भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१ कथासरित्सागर

१ कथासरित्सागर एवं दिनेषु गच्छत्सु तस्योद्वाढवशात्किल । अपुत्रताकृता राज्ञश्चिन्ता जात्वपद्यत ॥२७॥ तयातिषुर्मनस्कं च दृष्ट्वा पप्रच्छ स प्रिया । अलङ्कारप्रभा देवी दौर्मनस्यस्य कारणम् ॥२८॥ सत स राजावादीतां सर्वसम्पत्तिरस्ति मे । एक तु पुत्रो नास्तीति दुख मां देवि बाधते ॥२९॥ या मया प्रागपुत्रस्य पुंस सत्त्ववत कथा। श्रुता सरस्मरणोद्भाताश्चिन्तेषा चोद्गता मम ॥३०॥ कीदृशी सा कथा देवेत्युक्तो देव्या तया च स । राजा तस्यै कथामेवं संक्षेपातामवर्णयत् ॥३१॥ अथ सत्त्वशीलस्य कथा नगरे चित्रकूटाख्ये ब्राह्मणार्श्वनतत्पर । बभूव ब्राह्मणवरो नाम्नान्यर्थो महीपति ॥३२॥ तस्यासीत्सत्त्वशीलाख्यो जयी युद्धैकसेवक । मासे मासे च लेभे स तस्मात् स्वर्णशत नृपात् ॥३३॥ पर्याप्तं तच्च नैवाभूत्यागिनस्तस्य काञ्चनम् । अपुत्रत्वाच्च दानैकविनोदासक्तचेतस ॥३४॥ पुत्रो विनोदहेतुर्मे दत्तस्तावन येवसा । दत्त च दानम्यसम तदप्यर्थविनाकृतम् ॥३५॥ वरं जीनेस्य शूकस्य हरोर्जे मोपलस्य वा। न संसारे दरिद्रस्य त्यागैकव्यसनस्य च ॥३६॥ इति सञ्चिन्तयन्नित्यं सत्त्वशील स जातुचित् । उद्याने सञ्चरन् प्राप निधिं दैवात्कदाचन ॥३७॥ सभृत्यश्च तमादाय भूरिकाञ्चनभास्वरम्। महापरत्नरुचिरं निनाय प्रक्षनं गृहम् ॥३८॥ तत स भोगा भुञ्जाना ब्राह्मणेभ्या ददद्वसु । भृत्यभ्यश्च सुहृद्भ्यश्च बाधवास्तेत्र यात्रिक ॥३९॥ १

सप्तम लम्बक ७

सप्तम लम्बक ७ इस प्रकार, बहुत दिन व्यतीत होने पर भी उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक बार उसे इस बात पर गम्भीर चिन्ता उत्पन्न हो गई ॥२७॥ उसे अत्यन्त चिन्तित देखकर रानी अलंकारप्रभा ने उसकी उदासी का कारण पूछा ॥२८॥ प्रश्न सुनकर राजा ने कहा— 'देवि ! मुझे सभी प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त है, किन्तु एक पुत्र का अभाव मेरी चिन्ता का कारण हो रहा है ॥२९॥ मैंने एक पुत्रहीन सत्त्ववान् मनुष्य की कथा सुनी थी उसके स्मरण आने पर आज चिन्ता बढ़ गई है' ॥३०॥ 'वह कैसी कथा है ?' — इस प्रकार रानी के पूछने पर राजा ने संक्षेप से वह कथा इस प्रकार सुनाई ॥३१॥ राजा सत्त्वशील की कथा चित्रकूट नामक नगर में ब्राह्मणों की सेवा में निरत ब्राह्मणवर नामक यथार्थ नामवाला राजा था ॥३२॥ उसका सत्त्वशील नामक एक विजयी और युद्ध में सहायता करनेवाला भक्त सेवक था। उसे राजा प्रतिमास एक सौ स्वर्ण-मुद्रा वेतन के रूप में देता था ॥३३॥ किन्तु परम उदार उस सत्त्वशील के लिए इतना धन पूरा नहीं होता था क्योंकि पुत्र न होने के कारण वह उस धन को दान कर देता था ॥३४॥ वह सोचता था कि विधि ने मेरे मनोरञ्जन के लिए एक पुत्र नहीं दिया केवल दान देने का व्यसन दिया वह भी धन के बिना ॥३५॥ संसार में पुराने और सूखे वृक्ष या पत्थर का जन्म होना अच्छा है किन्तु दान का व्यसनी होकर दरिद्र होना अच्छा नहीं ॥३६॥ ऐसा सोचते हुए सत्त्वशील ने घूमते-घामते दैवयोग से अपने उद्यान में कोष (खजाना) प्राप्त किया ॥३७॥ अपने नौकरों की सहायता से वह सत्त्वशील अपरिमित स्वर्ण और रत्नों से भरे हुए खजाने को अपने घर उठवा ले गया ॥३८॥ इतना धन प्राप्त करके वह सुख-भोग करता दान देता और भृत्यों तथा मित्रों को बाँटता हुआ सुख से रहने लगा ॥३९॥

The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.

