कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम तरंग १८९-२२७
– ६ –
नवम तरंग १८९-२२७ नरवाहनदत्त का साहस १८९ राज्यधर बढ़ई की कथा १९१ मानपरा और अर्थलोभ की कथा १९९ नरवाहनदत्त का कर्पूरसम्भव द्वीप के प्रति प्रस्थान २ ०७। सूर्यप्रभ नामक षष्ठम लम्बक २२९-४४९ प्रथम तरंग २२९-२५७ मंगलाचरण २२९ नरवाहनदत्त की कथा २२९ चन्द्रप्रभ से कथित आत्म वृत्तान्त २२९ सूर्यप्रभ का चरित्र २३१। द्वितीय तरंग चन्द्रप्रभ की सभा में मय दानव का आगमन २५७ सूर्यप्रभ के दरबार मे नारद मुनि का आगमन २५९ काण ब्राह्मण की कथा २६९ कलावती की कथा २८३ महस्तिका का प्रेम २८९। तृतीय तरंग ३१५-३४९ सूर्यप्रभ का उद्योग ३१५। चतुर्थ तरंग ३४९-३६७ सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना ३४९ रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा मय की चर्चा ३६३। पंचम तरंग ३६७-३८५ सूर्यप्रभ-चरित रणभूमि में संग्राम ३६७ शरभानना योगिनी के पराक्रम की कथा ३८३। षष्ठ तरंग ३८७-४२१ सूर्यप्रभ-चरित ३८७ गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा ३८७ गुणशर्मा का जन्म वृत्तान्त ४ ० । सप्तम तरंग ४२१-४४९ सूर्यप्रभ का वृत्तान्त अन्तिम युद्ध ४२१। अलंकारवती नामक नवम लम्बक ४५१-४८१ प्रथम तरंग ४५१-४८१ मंगलाचरण ४५१ नरवाहनदत्त की कथा ४५१ अलंकारवती की कथा ४५३ राम और सीता की कथा ४५९ राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा ४६७ नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह ४७९।
द्वितीय तरंग ४८४-५३९
– ७ –
द्वितीय तरंग ४८४-५३९ नरवाहनदत्त का अलंकारवती के घर जाना ४८४ अशोकमाला की कथा ४८७ स्थूलभुज विद्याधर की कथा ४९३ अनंगरति की कथा ४९५ अनंग- प्रभा की कथा ५ ५ अनंगप्रभा और मदनप्रभ की कथा ५३१।
तृतीय तरंग ५३९-५६७ नरवाहनदत्त और कार्पटिक (भिखारी) की कथा ५३९ राजा क्षत्रवन्त और कम्बवन्त भिखारी की कथा ५४१ वीर ब्राह्मण प्रलम्बबाहु की कथा ५५१ वीरवर ब्राह्मण की कथा ५५१ वैश्यपुत्र सुप्रभ की कथा ५५७।
चतुर्थ तरंग ५६७-६ १ नरवाहनदत्त का मृगया-वर्णन ५६७ चार दिव्य पुरुषों की कथा ५६९ नरवाहनदत्त का पर्णतद्वीप में जाना और विष्णुसेवा की प्राप्ति ५७१ नर वाहनदत्त का नारिकेल-द्वीप में जाना ५७५ समुद्रवैश्य की कथा ५७९ समुद्रशूर वैश्य की कथा ५८१ राजा कनकप्रभ की कथा ५८७ राजा बहुसुवर्ण की कथा ५८९ अर्थवर्मा और भोगवर्मा बनिये की कथा ५९१।
पंचम तरंग ६ १-६३५ मद्रभूति की कथा ६ १ राजा चिरदाता और उसके प्रसंग नामक भृत्य की कथा ६ ३ राजा कनकवर्ण की कथा ६ ५।
षष्ठ तरंग ६३५-६९६ धनस्वामी और उसके पुत्र महीपाल की कथा ६३७ चक्र और खड्ग नामक वैश्यपुत्रों की कथा ६५५ अहंकारी मुनि पतिव्रता स्त्री और धर्मव्याध की कथा ६५९ नल और दमयन्ती की कथा ६६७।
शक्तियश नामक दशम लम्बक ६९५-९९५ प्रथम तरंग ६९५-७२१ मङ्गलाचरण ६९५ नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) ६९५ एक भारवाहक (मजदूर) की कथा ६९७ मङ्खट की कथा ६९९ मालदास की कथा ७ १।
द्वितीय तरंग ७२१-७४ विक्रमसिंह और कुङ्कुमद्रिका वेश्या की कथा ७२१ चन्द्रश्री और सीलहर वैश्य की कथा ७२९ बुद्धिका और देवदास की कथा ७३१ मयूरतार और उसकी स्त्री की कथा ७३१ राजा सिंहबल और रानी कल्याणवती की कथा ७३५।
तृतीय तरंग ७४१-७६५
