत्र मुझे मार्ग बताकर छोड़ना चाहते हैं ॥३१४॥

१७८ कथासरित्सागर

१७८ कथासरित्सागर ततस्तौ फलमूलाशी वने तत्र निशागमे। श्रान्तौ संविशतः स्मोभौ दम्पती कुशसंस्तरे ॥३१५॥ दमयन्ती शनैर्निद्रामश्वसिता जगाम सा। नलो गन्तुमनास्त्वाशीदनिद्रः कलिमोहितः ॥३१६॥ उत्थाय चैकवस्त्रां तां दमयन्तीं विमुच्य सः। छिन्नं सदुत्तरीयार्धं प्रावृत्य च ततो ययौ ॥३१७॥ दमयन्ती च रात्र्यन्ते प्रबुद्धा तं पतिं वने। अपश्यन्ती गतं त्यक्त्वा विरुरोद विचिन्त्य सा ॥३१८॥ हार्यपुत्र महासत्त्व रिपावपि कृपापर। हा मद्वत्सल केनासि मयि निष्करणीकृतः ॥३१९॥ एकाकी च कथं पद्भ्यामटवीषु प्रयास्यसि। कस्ते श्रमापनोदाय परिचर्यां करिष्यति ॥३२०॥ मौलिमालापरागेण रञ्जितौ यौ महीभुजाम्। तौ ते पथि कथं पादौ धूलिः कलुषयिष्यति ॥३२१॥ हरिचन्दनचूर्णेनाप्यक्षिप्तं सहते न यत्। अङ्गं सहिष्यते तत्ते मध्याह्नाकतिपं कथम् ॥३२२॥ किं मे बालेन पुत्रेण किं दुहित्रा किमात्मना। तवैकस्य शिवं देवाः कुर्वतां यद्यहं सती ॥३२३॥ इत्येकानुशोचन्ती दमयन्ती नलं तदा। सत्पूर्वदर्शितात्तेनैव प्रतस्थे सा तत पथा ॥३२४॥ क्वचिच्छक्तातिचक्राम गवीधैलवनाटवी। नातिचक्राम भक्तिं तु सा भर्तरि कथञ्चन ॥३२५॥ सतीतेजश्च मार्गे तामरक्षन्नेन लुब्धकः। भस्मीकृतोऽहेस्त्रातायां तस्यां गतमनो बलात् ॥३२६॥ ततो दैवाद्वणिक्सार्थेनान्तरा मिलितेन सा। सह गत्वा पुरं प्राप सुबाहुनाख्यस्य भूपते ॥३२७॥ तत्र सा राजसुतया दूराद्दृष्ट्वैव हर्म्यतः। सौन्दर्यप्रीतमानाय्य स्वमात्रे प्राभृतीकृता ॥३२८॥ तस्या पार्श्वे महादेव्याः सा तस्थौ च तदावृता। त्यक्त्वा गतो मां भर्तेति पृष्टा चैतावदब्रवीत् ॥३२९॥

