कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
२८ कथासरित्सागर
२८ कथासरित्सागर आरुह्योपनतं स च यथादिष्टः स विष्णुना। तया विजित्य पृथिवीमाजह्रे राजकन्यकाः ॥२०॥ सहस्राशीतिसंख्याभिस्ततस्ताभिः समं च सः। उवास रत्नकूटेऽत्र यथेच्छं विहरन्नृपः ॥२१॥ शान्त्यर्थं शीतरश्मेश्च तस्य दिव्यस्य दन्तिनः। प्रत्यहं भोजयामास विप्राणां शतपञ्चकम् ॥२२॥ कदाचिच्च तमारुह्य परिभ्रम्य स भूपतिः। द्वीपान्तराणि स्वं द्वीपं रत्नाधिपतिराययौ ॥२३॥ तत्रावतरतस्तस्य गगनात्तु गजोत्तमम् । चञ्च्वा तार्क्ष्योद्भवः पक्षी मूर्ध्नि दैवादताडयत् ॥२४॥ स च पक्षी प्रदुद्राव राज्ञा तीक्ष्णाङ्कुशाहतः। हस्ती तु भूमावपतच्चञ्च्वाघातेन मूर्च्छितः ॥२५॥ मुपेजातीर्णं स गजो लब्धसंज्ञोऽपि माद्यकन्। उत्थाप्यमानोऽप्युत्थातुं निरस्तकबलप्रग्रहः ॥२६॥ पञ्चाहानि तथैवास्मिन्वारणे पतितस्थिते। दुःखितः स निराहारो राजा चाप्यवमब्रवीत् ॥२७॥ भो लोकपाला ब्रूतास्मिन्नुपायः सङ्कटे मम। अद्यैवोपहरिष्यामि छित्त्वाहं स्वशिरोऽथ वः ॥२८॥ इत्युक्त्वैवात्तखङ्गं तं स्वशिरश्छेत्तुमुद्यतम्। अशरीरा जगादेव वाणी तत्क्षणमम्बरात् ॥२९॥ मा साहसं कृथा राजन्साध्वी काचित्करोति यत्। हस्तस्पर्शं गजस्यास्य तदुत्तिष्ठति नान्यथा ॥३०॥ सच्छ्रुत्वैवामृतलतां नाम दृष्टः स भूपतिः। मुख्यामानाययामास निजां देवीं सुरक्षिताम् ॥३१॥ तया स्पृष्टः स हस्तेन नोदतिष्ठद् गजो यदा। तदा सोऽन्या निजाः सर्वा देवीरानाययन्नृपः ॥३२॥ ताभिः कृतकरस्पर्शः समस्ताभिरपि क्रमात्। नैवोत्तस्थौ द्विपः सोऽत्र न तास्वेकाप्यभूत्सती ॥३३॥ १ भोजनेप्यसमर्थः।
सप्तम लम्बक २१
सप्तम लम्बक २१ उस आये हुए हाथी पर विष्णु भगवान के आज्ञानुसार चढ़कर राजा न सारी पृथ्वी को जीतकर राज-कन्याओं का आहरण किया ॥२ ॥ वह राजा अस्सी हजार कन्याओं को लाकर रत्नकूटपुर में यथेच्छ विहार करता हुआ रहने लगा ॥२१॥ और उस श्वेतरश्मि¹ हाथी की शान्ति के लिए प्रतिदिन पाँच सौ ब्राह्मणों को भोजन कराता था ॥२२॥ किसी समय उस हाथी पर चढ़कर और अनेक द्वीपों का भ्रमण करके वह राजा अपम द्वीप में आया। वहाँ पर आकाश से भूमि पर उतरते हुए उस हाथी के मस्तक पर गरुडजातीय पक्षी ने चोंच से प्रहार किया ॥२३-२४॥ राजा के तीखे अंकुश के प्रहार से वह पक्षी तो भाग गया किन्तु हाथी चोंच की मार से मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥२५॥ राजा के उतर जाने पर होश में आया हुआ भी वह हाथी उठाये जाने पर भी न उठ सका और न आहार कर सका ॥२६॥ इस प्रकार, पाँच दिनों तक उस हाथी के निराहार पड़े रहने पर राजा भी निराहार रहकर दुःखित हुआ और बड़ी चिन्ता में पड़कर बोला—'हे लोकपालो मुझे इस संकट में कोई उपाय बताओ। नहीं तो मैं अपना सिर काटकर तुम्हें बलि दे दूँगा' ॥२७-२८॥ ऐसा कहकर और तलवार खींचकर अपना गला काटने को तैयार राजा से आकाशवाणी ने अशरीर रूप से कहा—॥२९॥ 'हे राजन् ! ऐसा दुस्साहस कार्य न करो। यदि कोई पतिव्रता स्त्री अपने हाथ से इस हाथी का स्पर्श करेगी तो यह उठ जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है' ॥३ ॥ यह सुनकर प्रसन्न राजा ने अमृतलता नाम की सुरक्षित प्रधान रानी को बुलवाया ॥३१॥ जब उसके छूने पर हाथी नहीं उठा तब उसने अन्य सभी रानियों को बुलवाया ॥३२॥ उनके छूने पर भी जब हाथी न उठा तब यह निश्चय हो गया कि इनमें कोई भी सच्चरित्रा और पतिव्रता नहीं है ॥३३॥ १ किसी-किसी पुस्तक में हाथी का नाम 'शीतरश्मि' मिला है। किन्तु श्वेतरश्मि' नाम ही उचित प्रतीत होता है।—अनु.