तृतीय तरंग ७४१-७६५ नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) ७४१ शक्तिप्रभा का कौशाम्बी में आगमन ७४१ दो विद्याधरियों की कथा ७४३ शुक की आत्मकथा ७४५ सोमप्रभ मकरन्दिका और मनोरथप्रभा की कथा ७४९ मनोरथ- प्रभा की कथा ७५३। चतुर्थ तरंग ७६५-८ ३ राजा फुलबर के सेवक की कथा ७६५ संजीवक बैल और पिङ्गलक सिंह की कथा ७६७ कील उखाड़नेवाले बन्दर की कथा ७६९ दमनक और करकट का संवाद ७७१ नगाड़ा और सियार की कथा ७७३ बगुला और केकड़े की कथा ७७७ सिंह और शश की कथा ७७९ मन्दविसर्पिणी जूँ और खटमल की कथा ७८३ मदोत्कट सिंह की कथा ७८७ टिट्टिभ दम्पती की कथा ७८९ कछुए और हंस की कथा ७८९ तीन यक्षों की कथा ७९१ टिट्टिभ-दम्पती की कथा (क्रमागत) ७९३ शुभीमुख पक्षी और बन्दर की कथा ७९५ धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि वैश्यों की कथा ७९७ सांप और बगुले की कथा ७९९ लोहे का तराजू और वैश्यपुत्र की कथा ८ १। पंचम तरंग ८ १-८४९ अगुरु जलानेवाले की कथा ८ ३ तिल धोनेवाले मूर्ख कृषक की कथा ८ ३ पानी में आग फेंकनेवाले की कथा ८ ५ नासिकारोपण की कथा ८ ५ मूर्ख गड़ेरिये की कथा ८ ५ अलंकारस्तम्भक की कथा ८ ७ मूर्ख रूईवाले की कथा ८ ७ खजूर काटनेवाले की कथा ८ ७ मूर्ख मन्त्री की कथा ८ ९ नमक खानेवाले की कथा ८ ९ गाय दुहुनेवाले की कथा ८ ९ मूर्खभंजे की कथा ८११ कौवा रुझा मूषक और चूहे की कथा ८१३ हिरण्यक चूहा और संन्यासी की कथा ८१७ ईर्ष्यालु पुरुष और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा ८२३ नाग और वरुक की कथा ८२७ केशमूर्ख की कथा ८२९ तैलमूर्ख की कथा ८३१ अस्थिमूर्ख की कथा ८३१ मूर्ख चाण्डाल- कन्या की कथा ८३१ दृष्ट राजा की कथा ८३३ दो मित्रों की कथा ८३५ असमवेत मूर्ख की कथा ८३७ पुत्रघाती मूर्ख की कथा ८३७ भ्रातृमूर्ख की कथा ८३७ ब्रह्मचारी पुत्र की कथा ८३९ मूर्ख ज्योतिषी की कथा ८३९ कोदी मूर्ख की कथा ८३९ एक मूर्ख राजा की कथा ८४१ कफने के लिए दस पैसे खर्च करनेवाले मूर्ख कंजूस की कथा ८४१ समुद्र की लहरों पर निशान लगानेवाले की कथा ८४३ मांस के बदले में मांस देनेवाले राजा की
कथा ८४३ एक को मारकर दूसरा पुत्र चाहनेवाली स्त्री की कथा ८४४
– ९ – कथा ८४३ एक को मारकर दूसरा पुत्र चाहनेवाली स्त्री की कथा ८४४ एक मूर्ख सेवक की कथा ८४५ दो बन्धुओं की कथा ८४५ एक मूर्ख योद्धा की कथा ८४९ 'कुछ न' मांगनेवाले मूर्ख की कथा ८४९। षष्ठ तरंग ८४९–८८३ नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) ८४९ कौआ और उल्लमा की कथा ८५१ चतुरन्त नाम के हाथी और खरगोशों की कथा ८५३ दाक्ष और कपिंजल की कथा ८५७ ब्राह्मण और धूर्त्तो की कथा ८५९ कौए और उल्लूओं की कथा का शेषांश ८५९ वृद्ध बनिया और चोर की कथा ८६१ ब्राह्मण चोर और राक्षस की कथा ८६३ रथकार और उसकी पत्नी की कथा ८६५ मेढकों के वाहन सर्प की कथा ८७१ सुवर्णमृग की कथा ८७७; मूर्ख सेवकों की कथा ८७७ अनूपमृग की कथा एक मूर्ख नौकर की कथा महिषीमृग की कथा। सप्तम तरंग ८८३-९११ यशोधर और लक्ष्मीधर की कथा ८८५ मगर और बानर की कथा ८९७ कान और हृदय से हीन गधे की कथा ९ १ धनी और गवैये की कथा ५ मूर्ख शिष्यों की कथा ९ ७ चावल छाननेवाले मूर्ख की कथा ९ ९ गधे का दूध दुहने की कथा ९ ९। अष्टम तरंग ९११-९३५ गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त से कही गई नई-नई कथाएँ ९११ ब्राह्मण और नेवले की कथा ९११ मूर्ख रोगी और वैद्य की कथा ९१३ मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा ९१५ घट और कर्पर नाम के चोरों