प्रथम लम्बक १७३

प्रथम लम्बक १७३ तब वे दोनों पति-पत्नी सायंकाल में फल मूल जल आदि खा-पीकर कुश के आस्तरण पर शान्त होकर सो गये ॥३१५॥ मार्ग-श्रम से श्रान्त दमयन्ती धीरे-धीरे गहरी नींद में सो गई, किन्तु कलियुग से मोहित नल उसे छोड़कर भागने की चिन्ता में जागता ही रहा ॥३१६॥ तदनन्तर, उसे सोई हुई जानकर, एक वस्त्र पहने हुए दमयन्ती को छोड़कर, उसकी चादर के फटे हुए आधे टुकड़े को ओढ़कर वह नल वहाँ से चला गया ॥३१७॥ रात बीतने पर जागी हुई दमयन्ती ने वन में पति को न देखकर और उसे त्याग कर गया हुआ जानकर विलाप करना आरम्भ किया—॥३१८॥ 'हाय आर्यपुत्र ! हाय महासत्त्वशालिन् ! हाय शत्रुओं पर भी कृपा करनेवाले ! हाय मेरे प्यारे ! किसने तुझे मेरे प्रति इतना निर्दय बना दिया ? ॥३१९॥ तू अकेला इन घोर जंगलों में कैसे जायगा तेरी थकावट दूर करने के लिए कौन सेवा करेगा । राजाओं के सिर पर धारण की हुई मालाओं के पराग से जो तेरे चरण रंग जाते थे उन तेरे चरणों को अब मार्ग की धूल कलुषित करेगी ! ॥३२०-३२१॥ जो तेरा शरीर, चन्दन के लेप का भी सहन नहीं कर सकता था वह अब दोपहर के सूर्य की प्रचंड गरमी को कैसे सहन करेगा ॥३२२॥ मुझे शिशु बालक से क्या करना है, लड़की से क्या और अपनी आत्मा से भी क्या काम है ? यदि मैं सती हूँ तो उसके प्रभाव से देवता तेरा कल्याण करें ॥३२३॥ इस प्रकार, एक-एक बात के लिए नल की चिन्ता करती हुई वह सती दमयन्ती नल द्वारा पहले दिन दिखाये हुए मार्ग से आगे चल पड़ी ॥३२४॥ मार्ग में जाते हुए उसने नदियों पहाड़ों और जंगलों को किसी प्रकार पार किया किन्तु पति भक्ति को वह किसी प्रकार पार न कर सकी ॥३२५॥ मार्ग में उसके सतीत्व के तेज ने उसकी रक्षा की जिससे वह सर्प से बच गई और उस पर आसक्त व्याध (बहेलिया) भस्म होगया ॥३२६॥ तब दैवयोग से मार्ग में मिले हुए व्यापारियों के एक दल के साथ वह सुबाहु नाम के राजा के नगर में जा पहुँची ॥३२७॥ वहाँ पर राजकुमारी ने अपने महल से बैठे-बैठे दमयन्ती को दूर से ही देख लिया और उसकी सुन्दरता से प्रसन्न होकर उसे बुलवाकर और भेंट-रूप में उसे अपनी माता को सौंप दिया ॥३२८॥ तब वह दमयन्ती उस महारानी से समादृत होकर उसी के पास रहने लगी। समाचार पूछने पर उसने इतना ही कहा कि मेरा पति मुझ छोड़कर चला गया ॥३२९॥

६८ कथासरित्सागर

६८ कथासरित्सागर तावच्च तत्पिता भीमो नलोदन्तमवेत्य तम्। तयोरन्वेषणायाप्ताञ्चरान् दिक्षु विसृष्टवान्॥३३०॥ तन्मध्याच्च सुवेषाख्य एकस्तत्सकियो भ्रमन्। सुबाहो राजधानीं तो प्राप ब्राह्मणरूपभृत् ॥३३१॥ स तत्र दमयन्तीं तामागन्तूश्चिन्वतीं सदा। अद्रक्षीत् साप्यपश्यत् तु स्थिता पितृमन्त्रिणम् ॥३३२॥ अन्योन्यं प्रत्यभिज्ञाय समेत्य रुदत स्म तौ। तथा यथात्र राज्ञी सा सुबाहोस्तदबुध्यत ॥३३३॥ यावच्चानाय्य सा देवी तौ यथावस्तु पृच्छति। बुबुधे दमयन्तीं तां तावत्स्वभगिनीसुताम् ॥३३४॥ ततः सा भर्तुरावेद्य तां सम्मान्य पितुर्गृहम्। रथेऽधिरोप्य व्यसृजत्ससुयेणां ससनिकाम् ॥३३५॥ तत्र सा दमयन्त्यासीत् प्राप्तापत्यद्वया सती। पित्रापि दृश्यमाना सा भर्तुर्वातां विचिन्वती ॥३३६॥ तत्पिता व्यसृजच्चारानन्वेष्टुं तं च सत्पतिम्। सूदस्यन्दनविद्याभ्यां विद्याभ्यामुपलक्षितम् ॥३३७॥ बालां वने प्रसुप्तां नृशंस सन्त्यज्य कुमुदिनीकान्ताम्। प्राप्यैवाम्बरखण्डं चन्द्रादृग्भ्व क्व यातोऽसि ॥३३८॥ एवं भवद्भिर्वक्तव्यं स्थिरा शङ्क्येत यत्र सः। इत्यादिदेश चारांस्तांस्स च भीमो महीपतिः ॥३३९॥ अत्रान्तरे स राजा च नलस्तस्मिन् वने निशि। प्रावृतार्धपटो दूरं गत्वा दावाग्निमैक्षत ॥३४०॥ भो महासत्त्व यावन्न वह्नेरङ्गमवसोऽमुना। अपसारय मां तावद्भावाग्निनिकटादितः ॥३४१॥ इत्यत्र तद्वचः श्रुत्वा दत्तदृष्टिर्ददर्श सः। [L27: आबद्धमण्डलं नागं नभो दावानलान्तिके ॥३४२॥ फणारत्नप्रभाभासजटिलं वनवह्निना। गृहीतमिव तेजोप्रहतिहस्तेन मूर्धनि ॥३४३॥ उपेत्य कृपयां सोऽथ तं धृत्वा नीत्वा च दूरतः। त्यक्तुमिच्छति यावत्स तावन्नागोऽब्रवीत्स तम् ॥३४४॥