उसके वैभव को देखकर उसके कुटुम्बियों ने पता लगा लिया कि इसे कहीं खजाना हाथ लगा है। अतः, ईर्ष्यावश उन्होंने राजा से जाकर सारा समाचार सुना दिया ॥४४ ॥ राजा ने पहरेदार को भेजकर सत्वशील को बुलवाया। वह भी राजभवन के आँगन में आकर एक कोने में खड़ा हो गया। वहाँ पर एकान्त में उसने हाथ में ली हुई छड़ी की नोक से मिट्टी की कच्ची भूमि खड़े-खड़े खोद डाली और उसे वहाँ पर ताँब के घड़े में भरी हुई मुहरों का खजाना दीख पड़ा ॥४१-४२॥ यह खजाना क्या मिला मानों देव ने—'इसे देकर राजा को संतुष्ट करो' इस प्रकार का प्रकाश दिया ॥४३॥ सत्वशील ने उस गढ़े को मिट्टी से भर दिया और द्वारपाल के साथ राजा के सम्मुख उप- स्थित हुआ। उसके प्रणाम करने पर राजा ने स्वयं कहा—॥४४॥ 'मुझे मालूम हुआ है कि तुम्हें खजाना मिला है। उसे हमें सौंप दो' ॥४५॥ यह सुनकर सत्वशील नम्रभाव से बोला कि 'महाराज ? पहले मिला हुआ खजाना समर्पण करूँ या आज का मिला हुआ ? ॥४६॥ राजा ने कहा—अभी प्राप्त धन-भाण्डार मुझे दो। सत्वशील ने राजा को एकान्त में ले जाकर तुरन्त देखा हुआ धन-भाण्डार दे दिया ॥४७॥ राजा ने प्रसन्न होकर कहा—'पहले भाण्डार को तुम आनन्द से भोगो'। इस प्रकार सन्तुष्ट राजा से आज्ञा पाकर सत्वशील अपने घर आया ॥४८॥ घर जाकर अपुत्रता के दुःख को किसी प्रकार भुलाता हुआ सत्वशील दान और भोग से भाण्डार को घटाता हुआ अपने नाम को चरितार्थ करने लगा ॥४९॥ विद्याधर राजा हेमप्रभ ने कहा कि 'इस प्रकार सत्वशील की कथा स्मरण करके पुत्र न होने की चिन्ता से दुःखी हूँ' ॥५० ॥ पति हेमप्रभ से इस प्रकार कही गई रानी अलंकारप्रभा उससे बोली—॥५१॥ 'यह सच है कि उदार हृदयवालों की दैव भी सहायता करता है। क्या दूसरा स्वर्ण भाण्डार देकर दैव ने सत्वशील की संकट के समय सहायता नहीं की ? ॥५२॥ इसी प्रकार, तुम भी अपने सत्त्व के प्रभाव से इच्छित फल प्राप्त करोगे। इस सम्बन्ध में उदाहरणस्वरूप विक्रमत्तुंग नामक राजा की कथा सुनो'— ॥५३॥

विक्रमत्तुंग राजा की कथा पृथ्वी का अलंकारस्वरूप पाटलिपुत्र नाम का नगर है जिसमें पूर्व वाणिशाली नाना प्रकार की मणियों जड़ी हुई हैं ॥५४॥ २

The provided image is completely blank and contains no text.

सप्तम लम्बक [पृष्ठ संख्या: ११]

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

सप्तम लम्बक [पृष्ठ संख्या: ११] प्राचीन समय उस नगर में विक्रमतुंग नाम का सत्यशील राजा था जो दान देने में याचकों से और युद्ध में शत्रुओं से कभी पराङ्मुख नहीं हुआ ॥५५॥ किसी समय वह राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। वहाँ उसने बिल्वफल (बेल) से होम करते हुए किसी ब्राह्मण को देखा ॥५६॥ उसे देखकर पूछने की इच्छा होने पर भी राजा उसे छोड़कर शिकार के लिए सेना के साथ आगे चला गया ॥५७॥ उछलते-गिरते बाणों से मारे जाते हुए भैंसों के समान मृगों और सिंहों से घिर शाम तक खेलकर लौटे हुए राजा ने उसी स्थान पर होम करते हुए ब्राह्मण को देखा और समीप जाकर प्रणाम करके उससे होम का फल पूछा ॥५८-५९॥ तब वह ब्राह्मण राजा को आशीर्वाद देकर बोला— मैं नागशर्मा नाम का ब्राह्मण हूँ। इस होम का फल सुनो—॥६० ॥ इस बिल्व के होम से जब अग्नि प्रसन्न होती है, तब कुण्ड से सोने के बिल्व निकलते हैं ॥६१॥ और, तब अग्नि प्रकट होकर स्वयं वरदान देती है। मुझे बिल्वों का होम करते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया किन्तु मुझ अभागे पर अभी तक अग्नि प्रसन्न नहीं हुई। उसके ऐसा कहने पर धीरसत्त्वशाली राजा उससे बोला—॥६२-६३॥ 'यदि ऐसा है, तो एक बिल्व मुझे दो मैं उसका होम करता हूँ और तुम्हारी अग्नि को अभी प्रसन्न करता हूँ' ॥६४॥ ब्राह्मण ने राजा से कहा— अनियमिता और अपवित्र अवस्था में तुम आग को कैसे प्रसन्न करोगे जब कि नियमपूर्वक अनुष्ठान करने और पवित्र स्थिति में रहनेवाले मुझपर वह प्रसन्न नहीं है ॥६५॥ राजा ने कहा—'ऐसी बात नहीं है। तुम चिन्ता न करो। तुम मुझे एक बिल्व दो और आश्चर्य देखो' ॥६६॥ तब ब्राह्मण ने आश्चर्य के साथ राजा को बिल्व दिया और राजा दृढ़ चित्त से मन-ही- मन बोला—'हे अग्निदेव! यदि तुम मेरे बिल्व-होम से प्रसन्न न होगे तो मैं अपना सिर तुम्हारे लिए होम कर दूँगा। ऐसा कहकर उसने बिल्व का होम दिया ॥६७-६८॥ बिल्व का होम करते ही हाथों में स्वर्ण का बिल्व लिए हुए अग्निदेव कुण्ड से प्रकट हुए, मानो वे राजा के दृढ़ सत्त्व का फल लेकर आये हों ॥६९ ॥ और दृढ़हृदय राजा से बोले—'तुम्हारे इस सत्त्व से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो ॥७०॥