की कथा ९१७। नवम तरंग ९३५–९६९ गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त को सुनाई गई विविध कथाएँ ९३५ बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न बनिय की कथा ३५ सिंह की आत्मकथा ९४१ स्वर्णचूड़ पक्षी की आत्मकथा ९४३ सर्प की आत्मकथा ९४५ दुष्टा स्त्री की आत्मकथा ९४७ कृपण रंक की कथा ५३ मार्जार मूर्ख की कथा ९५५ हिरण्याक्ष की कथा ९६३। दशम तरंग ९६९–९९५ (नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत्) ६९।) वेला नामक एकादश लम्बक ९९७-१ १३ प्रथम तरंग मंगलाचरण ९९७ नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) ७ ईश्वरदेव और पोतज की कथा १०१ व्यापारी और वेला की कथा १०१।
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कथासरित्सागर
कथासरित्सागर (द्वितीय खण्ड)
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रत्नप्रभा नाम सप्तमो लम्बकः
श्री आचार्य जिनवचन्द्र ज्ञान भण्डार ७ सांगा भवन घी का रास्ता, जयपुर सिटी ( राजस्थान ) रत्नप्रभा नाम सप्तमो लम्बकः इदं गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्थराक्ष्णोत्थना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम् । प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसावेन ते ॥ रत्नप्रभा नामक सप्तम लम्बक नगेन्द्र-नन्दिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-मन्थराक्षक के मन्थन द्वारा शिवजी के मुख रूपी समुद्र से निकले हुए इस कथा-रूपी अमृत का जो लोग आदर और आग्रहपूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निर्विघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर, दिव्य पद लाभ करते हैं। श्रीमान् सेठशंकर भाइ दुर्लभजी द्वारा उनके सुपुत्र रश्मिकान्त के शुभ विवाह पर भेंट ।
१ कथासरित्सागर
१ कथासरित्सागर प्रथमस्तरङ्गः मङ्गलाचरणम् केलिकेशग्रहव्यग्रगौरीकरनखामृतम् । शिवायानेकबक्त्राम्रेडनमिव शार्वं शिरोऽस्तु वः ॥१॥१ करं दानाम्भसार्द्रं यं कुञ्चिताग्रं प्रसारयन्। ददत् सिद्धिमिवाभाति स पायाद्वो गजाननः ॥२॥ रत्नप्रभायाः कथा एवं स तत्र कौशाम्ब्यां पुत्रो वत्सेश्वरस्य ताम्। परिणीय युवा प्राणसमां मदनमञ्चुकाम् ॥३॥ नरवाहनदत्तः स्वे सचिवैर्गोमुखादिभिः। सार्धं तस्यौ यथाकामं परिपूर्णमनोरथः ॥४॥ एकदा चोल्लसद्गन्धकोकिलालापराजिते। प्रवर्त्तितकथाप्रास्यवसन्तमध्यमाह्वते ॥५॥ प्रगीतमधुरोन्मगे सम्प्राप्ते च मधूत्सवे। ययौ विहर्तुमुद्यानं राजपुत्रः समन्वितः ॥६॥ तत्र भ्रातृवशादाकस्मादुपत्य निजगाद तम्। प्रहर्षोत्फुल्लनयनः स्ववयस्यस्तपन्तकः ॥७॥ युवराज मया दृष्टा क्वापीतो नातिदूरतः। कन्यावतीर्य गगनात् स्थिताशोकतरोरधः ॥८॥ तयैव प्रेषितश्चाहमुपेत्य ससखीकया। स्वकान्तिद्योतितदिशा त्वाह्वानाय कन्यया ॥९॥ तच्छ्रुत्वा स स्वसचिवैः साकं तद्दर्शनात्सुकः। नरवाहनदत्तस्तत्समीपमगाद्द्रुतम् ॥१०॥ ददर्श तत्र तां कान्तां लोललोचनषट्पदाम्। शोणोष्ठपल्लवां पीनस्तनस्तबकशोभिताम् ॥११॥ परागपुञ्जगौराङ्गीं छायया सापहारिणीम्। मालोचिताकृतिं साक्षादिवोपवनदेवताम् ॥१२॥ १ अत्र मङ्गलाचरणे शिवाशिरसः सम्भोगशृङ्गारवर्णनमस्ति। पार्वती स्वाधीन- भर्त्तृका वर्त्तते। अलङ्कारश्चात्रोत्प्रेक्षा। २ अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः।
सप्तम लम्बक ३
