कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक १६७ तब राजा त्रिभुवन ने सोये हुए उसके पास जाकर उस खड्ग को उठा लिया और उसके साथ ही उस राजा को दिव्य प्रभाव भी प्राप्त हो गया ॥२२७॥ तब राजा ने मदोन्मत्त होकर सोये हुए उस पाशुपत को लात मारकर उठाया और खूब डाँटा-फटकारा। किन्तु, वीर होने के कारण राजा ने उसका वध नहीं किया ॥२२८॥ और, सहेलियों के सहित अपनी उस असुर-कन्या के साथ वह बिल में चला गया ॥२२९॥ सिद्धि से भ्रष्ट वह पाशुपत अत्यन्त दुःखी हुआ। कृतघ्न व्यक्ति चिरकाल में निधि प्राप्त करके भी अवश्य भ्रष्ट हो जाते हैं ॥२३०॥ इस घटना को अपनी आँखों से देखकर भ्रमण करता हुआ मैं यहाँ आया हूँ। इसलिए, हे देवि चिरकाल के बाद भी तुझे पति का समागम अवश्य होगा ॥२३१॥ जैसे कि त्रिभुवन राजा को हुआ। क्योंकि कल्याण करनेवाला व्यक्ति कभी कष्ट नहीं पाता। इस प्रकार ब्राह्मण का उपदेश सुनकर बन्धुमती को कुछ सन्तोष हुआ ॥२३२॥ और उसने बहुत धन देकर उसे कृतार्थ किया। दूसरे दिन वहाँ दूर देश का रहनेवाला एक और ब्राह्मण रानी के पास आया ॥२३३॥ उत्कंठिता बन्धुमती ने परिचय और नाम बताकर उससे भी पति का समाचार पूछा। तब उस ब्राह्मण ने उससे कहा— ॥२३४॥ हे देवि मैंने तेरे पति को तो कहीं नहीं देखा किन्तु यथार्थ नामवाला मैं सुमन तेरे घर पर आया हूँ इसलिए शीघ्र ही तेरा मन प्रसन्न होगा। ऐसा मेरा मन कहता है। क्योंकि चिरकाल के वियोगियो का भी समागम होता ही है ॥२३५-२३६॥
नल और दमयन्ती की कथा
मैं इस सम्बन्ध में तुझे एक कथा सुनाता हूँ सुनो। प्राचीन काल में नल नाम का एक राजा था ॥२३७॥ वह राजा इतना सुन्दर था कि उसके रूप से अपमानित होकर कामदेव मानो (उसी दुःख से) क्रुद्ध शिवजी के नेत्र की आग में जलकर भस्म हो गया ॥२३८॥ पत्नी-रहित उस राजा ने अपने ही समान सुन्दरी पत्नी की खोज करते हुए विदर्भ देश के राजा भीम की कन्या दमयन्ती का नाम सुना ॥२३९॥