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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक १५५

नवम लम्बक १५५ तुमको राजा हुए जानकर, उसने मुझे कैसे भुला दिया यह सोचकर चिरदुःखिता माता क्रोध करके कभी तुम्हें शाप न दे दे ।।१३८।। माता और पिता से शापित व्यक्ति कभी सुख नहीं पाता इस सम्बन्ध में एक पुरानी कहानी कहता हूँ सुनो ।।१३९।। चक्र और खड्ग नामक वैश्यपुत्रों की कथा प्राचीन समय में चक्रपुर में चक्र नाम का एक वैश्य-पुत्र था। वह माता-पिता के द्वारा मना किये जाने पर भी उनकी इच्छा के विरुद्ध व्यापार के लिए सुवर्णद्वीप चला गया ।।१४०।। पाँच वर्षों में वहाँ से पर्याप्त द्रव्य उपार्जित करके लौटते हुए वह रत्नों से भरी नाव पर चढ़ा ।।१४१।। जब स्वदेश का किनारा कुछ ही शेष रह गया तब आकाश में सहसा आँधी-पानी की बौछार के साथ भारी बादल-दल उमड़ पड़ा ।।१४२।। यह माता-पिता की आज्ञा के विरुद्ध व्यापार करने क्यों गया मानों इसी क्रोध से समुद्र की ऊँची-ऊँची तरंगों ने उसकी नाव को तोड़-फोड़ डाला ।।१४३।। नाव में बैठे हुए अनेक व्यक्ति पानी में बह गये कितनों को मगर निगल गये और आयु शेष रहने के कारण लहरों ने चक्र को किनारे पर ला पटका ।।१४४।। किनारे पर बेहोश और असहाय पड़े हुए स्वप्न में जैसे उसने हाथ में फांस लिये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ।।१४५।। वह पुरुष चक्र को पाश से बाँधकर एक सभा में ले गया जहाँ दूर पर एक व्यथित सिंहासन पर बैठा था ।।१४६।। उसी सिंहासन पर बैठे हुए व्यक्ति की आज्ञा से पाशधारी पुरुष ने उसे एक लोहे की कोठरी में पटक दिया ।।१४७।। उस कोठरी के अन्दर चक्र ने सिर पर घूमते हुए लोहे के गरम चक्र से पीड़ित एक दूसरे पुरुष को देखा ।।१४८।। और पूछा—'तू कौन है तथा इस कष्ट से किस प्रकार तू जी रहा है? तब उसने कहा—।।१४९।। "मैं खड्ग नाम का वैश्यपुत्र हूँ। मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी इससे क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझे शाप दिया कि तू सिर पर रखे हुए लोहे के चक्र के समान हम लोगों को त्रास देता है, इसलिए हे दुराचारी तुझे भी ऐसी ही अनुपम पीड़ा होगी ।।१५०-१५१।। ऐसा कहकर और रोते हुए मुझे देखकर वे बोले—'रोओ मत ऐसी पीड़ा तुझे केवल एक मास तक ही होगी' ।।१५२।।

१५६ कथासरित्सागर

१५६ कथासरित्सागर

तच्छ्रुत्वाहं शुचा भीत्या तद्दिनं शयनाशितः । निशि स्वप्न इवाद्राक्षं भीमं पुरपमागतम् ॥१५३॥ सेनादाय बलेनाहमस्मिंल्लोहमये गृहे । क्षिप्तो यस्तं च मे मूर्ध्नि ज्वलच्चक्रमिदं भ्रमतु ॥१५४॥ इति मे पितृशापोऽयं तेन प्राणा न यान्ति मे । स च मासोऽद्य सम्पूर्णो न च मुच्य सभाप्यहम् ॥१५५॥ इत्युक्तवन्तं तं खड्गं स चक्रः सङ्घपोऽब्रवीत् । पित्रोः प्रवसतामार्थे मयापि न कृतं वचः ॥१५६॥ प्राप्तं नङ्क्ष्यति तं वित्तमिति मां शपत स्म तौ । तन्नाम्न मे धनं नष्टं कृत्स्नं द्वीपान्तरार्जितम् ॥१५७॥ एषव वार्तां श्रायत्र तत्सोऽयं जीवितन मे । दह्यतन्मूर्ध्नि मे चक्रं खड्ग शापोऽपयातु ते ॥१५८॥ इति चक्रे वदत्यय वाणी दिव्यात्र शुश्रुवे । खड्ग मुक्तोऽसि चक्रस्य मूर्द्धयेतन्चक्रमपर्यं ॥१५९॥ सञ्छ्रुत्वा चक्रशिरसि न्यस्तचक्रस्तदव सः । खड्गः केनाप्यवृश्यन निन्ये पितृगृहं ततः ॥१६०॥ तत्रासीत् स पुनः पित्रोरनुलङ्घितशासनः । चक्रस्त्वादाम तन्मूर्ध्नि चक्रं तत्रैवमभ्यधात् ॥१६१॥ पापिमोज्येऽपि मुच्यन्तां पृथ्व्यां तत्पातरपि । व्या पापक्षयमेतन्मे चक्रं भ्राम्यतु मूर्धनि ॥१६२॥ इत्युक्तवन्तं तं चक्रं धीरसत्त्वं नभःस्थिताः । पुष्पवृष्टिमुजो देवाः परितुष्ट्येवमब्रुवन् ॥१६३॥ साधु साधु महासत्त्व क्षान्तं कक्षणयानया । पापं ते व्रज वित्तं च तवाक्षम्यं भविष्यति ॥१६४॥ इत्युक्तवत्सु देवेषु चक्रस्य शिरसः क्षणात् । श्वायसं तस्य सचक्र जगाम क्वाप्यदर्शनम् ॥१६५॥ त्क्षमोपेत्याम्बरावेको विद्याधरकुमारकः । तुष्टेनेन्द्रप्रेषितं दत्त्वा महार्हं रत्नसञ्चयम् ॥१६६॥ मङ्के कृर्व्वथ स चक्रं नगरं धवलाभिधम् । निजं तत्प्रापयामास जगाम च यथागतम् ॥१६७॥