सप्तम लम्बक ३ प्रथम तरंग मंगलाचरण शिव और पार्वती की प्रेम-क्रीड़ा के समय शिव का केश ग्रहण करती हुए पार्वती के हाथों के नखों में प्रतिबिम्बित अनेक चन्द्रमाओं से युक्त उनका (शिव का) मस्तक आपका कल्याण करे ॥१॥१ मदजल से गीली और सिकुड़ी हुई सूंड को फैलाकर मानो सिद्धि प्रदान करते हुए गण- पति आपकी रक्षा करें ॥२॥ रत्नप्रभा की कथा पूर्वोक्त प्रकार से प्राणप्यारी मदनमंचुका के साथ धूमधाम से विवाह करके सफलमनोरथ युवराज नरवाहनदत्त गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ कौशाम्बी नगरी में सुख पूर्वक निवास करने लगा ॥३-४॥ एक बार, मदोन्मत्त कोयल के कूकने से मनोहर, लताओं को नचाते हुए मलय-पवन से सुरभित और गुनगुनाते हुए भौरों के गुंजन से मुखरित वसन्त-समय के प्राप्त होने पर, राज- कुमार, अपने साथी मन्त्रियों के साथ उद्यान-विहार के लिए गया ॥५-६॥ उद्यान-विहार करके आया हुआ और प्रसन्नता से विकसित नेत्रोंवाला तपन्तक२ सहसा युवराज के पास आकर बोला—॥७॥ 'युवराज ! यहाँ से कुछ समीप ही मैंने आकाश से उतरकर अशोक-वृक्ष के नीचे खड़ी किसी कन्या को देखा है ॥८॥ सहेली के साथ आई हुई और अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई उसी कन्या ने मेरे पास आकर तुम्हें बुलाने के लिए मुझे तुम्हारे पास भेजा है' ॥९॥ यह सुनकर नरवाहनदत्त अपने साथी मन्त्रियों के साथ उस कन्या को देखने के लिए शीघ्र ही अशोक वृक्ष के नीचे गया ॥१०॥ वहाँ उसने जन-लोचनों के लिए भ्रमरी के समान लाल ओठोंवाली एवं उभरे हुए स्तनों से शोभित उस सुन्दरी को देखा ॥११॥ पुष्यवृक्ष के समान गौर अंगोंवाली अपनी छाया से सन्ताप हरनेवाली और सुन्दर आकृतिवाली वह सुन्दरी उस उपवन की साक्षात् देवी-सी मालूम हो रही थी ॥१२॥ १ इस मंगलाचरण में संभोग-शृंगार रस है। पार्वती स्वाधीनभर्तृका नायिका हैं और यहाँ उत्प्रेक्षालंकार है। २ युवराज का नर्मसचिव वलनामक का पुत्र।
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर एव दिनेषु गच्छत्सु सस्योद्भाववशात्$^१$किल। अपुत्रताकृता राजंश्चिन्ता जात्वुदपद्यत ॥२७॥ तमतिदुर्मनस्कं च दृष्ट्वा पप्रच्छ तं प्रिया। अलङ्कारप्रभा देवी दौर्मनस्यस्य कारणम् ॥२८॥ ततः स राजावादीतां सर्वसम्पत्तिरस्ति मे। एकस्तु पुत्रो नास्तीति दुःखं मां देवि बाधते ॥२९॥ या मया प्राक्पुत्रस्य पुरः सत्त्ववतः कथा। श्रुता तत्स्मरणोद्भाताच्चिन्तैषा चोद्गता मम ॥३०॥ कीदृशी सा कथा देवेत्युक्तो देव्या तया च सः। राजा तस्यै कथामेव संक्षेपातामवर्णयत् ॥३१॥
राज्ञः सत्त्वशीलस्य कथा
नगरे चित्रकूटारुये ब्राह्मणार्जनतत्परः। बभूव ब्राह्मणवरो नाम्नान्वर्थो महीपतिः ॥३२॥ तस्यासीत्सत्त्वशीलाख्यो जयी युद्धैकसेवकः। मासे मासे च लेभे स तस्मात् स्वर्णशतं नृपात् ॥३३॥ पर्याप्तं तच्च नेवाभूत्यागिनस्तस्य काञ्चनम्। अपुत्रत्वाच्च दानैकविनोदासक्तचेतसः ॥३४॥ पुत्रो विनोदहेतुर्मे दत्तस्तान्न वेधसा। दत्तं च दानव्यसनं तद्व्यर्थंविनाकृतम् ॥३५॥ वरं जीर्णस्य शुष्कस्य तरोर्जन्मोपलस्य वा। न संसारे दरिद्रस्य त्यागैकव्यसनस्य च ॥३६॥ इति सञ्चिन्त्यमन्त्रित्य सत्त्वशीलः स जातुचित्। उद्याने सञ्चरन् प्राप निधिं दैवात्क्ववाचन ॥३७॥ समृद्धयैष तमादाय भूरिकाञ्चनभास्वरम्। महावैरत्यदचिरं निनाय प्रसभं गृहम् ॥३८॥ ततः स भोगाम्भुञ्जानो ब्राह्मणेभ्यो वदद्द्वसु। भृत्येभ्यश्च सुहृद्भ्यश्च प्रापवास्तेऽथ सत्विरम् ॥३९॥
१ प्रसङ्गवशादित्यर्थः।
सप्तम लम्बक ७
[Page Header] सप्तम लम्बक ७