३० कथासरित्सागर
३० कथासरित्सागर अन्तःपुरसहस्राणि साध्वीनीतमपि स्फुटम् । दृष्ट्वा विलब्धितान्येव स राजा जनसन्निधौ ॥३५॥ विसङ्क्य स्वपुरात्तस्मान्नानाय्य निखिलाः स्त्रियः। अशनं हस्तिनस्तस्य हस्तस्पर्शमकारयत् ॥३५॥ तथापि यस्य नोत्तस्थौ गजस्तस्तरसा भूपतिः। अस्मत् पुरे न साध्वी स्त्री नैकापीति त्रपां ययौ ॥३६॥ तावच्च दृढगुप्ताख्यस्ताम्रलिप्त्याः समागतः । वणिग्गवाक्षपो मुक्त्वा युक्तान्तं च गतोत्सुकः ॥३७॥ तस्य चामररी पश्चादाजगाम पतिव्रता। एषा शीलवती नाम सा तद्दृष्ट्वा तमब्रवीत् ॥३८॥ स्पृशाम्येष करेणैनं त्वमभूदपरो मया। मनसापि न भद्रपास्तन्मुक्तिस्त्वयं द्विपः ॥३९॥ इत्युक्त्वोरोचयद्धस्तेन सा च संस्पर्श तं गजम्। उत्तस्थौ च गजस्तस्य क्षणाच्च स ततोऽर्हणात् ॥४०॥ इमास्ताः पित्र्यतां प्राप्ता मान्त्रिन्वदवरोधमाः। गजाननन्नहारगर्मर्या जगतानन्य या ॥४१॥ इति शीलवतीं तत्र कृतकोलाहलो जनः। तां तुष्टाव गजं दृष्ट्वा स्वान्तर्गन्धे समुत्थितम् ॥४२॥ गजापि रक्षितामिति परितुष्याभिनन्द्य ताम्। प्रादूरकरोत्तदा रत्नैः शीलवतीं सतीम् ॥४३॥ नृपस्वामिन न यन्मित्रं ह्रीङ्गुणं मन्येष तवम्। अश्रूयतेऽने भाग्यं शृणु गच्छङ्गतामिव ॥४४॥ तस्मिंस्तत्त्वविदित्वा निजभार्य्यापराद्धतः। विससर्जाऽऽत्मनाऽपत्रस्तन्निनाय्यरवागतः ॥४५॥ अथैतादृक् शृङ्गालाख्यः स्वगृहस्य सन्निधौ। गच्छन् ददर्श सा च स्नात्वा विश्रान्त मूता ॥४६॥ दीक्षिताङ्गीव न चारित्रवता विशङ्कितेति। सा च राज्ञाऽब्रवीत् किं मां त्वमन्वागच्छसीति ॥४७॥ स्पृष्टा मया सा गत्वा शीलावत्युवाचतः। उपसर्गेण शङ्केयं च साध्वित्यागता मया ॥४८॥ ततस्तस्याः सा तत्र प्रच्छन्नाऽभूत् कौतुकात्।
सप्तम लम्बक ३१
सप्तम लम्बक ३१ राजा की अस्सी हजार रानियां इस घटना से जन-समाज के सामने अत्यन्त लज्जित हुई ॥३४॥ तब राजा ने भी लज्जित होकर अपने नगर की सभी स्त्रियों को बुलाकर क्रम से हाथी को छुआया ॥३५॥ फिर भी वह हाथी न उठा तो राजा को इसके लिए बड़ी लज्जा इस बात की हुई कि मेरे नगर में एक भी सदाचारिणी स्त्री नहीं है ॥३६॥ इतने में ताम्रलिप्ती (तमलुक) नगरी से आया हुआ हर्षगुप्त नाम का एक वैश्य उस तमाशे को देखने के लिए आया। उसके पीछे उसकी एक शीलवती नाम की सधवा पत्नी भी आई और उसने देखकर कहा ॥३७-३८॥ मैं इस हाथी को हाथ से छूती हूँ। यदि मैंने अपने पति के सिवाय दूसरे को मन से भी न ध्यान किया हो तो यह हाथी उठ जाय ॥३९॥ ऐसा कहकर और समीप जाकर उसने हाथी को छू दिया। उसके छूते ही हाथी उठ खड़ा हुआ और आहार करने लगा ॥४०॥ इस प्रकार, ईश्वर के समान इस संसार की सृष्टि पालन और संहार करने में समर्थ पतिव्रता स्त्रियां विरले ही हैं। इस प्रकार, कोलाहल करती हुई जनता वहाँ पर सती शीलवती की प्रशंसा करने लगी ॥४१ ४२॥ राजा ने प्रसन्न होकर सती शीलवती को असंख्य धन रत्न दिये और उसके पति हर्षगुप्त को राजभवन के समीप ही घर देकर बसा दिया और उसका बहुत सत्कार किया ॥४३ ४४॥ और तभी से उस राजा ने अपनी सभी स्त्रियों का स्पर्श तक छोड़ दिया और उनके लिए केवल भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध कर दिया ॥४५॥ तदनन्तर राजा ने हर्षगुप्त को बुलवाया। उसके साथ भोजन करने के बाद राजा ने सती शीलवती से एकान्त में कहा— ॥४६॥ 'हे शीलवती ! क्या तुम्हारे पिता के कुल में कोई कन्या है ? यदि है तो उसे मुझे दिलवाओ। मैं समझता हूँ कि वह भी तुम्हारे समान अवश्य सदाचारिणी होगी ॥४७॥ उस राजा से इस प्रकार कही गई शीलवती बोली— ताम्रलिप्ती नगरी के शंखदत्ता नाम की मेरी बहन है। महाराज यदि आप चाहते हैं तो उस सुन्दरी से विवाह कीजिए ॥४८ ४९॥
३२ कथासरित्सागर
३२ कथासरित्सागर इत्युक्तः स तया राजा प्रतिपेदे नृपतिः तत् ॥४९॥ निश्चित्य च तदन्वेद्युः शीलवत्या तया सह। तेनापि हर्षगुप्तेन समारुह्य खगामिनम् ॥५०॥ श्वेतरश्मिं स्वयं गत्वा ताम्रलिप्तीं स भूपतिः। विवेश हर्षगुप्तस्य वणिजस्तस्य मन्दिरम् ॥५१॥ तत्र पप्रच्छ तदहर्लग्नं शीलवतीस्वसुः। विवाहे राजदत्ताया गणकानातमनस्तथा ॥५२॥ गणकाश्चोभयोः पृष्ट्वा नक्षत्राण्येवमब्रुवन्। लग्नौ वां शोभनो राजन्नस्ति मासेष्वितस्त्रिषु ॥५३॥ अद्य वा विद्यते यादृक्स्तेनैषा चेद्विवाह्यते। राजदत्ता ततोऽवश्यमसाध्वी भवति प्रभो ॥५४॥ गणकैरेवमुक्तोऽपि कमनीयवधूत्सुकः। एकाकी चिरमप्यास्तु स राजा समचिन्तयत् ॥५५॥ अलं विचारेणाद्यैव राजदत्तामिहोद्वहे। शीलवत्याः स्वसा ह्येषा निर्दर्पा नासती भवेत् ॥५६॥ यतत्समुद्रमध्येऽस्ति द्वीपलब्धममानुषम्। एकशून्यचतुःशालं तत्रैतां स्थापयामि च ॥५७॥ दुर्गेऽेऽत्र परीवारं स्त्रीरेवास्याः करोमि च। पुरुषादर्शनादेवमसती स्यादियं कथम् ॥५८॥ इति निश्चित्य तदहः परिणिन्ये स भूपतिः। तां राजदत्तां सहसा शीलवत्या समर्पिताम् ॥५९॥ कृतोद्वाहः कृताचारो हर्षगुप्तेन तां वधूम्। आदाय प्रेमैव समं शीलवत्या तया च सः ॥६०॥ श्वेतरश्मिं समारुह्य क्षणेन नभसा निजम्। मार्गोन्मुखेन द्वीपं रत्नकूटं तदाययौ ॥६१॥ सविमेने च तां भूयस्तया शीलवतीं यथा। प्राप्तसाध्वीव्रतफला कृतार्था समपादि सा ॥६२॥ ततस्तमेव करिणि श्वेतरश्मौ नभश्चरे। आरोप्य तां नववधू राजदत्तां स चिन्तिते ॥६३॥ नीत्वा सप्ताब्धिमध्यस्थे द्वीपे मानुषदुर्गमे। आस्खापयच्चतुःशाले नारीमयपरिच्छदाम् ॥६४॥