नवम लम्बक १८१

नवम लम्बक १८१ उधर दमयन्ती के पिता भीम ने नल का समाचार जानकर, नल और दमयन्ती के कुशल जानने के लिए चारों ओर दूत भेजे ॥३३०॥ उन दूतों में सुदेव नाम का एक मन्त्री घूमता हुआ ब्राह्मण के वेश में सुबाहु की राजधानी में आ पहुँचा ॥३३१॥ वहाँ मन्त्री ने आगन्तुकों में अपने परिचितों को ढूँढ़ती हुई दमयन्ती को देखा और उस दुखिया दमयन्ती ने भी पिता के मन्त्री को देखा ॥३३२॥ वे दोनों परस्पर पहचानकर इस प्रकार रोने लगे कि सुबाहु राजा की रानी ने उन्हें जान लिया ॥३३३॥ जब उसने उन दोनों को अपने पास बुलाकर विस्तृत समाचार पूछा तब उसे पता चला कि वह उसकी बहन की कन्या दमयन्ती है ॥३३४॥ तब महारानी ने अपने पति से कहकर और दमयन्ती का सम्मान करके उसे रथ पर बैठाकर सैनिक सिपाहियों और सुदेव मन्त्री के साथ पिता के घर भेज दिया ॥३३५॥ पिता के घर पहुँचकर और अपने दोनों बच्चों को पाकर पिता के संरक्षण में पति की प्रतीक्षा करती हुई दमयन्ती वहीं रहने लगी ॥३३६॥ नल को पाक-विद्या और रथ चलाने की कला में विशेषज्ञ बताते हुए उसका परिचय देकर उसे ढूँढ़ने के लिए दमयन्ती के पिता भीम ने चारों ओर अपने गुप्तचर भेजे ॥३३७॥ और, गुप्तचरों से राजा भीम ने कहा—'जहाँ तुम्हें नल के होने का सन्देह हो वहाँ तुम इस आर्या को पढ़ना—वन में सोई हुई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर अम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र तू अदृश्य होकर कहाँ चला गया? ॥३३८-३३९॥ उधर, राजा नल उस वन में रात्रि के समय दमयन्ती को छोड़कर आधा दुपट्टा ओढ़े हुए दूर चला गया और आगे जाकर उसने वन में लगी हुई आग देखी ॥३४०॥ 'हे महापुरुष विचार मुझे जबतक यह दावाग्नि जला नहीं देती उसके पहले ही मुझे इससे निकाल लो' ॥३४१॥ ऐसा वचन सुनकर राजा ने ध्यान से देखा कि दावानल के पास कुण्डली मारे हुए एक नाग बैठा है ॥३४२॥ दवाग्नि की लपटों से उस नाग के फण की मणि की किरणें व्यंगित हो रही हैं मानों दवाग्नि ने हाथ में प्रचंड दण्ड लेकर उसकी मोरड़ी पकड़ ली हो ॥३४३॥ राजा नल ने दया करके उसके समीप जाकर और उसे कंधे पर रखकर दूर ले जाकर जैसे ही छोड़ना चाहा वैसे ही वह नाग बोला—॥३४४॥ ८१