१० कथासरित्सागर

१० कथासरित्सागर तत्र विक्रमतुङ्गाख्यो राजाभूत्सत्त्ववान्पुरा। योऽभूत्पराङ्मुखो दाने नार्थिनां न युधि द्विषाम्॥५५॥ स जातु मृगयाहेतो प्रविष्टो नृपतिर्वनम्। बिल्वैर्होमं विदधतं तत्र ब्राह्मणमैक्षत॥५६॥ तं दृष्ट्वा प्रष्टुकामोऽपि परिहृत्य तदन्तिकम्। ययौ स दूरं मृगयारसेन सबलस्ततः॥५७॥ उत्पतद्भिः पतद्भिश्च हन्यमानेः स्वपाणिना। चिरं मृगैश्च सिंहैश्च क्रीडित्वा कन्दुकैरिव॥५८॥ आवृत्तस्त उपेयात्र दृष्ट्वा होमपरं द्विजम्। उपेत्य नत्वा पप्रच्छ नाम होमफलं च सः॥५९॥ ततः स ब्राह्मणो भूपं कृताशीस्तमभाषत। विप्रोऽहं नागशर्माख्यो होमे च श्रृणु मे फलम्॥६०॥ अनेन बिल्वहोमेन प्रसीदति यदानलः। हिरण्मयानि बिल्वानि तदा निर्यान्ति कुण्डतः॥६१॥ ततोऽग्निः प्रकटीभूय वरं साक्षात् प्रयच्छति। वर्त्तते मम भूयांश्च कालो बिल्वानि जुह्वतः॥६२॥ मन्दपुण्यस्य नाद्यापि तुष्यत्येव स पावकः। इत्युक्ते तेन राजा तं धीरसत्त्वोऽभ्यभाषत॥६३॥ तर्हि मे देहि बिल्वं त्वमेकं यावज्जुहोमि तत्। प्रसादयामि च ब्रह्मन्नधुनेव तवानलम्॥६४॥ कथं प्रसादयसि त्वं वह्निमप्रयतोऽप्यधि। यो ममैवं प्रत्तस्तस्य पूतस्यापि न तुष्यति॥६५॥ इत्युक्तस्तेन विप्रेण राजा तमवदत्पुनः। मैवं प्रयच्छ मे बिल्वं पश्याश्चर्यं क्षणादिति॥६६॥ ततः स राज्ञे विप्रोऽस्मै ददौ बिल्वं सकौतुकः। राजा च स तथा तत्र वृद्धसत्त्वेन चेतसा॥६७॥ हुतेनानेन बिल्वेन न चेत्तुष्यति तच्छिरः। स्वमग्ने ते जुहोमीति ध्यात्वा तस्मिञ्जुहाव तत्॥६८॥ प्राविरासीच्च सप्ताचिः कुण्डाद् बिल्वं हिरण्मयम्। स्वयमादाय तत्तस्य फलं सत्त्वतरोरिव॥६९॥ जगाद च स साक्षात्तं जातवेदा महीपतिम्। सत्त्वेनानेन तुष्टोऽस्मि तद्गृहाण वरं नृप॥७०॥

सप्तम लम्बक ११

सप्तम लम्बक ११ प्राचीन समय उस नगर में विक्रमतुंग नाम का सत्यशील राजा था जो दान देने में याचकों से और युद्ध में शत्रुओं से कभी पराङ्मुख नहीं हुआ ॥५५॥ किसी समय वह राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। वहाँ उसने बिल्वफल (बेल) से होम करते हुए किसी ब्राह्मण को देखा ॥५६॥ उसे देखकर पूछने की इच्छा होने पर भी राजा उसे छोड़कर शिकार के लिए सेना के साथ आगे चला गया ॥५७॥ उछलते-गिरते हांकों से मारे आते हुए भैंसों के समान मृगों और सिंहों से चिर काल तक खेलकर लौटे हुए राजा ने उसी स्थान पर होम करते हुए ब्राह्मण को देखा और समीप जाकर प्रणाम करके उससे होम का फल पूछा ॥५८-५९॥ तब वह ब्राह्मण राजा को आशीर्वाद देकर बोला—'मैं नागशर्मा नाम का ब्राह्मण हूँ। इस होम का फल सुनो—॥६०॥ इस बिल्व के होम से जब अग्नि प्रसन्न होती है, तब कुण्ड से सोने के बिल्व निकलते हैं ॥६१॥ और, तब अग्नि प्रकट होकर स्वयं वरदान देती है। मुझे बिल्वों का होम करते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया किन्तु मुझ अभागे पर अभी तक अग्नि प्रसन्न नहीं हुई। उसके ऐसा कहने पर धीरसत्त्वशाली राजा उससे बोला—॥६२-६३॥ 'यदि ऐसा है, तो एक बिल्व मुझे दो मैं उसका होम करता हूँ और तुम्हारी अग्नि को अभी प्रसन्न करता हूँ' ॥६४॥ ब्राह्मण ने राजा से कहा—'अनियमित और अपवित्र अवस्था में तुम आग को कैसे प्रसन्न करोगे जब कि नियमपूर्वक अनुष्ठान करने और पवित्र स्थिति में रहनेवाले मुझपर वह प्रसन्न नहीं हैं' ॥६५॥ राजा ने कहा—'ऐसी बात नहीं है। तुम चिन्ता न करो। तुम मुझे एक बिल्व दो और आश्चर्य देखो' ॥६६॥ तब ब्राह्मण ने आश्चर्य के साथ राजा को बिल्व दिया और राजा दृढ़ चित्त से मन-ही- मन बोला—'हे अग्निदेव! यदि तुम मेर बिल्व-होम से प्रसन्न न होय तो मैं अपना सिर तुम्हारे लिए होम कर दूँगा। ऐसा कहकर उसने बिल्व को होम दिया ॥६७-६८॥ बिल्व का होम करते ही हाथ में स्वर्ण का बिल्व लिए हुए अग्निदेव कुण्ड से प्रकट हुए मानों वे राजा के दृढ़ सत्त्व का फल लेकर आये हों ॥६९॥ और शुद्धहृदय राजा से बोले—'तुम्हारे इस सत्त्व से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो' ॥७०॥

The provided image is completely blank and contains no text.