सप्तम लम्बक ६३
सप्तम लम्बक ६३ उसके ऐसा कहने पर राजा ने उसे स्वीकार किया ॥४९॥ दूसरे दिन शीलवती से निश्चय करके उस हर्षगुप्त वैश्य के साथ आकाशगामी श्वेतरश्मि हाथी पर बैठकर वह राजा स्वयं ताम्रलिप्ती नगरी में गया और हर्षगुप्त के यहाँ आकर ठहरा ॥५०-५१॥ वहाँ जाकर उसने ज्योतिषियों से शीलवती की बहन से विवाह करने का लग्न पूछा। गणकों ने दोनों के नक्षत्र पूछकर कहा—'राजन् ! तुम दोनों का विवाह आज से तीन महीने के बाद ठीक बनता है। आज ही यदि इसका विवाह किया जायगा तो यह कन्या अवश्य दुराचारिणी हो जायगी' ॥५२-५४॥ गणकों के इस प्रकार कहने पर भी उस सुन्दरी कन्या के लिए उत्सुक और इतने दिनों तक अकेले रहने में असमर्थ राजा ने सोचा ॥५५॥ अधिक सोच-विचार क्या करें। आज ही राजवला से विवाह करता हूँ क्योंकि यह शीलवती की बहन है शान्त और सती ही होगी। और, रत्नद्वीप के समीप ही जो बिना मनुष्यों का एक छोटा-सा टापू है उसमें एक चौसाला (चतुःशाल) बनाकर इसे रखता हूँ ॥५६-५७॥ उस दुर्गम द्वीप में इसके नौकर-चाकरों में सभी स्त्रियाँ रहेंगी। पुरुष का जब दसन ही नहीं होगा तब यह व्यभिचारिणी कैसे होगी ॥५८॥ ऐसा सोचकर राजा ने उसी दिन शीलवती से दान की गई उस राजवला से विवाह कर लिया ॥५९॥ इस प्रकार, विवाह करके हर्षगुप्त द्वारा वैवाहिक रीति-रिवाजों के किये जाने पर, राजा उस नववधू, शीलवती और वैश्य के साथ हाथी पर चढ़कर आकाश-मार्ग से रत्नकूट द्वीप म आया जहाँ जनता उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥६०-६१॥ राजधानी में आकर राजा न शीलवती को फिर से पर्याप्त धन मान आदि स सत्कार दिया। उसे भी पतिव्रता-पालन का सच्चा फल मिला ॥६२॥ तदनन्तर राजा उस नववधू को उसी आकाशगामी हाथी पर बिठाकर पूर्वनिर्धारित समुद्र के मध्य में स्थित मनुष्यों से अगम्य द्वीप में ले गया और अनेक दासियों के साथ उस वहीं चौशाल में रख दिया ॥६३ ६४॥ ९
३४ कथासरित्सागर
३४ कथासरित्सागर यद्यद्वस्तूपयुक्तं च तस्यास्तत्तदविलम्बयन् । व्योम्नैव प्रापयामास तत्र तेन गजेन स ॥६५॥ स्वयं तदनुरक्तश्च तत्रैवासीत्सदा निशि । आययौ राजकार्यार्थं रत्नकूटे दिवा पुनः ॥६६॥ एकदा स तया साकं प्रत्यूषे राजसत्तमः । राजा प्रतिघ्नन्सुस्वप्नं सिषेवे पानमङ्गलम् ॥६७॥ तेन मत्ताममुञ्चन्तीमपि मुक्त्वा स तां ययौ । रत्नकूटं स्वकार्यार्थं नित्यस्निग्धा हि राजता ॥६८॥ तत्र तस्थौ सशङ्कन कुर्वन्कार्याणि चेतसा । क्षीबा किमकरोन्मुक्ता सा मयेतीव त्रसता ॥६९॥ तावच्च राजवत्ता सा स्थाने तत्रातिदुर्गमे । महानसादिब्यप्रासु वासीष्वेकाकिनी स्थिता ॥७०॥ द्वारे निधिमिवान्यं तत्तद्रक्षाविजिगीषया । आगतं पुरुषं कञ्चिदृष्ट्वाश्चर्यदायकम् ॥७१॥ कस्त्वं कथमिदं स्थानमगम्यं चागतो भवान् । इति च भ्रान्तिकप्राप्तं क्षीबा पप्रच्छ सा किल ॥७२॥ ततः स दृष्टबहुलक्लेशस्तां पुंस्कोऽब्रवीत् । मुग्धे पवनसेनाख्यो वणिक्पुत्रोऽस्मि माथुरः ॥७३॥ हृतस्वो गोत्रजैः सोऽह्रमनाथः प्रमयात्पितुः । गत्वा विदेशे कृपणां परसेवामशिश्रियम् ॥७४॥ ततः कृच्छ्रेण सम्प्राप्य धनलेशं वणिग्मया । गच्छन्देशान्तरं मार्गे मुषितोऽस्म्येत्य तस्करैः ॥७५॥ ततो भिक्षां भ्रमंस्तुल्यैः सहायैर्गतवानहम् । रत्नानामाकरस्थानं कनकक्षेत्रसञ्ज्ञकम् ॥७६॥ तत्राङ्गीकृत्य भूपस्य भागं संवत्सरावधि । खातं ननक्षिति रत्नं नैकमप्यस्मि लब्धवान् ॥७७॥ मन्दत्सु लब्धरत्नेषु मन्विधेष््वपरेषु च । गत्वाम्भोतीरे दुःखात्तं काष्ठान्यहमुपाहरम् ॥७८॥ अग्निप्रवेशाय चितां यावत्तत्र करोमि तैः । धीवदताभिधस्तावत्कोऽप्यत्र वणिगाययौ ॥७९॥
