कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक १८१
नवम लम्बक १८१ उधर दमयन्ती के पिता भीम ने नल का समाचार जानकर, नल और दमयन्ती के कुशल जानने के लिए चारों ओर दूत भेजे ॥३३०॥ उन दूतों में सुदेव नाम का एक मन्त्री घूमता हुआ ब्राह्मण के वेश में सुबाहु की राजधानी में आ पहुँचा ॥३३१॥ वहाँ मन्त्री ने आगन्तुकों में अपने परिचितों को ढूँढ़ती हुई दमयन्ती को देखा और उस दुखिया दमयन्ती ने भी पिता के मन्त्री को देखा ॥३३२॥ वे दोनों परस्पर पहचानकर इस प्रकार रोने लगे कि सुबाहु राजा की रानी ने उन्हें जान लिया ॥३३३॥ जब उसने उन दोनों को अपने पास बुलाकर विस्तृत समाचार पूछा तब उसे पता चला कि वह उसकी बहन की कन्या दमयन्ती है ॥३३४॥ तब महारानी ने अपने पति से कहकर और दमयन्ती का सम्मान करके उसे रथ पर बैठाकर सैनिक सिपाहियों और सुदेव मन्त्री के साथ पिता के घर भेज दिया ॥३३५॥ पिता के घर पहुँचकर और अपने दोनों बच्चों को पाकर पिता के संरक्षण में पति की प्रतीक्षा करती हुई दमयन्ती वहीं रहने लगी ॥३३६॥ नल को पाक-विद्या और रथ चलाने की कला में विशेषज्ञ बताते हुए उसका परिचय देकर उसे ढूँढ़ने के लिए दमयन्ती के पिता भीम ने चारों ओर अपने गुप्तचर भेजे ॥३३७॥ और, गुप्तचरों से राजा भीम ने कहा—'जहाँ तुम्हें नल के होने का सन्देह हो वहाँ तुम इस आर्या को पढ़ना—वन में सोई हुई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर अम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र तू अदृश्य होकर कहाँ चला गया? ॥३३८-३३९॥ उधर, राजा नल उस वन में रात्रि के समय दमयन्ती को छोड़कर आधा दुपट्टा ओढ़े हुए दूर चला गया और आगे जाकर उसने वन में लगी हुई आग देखी ॥३४०॥ 'हे महापुरुष विचार मुझे जबतक यह दावाग्नि जला नहीं देती उसके पहले ही मुझे इससे निकाल लो' ॥३४१॥ ऐसा वचन सुनकर राजा ने ध्यान से देखा कि दावानल के पास कुण्डली मारे हुए एक नाग बैठा है ॥३४२॥ दवाग्नि की लपटों से उस नाग के फण की मणि की किरणें व्यंगित हो रही हैं मानों दवाग्नि ने हाथ में प्रचंड दण्ड लेकर उसकी मोरड़ी पकड़ ली हो ॥३४३॥ राजा नल ने दया करके उसके समीप जाकर और उसे कंधे पर रखकर दूर ले जाकर जैसे ही छोड़ना चाहा वैसे ही वह नाग बोला—॥३४४॥ ८१
१८२ कथासरित्सागर
१८२ कथासरित्सागर गणयित्वा दशायनि पदानि नय मामितः। ततः स प्रययावेव पदानि गणयन्नलः॥३४५॥ एकं द्वे त्रीणि चत्वारि पञ्च षट् सप्त शृण्वहे। अष्टौ नव दशेत्युक्तवन्तमुक्तिच्छलेन तम्॥३४६॥ नलं स्कन्धस्थितो नागो रुकाटान्ते ददंश सः। तेन ह्रस्वभुजः कृष्णो विरूपः सोऽभवत्क्षणम्॥३४७॥ ततोऽवतार्य स्कन्धात्तं स राजा पृष्टवानहिम्। को भवान् का कृता चेयं त्वया मे प्रत्युपक्रिया॥३४८॥ एतमब्रूषथ श्रुत्वा स नागः प्रत्युवाच तम्। राजन् कार्कोटनामानं नागराजमवेहि माम्॥३४९॥ दंशो गुणाय च मया दत्तस्ते तच्च वेत्स्यसि। गूढवासे च वैरूप्यं महतां कार्यसिद्धये॥३५०॥ गृहाण चाग्निशौचाख्यमिदं वस्त्रयुगं मम। अनेन प्रावृतेनैव स्वं रूपं प्रतिपत्स्यसे॥३५१॥ इत्युक्त्वा दत्ततद्वस्त्रयुगे कार्कोटके गते। नलस्तस्माद्वनाद् गत्वा क्रमेण प्राप कोशलान्॥३५२॥ कोशलाधिपतेस्तत्र ऋतुपर्णस्य भूपतेः। स ह्रस्वबाहुनामा सन् सूदत्वं शिश्रिये गृहे॥३५३॥ भोजनानि च यत्तस्य चक्रे दिव्यरसानि सः। तेन प्रसिद्धिं प्रापात्र रसविज्ञानतस्तथा॥३५४॥ तत्रस्थे ह्रस्वबाह्वाख्ये नले तस्मिन् कदाचन। विदर्भराजचारपु षेष्वेकोऽत्र किलाययौ॥३५५॥ ह्रस्वबाहुरितीहास्ति स्वविचारबहिर्ययोः। नलतुल्यो नलः सूद इति चारोऽत्र सोऽशृणोत्॥३५६॥ नलं सम्भाव्य तं बुद्ध्या चास्थाने नृपतेः स्थितम्। युक्त्या स तत्र गत्वैतां पपाठार्या प्रभूदिताम्॥३५७॥ 'बालां बने प्रसुप्तां नृशंस सन्त्यज्य कुमुदिनीकान्ताम्। प्राप्यवाम्बरखण्डं चन्द्रावुदयः क्व यातोऽसि'॥३५८॥ तच्छ्रुत्वोन्मत्तवाक्यार्थं तमन्या अवजज्ञिरे। सूदच्छद्मस्थितस्त्वत्र स नलः प्रत्युवाच तम्॥३५९॥
नवम लम्बक १८१