सप्तम लम्बक २६

सप्तम लम्बक २६ यह सुनकर महावीर राजा प्रणाम करता हुआ बोला—मेरे लिए दूसरा और वर क्या चाहिए, पहले उस ब्राह्मण का मनोरथ पूर्ण करो ॥७१॥ राजा की बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न अग्नि ने कहा कि यह ब्राह्मण महाधनपति होगा और मेरी कृपा से तुम्हारा भण्डार और लक्ष्मी दोनों कभी क्षीण न होंगे। इस प्रकार, वर देते हुए अग्नि से ब्राह्मण बोला—॥७२-७३॥ भगवन् ! स्वेच्छाविहारी राजा से तुम इतना शीघ्र प्रसन्न हो गये और कठोर नियम तथा व्रत करनेवाले मुझसे न हुए, यह क्या बात है ? ॥७४॥ तब अग्नि ने कहा— 'यदि मैं वचन न देता तो यह महासत्त्वशाली राजा अपना सिर काटकर मुझ में होम देता ॥७५॥ उत्कृष्ट सत्त्ववाले व्यक्तियों को सिद्धियाँ शीघ्र प्राप्त होती हैं और हे ब्राह्मण ! तुम्हारे ऐसे मन्द सत्त्ववालों को सिद्धियाँ देर से प्राप्त होती हैं ॥७६॥ ऐसा कहकर अग्निदेव के अन्तर्धान होने पर नागशर्मा राजा से आज्ञा लेकर चला गया और वह क्रमशः महाधनी हो गया ॥७७॥ राजा भी अपनी अद्भुत सत्त्वधीरता के कारण सेवकों से स्तुति किया जाता हुआ पाटलिपुत्र नगर को गया ॥७८॥ एक बार एकान्त में बैठे हुए राजा के समीप समुद्भव नामक द्वारपाल ने कहा—'महाराज ! अपना नाम दत्तशर्मा बताता हुआ एक ब्रह्मचारी ब्राह्मण आपसे एकान्त में कुछ निवेदन करने के लिए द्वार पर आया है' ॥७९-८० ॥ 'उसे बुलाओ'—राजा की इस प्रकार आज्ञा पाने पर द्वारपाल उसे ले आया। वह भी राजा को 'स्वस्ति' कहकर और प्रणाम करके बैठ गया ॥८१॥ और बोला— महाराज ! मैं किसी चूर्ण मिलाने की युक्ति द्वारा ताँबे से तुरन्त उत्तम सोना बनाना जानता हूँ ॥८२॥ वह युक्ति गुरु ने मुझे बताई है और मैंने उसकी अनेक बार परीक्षा की है, जिससे सोना बन गया ॥८३॥ उस ब्रह्मचारी के ऐसा कहने पर राजा ने ताँबा मँगवाया। उसके पिघल जाने पर ब्रह्मचारी ने उसमें चूर्ण डाला। उसमें चूर्ण डालते ही किसी छिपे हुए देवता ने अदृश्य रूप से उस चूर्ण का अपहरण कर लिया। अग्नि की कृपा से राजा ने उस अदृश्य यक्ष को देख लिया ॥८४-८५॥

१४ (left) कथासरित्सागर (center)

Let's do a careful line-by-line transcription of the image.

  • Header: १४ (left) कथासरित्सागर (center)

  • Line 1: अप्राप्तचूर्णं ताम्रं च न सुवर्णीबभूव तत्।

  • Line 2: एवं त्रिः कुर्वतस्तस्य बटोर्मोघः श्रमोऽभवत् ॥८६॥

  • Line 3: सुप्ते विषण्णावादाय राजा तस्माद् बटोः स्वयम्। (Wait, let's look at the image: सुप्ते विषण्णावादाय? No, सुप्ते विषण्णादादाय? Let's look at the letters: सु प्ते वि ण्णा वा दा ? No, सुप्ते विषण्णावादाय? Let's look at the image: सुप्ते विषण्णावादाय? No, सुप्ते विषण्णावादाय? Let's look at the letters: सु प्ते वि ण्णा वा दा ? Yes, सुप्ते विषण्णावादाय? Wait, सुप्ते विषण्णावादाय

सप्तम लम्बक १५

सप्तम लम्बक १५ चूर्ण न मिल सकने के कारण वह ताँबा सोना न बन सका। इस प्रकार, तीन बार करने पर भी ब्रह्मचारी का प्रयत्न निष्फल ही रहा ॥८६॥ तब राजा ने दुःखित ब्रह्मचारी से उस चूर्ण को लेकर स्वयं पिघले हुए ताँबे में डाला और उससे सोना बन गया ॥८७॥ राजा के चूर्ण डालने पर यक्ष ने उसका अपहरण नहीं किया और मुस्कराकर चला गया ॥८८॥ इस घटना से आश्चर्य चकित उस ब्रह्मचारी के पूछने पर राजा ने यक्ष की बात उसे कह सुनाई ॥८९॥ तब राजा ने उस ब्रह्मचारी से चूर्ण बनाने की युक्ति सीख ली और उसका विवाह कराकर पालन-पोषण की व्यवस्था कर दी ॥९०॥ और, उस युक्ति से सोना बनाकर राजा ने अपने भण्डार को समृद्ध कर लिया ॥९१॥ इस प्रकार, डरा हुआ या प्रसन्न ईश्वर उच्च सत्त्ववालों को सिद्धि प्रदान करता ही है ॥९२॥ इसलिए 'हे महाराज ! तुमसे गम्भीर सत्त्वशाली और कौन दाता है। अतः शिव तुम्हें पुत्र प्रदान करेंगे। शोक मत करो' ॥९३॥ इस प्रकार, रानी अलंकारप्रभा के उदार वचन सुनकर राजा हेमप्रभ प्रसन्न हुआ और उसकी बातों पर उसने विश्वास किया ॥९४॥ राजा ने अपने उत्साह-भरे हृदय से शिव की आराधना से पुत्र की प्राप्ति को सम्भव समझा ॥९५॥ तब दूसरे दिन राजा हेमप्रभ रानी के साथ स्नान करने के बाद शिव की पूजा करके और ब्राह्मणों को नौ करोड़ सोने की मुद्राएँ दान करके पुत्र-प्राप्ति के लिए निराहार होकर शिव के सम्मुख तप करने के लिए बैठ गया और उसने यह निश्चय कर लिया कि या तो देह-त्याग करूँगा अथवा शंकर को प्रसन्न करूँगा ॥९६-९७॥ तप में बैठे हुए उसने भगवान् गिरिजापति की इस प्रकार स्तुति की—'शरण में आये हुए उपमन्यु को स्वेच्छा से दुग्ध-समुद्र दान करनेवाले संसार की उत्पत्ति रक्षा और प्रलय करने वाले हे शंकर ! तुम्हें प्रणाम है। हे आकाश आदि अष्टमूर्ति धारण करनेवाले गौरीपति ! तुम्हें प्रणाम है ॥९८-९९॥ हे निरन्तर खिले हुए हृदय-कमल में निवास करनेवाले निर्मल मानस-सरोवर के कलहंस शम्भू ! तुम्हें प्रणाम है ॥१००॥