१८२ कथासरित्सागर

१८२ कथासरित्सागर गणयित्वा दशायनि पदानि नय मामितः। ततः स प्रययावेव पदानि गणयन्नलः॥३४५॥ एकं द्वे त्रीणि चत्वारि पञ्च षट् सप्त शृण्वहे। अष्टौ नव दशेत्युक्तवन्तमुक्तिच्छलेन तम्॥३४६॥ नलं स्कन्धस्थितो नागो रुकाटान्ते ददंश सः। तेन ह्रस्वभुजः कृष्णो विरूपः सोऽभवत्क्षणम्॥३४७॥ ततोऽवतार्य स्कन्धात्तं स राजा पृष्टवानहिम्। को भवान् का कृता चेयं त्वया मे प्रत्युपक्रिया॥३४८॥ एतमब्रूषथ श्रुत्वा स नागः प्रत्युवाच तम्। राजन् कार्कोटनामानं नागराजमवेहि माम्॥३४९॥ दंशो गुणाय च मया दत्तस्ते तच्च वेत्स्यसि। गूढवासे च वैरूप्यं महतां कार्यसिद्धये॥३५०॥ गृहाण चाग्निशौचाख्यमिदं वस्त्रयुगं मम। अनेन प्रावृतेनैव स्वं रूपं प्रतिपत्स्यसे॥३५१॥ इत्युक्त्वा दत्ततद्वस्त्रयुगे कार्कोटके गते। नलस्तस्माद्वनाद् गत्वा क्रमेण प्राप कोशलान्॥३५२॥ कोशलाधिपतेस्तत्र ऋतुपर्णस्य भूपतेः। स ह्रस्वबाहुनामा सन् सूदत्वं शिश्रिये गृहे॥३५३॥ भोजनानि च यत्तस्य चक्रे दिव्यरसानि सः। तेन प्रसिद्धिं प्रापात्र रसविज्ञानतस्तथा॥३५४॥ तत्रस्थे ह्रस्वबाह्वाख्ये नले तस्मिन् कदाचन। विदर्भराजचारपु षेष्वेकोऽत्र किलाययौ॥३५५॥ ह्रस्वबाहुरितीहास्ति स्वविचारबहिर्ययोः। नलतुल्यो नलः सूद इति चारोऽत्र सोऽशृणोत्॥३५६॥ नलं सम्भाव्य तं बुद्ध्या चास्थाने नृपतेः स्थितम्। युक्त्या स तत्र गत्वैतां पपाठार्या प्रभूदिताम्॥३५७॥ 'बालां बने प्रसुप्तां नृशंस सन्त्यज्य कुमुदिनीकान्ताम्। प्राप्यवाम्बरखण्डं चन्द्रावुदयः क्व यातोऽसि'॥३५८॥ तच्छ्रुत्वोन्मत्तवाक्यार्थं तमन्या अवजज्ञिरे। सूदच्छद्मस्थितस्त्वत्र स नलः प्रत्युवाच तम्॥३५९॥