वहाँ जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती थी उन्हें राजा आकाशगामी हाथी से भेजता था। किसी पुरुष का विश्वास न करता था॥६५॥ स्वयं भी उसके प्रेम के कारण प्रति रात्रि को हाथी से वहाँ जाता था और दिन में फिर रत्नकूट चला आता था॥६६॥ एक बार राजा ने बुरे स्वप्न की शान्ति के लिए प्रभात-काल में ही उसके (राजदत्ता के) साथ मद्यपान कर लिया। मद्यपान से मत्त उस रानी के बार-बार मना करने पर भी वह राजा राजकार्यों को देखने के लिए रत्नकूट चला आया। क्योंकि राजकार्य दैनिक प्रिय कर्तव्य है॥६७-६८॥ वहाँ राजकार्य करते हुए भी राजा मदोन्मत्ता अकेली पत्नी की चिन्ता करते हुए, अनमने भाव से कार्य कर रहा था॥६९॥ इतने में ही वह रानी राजदत्ता दासियों के भोजन-विश्राम आदि कार्यों में व्यस्त हो जाने पर, उस दुर्गम द्वीप के भवन के द्वार पर अकेली ही निकल आई ॥७०॥ उसके द्वार पर आते ही उसकी रक्षा भंग करने के लिए मानों दैव से प्रेरित कोई पुरुष आया उसे मदोन्मत्ता राजदत्ता ने देखा और पास आने पर पूछा—'तुम कहाँ से आये हो कौन हो और इस दुर्गम स्थान पर किस प्रकार आ सके ? ॥७१-७२॥ अनेक कष्टों को झेले हुए उस पुरुष ने कहा—'हे सुन्दरी ! मैं मथुरावासी पवनसेन नामक बनिये का पुत्र हूँ। पिता की मृत्यु होने पर कुटुम्बियों द्वारा सब धन हरण कर लेने पर विदेश जाकर दीन चाकरी करने लगा॥७३-७४॥ तब बड़ी कठिनाई से व्यापार द्वारा धन कमाकर दूसरे देश को जाता हुआ राह में चोरों से लूट लिया गया॥७५॥ तब अपने ऐसे लोगों के साथ रत्नों की खदानोंवाले कनक-क्षेत्र में गया॥७६॥ वहाँ पर राजा को हिस्सा देने का निर्णय करके एक साल तक रत्न-प्राप्ति के लिए जमीन खोदता रहा। गहरे गड्ढों के खोदने पर भी रत्न न मिला॥७७॥ और, मेरे साथी रत्नों को पाकर प्रसन्न हो रहे थे इसलिए मैंने दुःख से पीड़ित होकर समुद्र के किनारे लकड़ियाँ एकत्र करके जल मरने के लिए चिता बनाई। जब मैं चिता में प्रवेश कर ही रहा था कि इतने में जीवदत्त नामक जहाजी बनिया दैवयोग से आया॥७८-७९॥
३६ कथासरित्सागर
३६ कथासरित्सागर विचार्य मरजातेन दत्त्वा वृत्तिं दयालुना। गृहीतोऽहं प्रवहणे स्वर्णद्वीप यियासता ॥८०॥ ततोऽकस्मात्प्रवहणेनाब्धिमध्येन गच्छताम्। पञ्चस्वहस्सु यातेषु मेघोऽकस्माद्ववृष्यस ॥८१॥ प्रवृष्टे स्थूलधारामिर्मघेऽस्मिन्मारुतेन तत्। अघूर्णत प्रवहणं मत्तहस्तिशिरो यथा ॥८२॥ क्षणाच्चिमज्ज भग्नेऽस्मिन्यानपात्रे विधेर्वशात्। एकं फलकक प्राप्तस्तत्काल मज्जता मया ॥८३॥ तवाऽवस्तत शान्ते मेघाटोपे विधेर्वशात्। इमं प्रदेशं प्राप्याहमुत्तीर्ण साम्प्रतं वने ॥८४॥ वीक्ष्य चेदं चतुश्शालं प्रविश्याभ्यन्तर मया । दृष्टा दृष्टिसुधावृष्टिस्त्व तापशमनी शुभे ॥८५॥ इत्युक्तवन्तं पर्यङ्के निवेश्यालिङ्गि तम्। मोहिता राजवत्ता सा मदेन मदनेन च ॥८६॥ स्त्रीत्वं शीजत्वमेकान्तं पुंसो लामोऽनियन्त्रणा । यत्र पञ्चाम्यस्तत्र वार्त्ता शीलसूनस्य का॥८७॥ न चैवं क्षमते भारी विचारं मारमोहिता। यदियं चकमे रात्री तमकाम्यं विपद्गतम् ॥८८॥ तावच्च रत्नाधिपतिः स राजा रत्नकूटतः। आजगामोत्सुकस्तूर्णं शुचरद्विपवाहनः ॥८९॥ प्रविशंश्चात्र सोऽपश्यत्सादृश्येनापि तेन ताम्। पुरुषेण समं भार्या राजवत्तां रतिस्थिताम् ॥९०॥ दृष्ट्वा जिघांसितमपि क्षितीशः पुरुष स तम्। नाबधीत्पादपतितं युवानं कृपणा गिरः ॥९१॥ भार्या भीतां च मत्तां तां स वीक्ष्यैवमचिन्तयत् । मद्ये मारैकसुहृदि प्रसक्ता स्त्री सती कुतः ॥९२॥ श्चियन्तु चपला नारी रक्षमापि न शक्यते। किं नामालोलवाताली बाहुभ्यां जातु बध्यते ॥९३॥ न कृत गणकोक्तं यत्तदिदं तस्य मे फलम्। विपाककटुकं तस्य माप्तवाक्यावधीर णम् ॥९४॥
सप्तम लम्बक ३७
सप्तम लम्बक ३७ स्वर्णद्वीप जाते हुए उस दयालु बनिये ने मरने से रोककर और जीवन-निर्वाह का प्रबन्ध करके मुझे जहाज पर चढ़ा दिया ॥८०॥ तब समुद्र के बीच जहाज से जाते हुए हम लोगों को पाँच दिन बीत गये छठे दिन अकस्मात् बादल दीख पड़े और मूसलाधार पानी बरसने पर आँधी से जहाज हाथी के सिर के समान झूमने लगा। और क्षण-भर में टूटकर डूब गया । डूबते हुए मैंने एक लकड़ी का तख्ता पा लिया ॥८१-८३॥ उस पर बैठा हुआ मै आकाश साफ होने पर, इस द्वीप के किनारे वन में जा लगा। वहाँ से इस चौसाले मकान को देखकर इधर आया और यहाँ आँख के लिए अमृत-वर्षा के समान दुःख शमन करनेवाली तुम्हें देखा ॥८४-८५॥ ऐसा कहते हुए उस बनिये को मद और काम से उन्मत्त राजदत्ता ने पलंग पर बैठाकर लिपटा लिया ॥८६॥ स्त्रीत्व मद का नशा एकान्त पुरुष का मिलना और पूर्ण स्वतन्त्रता जहाँ ये पाँच अनियाँ एकत्र हों वहाँ चरित्र-रूपी तृण की बात ही क्या ? ॥८७॥ काम से उत्तेजित नारी किसी प्रकार का विचार नहीं कर सकती। इसीलिए उसने विपत्ति में पड़े हुए उस दरिद्र और कुरूप को भी अपना किया ॥८८॥ इतने में ही वह राजा रत्नाधिपति उत्सुकता के साथ आकाशगामी हाथी पर बैठकर शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचा ॥८९॥ उसने आते ही उस दीन दरिद्र के साथ सोयी हुई रानी राजदत्ता को अपनी आँखों से देखा ॥९०॥ उसने मार डालने योग्य व्यक्ति को भी दीनतापूर्वक प्रार्थना करने पर नहीं मारा। डरी हुई और मद्य से चूर पत्नी को देखकर वह इस प्रकार सोचने लगा कि काम का एकमात्र मित्र मद्य के पी लेने पर स्त्री सती कैसे रह सकती है? ॥९१ ९२॥ चंचला (दुराचारिणी) स्त्री रक्षा से भी रोकी नहीं जा सकती। क्या प्रलयकालीन आँधी हाथ से रोकी जा सकती है ? ॥९३॥ मैंने जो गणक का कहना नहीं माना उसी का यह फल है। विश्वस्त और हितैषी पुरुष की बात का अनादर करना किसके लिए परिणाम में अच्छा नहीं होता ॥९४॥