इस प्रकार, बहुत दिन व्यतीत होने पर भी उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक बार उसे इस बात पर गम्भीर चिन्ता उत्पन्न हो गई ॥२७॥ उसे अत्यन्त चिन्तित देखकर रानी अनंगकारप्रभा ने उसकी उदासी का कारण पूछा ॥२८॥ प्रश्न सुनकर राजा ने कहा- 'देवि ! मुझे सभी प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त है किन्तु एक पुत्र का अभाव मेरी चिन्ता का कारण हो रहा है ॥२९॥ मैंने एक पुत्रहीन सत्त्ववान् मनुष्य की कथा सुनी थी उसके स्मरण आने पर आज चिन्ता बढ़ गई है' ॥३०॥ वह कैसी कथा है? - इस प्रकार रानी के पूछने पर राजा ने संक्षेप से वह कथा इस प्रकार सुनाई ॥३१॥
[Subheading] राजा सत्त्वशील की कथा
चित्रकूट नामक नगर में ब्राह्मणों की सेवा में निरत ब्राह्मणधर नामक यथार्थ नामवाला राजा था ॥३२॥ उसका सत्त्वशील नामक एक विजयी और युद्ध में सहायता करनेवाला भक्त सेवक था। उसे राजा प्रतिमास एक सौ स्वर्ण-मुद्रा वेतन के रूप में देता था ॥३३॥ किन्तु परम उदार उस सत्त्वशील के लिए इतना धन पूरा नहीं होता था क्योंकि पुत्र न होने के कारण वह उस धन को दान कर देता था ॥३४॥ वह सोचता था कि विधि ने मेरे मनोविनोद के लिए एक पुत्र नहीं दिया केवल दान देने का व्यसन दिया वह भी धन के बिना ॥३५॥ संसार में पुराने और सूखे वृक्ष या पत्थर का जन्म होना अच्छा है किन्तु दान का व्यसनी होकर दरिद्र होना अच्छा नहीं ॥३६॥ ऐसा सोचते हुए सत्त्वशील ने घूमते-घामते दैवयोग से अपने उद्यान में कोष (खजाना) प्राप्त किया ॥३७॥ अपने नौकरों की सहायता से वह सत्त्वशील अपरिमित स्वर्ण और रत्नों से भरे हुए खजाने को अपने घर उठवा ले गया ॥३८॥ इतना धन प्राप्त करके वह सुख-भोग करता दान देता और भृत्यों तथा मित्रों को बाँटता हुआ सुख से रहने लगा ॥३९॥
१ कथासरित्सागर
१ कथासरित्सागर एवं दिनेषु गच्छत्सु तस्योद्वाढवशात्किल । अपुत्रताकृता राज्ञश्चिन्ता जात्वपद्यत ॥२७॥ तयातिषुर्मनस्कं च दृष्ट्वा पप्रच्छ स प्रिया । अलङ्कारप्रभा देवी दौर्मनस्यस्य कारणम् ॥२८॥ सत स राजावादीतां सर्वसम्पत्तिरस्ति मे । एक तु पुत्रो नास्तीति दुख मां देवि बाधते ॥२९॥ या मया प्रागपुत्रस्य पुंस सत्त्ववत कथा। श्रुता सरस्मरणोद्भाताश्चिन्तेषा चोद्गता मम ॥३०॥ कीदृशी सा कथा देवेत्युक्तो देव्या तया च स । राजा तस्यै कथामेवं संक्षेपातामवर्णयत् ॥३१॥ अथ सत्त्वशीलस्य कथा नगरे चित्रकूटाख्ये ब्राह्मणार्श्वनतत्पर । बभूव ब्राह्मणवरो नाम्नान्यर्थो महीपति ॥३२॥ तस्यासीत्सत्त्वशीलाख्यो जयी युद्धैकसेवक । मासे मासे च लेभे स तस्मात् स्वर्णशत नृपात् ॥३३॥ पर्याप्तं तच्च नैवाभूत्यागिनस्तस्य काञ्चनम् । अपुत्रत्वाच्च दानैकविनोदासक्तचेतस ॥३४॥ पुत्रो विनोदहेतुर्मे दत्तस्तावन येवसा । दत्त च दानम्यसम तदप्यर्थविनाकृतम् ॥३५॥ वरं जीनेस्य शूकस्य हरोर्जे मोपलस्य वा। न संसारे दरिद्रस्य त्यागैकव्यसनस्य च ॥३६॥ इति सञ्चिन्तयन्नित्यं सत्त्वशील स जातुचित् । उद्याने सञ्चरन् प्राप निधिं दैवात्कदाचन ॥३७॥ सभृत्यश्च तमादाय भूरिकाञ्चनभास्वरम्। महापरत्नरुचिरं निनाय प्रक्षनं गृहम् ॥३८॥ तत स भोगा भुञ्जाना ब्राह्मणेभ्या ददद्वसु । भृत्यभ्यश्च सुहृद्भ्यश्च बाधवास्तेत्र यात्रिक ॥३९॥ १
सप्तम लम्बक ७