नवम लम्बक १८१ 'यहाँ से और दस पग आगे ले जाकर मुझे छोड़ो। तब नल एक दो तीन चार, पाँच छह सात इस प्रकार गिनकर दस पग आगे गया। जब राजा ने दस (दश)१ कहा तब छल से कंधे पर बैठे हुए उस नाग ने ललाट के पास उसे डँस लिया। इस कारण वह राजा छोटे हाथोंवाला काला और विरूप हो गया—॥३४५-३४७॥ तब राजा ने क्रोध से नाग को उतारकर कहा-'तू कौन है और तूने मेरे साथ यह क्या प्रत्युपकार किया है ? ॥३४८॥ नल के यह वचन सुनकर वह नाग उत्तर देता हुआ बोला-'राजन्, मुझे नागों का राजा कर्कोटक नाम से जानो। गुप्त निवास करने में रूप का बदल जाना महान् पुरुषों की कार्यसिद्धि के लिए ही होता है। इसलिए, मैंने तुम्हारे ललाट पर डँसा है, जो तेरे काम के लिए ही होगा॥३४९-३५०॥ और, यह अग्निशौच नाम के वस्त्र का जोड़ा लो। इसे ओढ़ते ही तुम अपने पूर्वरूप में आ जाओगे' ॥३५१॥ ऐसा कहकर और उसे शौचवस्त्र का जोड़ा देकर, कर्कोटक चला गया। उसके चले जाने पर, नल क्रमशः कोशल देश में जा पहुँचा ॥३५२॥ वहाँ जाकर वह नल कोशलराज ऋतुपर्ण के घर में ह्रस्वबाहु के नाम से पाचक (रसोइया) बन गया ॥३५३॥ वह जो दिव्य रसवाले भोजन बनाता था और रथ चलाने की विशेषता रखता था इससे उसने उस राज्य में पर्याप्त यश प्राप्त कर लिया॥३५४॥ जब कि नल ह्रस्वबाहु के नाम से वहाँ नौकरी कर रहा था इसी बीच विदर्भ राज्य के गुप्तचरों में से एक वहाँ आया ॥३५५॥ निर्दिष्ट चिह्नों से वह नल को जानकर और उसे राजसभा में बैठे हुए देखकर वह गुप्तचर युक्ति से वहाँ जा पहुँचा। वहाँ जाकर उसने अपने स्वामी भीम द्वारा कही हुई आर्या पढ़ी—॥३५६ ३५७॥ 'वन में सोई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर अम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र तू अदृश्य होकर कहाँ चला गया गया ? ॥३५८॥ उसे सुनकर सभासदों ने उसे पागल का प्रलाप समझा किन्तु रसोइए के वेश में प्रच्छन्न नल ने उसे उत्तर दिया ॥३५९॥ १ संस्कृत में 'दन्' धातु से लोट् मध्यम पुरुष एकवचन में निष्पन्न 'दश' का अर्थ होता है—डँसो। संख्या के अर्थ में दश—दस के लिए प्रसिद्ध है। —अनु
१८४ कथासरित्सागर
१८४ कथासरित्सागर शीर्णोऽम्बरेकदेशश्चन्द्र प्राप्यायमण्डल प्रविष्टन् । कुमुदिन्या यददृश्यो जातस्तत्का नुहासता तस्य' ॥३६०॥ एतद्द्रुततरं श्रुत्वा सत्य सम्भाव्य स नलम्। विपद्युद्भूतवैरूप्यं धारः सोऽथ ययौ ततः ॥३६१॥ विदर्भान् प्राप्य भीमाय राज्ञे भार्यायुताय सः। दमयन्त्यै च तत्सर्वं दृष्टश्रुतमवर्णयत् ॥३६२॥ ततोऽथ दमयन्ती सा पितरं स्वैरमब्रवीत्। निस्सन्देहं स एवार्यपुत्रः सूदमिषे स्थितः ॥३६३॥ तत्तदानयने युक्तिर्ममता क्रियतामिह। ऋतुपर्णस्य नृपतेस्तस्य दूतो विसृज्यताम् ॥३६४॥ प्राप्तमात्रश्च स भूपमेवं तत्र ब्रवीतु सः। गतः क्वापि नलो राजा प्रवृत्तिर्नास्य बुध्यते ॥३६५॥ तत्प्रातः कुरुत भूयो दमयन्ती स्वयंवरम्। अतोऽद्यैव विदर्भेषु शीघ्रमागम्यतामिति ॥३६६॥ ततः श्रुतैतद्वार्तेन स रथज्ञानिना नृपः। एकाहेनार्यपुत्रेण साक ध्रुवमिहेष्यसि ॥३६७॥ एवं सपितृकालोच्य सन्दिश्य च तथैव सा। पर्णादान् व्यसृजद्दूतं दमयन्ती यथोचितम् ॥३६८॥ तेनर्तुपर्णो गत्वा स तथैवोक्तः समुत्सुकः। जगाद सूदरूपं तं प्रणयात् पार्श्वगं नलम् ॥३६९॥ ह्रस्वबाहो रथज्ञानं ममास्तीत्यवदद् भवान्। तत्प्रापय विदर्भान् मामद्यैबोत्सहते यदि ॥३७०॥ तच्छ्रुत्वैव नलो बाढं प्रापयामीत्युदीर्य सः। गत्वा वराश्वान् संयोज्य सज्जं चक्रे रथोत्तगम् ॥३७१॥ स्वयंवरप्रवादोऽयं जाने मत्प्राप्तये तया। कृतो न दमयन्ती तु सा स्वप्नेऽपीदृशी भवेत् ॥३७२॥ तत्तत्र तावद् गच्छामि पश्यामीति विचिन्त्य सः। राज्ञस्तस्यर्तुपर्णस्य सज्जं रथमुपानयत् ॥३७३॥ आरूढे च नृपे तस्मिंस्तं सबाहयितुं रथम्। नलः प्रवृत्ते तादग्र्जबजबैगेन रहसा ॥३७४॥
नवम लम्बक ४८५
नवम लम्बक ४८५ 'क्षीण चन्द्रमा अम्बर (वस्त्र और आकाश) के एक देश से दूसरे (मुख-मंडल) मंडल में जाकर यदि कुमुदिनी के लिए अदृश्य हो जाता है, तो उसमें उसकी क्या क्रूरता है ? ॥३६०॥ यह उत्तर सुनकर और उसे विपत्ति के कारण विक्लव रूपवाला नल समझकर वह गुप्तचर वहाँ से चला गया ॥३६१॥ और विदर्भ की राजधानी में पहुँचकर उसने महारानी के सहित राजा भीम तथा दमयन्ती से जो कुछ उसने देखा-सुना था सब कह सुनाया ॥३६२॥ यह सुनकर दमयन्ती एकान्त में अपने पिता से बोली—'पाचक के रूप में छिपा हुआ यह अवश्य ही मेरा पति है ॥३६३॥ अब उसके यहाँ बुलाने में मेरी युक्ति कीजिए। उस राजा ऋतुपर्ण के पास दूत भेजिए, वह दूत राजा ऋतुपर्ण के पास पहुँचते ही राजा से यह कहे कि राजा नल कहीं चला गया है। उसका पता अब नहीं लग रहा है ॥