३३ कथासरित्सागर
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
३३ कथासरित्सागर निवार्य मरणात्तन् दत्त्वा वृत्तिं दयालुना। गृहीतोऽहं प्रवहणे स्वर्णद्वीपं यियासता ॥८०॥ ततोऽकस्मान्नवहनेनाब्धिमध्येन गच्छताम्। पञ्चस्वहस्सु यातेषु मेघोऽकस्माद्व्यबुध्यत ॥८१॥ प्रमृष्टे स्थूलधाराभिर्भवेऽस्मिन्मारुतेन तत्। व्यघूर्णत प्रवहणं मत्तहस्तिशिरो यथा ॥८२॥ क्षणाच्चिमग्न्य भग्नेऽस्मिन्वानपात्रे विधेर्वशात्। एकं फलकम् प्राप्तस्तत्कालं मज्जता मया ॥८३॥ तदारूढस्ततः शान्ते मेघाटोपे विधेर्वशात्। इमं प्रदेशं प्राप्यहमुत्तीर्णः साम्प्रतं वने ॥८४॥ वीक्ष्य चेदं धनुश्शास्त्रं प्रविष्टाम्यन्तरं मया। दृष्टा दृष्टिसुधावृष्टिस्त्वं तापशमनी भुमे ॥८५॥ इत्युक्तवन्तं पर्यङ्के निषद्यैवाश्लिषत्तु तम्। मोहिता राजवत्ता सा मदेन मदनेन च ॥८६॥ स्त्रीत्वं जीवितमेकान्तः पुंसो कामोऽनियन्त्रणा। यत्र पञ्चाम्नयस्तत्र वार्ता शीलतृणस्य का ॥८७॥ न चैव क्षमते नारी विचारं मारमोहिता। यदिदं चकमे राज्ञी तमकाम्यं विपद्गतम् ॥८८॥ तावच्च रत्नाधिपतिः स राजा रत्नकूटकः। आजगामोत्सुकस्तूर्णं शुपरद्विपवाहनः ॥८९॥ प्रविशदात्र सोऽपश्यत्सादृशेनापि तन ताम्। पुरुषेण समं भार्यां राजवत्तां रतिस्थिताम् ॥९०॥ दृष्ट्वा निष्कासितमपि क्षितीशः पुरुषं स तम्। त्रासभीत्यादपतितं ब्रुवाणं कृपणा गिरः ॥९१॥ भार्यां मौढां च मत्तां तां स वीक्ष्यैवमचिन्तयत्। अद्य मारेङ्मुहृदि प्रसक्ता स्त्री सती कुत ॥९२॥ नियन्तुं चपला नारी रक्षयापि न शक्यते। किं नामोत्पातवाताली बाहुभ्यां जातु बध्यते ॥९३॥ न श्रुतं गणकोक्तं यत्तन्दि तस्य मे फलम्। विपाककटुब तस्य भाप्तवाकयावधीरणम् ॥९४॥
सप्तम लम्बक १९
सप्तम लम्बक १९ यह शीलवती की बहन है—यह देखते हुए मैं यह भूल गया कि हलाहल विष भी अमृत का सहोदर ही है ॥१९५॥ यह भी ठीक है कि दैव की आश्चर्यजनक चेष्टा को कौन व्यक्ति पुरुषार्थ से जीत सकता है ॥१९६॥ ऐसा सोचकर राजा ने क्रोध नहीं किया और वृत्तान्त पूछकर उस वैश्य-पुत्र को छोड़ दिया ॥१९७॥ छूटा हुआ वैश्य-पुत्र अपने जाने का मार्ग खोजता हुआ भवन से निकलकर समुद्र के तट पर गया और उसने दूर से जाते हुए एक जहाज को देखा ॥१९८॥ तब उसी तख्ते पर चढ़कर, जिससे पहले आया था समुद्र में कूद पड़ा और चिल्लाकर रोने लगा कि मुझे बचाओ। उसका रोना-चिल्लाना सुनकर उस जहाज में बैठे हुए उसके स्वामी क्रोधवर्मा ने उसे जहाज में चढ़ाकर अपने पास रख लिया ॥१९९ ॥ दैव ने जिसके नाश के लिए जो विधान रच रखा है वह, दौड़कर भागते हुए का भी पीछा करता है ॥१ ९॥ यही कारण था कि वह मूर्ख बनिया जहाज में चलते हुए एकान्त में क्रोधवर्मा की स्त्री के साथ पकड़ा गया। क्रोधवर्मा उसके इस कुकृत्य को देखकर क्रुद्ध हो उठा और उसे समुद्र में फेंक दिया जिससे वह डूबकर मर गया ॥१०२॥ इधर राजा रत्नाधिपति क्रोध न करके राजदत्ता (अपनी स्त्री) को सेवकों और सामान के साथ श्वेतराश्मि हाथी पर बैठाकर रत्नकूट ले आया ॥१ ३॥ रत्नकूट में पहुँचकर राजा ने उसे उसकी बहन शीलवती को सौंप दिया और शीलवती तथा मन्त्रियों को उसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥१ ४॥ और बोला—'आश्चर्य है कि सार-रहित और नीरस सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर मैंने कितना कष्ट पाया ॥१ ५॥ इसलिए, अब वन में जाकर भगवान की शरण लेता हूँ जिससे फिर ऐसे कष्टों का भोग न करूँ ॥१ ६॥ ऐसा कहते हुए, राजा सुधी मन्त्रियों और शीलवती द्वारा बहुत रोके जाने पर भी वैराग्य पर दृढ़ रहा ॥१ ७॥ और उसने अपना सारा राज्य पापभंजन नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को विधिपूर्वक दान कर दिया और शेष धन शीलवती तथा अन्यान्य ब्राह्मणों को देकर भोगों से सर्वथा विरक्त हो गया ॥१ ८ । ९॥
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर शीलवत्याः स्वसेतीमां जानतो बत विस्मृता। सुधायाः सहजा सा मे कालकूटविषच्छला॥९५॥ अथवा कः समर्थः स्यादसम्माव्यं विचेष्टितम्। जेतुं पुरुषकारेण विधेरद्भुतकर्मणः॥९६॥ इत्यालोच्य न चुक्रोश कस्मैचित् जहौ च सः। पृष्टोदन्तं वणिक्पुत्रं राजा प्रच्छन्नकामुकम्॥९७॥ सोऽपि मुक्तस्ततोऽभ्यन्तति काञ्चिद्वणिक्सुतः। निर्गत्याब्धौ प्रवहणं दूरादागच्छदैक्षत॥९८॥ ततः फलकम् भूयस्तमेवारुह्य सोऽम्बुधौ। भ्रमन्नूत्कृत्य चक्रन्द मामुद्धरत भो इति॥९९॥ तेन स क्रोधवर्माख्यो वणिक्प्रधानपाथगः। समुद्धृत्य वणिक्पुत्रं चकारास्तिकवसिनम्॥१००॥ मस्य यद्विहितं धात्रा कर्म नाशाय तस्य तत्। पदवीं यत्र तत्रापि धावतोऽप्यनुधावति॥१०१॥ यथा तत्र स्थितो मूढस्तत्पत्न्या सङ्गतो रहः। विलोक्य वणिजा तेन क्षेपितोऽब्धौ व्यपद्यत॥