नवम लम्बक ३५७

नवम लम्बक ३५७ यह सुनकर उस दिन को मैंने बड़े दुःख के साथ बिताया और रात में स्वप्न के समान आये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ॥१५३॥ उस पुरुष ने मुझे बलपूर्वक उठाया और इस लोहे की कोठरी में लाकर पटक दिया और तब मेरे सिर पर इस घूमते हुए गरम चक्र को लगा दिया ॥१५४॥ इस प्रकार, यह मुझे मेरे माता-पिता का शाप है। मेरे प्राण ही नहीं निकल रहे हैं, यद्यपि भयंकर वेदना हो रही है। शाप की अवधि का एक मास आज पूरा होगया फिर भी मैं इस कष्ट से नहीं छूट रहा हूँ" ॥१५५॥ इस प्रकार कहते हुए लब्ध से दयालु चक्र बोला- धन के लिए द्वीपान्तर जाते हुए मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी थी तो उन्होंने शाप दिया था कि तेरा कमाया हुआ भी धन नष्ट हो जायगा। इसी कारण द्वीपान्तर से कमाया हुआ मेरा सारा धन समुद्र में डूब गया। ॥१५६-१५७॥ यही वृत्तान्त मेरा है। अब इस जीवन से क्या लाभ है। इस चक्र को मेरे सिर पर रख दो। तुम्हारा शाप नष्ट हो' ॥१५८॥ वह जब इस प्रकार कह ही रहा था कि इतने में उसने आकाशवाणी सुनी कि 'हे लब्ध तू छूट गया। इस चक्र को चक्र के सिर पर रख दे' ॥१५९॥ यह सुनकर अपने सिर से चक्र को चक्र के सिर पर रखकर, लब्ध किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा पिता के घर ले जाया गया ॥१६०॥ अब वह अपने घर में माता-पिता की आज्ञा का पालन करता हुआ रहने लगा। उधर चक्र को सिर पर लेकर चक्र ने यह कहा- पृथ्वी पर और जो भी मेरे समान पापी हों वे पाप से छूट जाँय जबतक पापों का नाश न हो तबतक यह चक्र मेरे सिर पर घूमता रहे ॥१६१-१६२॥ इस प्रकार के धैर्यशाली चक्र पर आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और वे प्रसन्न होकर बोले-॥१६३॥ 'हे महापुरुष ठीक है ठीक है, तेरी इस अपार करुणा से तेरे पाप नष्ट हो गये। अब जाओ तुम्हारे पास अक्षय धन होगा ॥१६४॥ देवताओं के इस प्रकार कहने पर चक्र के सिर से वह लोहे का जलता चक्र अदृश्य हो गया ॥१६५॥ और, आकाश से उतरकर आये हुए एक विद्याधर ने इन्द्र द्वारा भेजे गये अमूल्य रत्नों का ढेर उसे दिया ॥१६६॥ और, चक्र को पोत में उठाकर, उसे उसके धवलपुर में पहुँचाकर वह विद्याधर जैसे आया था वैसे ही चला गया ॥१६७॥ ८१