३६४-३६५॥ अब दमयन्ती प्रातःकाल ही फिर स्वयंवर करेगी। इसलिए, आप स्वयंवर के लिए आज ही विदर्भ देश में पधारें ॥३६६॥ यह सुनकर वह राजा रथ चलाने में कुशल आर्यपुत्र (नल ) के साथ एक दिन में अवश्य ही यहाँ आ जायगा' ॥३६७॥ पिता के साथ उसने इस प्रकार विचार कर और तदनुसार उसने कोसलराज के पास उपयुक्त दूत को भिजवाया ॥३६८॥ उस दूत ने राजा ऋतुपर्ण को उसी प्रकार जाकर सन्देश दे दिया। उत्सुक राजा ऋतुपर्ण ने भी सूत के रूप में अपने पास में स्थित नल से कहा ॥३६९॥ हे ह्रस्वबाहु तुमने मुझसे कहा था कि मुझे रथ चलाने का ज्ञान भी है, तो यदि तुम्हें उत्साह है, तो मुझे आज ही विदर्भ देश की राजधानी में पहुँचा दो ॥३७० ॥ यह सुनकर नल ने कहा 'ठीक है पहुँचाता हूँ। इस प्रकार कहकर और अच्छे-अच्छे घोड़ों को जोड़कर उसने एक उत्तम रथ तैयार किया ॥३७१॥ यह स्वयंवर का प्रचार, मेरी प्राप्ति के लिए एक बहाना मात्र है, ऐसा मैं समझता हूँ क्योंकि दमयन्ती तो स्वप्न में भी ऐसी नहीं है (कि वह पुनः स्वयंवर करे) ॥३७२॥ तो अब वहाँ जाकर देखता हूँ—ऐसा सोचकर उसने राजा ऋतुपर्ण के लिए, सजा- [L29: सजाया तैयार रथ ला दिया ॥३७३॥ राजा के रथ पर आरूढ हो जाने पर नल ने गरुड को जीतनेवाले वेग से रथ को हाँका ॥३७४॥
१८४ कथासरित्सागर
१८४ कथासरित्सागर रथवेगच्युतं वस्त्रं प्राप्तं रथविधारणम्। ब्रुवाणमथ मार्गे तमृतुपर्णं नलोऽब्रवीत् ॥३७५॥ राजन् क्व तव तद्वस्त्रमनेनैव क्षणेन हि। बहूनि योजनान्येव व्यतिक्रान्तो रथस्तव ॥३७६॥ श्रुत्वैतदृतुपर्णस्तमवादीदङ्ग देहि मे। रथज्ञानमिदं तुभ्यमक्षज्ञानं ददाम्यहम् ॥३७७॥ येन वश्या भवन्त्यक्षाः संख्याज्ञानं च जायते। सम्प्रत्येव च पश्यात्र वदामि प्रत्ययं तव ॥३७८॥ दृश्यतेऽग्रे तरोर्योऽस्य संख्यामेतस्य तेऽधुना। वच्म्यहं फलपर्णानां गणयित्वा च पश्य ताम् ॥३७९॥ इत्युक्त्वा फलपर्णानि यावन्त्येव जगाद सः। नलेन गणितान्यासंस्तावन्त्येवात्र शाखिनि ॥३८०॥ ततो नलो रथज्ञानमृतुपर्णाय तद्ददौ। ऋतुपर्णोऽप्यदादक्षज्ञानं तस्मै नलाय तत् ॥३८१॥ परीक्षते स्म तज्ज्ञानं नलो गत्वाऽपरे तरौ। सम्यक् च बुबुधे संख्यां पत्रादिष्वत्र तेन सः ॥३८२॥ ततो हृष्यति यावत् स तावत्तस्य शरीरतः। निरगात् पुरुषः कृष्णस्तं स कोऽसीति पृष्टवान् ॥३८३॥ सोऽहं कलिः शरीरात्त्वां दमयन्तीवृतस्य ते। ईर्ष्याया प्राविशं तेन भ्रष्टा द्यूतेन ते श्रियः ॥३८४॥ ततस्त्वां दशतस्तेन कार्कोटेन तदा वने। न दग्धस्त्वमहं त्वेव पश्य दग्धस्त्वयि स्थितः ॥३८५॥ मिथ्या परोपकारो हि कृतः स्यात् कस्य शर्मणे। तद्गच्छाम्यवकाशो हि नास्त्यन्येषु न च त्वयि ॥३८६॥ इत्युक्त्वा स कलिस्तस्य तिरोऽभूत् सोऽपि तत्क्षणम्। जातधर्ममतिः प्राप्ततेजाः प्राग्वद्बभूव सः ॥३८७॥ आरुह्य वाह्य रथं तस्मिन्नेवाह्नि तं जवात्। विदर्भमृतुपर्णं तं प्रापयामास भूपतिम् ॥३८८॥ स चोपहस्यमानोऽत्र पृष्टागमनकारणः। ऋतुपर्णो जगौ राजगृहासन्ने समावसत् ॥३८९॥
नवम लम्बक १८७
नवम लम्बक १८७ रथ के वेग से राजा ऋतुपर्ण का वस्त्र गिर गया। तब रथ को रोकने के लिए कहते हुए राजा ऋतुपर्ण से नल ने कहा कि 'राजन् तुम्हारा वह वस्त्र कहाँ गिरा यह पता नहीं लगेगा क्योकि यह रथ अनेक योजन आगे आ चुका है' ॥१७५-१७६॥ यह सुनकर राजा ऋतुपर्ण नल से बोला—'तू मुझे रथ चलाने की क्रिया बता। मैं तुझे पाशा फेंकने का तरीका बताता हूँ और उसका ज्ञान भी अभी कराता हूँ जिससे पासे अपने वश में हो जाते हैं और संख्या भी मालूम हो जाती है' ॥१७७-१७८॥ 'यह सामने जो वृक्ष दीख रहा है उसके पत्तों और फलों को गिनकर मैं तुम्हें बताता हूँ और फिर तुम भी उसे गिनकर देखो' ॥१७९॥ ऐसा कहकर ऋतुपर्ण ने उस पेड़ के जितने पत्ते और फल बताये वे नल के गिनने पर उतने ही निकले ॥१८०॥ तब राजा नल ने ऋतुपर्ण को रथ-संचालन-विद्या बता दी और राजा ऋतुपर्ण ने उसे अक्ष-विद्या (द्यूत-कला) ॥१८१॥ तब नल ने उस विद्या की परीक्षा एक दूसरे पेड़ पर की और उसने उसे भली भाँति सही पाया ॥१८२॥ यह जानकर राजा नल जब प्रसन्न हुआ तब उसके शरीर से एक काला पुरुष निकला। राजा ने उससे फिर पूछा—'तू कौन है ॥१८३॥ वह बोला—'मैं कलियुग हूँ। दमयन्ती के द्वारा तेरा वरण करने पर मैं ईर्ष्या से तेरे शरीर में घुसा। इसी कारण जुआ खेलने से तेरी सम्पत्ति नष्ट हो गई ॥१८४॥ तदनन्तर, वन में तुझ डँसते हुए कर्कोटक ने तुझे नहीं डँसा बल्कि मुझे डँसा। देख यह जला हुआ मैं तेरे सामने खड़ा हूँ ॥१८५॥ व्यर्थ ही दूसरे का अपकार करना किसके लिए कल्याणकारी होता है। इसलिए, बेटा अब मैं जाता हूँ। अब तुमरो में मेरे रहने का स्थान नहीं है' ॥१८६॥ ऐसा कहकर वह कलि अदृश्य होगया और नल भी उसी समय पहले के समान धर्मात्मा और तेजस्वी हो गया ॥१८७॥ तब नल ने आकर और रथ पर बैठकर वेग से उसी दिन उस राजा ऋतुपर्ण को विदर्भ देश में पहुँचा दिया ॥१८८॥ वह राजा ऋतुपर्ण वहाँ के लोगो द्वारा हँसी का पात्र बनाया जाता हुआ वहीं राजभवन के पास ठहरा ॥१८९॥
१८८ कथासरित्सागर
१८८ कथासरित्सागर प्राप्तं तं तत्र बुद्ध्वा सा श्रुताश्वजर्यरथस्वना ॥ दमयन्ती जहर्षान्तः सम्भावितनलागमा ॥ ३९० ॥ विससर्जाथ सा तन्मन्वेष्टुं चेटिकां निजाम् । सा चान्विष्यागता चेटी तामुवाच प्रियोत्सुकाम् ॥ ३९१ ॥ देवि गत्वा मयान्विष्टमेष यः कोशलेश्वरः । स्वयंवरप्रवादं तं मिथ्या श्रुत्वा किलागतः ॥ ३९२ ॥ आनीतो रथवाहेन सूदेन ह्रस्वबाहुना । एकेनैव दिनेनाश्व रथविज्ञानशालिना ॥ ३९३ ॥ स च तत्सूपशालायां गत्वा सूदो मयेक्षितः । कृप्णवर्णो निरुपमश्च प्रभावः कोऽपि तस्य तु ॥ ३९४ ॥ विक्षिप्तमेव यत्तस्य पानीयं परपूरितम् । काष्ठान्यनर्पिताग्नीनि स्वयं प्रज्वलितानि च ॥ ३९५ ॥ क्षणाच्च भोजनैस्तैस्तन्निष्पन्नं दिव्यमेव च । एतद्बुद्ध्वा महाश्चर्यं ततस्त्वहमिहागता ॥ ३९६ ॥ एतच्चेटीमुखाच्छ्रुत्वा दमयन्ती व्यचिन्तयत् । वश्याग्निवरुणः सूदो रथविद्यारहस्यवित् ॥ ३९७ ॥ आर्यपुत्रो भवेत्येष गतो वैरुप्यमन्यथा । जाने मद्धिप्रयोगात्तं जिज्ञासुरुह रूप्यमूमू ॥ ३९८ ॥ इति सङ्कल्प्य युक्त्वा स्त्रीं राहू चेट्या तयैव सा । तस्यान्तिकं दर्शयितुं प्राहिणोद्दारकावुभौ ॥ ३९९ ॥ स तौ निजशिशू बुद्ध्वा कृत्वा धाङ्क तरुश्चिरम् । गलद्वाराप्रवाहेण तूष्णीमरुददक्षुणा ॥ ४०० ॥ ईदृशावेव मे बालो मातामहगृहे स्थितौ । जातं मे तत्स्मृतैर्वृत्तभित्युवाच स चेटिकाम् ॥ ४०१ ॥ सा धिच्या सहो गत्वा चेटी सर्वं शशंस तत् । दमयन्त्यै ततः सापि जातास्था सुतरामभूत् ॥ ४०२ ॥ अपरेद्युस्ततः सा प्रात स्वचेटीमादिदेश सा । गत्वा तमृतुपर्णस्य सूतं मद्वचनाद्वद ॥ ४०३ ॥ श्रुतं मया यदुद्भ्रान्तो सूदो नान्यतोऽस्ति सूपकृत् । तन्ममार्थ स्वयागत्य व्यञ्जनं साध्यतामिति ॥ ४०४ ॥
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आश्चर्यजनक रथ की ध्वनि को सुनकर नल के आने की सम्भावना करती हुई दमयन्ती हृदय से प्रसन्न हुई ॥३९०॥ तदनन्तर उसने वास्तविक बात जानने के लिए उसके पास एक दासी को भेजा। वह दासी सब जानकर नल के लिए उत्सुक दमयन्ती से बोली—॥३९१॥ हे देवि मैंने जाकर पता लगाया कि यह राजा ऋतुपर्ण तेरे झूठे स्वयंवर का निमन्त्रण पाकर आया है। उसे ह्रस्वबाहु नाम का सारथी एक दिन में ही यहाँ ले आया है। क्योंकि वह रथ-संचालन-विज्ञान का विशेषज्ञ है॥३९२-३९३॥ तो मैंने रसोईघर में जाकर उस रसोइए को देखा। वह काले रंग और विकृत रूप का कोई व्यक्ति है॥३९४॥ उसका चमत्कार मैंने देखा कि उसने चावलों में पानी नहीं डाला था किन्तु उसमें स्वयं पानी आ गया लकड़ियों में आग न लगाने पर भी लकड़ियाँ अपने-आप जल उठीं और पलक मारते ही उसने अनेक प्रकार के दिव्य भोजन तैयार कर दिये। यह सब देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैं यहाँ आई ॥३९५-३९६॥ दासी के मुँह से यह सब सुनकर दमयन्ती सोचने लगी— अग्नि और जल जिसके वश में हों और जो रथ-विद्या के रहस्य को जानता है, आर्यपुत्र (नल) इतना विकल कैसे हो गया। मैं समझती हूँ मेरे वियोग से पीड़ित होने के कारण ऐसा हुआ होगा। तो मैं अब उसी से पूछती हूँ ॥३९७-३९८॥ ऐसा सोचकर दमयन्ती ने उस दासी के साथ आने वाले बच्चों को नल के पास भेजा ॥३९९॥ उन्हें देखकर और दोनों बच्चों को गोद में रखकर बहुत समय तक धारा प्रवाह आँसू बहाते हुए नल मौन रोता रहा ॥४००॥ कुछ समय बाद वह चेटी (दासी) से बोला—ऐसे ही मेरे दो बच्चे अपने नाना के घर में हैं। उन्हें स्मरण करके मुझे दुःख हुआ ॥४०१॥ तब उस दासी ने उन बच्चों के साथ लौटकर दमयन्ती को सारा समाचार सुनाया। तब दमयन्ती का भी पूर्ण विश्वास हो गया ॥४०२॥ दूसरे दिन प्रातःकाल उसने दासी को आज्ञा दी कि तू जाकर राजा ऋतुपर्ण के रसोइए से कह दे—॥४०३॥ कि मैंने सुना है तेरे समान दूसरा कोई रसोइया नहीं है अतः आज तू मेरे यहाँ आकर भोजन बना ॥४०४॥ ८२