१६ कथासरित्सागर

१६ कथासरित्सागर नमो दिव्यप्रकाशाय निर्मलाय कलात्मने। प्रक्षीणदोषैर्दृश्याय सोमायात्यद्भुताय ते ॥१०१॥ देहार्धभूतकान्ताय केवलब्रह्मधारिणे। इच्छानिर्मितविश्वाय नमो विश्वमयाय ते ॥१०२॥ एवं कृतस्तुतिं च तं राजानं गिरिजापतिः। त्रिरात्रोपोषितं स्वप्ने साक्षाद् भूयेवमब्रवीत् ॥१०३॥ उत्तिष्ठ राजन्भावी ते वीरो वंशधरः सुतः। गौरीप्रसादात्कन्यापि भविष्यत्युत्तमा तव ॥१०४॥ नरवाहनदत्तस्य युष्माकं चक्रवर्तिनः। भविष्यतो भवित्री या महिषी महसां निधे ॥१०५॥ इत्युक्त्वान्तर्हिते शर्वे सोऽथ विद्याधरेश्वरः। हेमप्रभः प्रबुबुधे प्रहृष्टो रजनीक्षये ॥१०६॥ आनन्दयदलंकारप्रभां स्वप्नं निवेद्य सः। गौर्या स्वप्ने तथैवोक्तां भार्यां संवादसिनीम् ॥१०७॥ उत्थाय च ततः स्नातः स राजार्चितधूर्जटिः। चकार दत्तदानः सन्नुत्सवं कृतपारणः ॥१०८॥ दिवसेष्वथ यातेषु देवी कतिपयेषु सा। अलङ्कारप्रभा तस्य राज्ञो गर्भमधारयत् ॥१०९॥ आनन्दयामास च तं मुखेन मधुगन्धिना। लोलनेत्रासिता कान्तं पङ्कजेनेव पाण्डुना ॥११०॥ आख्यातदत्ताभ्यनुज्ञां तामनुवारैर्गर्भदोहदःै। असूत तनयं काले शौरर्कमिव सा ततः ॥१११॥ येन जातेन महतैस्तेजोभिरवभासितम्। सिन्दूराख्यां नीतमपि तज्जातवासकम् ॥११२॥ पिता च तं शिशुं राजा शत्रुलोभभयावहम्। न्धिव्यागुपष्टिमं नाम्ना वज्रप्रभं व्यधात् ॥११३॥ ततः स ववृधे बालः पार्वणेन्दुरिव क्रमात्। कलाभिः पूर्यमाणः सन् वृद्धिहेतोः कुलाम्बुधेः ॥११४॥ अवाचिरात्पुनस्तस्य राज्ञो हेमप्रभस्य सा। अलङ्कारप्रभा राज्ञी सगर्भा समपद्यत ॥११५॥

सप्तम लम्बक १७

सप्तम लम्बक १७ हे दिव्य प्रकाशधारी निर्मल बल-स्वरूप हे निर्दोष व्यक्तियों से देखे जानेवाले अत्यन्त आश्चर्यमय शिव ! तुम्हें प्रणाम है। हे आधे शरीरमें गिरिजा को धारण करनेवाले विशुद्ध ब्रह्मचारिन् ! हे सङ्कल्पमात्र से विश्व की रचना करनेवाले और स्वयं विश्वस्वरूप ! तुम्हें प्रणाम है ॥११ १०२॥ इस प्रकार, स्तुति करते हुए और तीन दिनों तक उपवास किये हुए राजा से प्रसन्न होकर शिव ने दर्शन देकर कहा—'राजन् ! उठो। तुम्हारे वंश का प्रवर्तक बालक उत्पन्न होगा और गौरी की कृपा से तुम्हें एक उत्तम कन्या भी होगी ॥१०३-१०४॥ वह कन्या तुम विद्याधरों के होनेवाले चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की महारानी बनेगी' ॥११ ५॥ ऐसा कहकर शिव के अन्तर्धान होने पर वह विद्याधरों का राजा प्रातःकाल प्रसन्न चित्त होकर उठा और उसने अपनी महारानी अलङ्कारप्रभा को स्वप्न का समाचार सुनाकर आनन्दित किया रानी ने भी स्वप्न में पार्वती के द्वारा इसी प्रकार के वरदान प्राप्त करने का समाचार सुनाया ॥११ ६-११७॥ राजा ने उठकर स्नान करके शिव की पूजा की और दान दिया तथा व्रत का पारणोत्सव किया। कुछ दिन व्यतीत होने पर रानी अलङ्कारप्रभा ने गर्भ-धारण किया ॥११८-११९॥ वह रानी मधु से सुगन्धित और चंचल नेत्र भ्रमरवाले पाण्डुरवर्ण कमल के समान मुख से राजा को आनन्दित करने लगी ॥१२० ॥ तदनन्तर प्रसिद्ध और प्रशंसनीय जन्मवाले पुत्र को रानी ने इस प्रकार उत्पन्न किया जैसे आकाश सूर्य को उत्पन्न करता है ॥१२१॥ उत्पन्न होते ही उस कुमार ने अपने फैलते हुए तेज से उस प्रसूति-गृह को मानों सिन्दूर से लाल कर दिया ॥१२२॥ पिता हेमप्रभ ने शत्रुकुल का भय देनेवाले उस पुत्र का नाम आकाशवाणी के आज्ञानुसार वज्रप्रभ रखा ॥१२३॥ तब वह बालक पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान अपने तेज-रूपी गरुड़ को बढ़ाने के लिए क्रमशः बढ़ने लगा ॥१२४॥ तदनन्तर राजा हेमप्रभ की रानी अलङ्कारप्रभा ने पुनः थोड़े दिनों में ही गर्भ धारण किया ॥१२५ ॥ ३