सप्तम लम्बक ७ इस प्रकार, बहुत दिन व्यतीत होने पर भी उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक बार उसे इस बात पर गम्भीर चिन्ता उत्पन्न हो गई ॥२७॥ उसे अत्यन्त चिन्तित देखकर रानी अलंकारप्रभा ने उसकी उदासी का कारण पूछा ॥२८॥ प्रश्न सुनकर राजा ने कहा— 'देवि ! मुझे सभी प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त है, किन्तु एक पुत्र का अभाव मेरी चिन्ता का कारण हो रहा है ॥२९॥ मैंने एक पुत्रहीन सत्त्ववान् मनुष्य की कथा सुनी थी उसके स्मरण आने पर आज चिन्ता बढ़ गई है' ॥३०॥ 'वह कैसी कथा है ?' — इस प्रकार रानी के पूछने पर राजा ने संक्षेप से वह कथा इस प्रकार सुनाई ॥३१॥ राजा सत्त्वशील की कथा चित्रकूट नामक नगर में ब्राह्मणों की सेवा में निरत ब्राह्मणवर नामक यथार्थ नामवाला राजा था ॥३२॥ उसका सत्त्वशील नामक एक विजयी और युद्ध में सहायता करनेवाला भक्त सेवक था। उसे राजा प्रतिमास एक सौ स्वर्ण-मुद्रा वेतन के रूप में देता था ॥३३॥ किन्तु परम उदार उस सत्त्वशील के लिए इतना धन पूरा नहीं होता था क्योंकि पुत्र न होने के कारण वह उस धन को दान कर देता था ॥३४॥ वह सोचता था कि विधि ने मेरे मनोरञ्जन के लिए एक पुत्र नहीं दिया केवल दान देने का व्यसन दिया वह भी धन के बिना ॥३५॥ संसार में पुराने और सूखे वृक्ष या पत्थर का जन्म होना अच्छा है किन्तु दान का व्यसनी होकर दरिद्र होना अच्छा नहीं ॥३६॥ ऐसा सोचते हुए सत्त्वशील ने घूमते-घामते दैवयोग से अपने उद्यान में कोष (खजाना) प्राप्त किया ॥३७॥ अपने नौकरों की सहायता से वह सत्त्वशील अपरिमित स्वर्ण और रत्नों से भरे हुए खजाने को अपने घर उठवा ले गया ॥३८॥ इतना धन प्राप्त करके वह सुख-भोग करता दान देता और भृत्यों तथा मित्रों को बाँटता हुआ सुख से रहने लगा ॥३९॥
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उसके वैभव को देखकर उसके कुटुम्बियों ने पता लगा लिया कि इसे कहीं खजाना हाथ लगा है। अतः, ईर्ष्यावश उन्होंने राजा से जाकर सारा समाचार सुना दिया ॥४४ ॥ राजा ने पहरेदार को भेजकर सत्वशील को बुलवाया। वह भी राजभवन के आँगन में आकर एक कोने में खड़ा हो गया। वहाँ पर एकान्त में उसने हाथ में ली हुई छड़ी की नोक से मिट्टी की कच्ची भूमि खड़े-खड़े खोद डाली और उसे वहाँ पर ताँब के घड़े में भरी हुई मुहरों का खजाना दीख पड़ा ॥४१-४२॥ यह खजाना क्या मिला मानों देव ने—'इसे देकर राजा को संतुष्ट करो' इस प्रकार का प्रकाश दिया ॥४३॥ सत्वशील ने उस गढ़े को मिट्टी से भर दिया और द्वारपाल के साथ राजा के सम्मुख उप- स्थित हुआ। उसके प्रणाम करने पर राजा ने स्वयं कहा—॥४४॥ 'मुझे मालूम हुआ है कि तुम्हें खजाना मिला है। उसे हमें सौंप दो' ॥४५॥ यह सुनकर सत्वशील नम्रभाव से बोला कि 'महाराज ? पहले मिला हुआ खजाना समर्पण करूँ या आज का मिला हुआ ? ॥४६॥ राजा ने कहा—अभी प्राप्त धन-भाण्डार मुझे दो। सत्वशील ने राजा को एकान्त में ले जाकर तुरन्त देखा हुआ धन-भाण्डार दे दिया ॥४७॥ राजा ने प्रसन्न होकर कहा—'पहले भाण्डार को तुम आनन्द से भोगो'। इस प्रकार सन्तुष्ट राजा से आज्ञा पाकर सत्वशील अपने घर आया ॥४८॥ घर जाकर अपुत्रता के दुःख को किसी प्रकार भुलाता हुआ सत्वशील दान और भोग से भाण्डार को घटाता हुआ अपने नाम को चरितार्थ करने लगा ॥४९॥ विद्याधर राजा हेमप्रभ ने कहा कि 'इस प्रकार सत्वशील की कथा स्मरण करके पुत्र न होने की चिन्ता से दुःखी हूँ' ॥५० ॥ पति हेमप्रभ से इस प्रकार कही गई रानी अलंकारप्रभा उससे बोली—॥५१॥ 'यह सच है कि उदार हृदयवालों की दैव भी सहायता करता है। क्या दूसरा स्वर्ण भाण्डार देकर दैव ने सत्वशील की संकट के समय सहायता नहीं की ? ॥५२॥ इसी प्रकार, तुम भी अपने सत्त्व के प्रभाव से इच्छित फल प्राप्त करोगे। इस सम्बन्ध में उदाहरणस्वरूप विक्रमत्तुंग नामक राजा की कथा सुनो'— ॥५३॥