नवम लम्बक १८१

नवम लम्बक १८१ 'यहाँ से और दस पग आगे ले जाकर मुझे छोड़ो। तब नल एक दो तीन चार, पाँच छह सात इस प्रकार गिनकर दस पग आगे गया। जब राजा ने दस (दश)१ कहा तब छल से कंधे पर बैठे हुए उस नाग ने ललाट के पास उसे डँस लिया। इस कारण वह राजा छोटे हाथोंवाला काला और विरूप हो गया—॥३४५-३४७॥ तब राजा ने क्रोध से नाग को उतारकर कहा-'तू कौन है और तूने मेरे साथ यह क्या प्रत्युपकार किया है ? ॥३४८॥ नल के यह वचन सुनकर वह नाग उत्तर देता हुआ बोला-'राजन्, मुझे नागों का राजा कर्कोटक नाम से जानो। गुप्त निवास करने में रूप का बदल जाना महान् पुरुषों की कार्यसिद्धि के लिए ही होता है। इसलिए, मैंने तुम्हारे ललाट पर डँसा है, जो तेरे काम के लिए ही होगा॥३४९-३५०॥ और, यह अग्निशौच नाम के वस्त्र का जोड़ा लो। इसे ओढ़ते ही तुम अपने पूर्वरूप में आ जाओगे' ॥३५१॥ ऐसा कहकर और उसे शौचवस्त्र का जोड़ा देकर, कर्कोटक चला गया। उसके चले जाने पर, नल क्रमशः कोशल देश में जा पहुँचा ॥३५२॥ वहाँ जाकर वह नल कोशलराज ऋतुपर्ण के घर में ह्रस्वबाहु के नाम से पाचक (रसोइया) बन गया ॥३५३॥ वह जो दिव्य रसवाले भोजन बनाता था और रथ चलाने की विशेषता रखता था इससे उसने उस राज्य में पर्याप्त यश प्राप्त कर लिया॥३५४॥ जब कि नल ह्रस्वबाहु के नाम से वहाँ नौकरी कर रहा था इसी बीच विदर्भ राज्य के गुप्तचरों में से एक वहाँ आया ॥३५५॥ निर्दिष्ट चिह्नों से वह नल को जानकर और उसे राजसभा में बैठे हुए देखकर वह गुप्तचर युक्ति से वहाँ जा पहुँचा। वहाँ जाकर उसने अपने स्वामी भीम द्वारा कही हुई आर्या पढ़ी—॥३५६ ३५७॥ 'वन में सोई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर अम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र तू अदृश्य होकर कहाँ चला गया गया ? ॥३५८॥ उसे सुनकर सभासदों ने उसे पागल का प्रलाप समझा किन्तु रसोइए के वेश में प्रच्छन्न नल ने उसे उत्तर दिया ॥३५९॥ १ संस्कृत में 'दन्' धातु से लोट् मध्यम पुरुष एकवचन में निष्पन्न 'दश' का अर्थ होता है—डँसो। संख्या के अर्थ में दश—दस के लिए प्रसिद्ध है। —अनु