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर तथेति स तदा गत्वा नलशङ्कया तयार्थितः । ऋतुपर्णमनुज्ञाप्य दमयन्तीमुपाययौ ॥४०५॥ सत्यं ब्रूहि नलो राजा यदि त्वं सूदरूपभृत् । चिन्ताब्धिमग्नां पारं मां प्रापयाश्वेत्युवाच सा ॥४०६॥ तच्छ्रुत्वा स नलः स्नेहहर्षदुःखप्रपाकुलः । अवाङ्मुखः प्राप्तकालं सामुवाचाथगद्गदम् ॥४०७॥ स एवास्मि नलः सत्यं पापः कुलिशकर्कशः । त्वां संतापयता येन व्यामोहादनलायितम् ॥४०८॥ इत्युक्तवान्स पृष्टोऽभूद्दमयन्त्या तया नलः । यद्येवं तद्वैरूप्यत्वं कथं प्राप्तो भवानिति ॥४०९॥ ततः स तस्यै स्वोदन्तं नलः कृत्स्नमवर्णयत् । कार्कोटकस्यादारभ्य कलिंनिर्गमनावधिम् ॥४१०॥ तदैव चाग्निशौचं तद्दत्तं कार्कोटकेन सः । प्रावृत्य वस्त्रयुगलं रूपं स्वं प्रत्यपद्यत ॥४११॥ दृष्ट्वा नलं पुनरवाप्तनिजाभिरामरूपं तमाशु विकसद्वदनारविन्दा । मत्राश्रुभिः शमितदुःखदवानलेव हर्षं कमप्यनुपमं दमयन्त्यवाप ॥४१२॥ बुद्धा च तत्परिजनात्प्रमदप्रवृत्तावागत्य तत्र सहसा स विदर्भराजः । भीमो नलं समभिनन्द्य कृतानुम्पूजं महोत्सवमयं स्वपुरं चकार ॥४१३॥ हृष्टता हृदि भीमभूपुजा कृतसत्कृत्युपचारसत्क्रियः । ऋतुपर्णनृपोऽपि तं नलं प्रतिपूज्याथ जगाम कोशलान् ॥४१४॥ अथ निषधनरेश्वरो निजं कलिघोरात्म्यविजृम्भितं नलः । श्वशुराय स तत्र वर्णयन्नवसत् प्राप्तसमासक्तं सुखम् ॥४१५॥ गत्वाल्पैरेव दिनैस्ततः स निषधान्सैन्यैः सह स्वाशुरै- रद्यामानजितं विधाय विनतं तं पुष्कराख्यं पुनः । धर्मात्मा धृतसंविभागमगुजं देहाद् गतद्वापरं राज्यं स्वं दमयन्त्यवाप्तिसुखितो भेजे यथावन्नलः ॥४१६॥ इति स व्याख्याय कथां नगरे तारापुरे द्विजः सुमनाः । राजसुतां बन्धुमतीं प्रोषितपतिकांमुवाच तां भूयः ॥४१७॥ एवं भुवि महान्तो विपद्य दुःखं भजन्ति कल्याणम् । अनुभूयास्तमनं किल दिनकृत्प्रमुखा व्रजन्त्युदयम् ॥४१८॥
नवम लम्बक १६१
नवम लम्बक १६१ 'ठीक है' ऐसा कहकर दासी द्वारा प्रार्थित किया गया पाचक, ऋतुपर्ण से आज्ञा लेकर दमयन्ती के पास आया ॥४५॥ तब उसे देखकर दमयन्ती बोली-रसोईए का रूप धारण किये हुए तुम यदि राजा नल हो, तो चिन्ता-समुद्र में डूबी हुई मुझे आज पार लगाओ' ॥४०६॥ यह सुनकर स्नेह दुःख और लज्जा से व्याकुल राजा नल नीचे मुंह किये हुए आँसुओं से दबे गले से अन्दर की बात बोला—॥४०७॥ 'हाँ मैं वही वज्र-सा कठोर पापी नल हूँ। तुम्हें सन्तप्त करते हुए मैंने नल होकर भी अनल (अग्नि) का काम किया है'॥४०८॥ इस प्रकार कहते हुए नल से दमयन्ती ने पूछा कि यदि ऐसा है, तो तुम इतने कुरूप कैसे हो गये ? ॥४०९॥ इस प्रकार पूछती हुई दमयन्ती को नल ने अपना पिछला सारा समाचार-कार्कोटक को आग से निकालने से लेकर कलियुग के शरीर से निकलने तक का-सुना डाला ॥४१०॥ और, उसी समय कार्कोटक के दिये हुए अग्नि से शुद्ध वस्त्रों को पहनकर वह नल फिर से अपने पुराने और वास्तविक रूप में आ गया ॥४११॥ पुनः अपने सच्चे रूप में आये हुये सुन्दर नल को देखकर खिले हुए कमल के समान मुख वाली दमयन्ती ने आँखों के आँसुओं से दुःख-दावानल के शान्त हो जाने पर अवर्णनीय आनन्द का अनुभव किया ॥४१२॥ नल के मिल जाने से अत्यन्त प्रसन्न सेवक-सेविकाओं द्वारा नल का सहसा प्रकट हो जाना जानकर, उस विदर्भराज भीम ने वहाँ आकर नल का समुचित अभिनन्दन और समुचित आदर सत्कार करके अपने नगर को महोत्ससमय बना दिया ॥४१३॥ तदनन्तर, मन-ही-मन हँसते हुए राजा भीम के द्वारा समुचित रूप से सत्कृत राजा ऋतुपर्ण भी नल को बधाई देकर कोशल देश को चला गया ॥४१४॥ इसके पश्चात् निषध देश के राजा नल ने कलियुग की दुष्टता के कारण होनेवाले उपद्रव को, राजा भीम को सुनाकर, अपनी प्राणप्यारी दमयन्ती के साथ वहीं सुखपूर्वक निवास किया ॥४१५॥ कुछ ही दिनों के अनन्तर धर्मात्मा राजा नल ने अपने श्वशुर की सेनाओं के साथ निषध देश में जाकर और अपने भाई पुष्कर को पाशों के विज्ञान से जीतकर उसे आज्ञाकारी बना लिया। देह से द्वापर के निकल जाने पर, पाश्चात हुए छोटे भाई पुष्कर को उसका अपना भाग देकर नल अपनी प्राणप्रिया दमयन्ती के साथ अपने राज्य का पुनः विधिवत् शासन करने लगा ॥४१६॥ तारापुर नगर में इस प्रकार कथा सुना कर ब्राह्मण सुमन ने प्रोषितपतिका राजकुमारी बन्धुमती से फिर कहा—॥४१७॥ 'हे राजपुत्री बड़े-बड़े लोग भी इस प्रकार का असह्य कष्ट भोगकर पुनः कल्याण प्राप्त करते हैं। सूर्य के समान प्रचंड तेजस्वी भी अस्त का अनुभव करके फिर उदय होते हैं ॥४१८॥