विक्रमत्तुंग राजा की कथा पृथ्वी का अलंकारस्वरूप पाटलिपुत्र नाम का नगर है जिसमें पूर्व वाणिशाली नाना प्रकार की मणियों जड़ी हुई हैं ॥५४॥ २
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सप्तम लम्बक [पृष्ठ संख्या: ११]
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सप्तम लम्बक [पृष्ठ संख्या: ११] प्राचीन समय उस नगर में विक्रमतुंग नाम का सत्यशील राजा था जो दान देने में याचकों से और युद्ध में शत्रुओं से कभी पराङ्मुख नहीं हुआ ॥५५॥ किसी समय वह राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। वहाँ उसने बिल्वफल (बेल) से होम करते हुए किसी ब्राह्मण को देखा ॥५६॥ उसे देखकर पूछने की इच्छा होने पर भी राजा उसे छोड़कर शिकार के लिए सेना के साथ आगे चला गया ॥५७॥ उछलते-गिरते बाणों से मारे जाते हुए भैंसों के समान मृगों और सिंहों से घिर शाम तक खेलकर लौटे हुए राजा ने उसी स्थान पर होम करते हुए ब्राह्मण को देखा और समीप जाकर प्रणाम करके उससे होम का फल पूछा ॥५८-५९॥ तब वह ब्राह्मण राजा को आशीर्वाद देकर बोला— मैं नागशर्मा नाम का ब्राह्मण हूँ। इस होम का फल सुनो—॥६० ॥ इस बिल्व के होम से जब अग्नि प्रसन्न होती है, तब कुण्ड से सोने के बिल्व निकलते हैं ॥६१॥ और, तब अग्नि प्रकट होकर स्वयं वरदान देती है। मुझे बिल्वों का होम करते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया किन्तु मुझ अभागे पर अभी तक अग्नि प्रसन्न नहीं हुई। उसके ऐसा कहने पर धीरसत्त्वशाली राजा उससे बोला—॥६२-६३॥ 'यदि ऐसा है, तो एक बिल्व मुझे दो मैं उसका होम करता हूँ और तुम्हारी अग्नि को अभी प्रसन्न करता हूँ' ॥६४॥ ब्राह्मण ने राजा से कहा— अनियमिता और अपवित्र अवस्था में तुम आग को कैसे प्रसन्न करोगे जब कि नियमपूर्वक अनुष्ठान करने और पवित्र स्थिति में रहनेवाले मुझपर वह प्रसन्न नहीं है ॥६५॥ राजा ने कहा—'ऐसी बात नहीं है। तुम चिन्ता न करो। तुम मुझे एक बिल्व दो और आश्चर्य देखो' ॥६६॥ तब ब्राह्मण ने आश्चर्य के साथ राजा को बिल्व दिया और राजा दृढ़ चित्त से मन-ही- मन बोला—'हे अग्निदेव! यदि तुम मेरे बिल्व-होम से प्रसन्न न होगे तो मैं अपना सिर तुम्हारे लिए होम कर दूँगा। ऐसा कहकर उसने बिल्व का होम दिया ॥६७-६८॥ बिल्व का होम करते ही हाथों में स्वर्ण का बिल्व लिए हुए अग्निदेव कुण्ड से प्रकट हुए, मानो वे राजा के दृढ़ सत्त्व का फल लेकर आये हों ॥६९ ॥ और दृढ़हृदय राजा से बोले—'तुम्हारे इस सत्त्व से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो ॥७०॥
१० कथासरित्सागर
१० कथासरित्सागर तत्र विक्रमतुङ्गाख्यो राजाभूत्सत्त्ववान्पुरा। योऽभूत्पराङ्मुखो दाने नार्थिनां न युधि द्विषाम्॥५५॥ स जातु मृगयाहेतो प्रविष्टो नृपतिर्वनम्। बिल्वैर्होमं विदधतं तत्र ब्राह्मणमैक्षत॥५६॥ तं दृष्ट्वा प्रष्टुकामोऽपि परिहृत्य तदन्तिकम्। ययौ स दूरं मृगयारसेन सबलस्ततः॥५७॥ उत्पतद्भिः पतद्भिश्च हन्यमानेः स्वपाणिना। चिरं मृगैश्च सिंहैश्च क्रीडित्वा कन्दुकैरिव॥५८॥ आवृत्तस्त उपेयात्र दृष्ट्वा होमपरं द्विजम्। उपेत्य नत्वा पप्रच्छ नाम होमफलं च सः॥