१०२॥ तावच्च रत्नाधिपतिः स राजा सपरिच्छदाम्। आरोप्य श्वतरथमो तां राजवत्तामकोपतः॥१०३॥ प्रापय्य रत्नकटकं शीलवत्याः समर्प्य च। तस्यै च सचिवेभ्यश्च सवृत्तान्तमवर्णयत्॥१०४॥ जगाद च कियद्दुःखमनुभूतमहो मया। असारविरसेष्वेषु भोगेष्वामुक्तचेतसा ॥१०५॥ तदिदानीं वनं गत्वा हरिं शरणमाश्रये। येन स्यां नैष दुःखानां भाजनं पुनरीदृशाम्॥१०६॥ इत्युक्तवान् स मचिबर्वार्यमाणोऽपि दुःखितः। शीलवत्या च वैराग्यान्निश्चयं नैव तज्जहौ॥१०७॥ ततोऽधमपरित्रादावत्रं साध्ये स्वकोशतः। दीनवर्यै द्विजभ्योऽथ दत्वान्यद् भोगनिस्पृहः॥१०८॥ पात्रभूतप्रनगजाय ब्राह्मगाय यथाविधि। न्दो गुणमरिष्टाय नित्यं गव्यं स भूपतिः॥१०९॥
सप्तम लम्बक ३९
सप्तम लम्बक ३९ यह धीमवती की बहन है—यह देखते हुए मैं यह भूल गया कि हलाहल विष भी अमृत का सहोदर ही है॥९५॥ यह भी ठीक है कि दैव की आश्चर्यजनक चेष्टा को कौन व्यक्ति पुरुषार्थ से जीत सकता है॥९६॥ ऐसा सोचकर राजा ने क्रोध नहीं किया और वृत्तान्त पूछकर उस वैश्य-पुत्र को छोड़ दिया ॥९७॥ छूटा हुआ वैश्य-पुत्र अपने जाने का मार्ग खोजता हुआ भवन से निकलकर समुद्र के तट पर गया और उसने दूर से आते हुए एक जहाज को देखा ॥९८॥ तब उसी तख्ते पर चढ़कर, जिससे पहले आया था समुद्र में कूद पड़ा और चिल्लाकर रोने लगा कि मुझे बचाओ। उसका रोना-चिल्लाना सुनकर उस जहाज में बैठ हुए उसके स्वामी क्रोशवर्मा ने उसे जहाज में चढ़ाकर अपने पास रख लिया ॥९९ १ ॥ दैव ने जिसके नाश के लिए जो विधान रच रखा है, वह, दौड़कर भागते हुए का भी पीछा करता है॥१ १॥ यही कारण था कि वह मूर्ख बनिया जहाज में चलते हुए एकान्त में क्रोशवर्मा की स्त्री के साथ पकड़ा गया। क्रोशवर्मा उसके इस कुकृत्य को देखकर क्रुद्ध हो उठा और उसे समुद्र में फेंक दिया जिससे वह डूबकर मर गया ॥१ २॥ इधर राजा रत्नाधिपति क्रोध न करके राजन्ता (अपनी स्त्री) को सेवकों और सामान के साथ श्वेतरश्मि हाथी पर बैठाकर रत्नकूट ले आया ॥१ ३॥ रत्नकूट में पहुँचकर राजा ने उसे उसकी बहन धीमवती को सौंप दिया और धीमवती तथा मन्त्रियों को उसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥१ ४॥ और बोला—'आश्चर्य है कि सार रहित और नीरस सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर मैंने कितना कष्ट पाया ॥१ ५॥ इसलिए, अब वन में जाकर भगवान् की शरण लेता हूँ जिससे फिर ऐसे कष्ट का भोग न करूँ॥१ ६॥ ऐसा कहते हुए, राजा दुःखी मन्त्रियों और धीमवती द्वारा बहुत रोके जाने पर भी वैराग्य पर दृढ़ रहा ॥१ ७॥ और उसने अपना सारा राज्य पापभंजन नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को विधिपूर्वक दान कर दिया और शेष धन धीमवती तथा अन्यान्य ब्राह्मणों को देकर माया से सर्वथा विरक्त हो गया ॥१ ८ १ ९॥
४० कथासरित्सागर
४० कथासरित्सागर दत्तराज्यश्च नभसा स गमिष्यंस्तपोवनम्। आनाययञ्श्वेतरश्मिं पौराणां साधु पश्यताम् ॥११०॥ आनीतमात्रं स करी शरीरं प्रविमुच्य तत्। पुरुषो दिव्यरूपोऽभूद्धारकेयूरराजितः ॥१११॥ श्वेतरश्मिकथितः पूर्वजन्मवृत्तान्तः को भवान्किमिदं चेति पृष्टो राज्ञा जगाद सः। गन्धर्वौ भ्रातरावावामुभौ मलयवासिनौ ॥११२॥ अह सोमप्रभो नाम ज्येष्ठो देवप्रभश्च सः। तस्य चैकैव मद्भातुरभार्या सा चातिवल्लभा ॥११३॥ स तां राजवतीं नाम कृतवोत्सङ्गं परिभ्रमन्। एकदा सिद्धवासस्य स्थानं प्रायानया सह ॥११४॥ केशवायतने तत्र वयमभ्यर्चिताच्युताः। प्रावर्त्तामहि सर्वेऽपि गातुं भगवतः पुरः ॥११५॥ तावदागत्य तत्रैकः सिद्धस्तां श्रव्यगायिनीम्। दृष्ट्वा राजवतीं पश्यन्नतिष्ठदनिमेषया ॥११६॥ सिद्धोऽपि सानिलाषः किं परनारीं निरीक्षसे। इति रोष्यात्स मद्भाता क्रुधा सिद्धं तमब्रवीत् ॥११७॥ ततः स सिद्धः कुपितः शप्तुमेव तमभ्यधात्। गीताश्चर्यान्मया मूढ वीक्षितेयं न कामतः ॥११८॥ तन्मर्त्ययोनावीर्ष्यालुः पत त्वमनया सह। पश्येतामेव भार्यां त्वं साक्षात्तत्रान्यसङ्गताम् ॥११९॥ इत्युचिवान् मया सोऽथ बाल्यात्तच्छापकोपतः। हस्तस्थेनाहृतः क्रीडामुग्ध्येन श्वेतहस्तिना ॥१२०॥ ततः स मां समशपद्येनाहं भवताहृतः। तादृक्श्वेतो गजो भूमौ भवानुत्पद्यतामिति ॥१२१॥ अथानुनीतो मद्भात्रा तेन देवप्रभेण सः। सिद्धः कृपालुः शापान्तमेवमस्माकमब्रवीत् ॥१२२॥ हरेः प्रसादान्मर्त्योऽपि भूत्वा द्वीपेश्र्वरो भवान्। गजीभूतमिमं प्राप्स्यत्यनुजं दिव्यवाहनम् ॥१२३॥ मन्तपुरसहस्राणि त्वमशीतिमवाप्स्यसि। तैषां वेत्स्यसि दौःशील्पं सर्वेषां जनसन्निधौ ॥१२४॥
सप्तम लम्बक ४१