५९९ कथासरित्सागर
५९९ कथासरित्सागर तस्मात्त्वमपि तमाप्स्यसि पतिमनेधे प्रोषितागत मचिरात् । कुरु धृतिमरति परिहर विहर च पतिकामनातामे ॥४१९॥ इति त द्विजमुखतमुक्तवाक्य बहुनामभ्यर्च्य धनेन सवॄगुभ सा । अवलम्ब्य धृति प्रतीक्षमाणा दयित व धुमती स्वमन्न तस्थौ ॥४२०॥ अल्पैरेव च तस्या दिनै स पतिरामयो महीपालः । देशान्तरे स्थितां ता जननीमादाय पितृसहित ॥४२१॥ आगत्य द्यामृतांशु पार्वण इव वारिराशिजलस्थलमीम् । जननमहोत्सबदायी बन्धुमतीं नन्दयामास ॥४२२॥ अथ तत्र तया सहितस्तत्पित्रा पूवदत्तराज्यधुरः । स महीपालो बुभुजे राजा सञ्चीप्सितान् भोगान् ॥४२३॥ इत्यारममन्त्रिणरुभूतिमुखात्निशम्य चित्रां कथामनुपमामनुरागरम्याम् । रामासक्त स नरवाहनदत्तदेवो वत्सेश्वरस्य तनयो भृशमभ्यतुष्यत् ॥४२४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरेऽलङ्कारवतीसम्बके षष्ठस्तरङ्गः । समाप्तश्चायमलङ्कारवतीसम्बको नवमः ।
नवम लम्बक ६१३
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इसलिए हे सदाचारिणी तू भी यात्रा से लौटने पर अपने पति को अवश्य प्राप्त करेगी। धैर्य रख उद्विग्नता छोड़। और, पति-प्राप्ति की कामना पूर्ण होने से आनन्द प्राप्त कर ॥४१९॥ इस प्रकार, कहते हुए उस ब्राह्मण को बहुत धन वस्त्र आदि से सत्कृत कर वह सद्गुणोपेता वसुमती धैर्य-धारण करके अपने पति के आगमन की प्रतीक्षा में पिता के घर में निवास करती थी ॥४२०॥ कुछ ही दिनों के पश्चात् उसका पति महीपाल दूसरे देश में रहनेवाली अपनी माता को साथ लेकर पिता-सहित पुनः अपनी राजधानी (तारापुर) में लौट आया ॥४२१॥ प्रजा के नेत्रों को आनन्द देनेवाला महीपाल ने अपनी पत्नी वसुमती को इस प्रकार आनन्दित किया जैसे पूर्णिमा का चन्द्र समुद्र की लक्ष्मी को आनन्दित करता है॥४२२॥ तदनन्तर महीपाल वसुमती के साथ उसके पिता द्वारा दिये गये राज्य के भार को वहन करता हुआ और अभीष्ट भोगों को प्राप्त करता हुआ अपनी पृथ्वी का शासन करने लगा ॥४२३॥ वत्सेश्वर उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त अपनी पत्नियों के साथ मन्त्री मरुभूति के मुँह से इस विचित्र और राग-मनोहर कथा को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥४२४॥
महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती-लम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त नवम अलंकारवती-लम्बक समाप्त
शक्तियशो नाम दशमो लम्बकः
शक्तियशो नाम दशमो लम्बकः १५ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमम्बरास्योत्सना स्फुरा किस कृपामृत हरमुखाभ्युषरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति ये विगतविघ्नरूढ्यर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं मूर्ध्नि भवप्रसादेन ते ॥ प्रथमस्तरङ्गः मङ्गलाचरणम् अवारणीय¹ रिपुभिर्वारणीयं करं नुमः। हेरम्बस्य ससिन्दूरमसि दूरमपच्छिदम् ॥१॥ पायाद्वः पुरदाहाय शम्भोः सन्नद्धतं शरम्। समं व्यग्रेषु नेत्रेषु तृतीयमधिकं स्फुरत् ॥२॥ रक्तारुणा नृसिंहस्य कुटिला विद्रिषो वधे। नखश्रेणी च दृष्टिश्च निहन्तु दुरितानि वः ॥३॥ नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) एवं वत्सेश्वरसुतः कौशाम्ब्यां सचिवैः सह। नरवाहनदत्तः स तस्थौ भार्यासखः सुखी ॥४॥ एकदा चास्थिते तस्मिन्नास्थानस्थस्य तत्पितुः। वत्सेश्वरस्य विज्ञप्त्यै तत्रासीद् वणिगागमौ ॥५॥ स रत्नदत्तनामा तं प्रतीहारनिवेदितः। प्रविश्य नत्वा राजानं वणिगेव व्यजिज्ञपत् ॥६॥ अत्र मङ्गले विरोधाभासोऽलङ्कारः। यथा—अ-वारणीयम् वारणीयम् स-सिन्दूरम् मसिदूरम्—इति। अत्र वारणस्य = गजस्येदं वारणीयम्=गजसम्बन्धि। न वारणीयम् अवारणीयम् अप्रतिरोध्यम्। सिन्दूरेण सहितं ससिन्दूरम्—सिन्दूरलिप्तम् असि-ऋत दूरं = दूरे इत्यर्थः, ईदृशं करं—शुण्डादण्डं नुमः=नमामि ।