५९॥ ततः स ब्राह्मणो भूपं कृताशीस्तमभाषत। विप्रोऽहं नागशर्माख्यो होमे च श्रृणु मे फलम्॥६०॥ अनेन बिल्वहोमेन प्रसीदति यदानलः। हिरण्मयानि बिल्वानि तदा निर्यान्ति कुण्डतः॥६१॥ ततोऽग्निः प्रकटीभूय वरं साक्षात् प्रयच्छति। वर्त्तते मम भूयांश्च कालो बिल्वानि जुह्वतः॥६२॥ मन्दपुण्यस्य नाद्यापि तुष्यत्येव स पावकः। इत्युक्ते तेन राजा तं धीरसत्त्वोऽभ्यभाषत॥६३॥ तर्हि मे देहि बिल्वं त्वमेकं यावज्जुहोमि तत्। प्रसादयामि च ब्रह्मन्नधुनेव तवानलम्॥६४॥ कथं प्रसादयसि त्वं वह्निमप्रयतोऽप्यधि। यो ममैवं प्रत्तस्तस्य पूतस्यापि न तुष्यति॥६५॥ इत्युक्तस्तेन विप्रेण राजा तमवदत्पुनः। मैवं प्रयच्छ मे बिल्वं पश्याश्चर्यं क्षणादिति॥६६॥ ततः स राज्ञे विप्रोऽस्मै ददौ बिल्वं सकौतुकः। राजा च स तथा तत्र वृद्धसत्त्वेन चेतसा॥६७॥ हुतेनानेन बिल्वेन न चेत्तुष्यति तच्छिरः। स्वमग्ने ते जुहोमीति ध्यात्वा तस्मिञ्जुहाव तत्॥६८॥ प्राविरासीच्च सप्ताचिः कुण्डाद् बिल्वं हिरण्मयम्। स्वयमादाय तत्तस्य फलं सत्त्वतरोरिव॥६९॥ जगाद च स साक्षात्तं जातवेदा महीपतिम्। सत्त्वेनानेन तुष्टोऽस्मि तद्गृहाण वरं नृप॥७०॥
सप्तम लम्बक ११
सप्तम लम्बक ११ प्राचीन समय उस नगर में विक्रमतुंग नाम का सत्यशील राजा था जो दान देने में याचकों से और युद्ध में शत्रुओं से कभी पराङ्मुख नहीं हुआ ॥५५॥ किसी समय वह राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। वहाँ उसने बिल्वफल (बेल) से होम करते हुए किसी ब्राह्मण को देखा ॥५६॥ उसे देखकर पूछने की इच्छा होने पर भी राजा उसे छोड़कर शिकार के लिए सेना के साथ आगे चला गया ॥५७॥ उछलते-गिरते हांकों से मारे आते हुए भैंसों के समान मृगों और सिंहों से चिर काल तक खेलकर लौटे हुए राजा ने उसी स्थान पर होम करते हुए ब्राह्मण को देखा और समीप जाकर प्रणाम करके उससे होम का फल पूछा ॥५८-५९॥ तब वह ब्राह्मण राजा को आशीर्वाद देकर बोला—'मैं नागशर्मा नाम का ब्राह्मण हूँ। इस होम का फल सुनो—॥६०॥ इस बिल्व के होम से जब अग्नि प्रसन्न होती है, तब कुण्ड से सोने के बिल्व निकलते हैं ॥६१॥ और, तब अग्नि प्रकट होकर स्वयं वरदान देती है। मुझे बिल्वों का होम करते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया किन्तु मुझ अभागे पर अभी तक अग्नि प्रसन्न नहीं हुई। उसके ऐसा कहने पर धीरसत्त्वशाली राजा उससे बोला—॥६२-६३॥ 'यदि ऐसा है, तो एक बिल्व मुझे दो मैं उसका होम करता हूँ और तुम्हारी अग्नि को अभी प्रसन्न करता हूँ' ॥६४॥ ब्राह्मण ने राजा से कहा—'अनियमित और अपवित्र अवस्था में तुम आग को कैसे प्रसन्न करोगे जब कि नियमपूर्वक अनुष्ठान करने और पवित्र स्थिति में रहनेवाले मुझपर वह प्रसन्न नहीं हैं' ॥६५॥ राजा ने कहा—'ऐसी बात नहीं है। तुम चिन्ता न करो। तुम मुझे एक बिल्व दो और आश्चर्य देखो' ॥६६॥ तब ब्राह्मण ने आश्चर्य के साथ राजा को बिल्व दिया और राजा दृढ़ चित्त से मन-ही- मन बोला—'हे अग्निदेव! यदि तुम मेर बिल्व-होम से प्रसन्न न होय तो मैं अपना सिर तुम्हारे लिए होम कर दूँगा। ऐसा कहकर उसने बिल्व को होम दिया ॥६७-६८॥ बिल्व का होम करते ही हाथ में स्वर्ण का बिल्व लिए हुए अग्निदेव कुण्ड से प्रकट हुए मानों वे राजा के दृढ़ सत्त्व का फल लेकर आये हों ॥६९॥ और शुद्धहृदय राजा से बोले—'तुम्हारे इस सत्त्व से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो' ॥७०॥