सप्तम लम्बक ४१ राज्य और धन का दान करके राजा ने रोते हुए नागरिकों के सामने ही तपोवन में जाने की इच्छा से श्वेतरश्मि हाथी को बुलाया ॥११० ॥ सामने प्रस्तुत श्वेतरश्मि हाथी ने तुरन्त अपना हाथी का शरीर छोड़कर हार-केयूर धारी दिव्य पुरुष गन्धर्व का रूप धारण किया ॥१११॥ श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा 'तुम कौन हो और यह क्या किया ? —राजा के इस प्रकार पूछने पर हाथी बोला— मैं और तुम—हम दोनों पूर्वजन्म में मलयाचल-निवासी गन्धर्वजातीय भाई हैं। मैं छोटा भाई सोमप्रभ हूँ और दूसरा बड़ा भाई देवप्रभ था । उसकी राजवती नाम की अत्यन्त प्यारी पत्नी थी जिसे वह गोद में लेकर घूमते हुए सिद्धवास नामक स्थान में मेरे साथ गया ॥११२–११४॥ वहीं पर विष्णु भगवान् के एक मन्दिर में उनकी पूजा करके हम लोग गाने के लिए प्रवृत्त हुए ॥११५॥ उस मन्दिर में एक सिद्ध आया और वह अतिमनोहर गान करते हुए राजवती को एकटक से देखने लगा ॥११६॥ मेरे बड़े भाई ने उसे इस प्रकार घूरते हुए देखकर उस सिद्ध से क्रुद्ध होकर कहा कि तू सिद्ध होकर भी दूसरे की स्त्री को इस प्रकार की लालसा से क्यों देखता है ? ॥११७॥ तब सिद्ध ने भी क्रुद्ध होकर उसे शाप देने के लिए इस प्रकार कहा—'रे मूर्ख ! गाने के आश्चर्य से मैंने इसे देखा वासना से नहीं। इसलिए, हे ईर्ष्याभासे ! तुम दोनों इसके साथ मनुष्य की योनि में जा गिरागे और तुम इसी पत्नी को दूसरे से समागम करते हुए अपनी आँखों से देखोगे' । ऐसा कहते हुए उस सिद्ध को मैंने क्रोध से हाथ में लिये हुए मिट्टी के सफेद हाथी (खिलौने) से मारा ॥११८–१२०॥ तब उसने मुझे शाप दिया कि 'तूने मुझे मिट्टी के सफेद हाथी से मारा है इसलिए तू अगले जन्म में सफेद हाथी की योनि में जन्म लेगा' ॥१२१॥ तदनन्तर मेरे भाई द्वारा किये गये अनुनय-विनय पर प्रसन्न उस सिद्ध ने दयालु होकर हम दोनों का शापान्त इस प्रकार किया ॥१२२॥ देवप्रभ से कहा कि 'तू विष्णु भगवान् की कृपा से मनुष्य होकर भी एक द्वीप का राजा होगा और हाथी बने हुए अपने भाई को दिव्य वाहन के रूप में प्राप्त करेगा। तेरी अस्सी हजार रानियाँ होगी। उन सभी रानियों की दुश्चरित्रता तुझे जनता के सामने मालूम होगी ॥१२३ १२४॥ ६
४२ कथासरित्सागर
४२ कथासरित्सागर अथैतां मानुषीभूतां स्वभार्यां परिणेष्यसि । प्रत्यक्षमेनामपि च द्रक्ष्यस्यन्येन सङ्गताम् ॥१२५॥ ततो विरक्तहृदयो दत्त्वा राज्यं द्विजन्मने । देवप्रभ यदा शान्तो वनं गन्तुं प्रपत्स्यसि ॥१२६॥ तदा प्रथममुक्तेऽस्मिन्गजरत्नावुजे तव । अनया भार्यया साकं शापात्त्वमपि मोक्ष्यसे ॥१२७॥ इति सिद्धोक्तशापान्ता वय प्राक्कर्मभवत् । एवं जाता पृथग्भोगाच्छापान्तं सैष चाद्य नः॥१२८॥ एवं सोमप्रभेणोक्ते स रत्नाधिपतिर्नृप । जातिं स्मृत्वाग्रवीद्धन्त सैष देवप्रभो ऽहम् ॥१२९॥ एषापि राजदत्ता मा पत्नी राजवती मम । इत्युक्त्वा स तया साकं भार्यया तां तनु जहौ ॥१३० ॥ क्षणात्सर्वेऽपि गन्धर्वा भूत्वा लोकस्य पश्यतः । समुत्पत्य निजं धाम ययुस्ते मरुद्याधस्रम् ॥१३१॥ धीरुवरयपि शीलस्य माहात्म्यात्प्राप्य सम्पदम् । ताम्रलिप्तीं पुरीं गत्वा तस्थौ धर्मोपसेविनी ॥१३२॥ इति जगति न रक्षितुं समर्थः क्वचिदपि कश्चिदपि प्रसह्य नारीम् । अवति तु सततं विशुद्ध एकः कुलयुवतीं निजमरूपाशबन्धः ॥१३३॥ एवं सर्ष्या नाम दुःशङ्कहेतुर्ह्येष पुंसां क्लेशदायी परेषाम् । योऽयं मा मुद्रक्षणायाङ्गनानामर्थोत्सुक्यं प्रत्युतासां करोति ॥१३४॥ इति नरवाहनदत्तो रत्नप्रभया स्वभार्यया कथिताम् । स निशम्य कथामभ्यां सचिवैः सार्धं परं मुमुदे ॥१३५॥ इति महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके द्वितीयस्तरङ्गः ।
तृतीयस्तरङ्गः निश्चयदत्तस्य अनुरागपरावरूपाश्च कथा एवं रत्नप्रभाख्यानकपात्रमत्त इवापरम् । नरवाहनदत्तं तं सचिवो गोमुखोऽब्रवीत् ॥१॥
तदनन्तर तू मनुष्य-योनि में उत्पन्न इसी पत्नी को प्राप्त करेगा इसे और दूसरे पुरुष के साथ अपनी आँखों से देखेगा। तब तू विरक्त होकर ब्राह्मण को राज्य देकर वन जाने का यत्न करेगा। उस समय तेरा छोटा भाई सोमप्रभ भी हाथी की योनि से मुक्त हो जायगा और तू भी इसी पत्नी के साथ मानव-योनि से मुक्त होकर अपने गन्धर्व-रूप को प्राप्त करेगा' ॥१२६-१२७॥ हाथी ने फिर कहा—'इस प्रकार, हम लोग सिद्ध के शाप से मुक्त हो गये। अपने-अपने कर्म के भेद से हम लोग पृथक् पृथक् योनि में उत्पन्न हुए थे। अब हम लोगों के शाप का आज अन्त हो गया' ॥१२८॥ सोमप्रभ के ऐसा कहने पर वह राजा नलाधिपति बोला—'मैं अपने पूर्व जन्म का स्मरण करता हूँ। वह देवप्रभ मैं ही तो था और यह राजदत्ता मेरी राजवती नाम की पत्नी है। ऐसा कहकर राजा और रानी राजवती राजदत्ता ने अपना मनुष्य का चोला त्याग दिया। उसी समय वे तीनों (राजा रानी और हाथी) गन्धर्व-देह धारण करके लीला के देखते-देखते आकाश में उड़कर मरुदाचल-स्थित अपने धाम को चले गये ॥१२९-१३१॥ शीलावती भी अपने शुद्ध चरित्र के प्रभाव से प्रचुर धन प्राप्त करके ताम्रलिप्ती नगर में जाकर धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगी ॥