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६१६ कथासरित्सागर
६१६ कथासरित्सागर भारवाहककथा नाम्ना वसुधरो देव दरिद्रोऽस्तीह भारिकः। अकस्माच्च ददर्शायन्निषण्णश्च स दृष्टवान् ॥७॥ कौतुकाच्च गृहं नीत्वा यथेष्टं पानभोजनम्। दत्त्वा स क्षीवतां नीत्वा मया पृष्टोऽब्रवीदिदम् ॥८॥ लब्धं राजकुलद्वारात् सरत्नं कटकं मया। उत्पाद्य रत्नमेकं च ततो विक्रीतवानहम् ॥९॥ तच्च दीनारलक्षण मूल्येन वणिजो मया। दत्तं हिरण्यगुप्तस्य तेनाद्याहं सुखं स्थितः ॥१०॥ इत्युक्त्वा दर्शितं तेन देवनामाङ्कितं मम। कटकं यत्ततो देव विज्ञाप्तोऽद्य मया प्रभुः ॥११॥ एतच्छ्रुत्वा स वत्सेशस्तत्रानाययति स्म तौ। भारिकं तं सबलयं सरत्नं वणिजं च तम् ॥१२॥ हन्त स्मृतं प्रकोष्ठान्मे भ्रष्टमेतत्पुरभ्रमे। इति तत्कटकं दृष्ट्वा स राजाभिदधे स्वयम् ॥१३॥ निघृष्टं राजनामाङ्कं लब्ध्वा किं कटकं त्वया। इति पृष्टोऽथ सम्यक् स राजाग्रे भारिकोऽभ्यधात् ॥१४॥ भारजीवी कुतो वेद्मि राजनामाक्षराण्यहम्। दारिद्र्यमुद्गवेनेदं सम्भ्रमात् स्वीकृतं मया ॥१५॥ इत्युक्तं तेन रत्नार्थमाक्षिप्तः सोऽब्रवीद् वणिक्। प्रसह्य१ मूल्येन मया गृहीतं रत्नमापणे ॥१६॥ न चास्य राजाभिज्ञानमस्ति तन्मयमुच्यत३। मूल्यात् पञ्चसहस्री तु नीतानेन परं स्थितम् ॥१७॥ एतद्धिरण्यगुप्तस्य वचो यौगन्धरायणः। श्रुत्वा तत्र स्थितोऽवादीन्नात्र दोषोऽस्ति कस्यचित् ॥१८॥ दरिद्रस्यालिपिज्ञस्य भव्यतां भारिकस्य विभो। दारिद्र्यात् क्रियते चौर्यं सर्व्वं केनोज्झितं पुनः ॥१९॥ १ 'मूल्येना प्रसह्य मया' —इति पुस्तकान्तरपाठः । २ 'न चास्ति' इति पुस्तकान्तरपाठः । ३ 'तदयमुच्यते' —इति पुस्तकान्तरपाठः ।
दशम लम्बक १९७
दशम लम्बक १९७ एक भारवाहक (मजदूर) की कथा महाराज इस नगरी में वसुंधर नाम का एक दरिद्र भारवाहक है। आज वह अकस्मात् ही लेता-देता और खाता-पीता दीखता है॥७॥ एक बार उसकी इस स्थिति को जानने की इच्छा से मैंने उसे खूब खिला पिलाकर और नशे में मस्त बनाकर पूछा तो उसने यह बताया—॥८॥ 'मैंने राजभवन के द्वार पर रत्नों से भरा एक कंकण (हाथ का आभूषण) पाया और उसमें से एक रत्न निकालकर मैंने बेच दिया ॥९॥ उस रत्न को मैंने हिरण्यगुप्त नामक जौहरी के पास एक लाख दीनार मूल्य पर बेचा। इसी कारण मैं आनन्द कर रहा हूँ ॥१० ॥ ऐसा कहकर उसने आपके नाम से अंकित उस कंकण को मुझे दिखाया इसीलिए मैंने महाराज से निवेदन किया है॥११॥ यह सुनकर मलयराज ने कड़े के साथ उस भारवाहक (मजदूर) को और रत्न के साथ साथ हिरण्यगुप्त वैश्य को वहाँ बुलवाया ॥१२॥ और, उस कंकण को देखकर राजा ने अपने-आप ही कहा— ओह ! अब स्मरण आ गया वह कंकण मेरे नगर भ्रमण करते समय हाथ से निकलकर गिर गया था' ॥१३॥ तब सभासदों ने उस भारवाहक से राजा के सामने ही पूछा कि 'राजा के नाम खुदे हुए इस कंकण को तूने कहाँ से चुराया ? तब वह बोला— बोझा ढोकर जीवन निर्वाह करनेवाला मैं राजा के नाम के अक्षर को कैसे जान सकता हूँ? दरिद्रता के दुःख से जले हुए मैंने इस ल लिया ॥१४ १५।। भारवाहक के ऐसा कहने पर, रत्न खरीदने के अपराधी हिरण्यगुप्त ने कहा 'मैंने बाजार में बिना जोर दबाव के अधिक मूल्य देकर इस रत्न को इससे खरीदा है' ॥१६॥ इस रत्न पर राजा का कोई चिह्न नहीं है। इसलिए, मैंने खरीदा और इसके मूल्य के रूप में पाँच हजार रुपये मुझमें लिये ॥१७॥ हिरण्यगुप्त का यह वचन सुनकर वहीं बैठा हुआ राजमंत्री पीताम्बरायण बोला— 'इस विषय में किसी का दोष नहीं है। दरिद्र और निरक्षर भारवाहक का क्या कहा जा सकता है? दरिद्रता के कारण ही चोरी की जाती है। फिर मिले हुए धन को किसने छोड़ा है ? ॥१८ १९॥ ८८
१०८ कथासरित्सागर