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर सगर्भा लावण्योद्भूतसविशेषद्युतिस्तथा। सत्यं हुताशमासाद्य मेजेऽन्तःपुररत्नताम् ॥११६॥ विद्याकल्पितसत्पक्षविमानेन नभस्तले। बभ्राम च तयाभूतविलसद्गर्भदोहदा ॥११७॥ प्राप्ते च समये तस्या देव्या कन्याजनिष्ट सा। पर्याप्तं वर्णनं यस्या जन्म गौरीप्रसादतः ॥११८॥ नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा भाविनीति वाक्। तदाद्यापि हरदेशवचःसंवादिनी दिवः ॥११९॥ ततो राजा सुतोत्पत्तिनिर्वेशेऽकृष्टनोत्सवः। तां स हेमप्रभोऽकार्षीन्नाम्ना रत्नप्रभां सुताम् ॥१२० ॥ स्वविद्यासंस्कृता सा च तस्य रत्नप्रभा पितुः। अवर्धत गृहे दिक्षु प्रकाशस्तूदपद्यत ॥१२१॥ ततः स राजा तं कर्महरं वज्रप्रभं सुतम्। कृतदारक्रियं कृत्वा यौवराज्येऽभिषिक्तवान् ॥१२२॥ विन्यस्तराज्यभारश्च तस्मिन्नासीत्स निर्वृतः। सुताविवाहचिन्ता तु तस्यैकामूसदा हृदि ॥१२३॥ एकदा सोऽन्तिकासीनां प्रदेवीं बोध्य तां सुताम्। राजाप्रवीदमङ्गारप्रभां वशी समीपगाम् ॥१२४॥ कुलालङ्कारभूतापि पश्य देवि जगत्त्रये। कन्या नाम महद्दुःखं धिग्गहो महतामपि ॥१२५॥ विनीताप्याप्तविद्यापि रूपयौवनवत्यपि। रत्नप्रभा वरप्राप्त्या विर्नैपा यद्धुनोति माम् ॥१२६॥ नरवाहनदत्तस्य भार्योक्ता दैवतैरियम्। तत्किं न दीयते तस्मै भव्यसम्बन्धवर्तिने ॥१२७॥ इति प्रोक्तस्तया दथ्या स राजा पुनरब्रवीत्। बाढं सा कन्यका धन्या या तं वरमवाप्नुयात् ॥१२८॥ स हि कामावताराशत्र किं तु नाद्यापि सिद्ध्यताम्। प्राजन्मनेन मया तस्य विद्याप्राप्तिः प्रतीक्ष्यते ॥१२९॥ इत्यत्र बान्तस्तस्य मद्यस्तैर्वचनैः पितुः। वर्णप्रविष्ठे- कन्दर्पमोहम् रूपन्तेपमं ॥१३०॥ श्रान्तवाविशतिस्तत मुजव निदिरितव च । ममूरत्नप्रभा तन कृतचिता वरण गा ॥१३१॥

सप्तम लम्बक १९

सप्तम लम्बक १९ वह गर्भबती रानी रनिवास में सिंहासन पर बैठी हुई सचमुच रनिवास के रत्न-सी मालूम होती थी ॥११६॥ गर्भ के कारण होनेवाली इच्छा की पूर्ति के लिए वह अपनी विद्या के प्रभाव से व्योम- यान की कल्पना करके आकाश में विचरण करती थी ॥११७॥ गर्भ का समय (दस महीने) पूरा होने पर रानी ने कन्या को उत्पन्न किया। उस कन्या के वर्णन में इतना कहना ही पर्याप्त है कि उस का जन्म पार्वती की कृपा से हुआ था ॥११८॥ उसके उत्पन्न होने पर शिव की आज्ञा का अनुसरण करनेवाली यह आकाशवाणी हुई कि 'यह नरवाहनदत्त की भावी पत्नी होगी' ॥११९॥ राजा ने पुत्रोत्पत्ति के समान ही उसका जन्म-महोत्सव मनाया और उस कन्या का नाम रत्नप्रभा रखा ॥१२ ०॥ राजा ने उस कन्या को अपनी विद्याओं से शिक्षित कर दिया। वह कन्या घर में बढ़ने लगी और उसका प्रकाश चारों दिशाओं में फैलने लगा ॥१२१॥ तदनन्तर राजा ने उस कुमार को युद्ध-विद्याओं में निपुण देखकर उसका विवाह करके उसे युवराज बना दिया ॥१२२॥ पुत्र पर राज्य-भार देकर राजा हेमप्रभ निश्चिन्त और सुखी था किन्तु कन्या के विवाह की एक चिन्ता उसके हृदय में जगी हुई थी ॥१२३॥ एक बार वह राजा अपने पास बैठी हुई विवाह-योग्य कन्या को देखकर समीप में स्थित रानी अलंकारप्रभा से बोला—॥१२४॥ 'हे महारानी ! तीनों लोकों में कुल के अलंकार-रूप होने पर भी कन्या महान् लोगों के लिए भी अत्यन्त दुःखदायिनी होती है ॥१२५॥ यह रत्नप्रभा शिक्षिता रूपवती और विद्याओं की जानकार होने पर भी वर न मिलने के कारण मुझे दुख दे रही है' ॥१२६॥ रानी ने कहा कि 'देवताओं ने इसके नरवाहनदत्त की महारानी होने की आकाशवाणी की है अतः हमारे उस भावी चक्रवर्ती को इसे क्यों नहीं दे देते ? ॥१२७॥ रानी के इस प्रकार कहे गए राजा हेमप्रभ ने उनसे कहा—'ठीक है। वह कन्या धन्य है जो नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त करे। वह कामदेव का अवतार है किन्तु उसने अभी स्थिरता नहीं प्राप्त की। अतः मैं उसकी विद्या प्राप्ति की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। (विद्या प्राप्त होने पर वह दिव्य विद्याधर हो जायगा) ॥१२८-१२९॥ इस प्रकार पिता के मुख से बाण व मोहन-मन्त्रों के समान उन अक्षरों के कान में जाने पर रत्नप्रभा उस पति द्वारा चित्त हरण कर लेने पर व्याकुल-सी मूर्च्छिता-सी सोई-सी और लिखी हुई-सी हो गई ॥१३ ०-१३१॥