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर शीर्णोऽम्बरेकदेशश्चन्द्र प्राप्यायमण्डल प्रविष्टन् । कुमुदिन्या यददृश्यो जातस्तत्का नुहासता तस्य' ॥३६०॥ एतद्द्रुततरं श्रुत्वा सत्य सम्भाव्य स नलम्। विपद्युद्भूतवैरूप्यं धारः सोऽथ ययौ ततः ॥३६१॥ विदर्भान् प्राप्य भीमाय राज्ञे भार्यायुताय सः। दमयन्त्यै च तत्सर्वं दृष्टश्रुतमवर्णयत् ॥३६२॥ ततोऽथ दमयन्ती सा पितरं स्वैरमब्रवीत्। निस्सन्देहं स एवार्यपुत्रः सूदमिषे स्थितः ॥३६३॥ तत्तदानयने युक्तिर्ममता क्रियतामिह। ऋतुपर्णस्य नृपतेस्तस्य दूतो विसृज्यताम् ॥३६४॥ प्राप्तमात्रश्च स भूपमेवं तत्र ब्रवीतु सः। गतः क्वापि नलो राजा प्रवृत्तिर्नास्य बुध्यते ॥३६५॥ तत्प्रातः कुरुत भूयो दमयन्ती स्वयंवरम्। अतोऽद्यैव विदर्भेषु शीघ्रमागम्यतामिति ॥३६६॥ ततः श्रुतैतद्वार्तेन स रथज्ञानिना नृपः। एकाहेनार्यपुत्रेण साक ध्रुवमिहेष्यसि ॥३६७॥ एवं सपितृकालोच्य सन्दिश्य च तथैव सा। पर्णादान् व्यसृजद्दूतं दमयन्ती यथोचितम् ॥३६८॥ तेनर्तुपर्णो गत्वा स तथैवोक्तः समुत्सुकः। जगाद सूदरूपं तं प्रणयात् पार्श्वगं नलम् ॥३६९॥ ह्रस्वबाहो रथज्ञानं ममास्तीत्यवदद् भवान्। तत्प्रापय विदर्भान् मामद्यैबोत्सहते यदि ॥३७०॥ तच्छ्रुत्वैव नलो बाढं प्रापयामीत्युदीर्य सः। गत्वा वराश्वान् संयोज्य सज्जं चक्रे रथोत्तगम् ॥३७१॥ स्वयंवरप्रवादोऽयं जाने मत्प्राप्तये तया। कृतो न दमयन्ती तु सा स्वप्नेऽपीदृशी भवेत् ॥३७२॥ तत्तत्र तावद् गच्छामि पश्यामीति विचिन्त्य सः। राज्ञस्तस्यर्तुपर्णस्य सज्जं रथमुपानयत् ॥३७३॥ आरूढे च नृपे तस्मिंस्तं सबाहयितुं रथम्। नलः प्रवृत्ते तादग्र्जबजबैगेन रहसा ॥३७४॥