१०८ कथासरित्सागर मुख्येन रत्नग्राही च न वाच्यो वणिगप्यसौ। एतन्महामन्त्रिवचो वत्सराजो व्यधत्त तत्॥२०॥ गत्वा पञ्चमदर्शी च भारिकेषु व्यचीचतत्। हिरण्यगुप्ताद्वणिजो रत्नं तस्मात् स्वमानयत्॥२१॥ भारिष्वेकापरोन्मुक्तं गृहीत्वा कटकं निजम्। मुखाद्व्यपगते प्रीतो गम्भीरो गोप्यवाद् गुहम्॥२२॥ विन्ध्यस्थानी पापायमिति चानन्दितोऽभवत्। राज्ञस्तं च वणिजं भार्यार्थं तममानयत्॥२३॥ गगनस्थे तु राजान्नगतायाणगत्वा। अहो स्वामिनिष्ठानां प्राणोऽप्यर्थः परात्मनः॥२४॥ मयूरकथा अभून् मयूरस्तन् नगरे भारिकस्य यत्। गथादि वहिनान्गोष्प्रासुर पारमित्रतवे॥१॥ राज्ञस्तं च सभार्या च प्रत्यहं याज्ञभारकम्। वनगत्याय विप्राय गुणानि म्य कुटुम्बकम्॥ २॥ तस्य पाशा दूरे वनं दण्डारण्या गते। तत्पाश्चानुग मयान् न्चिामरुरागम् ॥ ३॥ ते भीताः पा य तं प्रीत्या सर्वे गृहीत्वा यथायथम्। ददृशा दन्दिनगद्वणो तथा प्रभाविते॥ ४॥ राज्जनस्य तद विप्र प्र- वयस्तः प्रधान्। अत्त तं मुनिशेषं पण्डिताया ददौ नृपः॥ ५॥ इत्येतदाख्यानम् ... इति ... च कृतज्ञः सतां भवतः ॥६॥ स राजा ते सभाग्यान् पश्यान् प्रादूत ततः। अथावदन्महामात्यो यौगन्धरायणः ॥७॥ स राजा स मुदे वाच्यं स्वार्थेऽप्युपेयते। लब्धः कथं महाराज मन्त्रिभिः कृतनिश्चयैः ॥८॥
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षष्ठ लम्बक १९९
षष्ठ लम्बक १९९
मूल्य देकर रत्न खरीदनेवाले वैश्य का भी इसमें क्या अपराध है। राजा उदयन ने मन्त्री की बातों का समर्थन किया ॥२०॥ और, भारवाहकद्वारा व्यय कर दिये गये पाँच हजार रुपया वैश्य को देकर उससे रत्न ले लिया और पाँच हजार रुपये खा जानेवाले मजदूर से कंकण लेकर राजा ने उसे मुक्त कर दिया। वह मजदूर भी अपने घर गया ॥२१ २२॥ यह रत्नदत्त—'विश्वासघाती और दुष्ट है' मन में इस प्रकार समझते हुए भी राजा ने प्रयोजनवश उसका सम्मान किया ॥२३॥ उन सब के चले जाने पर राजा के सम्मुख बैठा हुआ वसन्तक बोला—'ओह ! भाग्य से मारे हुए व्यक्तियों से मिला हुआ धन भी नष्ट हो जाता है' ॥२४॥ इस विषय में भद्रघट की भी इस भारवाहक के ही समान स्थिति हुई। सुनिए— भद्रघट की कथा पाटलिपुत्र नामक नगर में शुभदत्त नाम का एक लकड़हारा था। वह जंगल से लकड़ी काट कर लाता और उसे बेचकर अपने परिवार का पालन करता था ॥२५-२६॥ एकबार वह जंगल में दूर तक चला गया और उसने वैभवोप से वहाँ रहनेवाले और दिव्य वस्त्राभंकार धारण किये हुए चार यक्षों को देखा ॥२७॥ उन्हें देखकर डरे हुए शुभदत्त को उन (यक्षों) ने ऐसा-वैसा ही दरिद्र समझकर दया करके कहा—॥२८॥ हे भद्र तू यहाँ हमलोगों के पास सेवक होकर रह। हमलोग बिना किसी कष्ट के तेरे घर का निर्वाह करेंगे ॥२९॥ उनके इस प्रकार कहने पर शुभदत्त ने स्वीकार कर लिया और स्नान आदि कराने के कार्य से उनकी सेवा करने लगा ॥३०॥ तब भोजन का समय आने पर, भोजन के लिए बैठे हुए यक्षों ने उससे कहा कि इस सामने रखे भद्रघट से हमको भोजन थामो ॥३१॥ उस घट को अन्दर से सूना देखकर वह चुप खड़ा हुआ कुछ विस्मय करने लगा। तब वे यक्ष मुस्कराते हुए फिर उससे बोले—॥३२॥
शुभदत्त न वत्सि त्वं क्षिप हस्तं घटान्तरे । यथेष्टं लप्स्यसे सर्वं घटः कामप्रदो ह्यसौ ॥३३॥ तच्छ्रुत्वा प्रक्षिपत्यन्तं पाणिं यावद् घटान्तरे । तावदाहारपानादि कामितं दृष्टवानसौ ॥३४॥ १ शुभदत्तो ददौ तेभ्यो बुभुजे च स्वयं सह ॥३५॥ एवं परिचरन् यक्षान् भक्त्या भीत्या च सोऽन्वहम् । तस्थौ कुटुम्बचिन्तान्नः शुभदत्तस्तदन्तिके ॥३६॥ तत्कुटुम्बं च क्षुत्तार्तं स्वप्नादेशेन गुह्यकैः । आश्वासितं तत्प्रसादान्नभोते स्म ततश्च सः ॥३७॥ मासमात्रेण यक्षास्ते शुभदत्तं तमब्रुवन् । तुष्टाः स्मस्तेऽनया भक्त्या ब्रूहि किञ्चिद्ददाम ते ॥३८॥ तच्छ्रुत्वा स जगावैतांस्तुष्ट्रा स्वं यदि सत्यतः । एष भद्रघटस्ते मे युष्माभिर्दीयतामिति ॥३९॥ ततस्तमूचुर्यक्षास्ते नैनं शक्ष्यसि रक्षितुम् । भग्नः पलायते ह्येष तद्गृणीष्वापरं वरम् ॥४०॥ इत्युक्तोऽपि स यक्षैस्तैः शुभदत्तोऽपरं यदा । वरं नैच्छत्तदा तस्मै ते तं भद्रघटं ददुः ॥४१॥ ततः प्रणम्य तान् हृष्टो घटमादाय तं जगात् । गृहं स शुभदत्तः स्वं प्रापं तन्वितबान्धवः ॥४२॥ तत्र तस्माद्घटात्सर्व्वा भोज्यादि निवेश्य तत् । गुप्यर्थमश्मभाण्डेषु सोऽभुङ्क्त स्वजनैः सह ॥४३॥ भारमुक्तो भजत्भोगान्वानमत्तोऽथ जातु सः । कुतस्त्वैषा भोगश्रीरित्युपृच्छ्यत बन्धुभिः ॥४४॥ स व्यक्तमब्रुवन् मूढो गर्वोपस्तितकामदम् । गृहीत्वा घटकं स्कन्धे प्रारेभे यत् नतितुम् ॥४५॥ नत्यतस्तस्य च स्कन्धान्मदोद्रक्तस्खलद्गतः । स भद्रघटका यातः पतित्वा भुवि खण्डशः ॥४६॥ १ एतत्पद्यार्धं मूलपुस्तके त्रुटितमस्ति । २ मद्यमदमत्ततया स्खलितचरणस्येत्यर्थः ।