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर सगर्भा चाभवद्देव्यभूत्सविशेषद्युतिस्तथा। सत्यं हेमासमारूढा भेजेऽन्तःपुररत्नताम् ॥११६॥ विद्याकल्पितसत्पद्मविमानेन नभस्तले। बभ्राम च सप्रभाभूतविलसद्गर्भबोढृवा ॥११७॥ प्राप्ते च समये तस्या देव्याः कन्याऽजनिष्ट सा। पर्याप्तं वर्णनं यस्या जन्म गौरीप्रसादतः ॥११८॥ नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा भाविनीति वाक्। तदाश्रावि सुरादेशवचःसंभाविनी दिवः ॥११९॥ ततो राजा सुतोत्पत्तिनिर्विशेषकृतोत्सवः। तां स हेमप्रभोऽकार्षीन्नाम्ना रत्नप्रभां सुताम् ॥१२०॥ स्वविद्यासंस्कृता सा च तस्य रत्नप्रभा पितुः। अवर्धत गृहे दिक्षु प्रकाशस्तूपपद्यत ॥१२१॥ ततः स राजा तं वर्महरं वज्रप्रभं सुतम्। कृतवारक्रियं कृत्वा यौवराज्येऽभ्यषिञ्चवान् ॥१२२॥ विन्यस्तराज्यभारश्च तस्मिन्नासीत्स निर्वृतः। सुताविवाहचिन्ता तु तस्यैकामूदथा हृदि ॥१२३॥ एकदा सोऽन्तिकासीनां प्रदेयां वीक्ष्य तां सुताम्। राजाऽब्रवीदलङ्कारप्रभां देवीं समीपगाम् ॥१२४॥ कुलालङ्कारभूतापि पश्य देवि जगत्त्रये। कन्या नाम महद्दुःखं धिग्ग्रहो महतामपि ॥१२५॥ विनीताऽप्याप्तविद्यापि रूपयौवनवत्यपि। रत्नप्रभा वरप्राप्त्या विनेया यद्धुनोति माम् ॥१२६॥ नरवाहनदत्तस्य भार्योक्ता दैवतैरियम्। तत्किं न दीयते तस्मै भाव्यस्मच्चक्रवर्तिने ॥१२७॥ इति चोक्तस्तया देव्या स राजा पुनरब्रवीत्। बाढं सा कन्यका धन्या या तं वरमवाप्नुयात् ॥१२८॥ स हि कामावतारोऽत्र किं तु नाद्यापि विद्यताम्। प्राप्तस्तेन मया तस्य विद्याप्राप्तिः प्रतीक्ष्यते ॥१२९॥ इत्येवं वदतस्तस्य सद्यस्तैर्वचनैः पितुः। कर्णप्रविष्टैः कन्दर्पमोहमु त्रपदोपमैः ॥१३०॥ भ्रान्तेवाविष्टचित्तेव सुप्तेव मिलितेव च। अभूद्रत्नप्रभा तेन हृतचित्ता वरणं सा ॥१३१॥

सप्तम लम्बक २१

सप्तम लम्बक २१ तब वह कन्या माता-पिता को प्रणाम करके और किसी प्रकार उठकर अपने निवास भवन में चली गई और अत्यन्त चिन्ता से व्याकुल होकर किसी प्रकार बड़ी देर के बाद सो गई ॥१३४॥ तब स्वप्न में उसे यशमयी पार्वती ने कहा—'बेटी ! यह शुभ दिन है। अतः तुम स्वयं कौशाम्बी में जाकर अपने पति को देखना। तब तुम्हारा पिता स्वयं वहाँ आकर तुम्हारा विवाह करेगा। पार्वती के उस प्रकार के आदेश को उसने प्रातःकाल उठकर अपनी माता से कह सुनाया ॥१३५॥ माता की आज्ञा पाकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब कुछ जानकर वह उद्यान में स्थित अपने पति को देखने के लिए अपने नगर से चली ॥१३६॥ 'हे आर्यपुत्र ! तुम मुझे वही रत्नप्रभा समझो जो उत्कण्ठित होकर तुम्हारे पास आई है। आगे तुम जैसा समझो' ॥१३७॥ इस प्रकार, उसके अमृत को नीचा दिखानेवाले मधुर वचन को सुनकर और नेत्रों के लिए अमृत के समान उस विद्याधरी के सुन्दर रूप को देखकर नरवाहनदत्त विधाता की निन्दा करने लगा कि उसने सारा शरीर ही नेत्रमय और कर्णमय क्यो नहीं बना दिया कि उसे मैं देखता ही रहता और उसके वचन सुनता ही रहता ॥१३८-१३९॥ और बोला—'मैं धन्य हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ कि तुमने प्रेम से मेरे पास अभिगमन किया ॥१४०॥ इस प्रकार, उन दोनों के परस्पर नवीन प्रेम के कारण वार्तालाप करते हुए ही अकस्मात् आकाश में विद्याधरों की सेना दीख पड़ी ॥१४१॥ 'यह मेरे पिता आये'—रत्नप्रभा के इस प्रकार कहते ही राजा हेमप्रभ अपने पुत्र के साथ आकाश से तुरन्त उतरा ॥१४२॥ वह राजा हेमप्रभ अपने पुत्र वज्रप्रभ के साथ स्वागत करते हुए नरवाहनदत्त के पास आया ॥१४३॥ जबतक वे परस्पर शिष्टाचार करते हुए मिल रहे थे, इतने में ही उनका आगमन जानकर वत्सराज उदयन भी अपने मंत्री के साथ वहीं आ गया ॥१४४॥ अतिथि-सत्कार प्राप्त करने के बाद राजा हेमप्रभ ने उदयन को रत्नप्रभा के पूर्व कथनानुसार सारा वृत्तान्त सुनाया ॥१४५॥

