कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती थी उन्हें राजा आकाशगामी हाथी से भेजता था। किसी पुरुष का विश्वास न करता था॥६५॥ स्वयं भी उसके प्रेम के कारण प्रति रात्रि को हाथी से वहाँ जाता था और दिन में फिर रत्नकूट चला आता था॥६६॥ एक बार राजा ने बुरे स्वप्न की शान्ति के लिए प्रभात-काल में ही उसके (राजदत्ता के) साथ मद्यपान कर लिया। मद्यपान से मत्त उस रानी के बार-बार मना करने पर भी वह राजा राजकार्यों को देखने के लिए रत्नकूट चला आया। क्योंकि राजकार्य दैनिक प्रिय कर्तव्य है॥६७-६८॥ वहाँ राजकार्य करते हुए भी राजा मदोन्मत्ता अकेली पत्नी की चिन्ता करते हुए, अनमने भाव से कार्य कर रहा था॥६९॥ इतने में ही वह रानी राजदत्ता दासियों के भोजन-विश्राम आदि कार्यों में व्यस्त हो जाने पर, उस दुर्गम द्वीप के भवन के द्वार पर अकेली ही निकल आई ॥७०॥ उसके द्वार पर आते ही उसकी रक्षा भंग करने के लिए मानों दैव से प्रेरित कोई पुरुष आया उसे मदोन्मत्ता राजदत्ता ने देखा और पास आने पर पूछा—'तुम कहाँ से आये हो कौन हो और इस दुर्गम स्थान पर किस प्रकार आ सके ? ॥७१-७२॥ अनेक कष्टों को झेले हुए उस पुरुष ने कहा—'हे सुन्दरी ! मैं मथुरावासी पवनसेन नामक बनिये का पुत्र हूँ। पिता की मृत्यु होने पर कुटुम्बियों द्वारा सब धन हरण कर लेने पर विदेश जाकर दीन चाकरी करने लगा॥७३-७४॥ तब बड़ी कठिनाई से व्यापार द्वारा धन कमाकर दूसरे देश को जाता हुआ राह में चोरों से लूट लिया गया॥७५॥ तब अपने ऐसे लोगों के साथ रत्नों की खदानोंवाले कनक-क्षेत्र में गया॥७६॥ वहाँ पर राजा को हिस्सा देने का निर्णय करके एक साल तक रत्न-प्राप्ति के लिए जमीन खोदता रहा। गहरे गड्ढों के खोदने पर भी रत्न न मिला॥७७॥ और, मेरे साथी रत्नों को पाकर प्रसन्न हो रहे थे इसलिए मैंने दुःख से पीड़ित होकर समुद्र के किनारे लकड़ियाँ एकत्र करके जल मरने के लिए चिता बनाई। जब मैं चिता में प्रवेश कर ही रहा था कि इतने में जीवदत्त नामक जहाजी बनिया दैवयोग से आया॥७८-७९॥