६५८ कथासरित्सागर

६५८ कथासरित्सागर सोऽथ चक्रोऽन्तिकं पित्रोः प्राप्यानन्दितबान्धवः। तस्थावाख्यातवृत्तान्तस्तत्र धर्मपरिश्च्युतः॥१६८॥ इत्याख्याय महीपालं चन्द्रस्वाम्यवदत् पुनः। ईदृक्पापफलं पुत्र मातापित्रोर्विरोधनम्॥१६९॥ काममेमुस्तु सद्मभितस्तथाप्येषां कथां शृणु। गर्विणो मुनेः पतिव्रताया धर्मव्याधस्य च कथा आसीत्कोऽपि मुनिः पूर्वं वनचारी महातपाः॥१७०॥ तरुच्छायोपविष्टस्य तस्योपरि बलाकया। विष्ठा कदाचिन्मुक्ताभूत्सोऽथ क्रुद्धो ददर्श ताम्॥१७१॥ दृष्टमात्रैव सा तेन बलाका भस्मसादभूत्। तपःप्रभावाहङ्कारं स च भेजे ततो मुनिः॥१७२॥ एकदा नगरे क्वापि स ब्राह्मणगृहं मुनिः। एकं प्रविश्य गृहिणीं तत्र भिक्षामयाचत॥१७३॥ प्रतीक्षस्व मनाग्भर्तुः परिचर्यां समापये। इति तं सा च गृहिणी निजगाद पतिव्रता॥१७४॥ ततस्तं क्रुद्धया दृष्ट्या वीक्षमाणं विहस्य सा। अभाषत मुने नाहं बलाका मुच्यतामिति॥१७५॥ श्रुत्वैतत्स मुनिस्तस्याश्चक्षुर्विस्मार साऽभूत्। एतत्कथमिव ज्ञातमनयेति विचिन्तयन्॥१७६॥ ततः कृत्वानिकायर्द्धिः शुश्रूषां भर्तुरत्र सा। साध्वी भिक्षां समादाय तस्यागादन्तिकं मुनेः॥१७७॥ सोऽथ बद्धाञ्जलिर्भूत्वा मुनिस्तमब्रवत्सतीम्। कथं बलाकावृत्तान्तः परोक्षोऽपि मम त्वया॥१७८॥ ज्ञात इत्यादितो ब्रूहि भिक्षां गृह्णाम्यहं ततः। इत्युक्तवन्तं तमृषिं साबोचत् पतिवेवता॥१७९॥ न भर्तृभक्तेरपरं धर्मं कञ्चन वेद्म्यहम्। तेन मे तत्प्रसादेन विज्ञानबलमीदृशम्॥१८०॥ किं चेह धर्मव्याधस्य मांसविक्रयजीविनः। गत्वा पश्य ततः श्रेयो निरहङ्कारमाप्स्यसि॥१८१॥ एवं सर्वविदा प्रोक्तः स पतिव्रतया मुनिः। गृहीत्वातिथिभागस्तां प्रणम्य निरगात्ततः॥१८२॥

नवम लम्बक ६५१

नवम लम्बक ६५१

वह चक्र भी माता-पिता को सब वृत्तान्त सुनाकर और बन्धु-बान्धवों को आनन्दित करके अपने धर्म पर दृढ होकर रहने लगा ॥१६८॥ महीपाल को यह कथा सुनाकर कनकस्वामी ने फिर कहा-'माता-पिता के विरोध करने का तो इतना दुष्परिणाम होता है और इनकी भक्ति भी इसी प्रकार कामधेनु है। इस सम्बन्ध में भी कथा सुनो- ॥१६९-१७०॥ अहंकारी मुनि, पतिव्रता स्त्री और धर्मव्याध की कथा प्राचीन काल में वन में रहनेवाला एक महातपस्वी मुनि था। एकबार वह वृक्ष की छाया में बैठा था कि उसके सिर पर एक बगुली ने बीट कर दी तो मुनि ने क्रुद्ध होकर उसे देखा ॥१७०-१७१॥ मुनि के इस प्रकार देखते ही वह बगुली जलकर भस्म हो गई। तब मुनि को अपने तप पर अहंकार उत्पन्न होगया ॥१७२॥ एक बार वह मुनि भिक्षा के लिए नगर में एक ब्राह्मण के घर गया। वहाँ जाकर उसने गृहिणी से भिक्षा माँगी ॥१७३॥ पतिव्रता गृहिणी ने कहा-'जरा ठहरो मैं पति की सेवा समाप्त कर लूँ, तो भिक्षा दूँ ॥१७४॥ तब क्रोध-भरी दृष्टि से देखते हुए उस मुनि को देखकर वह पतिव्रता हँसकर बोली- 'मुनि मैं बगुली नहीं हूँ। प्रतीक्षा करो' ॥१७५॥ यह सुनकर वह मुनि आश्चर्य के साथ वहाँ बैठकर सोचने लगा कि इस स्त्री ने यह कैसे जान लिया ? ॥१७६॥ तब वह पतिव्रता स्त्री पति की अग्निहोत्र-सम्बन्धी सेवा समाप्त करके और भिक्षा लेकर मुनि के समीप आई ॥१७७॥ तब वह मुनि हाथ जोड़कर उस सती स्त्री से बोला-'माता तुमने अपने परोक्ष के इस बगुली के वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ॥१७८॥ यह प्रारम्भ से कहो तो मैं भिक्षा ग्रहण करूँगा ? इस प्रकार कहते हुए मुनि से वह पतिव्रता कहने लगी ॥१७९॥ मैं पति-भक्ति के सिवा और दूसरा धर्म नहीं जानती। अत उसी की कृपा से मुझे यह विज्ञान-बल मिला है॥१८०॥ और यहाँ मांस बेचकर जीवन-निर्वाह करनेवाला एक धर्मव्याध है उससे जाकर मिलो। इससे तुम्हें अहंकार-रहित कल्याण मिलेगा' ॥१८१॥ इस प्रकार उस सर्वज्ञ पतिव्रता से कहा गया वह मुनि भिक्षा लेकर और प्रणाम करके वहाँ से निकला ॥१८२॥