२० कथासरित्सागर

२० कथासरित्सागर ततः कथञ्चित्पितरौ प्रणम्यान्तस्पुरं निजम्। गत्वा चिन्तातुरा निद्रां चिरेण कथमप्यगात् ॥१३२॥ प्रातः शुभे दिने पुत्रि वत्स वत्सेश्वरात्मजः। द्रष्टव्यः स्ववरो गत्वा कौशाम्बीं नगरीं त्वया ॥१३३॥ ततश्च स्वपुरेऽमुष्मिन्नानीय स्वपिता स्वयम्। तव तस्य च कल्याणि विवाहं संविधास्यति ॥१३४॥ इति स्वप्नेऽथ तां गौरी सानुकम्पा समादिशत्। प्रबुध्य सा च तं स्वप्नं प्रातर्मात्रे न्यवेदयत् ॥१३५॥ ततः सा तदनुज्ञाता बुद्ध्वा विद्याप्रभावतः। उद्यानस्थं वरं द्रष्टुं प्रावर्तत निजात्पुरात् ॥१३६॥ तामार्यपुत्र मामेतां वेत्थ रत्नप्रभामिति। प्राप्तामुक्त्वा क्षणेनाथ वित्थ यूयमतः परम् ॥१३७॥ एतत्तस्या वचः श्रुत्वा माधुर्यव्यक्ततामृतम्। विलोक्य नेत्रपीयूषं विद्याधर्या वपुश्च तत् ॥१३८॥ नरवाहनदत्तोऽन्तर्विधातारं निनिन्द सः। श्रोत्रनेत्रमयं कृत्स्नमकरोत्किं न मामिति ॥१३९॥ जगाद तां च धन्योऽहं जन्माद्य सफलं मम। योऽहमेवं स्वयं तन्वि स्नेहादभिसृतस्त्वया ॥१४०॥ इत्यन्योन्यनवप्रेमकृतसंलापयोस्तयोः। अकस्माद्ददृशे तत्र विद्याधरबलं दिवि ॥१४१॥ तातोऽयमागतोऽत्रेति त्राप्तरत्नप्रभोदिते। राजा हेमप्रभो व्योम्नः सपुत्रोऽवततार सः ॥१४२॥ उपाययौ च पुत्रेण सह बद्धप्रेमेण सः। नरवाहनदत्तं तं विहितस्वागतादरम् ॥१४३॥ अन्योन्यरचिताचारा यावत्तिष्ठन्ति ते क्षणात्। तावत्तत्रायायौ बुद्ध्वा वत्सराजः समन्त्रिकः ॥१४४॥ कृतातिथ्यविधिं तं च नृपं हेमप्रभाख्यं सः। यथा रत्नप्रभोक्तं तं वृत्तान्तं समबोधयत् ॥१४५॥

सप्तम लम्बक २१

सप्तम लम्बक २१ तब वह कुमारी माता-पिता को प्रणाम करके और किसी प्रकार उठकर अपने निवास भवन में चली गई और अत्यन्त चिन्ता से व्याकुल होकर किसी प्रकार बड़ी देर के बाद सो गई ॥१३४॥ तब स्वप्न में उस दयामयी पार्वती ने कहा—'बेटी ! कल शुभ दिन है। अतः तुम स्वयं कौशाम्बी में जाकर अपने पति को देखना। तब तुम्हारा पिता स्वयं वहाँ आकर तुम्हारा विवाह करेगा। पार्वती के उस प्रकार के आदेश को उसने प्रातःकाल उठकर अपनी माता से कह सुनाया ॥१३५॥ माता की आज्ञा पाकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब कुछ जानकर वह उद्यान में स्थित अपने पति को देखने के लिए अपने नगर से चली ॥१३६॥ 'हे आर्यपुत्र ! तुम मुझे वही रत्नप्रभा समझो जो उत्कण्ठित होकर तुम्हारे पास आई है। आगे तुम जैसा समझो' ॥१३७॥ इस प्रकार, उसके अमृत को नीचा दिखानेवाले मधुर वचन को सुनकर और नेत्रों के लिए अमृत के समान उस विद्याधरी के सुन्दर रूप को देखकर नरवाहनदत्त विधाता की निन्दा करने लगा कि उसने सारा शरीर ही नेत्रमय और कर्णमय क्यों नहीं बना दिया कि उसे मैं देखता ही रहता और उसके वचन सुनता ही रहता ॥१३८-१३९॥ और बोला—'मैं धन्य हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ कि तुमने प्रेम से मेरे पास अभिगमन किया ॥१४०॥ इस प्रकार, उन दोनों के परस्पर नवीन प्रेम के कारण वार्तालाप करते हुए ही अकस्मात् आकाश में विद्याधरों की सेना दीख पड़ी ॥१४१॥ 'यह मेरे पिता आये'—रत्नप्रभा के इस प्रकार कहते ही राजा हेमप्रभ अपने पुत्र के साथ आकाश से तुरन्त उतरा ॥१४२॥ वह राजा हेमप्रभ अपने पुत्र वज्रप्रभ के साथ स्वागत करते हुए नरवाहनदत्त के पास आया ॥१४३॥ जबतक वे परस्पर शिष्टाचार करते हुए मिल रहे थे इतने में ही उनका आगमन जानकर वत्सराज उदयन भी अपने मन्त्री के साथ वहीं आ गया ॥१४४॥ आतिथ्य-सत्कार प्राप्त करने के बाद राजा हेमप्रभ ने उदयन को रत्नप्रभा के पूर्व वृत्तान्तानुसार सारा वृत्तान्त सुनाया ॥१४५॥