१३२॥ इस प्रकार, संसार में कहीं भी कोई स्त्री को नियन्त्रण में रखकर रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकता। कुलीन स्त्री को उसका अपना ही एकमात्र प्रबल और विशुद्ध मन उसकी रक्षा कर सकता है ॥१३३॥ इस प्रकार दूसरों से ईर्ष्या करना और उन पर दोष लगाना यह मानव-स्वभाव का दोष है। यहाँ अधिक नियन्त्रण स्त्रियों की उन्मुक्तता को अत्यधिक बढ़ा देता है ॥१३४॥ नरवाहनदत्त इस प्रकार अपनी पत्नी रत्नप्रभा से कही गई कथा को सुनकर अपने मन्त्रियों के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥१३५॥ महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त
तृतीय तरंग निश्चयबल और अनुरागपरा की कथा इस प्रकार रत्नप्रभा से कही गई कथा के अन्त में नरवाहनदत्त का मन्त्री गोमुख उससे कहने लगा—॥१॥
४४ कथासरित्सागर
४४ कथासरित्सागर सत्यं साध्व्यः प्रविरालाश्चपलास्तु सर्वा स्त्रियः । अविश्वास्त्यास्तथा श्वेतामपि श्व कथां शृणु ॥२॥ इहास्त्युज्जयिनी नाम नगरी विश्वविश्रुता । तस्यां निश्चयदत्ताख्यो वणिक्पुत्रोऽभवत्पुरा ॥३॥ स द्यूतकारे द्यूतेन धनं जित्वा दिने दिने । स्नात्वा सिप्राजलेऽभ्यर्च्य महाकालमुदारधीः ॥४॥ दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यो दीनानाथेभ्य एव च । व्यधाद्विलेपनाहारताम्बूलाद्यविशेषतः ॥५॥ सदा स्नानार्चनाद्यन्ते महाकालारुयान्तिके । गत्वा व्यलिम्पदारामं श्मशाने चन्दनादिना ॥६॥ तत्रस्थे च शिलास्तम्भे स विन्यस्य विलेपनम् । विमलिंप कथम्पृष्ठं युवा प्रत्यहमेककः ॥७॥ तेन स्तम्भः स सुश्लक्ष्णः कालेनाभवदेकतः । अथागाच्चित्रकृत्तेन पथा रूपकृता सह ॥८॥ स स्तम्भं वीक्ष्य सुश्लक्ष्णं तत्र गौरीं समालिखत् । रूपकारोऽपि शास्त्रेण प्रौढयेवोल्लिखेत् ताम् ॥९॥ ततस्तयोगतवतोर्महाकालार्चनागता । विद्याधरसुतैकात्र स्तम्भे देवीं ददर्श ताम् ॥१०॥ सुलक्ष्णत्वात्साप्रविश्य तस्यां गत्वा कृतार्थताम् । अदृश्या विद्ययार्यैतं शिलास्तम्भं विवेश सा ॥११॥ तावन्निश्चयदत्त स तत्रागत्य वणिक्सुतः । साश्चर्यं स्तम्भमध्ये तां ददर्शोल्लिखितामुमाम् ॥१२॥ विलिप्याङ्गानि तत्स्तम्भागेऽन्यत्रानुरूपनम् । न्यस्य पृष्ठं समालब्धुं प्रारभे निरुपद्रवः स ॥१३॥ तद्विलोक्ष्य विलोलाक्षी सा विद्याधरकन्यका । स्तम्भान्तरस्था तद्रूपहृतचित्ता व्यचिन्तयत् ॥१४॥ ईदृशस्यापि शोभ्यस्य नास्ति पृष्ठानुलेपकः । तदहं तावदद्यास्य पृष्ठमेषा समालभे ॥१५॥ इत्यालोच्य प्रसार्यैव करं स्तम्भान्तरात्सती । व्यलिंपत्तस्य सा पृष्ठं स्नेहाद्विद्याधरी तदा ॥१६॥
सप्तम लम्बक ४५
सप्तम लम्बक ४५ सच है सदाचारिणी स्त्रियां विरल होती हैं। प्रायः स्त्रियाँ चंचला (दुराचारिणी) ही होती हैं और विश्वास के योग्य भी नहीं होतीं। इस प्रसंग में यह भी एक कथा सुनें ॥२॥ संसार में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। प्राचीन समय में वहाँ निश्चयदत्त नाम का बनिया का बेटा रहता था ॥३॥ वह जुआरी था और प्रतिदिन जुए से धन जीतकर, क्षिप्रा नदी में स्नान और महाकालेश्वर शिव की पूजा करके ब्राह्मणों दीना एवं अनाथों को दान देकर चन्दन इत्र भोजन ताम्बूल आदि का व्यवहार करता था। (वह बहुत खर्चीला और शौकीन था) ॥४-५॥ वह निश्चयदत्त प्रतिदिन स्नान पूजा आदि करके महाकाल-मन्दिर के समीप श्मशान में जाकर शरीर में चन्दन लगाता था ॥६॥ वह युवक वैश्य उस श्मशान में खड़े एक पत्थर के खम्भे पर, चन्दन लगाकर उस पर अपनी पीठ रगड़ता था ॥७॥ प्रतिदिन पीठ के रगड़ने से वह खम्भा अत्यन्त चिकना और सुन्दर हो गया था। एक बार उस मार्ग से एक चित्रकार एक मूर्तिकार (संगतराश) के साथ उधर से आया ॥८॥ उसने खम्भे को खूब चिकना देखकर उस पर गौरी का चित्र बना दिया। मूर्तिकार ने भी क्रीड़ावश छेनी और हथौड़ी से उस खोदकर मूर्ति का रूप दे दिया ॥ ॥ उन दोनों के चले जाने पर महाकाल की पूजा के लिए आई एक विद्याधर-कन्या उधर आ निकली और उसने खम्भे पर पार्वती की खुदी हुई मूर्ति देखी ॥ ९ ॥ उसे बहुत चिकना देखकर और पार्वती का वास समझकर वह विद्याधरी महाकाल की पूजा करके उसी खम्भे में अदृश्य रूप से प्रवेश कर गई ॥११॥ इतने में ही वैश्य-पुत्र प्रतिदिन के नियमानुसार उस खम्भे पर आया और गौरी की खुदी हुई मूर्ति उसने देखी ॥१२॥ तब उसने शरीर पर चन्दन का लेप करके खम्भे की दूसरी ओर पीठ रगड़ना प्रारम्भ किया ॥१३॥ उसे पीठ रगड़ते हुए देखकर वह चंचलाक्षी विद्याधरी खम्भ के अन्दर बैठी हुई उस वैश्य की सुन्दरता से मोहित हो गई और सोचने लगी ऐसे सुन्दर युवक की पीठ पर चन्दन लगानेवाला कोई नहीं है। तब मैं ही इसकी पीठ पर चन्दन लगाती हूँ ॥१४ १५॥ ऐसा सोचकर और खम्भे के अन्दर से ही हाथ फैलाकर स्नेह से उसकी पीठ मलने लगी ॥१६॥