नवम लम्बक ४८५

नवम लम्बक ४८५ 'क्षीण चन्द्रमा अम्बर (वस्त्र और आकाश) के एक देश से दूसरे (मुख-मंडल) मंडल में जाकर यदि कुमुदिनी के लिए अदृश्य हो जाता है, तो उसमें उसकी क्या क्रूरता है ? ॥३६०॥ यह उत्तर सुनकर और उसे विपत्ति के कारण विक्लव रूपवाला नल समझकर वह गुप्तचर वहाँ से चला गया ॥३६१॥ और विदर्भ की राजधानी में पहुँचकर उसने महारानी के सहित राजा भीम तथा दमयन्ती से जो कुछ उसने देखा-सुना था सब कह सुनाया ॥३६२॥ यह सुनकर दमयन्ती एकान्त में अपने पिता से बोली—'पाचक के रूप में छिपा हुआ यह अवश्य ही मेरा पति है ॥३६३॥ अब उसके यहाँ बुलाने में मेरी युक्ति कीजिए। उस राजा ऋतुपर्ण के पास दूत भेजिए, वह दूत राजा ऋतुपर्ण के पास पहुँचते ही राजा से यह कहे कि राजा नल कहीं चला गया है। उसका पता अब नहीं लग रहा है ॥३६४-३६५॥ अब दमयन्ती प्रातःकाल ही फिर स्वयंवर करेगी। इसलिए, आप स्वयंवर के लिए आज ही विदर्भ देश में पधारें ॥३६६॥ यह सुनकर वह राजा रथ चलाने में कुशल आर्यपुत्र (नल ) के साथ एक दिन में अवश्य ही यहाँ आ जायगा' ॥३६७॥ पिता के साथ उसने इस प्रकार विचार कर और तदनुसार उसने कोसलराज के पास उपयुक्त दूत को भिजवाया ॥३६८॥ उस दूत ने राजा ऋतुपर्ण को उसी प्रकार जाकर सन्देश दे दिया। उत्सुक राजा ऋतुपर्ण ने भी सूत के रूप में अपने पास में स्थित नल से कहा ॥३६९॥ हे ह्रस्वबाहु तुमने मुझसे कहा था कि मुझे रथ चलाने का ज्ञान भी है, तो यदि तुम्हें उत्साह है, तो मुझे आज ही विदर्भ देश की राजधानी में पहुँचा दो ॥३७० ॥ यह सुनकर नल ने कहा 'ठीक है पहुँचाता हूँ। इस प्रकार कहकर और अच्छे-अच्छे घोड़ों को जोड़कर उसने एक उत्तम रथ तैयार किया ॥३७१॥ यह स्वयंवर का प्रचार, मेरी प्राप्ति के लिए एक बहाना मात्र है, ऐसा मैं समझता हूँ क्योंकि दमयन्ती तो स्वप्न में भी ऐसी नहीं है (कि वह पुनः स्वयंवर करे) ॥३७२॥ तो अब वहाँ जाकर देखता हूँ—ऐसा सोचकर उसने राजा ऋतुपर्ण के लिए, सजा- [L29: सजाया तैयार रथ ला दिया ॥३७३॥ राजा के रथ पर आरूढ हो जाने पर नल ने गरुड को जीतनेवाले वेग से रथ को हाँका ॥३७४॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर रथवेगच्युतं वस्त्रं प्राप्तं रथविधारणम्। ब्रुवाणमथ मार्गे तमृतुपर्णं नलोऽब्रवीत् ॥३७५॥ राजन् क्व तव तद्वस्त्रमनेनैव क्षणेन हि। बहूनि योजनान्येव व्यतिक्रान्तो रथस्तव ॥३७६॥ श्रुत्वैतदृतुपर्णस्तमवादीदङ्ग देहि मे। रथज्ञानमिदं तुभ्यमक्षज्ञानं ददाम्यहम् ॥३७७॥ येन वश्या भवन्त्यक्षाः संख्याज्ञानं च जायते। सम्प्रत्येव च पश्यात्र वदामि प्रत्ययं तव ॥३७८॥ दृश्यतेऽग्रे तरोर्योऽस्य संख्यामेतस्य तेऽधुना। वच्म्यहं फलपर्णानां गणयित्वा च पश्य ताम् ॥३७९॥ इत्युक्त्वा फलपर्णानि यावन्त्येव जगाद सः। नलेन गणितान्यासंस्तावन्त्येवात्र शाखिनि ॥३८०॥ ततो नलो रथज्ञानमृतुपर्णाय तद्ददौ। ऋतुपर्णोऽप्यदादक्षज्ञानं तस्मै नलाय तत् ॥३८१॥ परीक्षते स्म तज्ज्ञानं नलो गत्वाऽपरे तरौ। सम्यक् च बुबुधे संख्यां पत्रादिष्वत्र तेन सः ॥३८२॥ ततो हृष्यति यावत् स तावत्तस्य शरीरतः। निरगात् पुरुषः कृष्णस्तं स कोऽसीति पृष्टवान् ॥३८३॥ सोऽहं कलिः शरीरात्त्वां दमयन्तीवृतस्य ते। ईर्ष्याया प्राविशं तेन भ्रष्टा द्यूतेन ते श्रियः ॥३८४॥ ततस्त्वां दशतस्तेन कार्कोटेन तदा वने। न दग्धस्त्वमहं त्वेव पश्य दग्धस्त्वयि स्थितः ॥३८५॥ मिथ्या परोपकारो हि कृतः स्यात् कस्य शर्मणे। तद्गच्छाम्यवकाशो हि नास्त्यन्येषु न च त्वयि ॥३८६॥ इत्युक्त्वा स कलिस्तस्य तिरोऽभूत् सोऽपि तत्क्षणम्। जातधर्ममतिः प्राप्ततेजाः प्राग्वद्बभूव सः ॥३८७॥ आरुह्य वाह्य रथं तस्मिन्नेवाह्नि तं जवात्। विदर्भमृतुपर्णं तं प्रापयामास भूपतिम् ॥३८८॥ स चोपहस्यमानोऽत्र पृष्टागमनकारणः। ऋतुपर्णो जगौ राजगृहासन्ने समावसत् ॥३८९॥