कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक ६३ उसके ऐसा कहने पर राजा ने उसे स्वीकार किया ॥४९॥ दूसरे दिन शीलवती से निश्चय करके उस हर्षगुप्त वैश्य के साथ आकाशगामी श्वेतरश्मि हाथी पर बैठकर वह राजा स्वयं ताम्रलिप्ती नगरी में गया और हर्षगुप्त के यहाँ आकर ठहरा ॥५०-५१॥ वहाँ जाकर उसने ज्योतिषियों से शीलवती की बहन से विवाह करने का लग्न पूछा। गणकों ने दोनों के नक्षत्र पूछकर कहा—'राजन् ! तुम दोनों का विवाह आज से तीन महीने के बाद ठीक बनता है। आज ही यदि इसका विवाह किया जायगा तो यह कन्या अवश्य दुराचारिणी हो जायगी' ॥५२-५४॥ गणकों के इस प्रकार कहने पर भी उस सुन्दरी कन्या के लिए उत्सुक और इतने दिनों तक अकेले रहने में असमर्थ राजा ने सोचा ॥५५॥ अधिक सोच-विचार क्या करें। आज ही राजवला से विवाह करता हूँ क्योंकि यह शीलवती की बहन है शान्त और सती ही होगी। और, रत्नद्वीप के समीप ही जो बिना मनुष्यों का एक छोटा-सा टापू है उसमें एक चौसाला (चतुःशाल) बनाकर इसे रखता हूँ ॥५६-५७॥ उस दुर्गम द्वीप में इसके नौकर-चाकरों में सभी स्त्रियाँ रहेंगी। पुरुष का जब दसन ही नहीं होगा तब यह व्यभिचारिणी कैसे होगी ॥५८॥ ऐसा सोचकर राजा ने उसी दिन शीलवती से दान की गई उस राजवला से विवाह कर लिया ॥५९॥ इस प्रकार, विवाह करके हर्षगुप्त द्वारा वैवाहिक रीति-रिवाजों के किये जाने पर, राजा उस नववधू, शीलवती और वैश्य के साथ हाथी पर चढ़कर आकाश-मार्ग से रत्नकूट द्वीप म आया जहाँ जनता उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥६०-६१॥ राजधानी में आकर राजा न शीलवती को फिर से पर्याप्त धन मान आदि स सत्कार दिया। उसे भी पतिव्रता-पालन का सच्चा फल मिला ॥६२॥ तदनन्तर राजा उस नववधू को उसी आकाशगामी हाथी पर बिठाकर पूर्वनिर्धारित समुद्र के मध्य में स्थित मनुष्यों से अगम्य द्वीप में ले गया और अनेक दासियों के साथ उस वहीं चौशाल में रख दिया ॥६३ ६४॥ ९