१६० कथासरित्सागर

१६० कथासरित्सागर

अन्यद्युः स मुनिर्धर्मव्याधमन्विष्य तत्र तम्। विपणिस्थमुपागच्छत् कुर्वाणं मांसविक्रयम् ॥१८३॥ धर्मव्याधश्च दृष्ट्वैव स तं मुनिमभाषत। किं पतिव्रतया ब्रह्मन्निह त्वं प्रेषितस्तया ॥१८४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितोऽवादीद्धर्मव्याधमपि स तम्। ईदृशं ते कथं ज्ञानं मांसविक्रयिणः सतः ॥१८५॥ इत्युक्तवन्तं तमृषिं धर्मव्याधो जगाद सः। मातापित्रोरहं भक्तस्तौ ममकं परायणम् ॥१८६॥ तयोः स्नापितयोः स्नामि भुञ्जे भोजिंतयोस्तयोः। शये शयितयोस्तेन ज्ञानमीदृग्विधं मम ॥१८७॥ मांसं चान्याहृतस्माहं मृगाद्वृत्तये परम्। स्वधर्मनिरतो भूत्वा विक्रीणे भार्ययार्हतः¹ ॥१८८॥ ज्ञानविघ्नममहङ्कारमहं सा च पतिव्रता। नैव कुर्वो मुने तेन निर्बाधज्ञानमावयोः ॥१८९॥ तस्मात्त्वमप्यहङ्कारं मुक्त्वा शुद्ध्य मुनिव्रतः ॥ स्वधर्मं चर येनाशु परं ज्योतिरवाप्स्यसि ॥१९०॥ इति तेनानुशिष्टश्च धर्मव्याधेन तद्गृहान्। गत्वा दृष्ट्वा च तच्चर्यां मुनिस्तुष्टो वनं ययौ ॥१९१॥ सिद्धस्तदुपदेशाच्च सोऽभूत्तावपि जग्मतुः। सिद्धिं पतिव्रताधर्मव्याधौ तद्धर्मचर्यया ॥१९२॥ एष प्रभावो भक्तानां पत्यौ पितरि मातरि। तदेहि सम्भावय तां मातरं दर्शनोत्सुकाम् ॥१९३॥ एवं पित्रा महीपाल स चन्द्रस्वामिमोदितः। प्रतिपेदे स्वदेशाय गन्तुं मात्रनुरोधतः ॥१९४॥ अनन्तस्वामिने सर्वं धर्मपित्रे निवेद्य तत्। तेनात्तमाट स ततः प्रायात्पितृसखो निशि ॥१९५॥ क्रमात् प्राप्य स्वदेशं च जननीं दर्शनेन ताम्। आनन्दयदहेवातिं मधु पिकवधूमिव ॥१९६॥


१ भार्ययालोभनेत्यर्थः। गृहो–कोशः।

नवम लम्बक १६१

नवम लम्बक १६१ दूसरे दिन वह मुनि उस नगर में धर्मव्याध को ढूँढ़कर, दूकान पर बैठे हुए और मांस बेचते हुए उससे मिला ॥१८४॥ धर्मव्याध मुनि को देखते ही बोला- क्या तुम्हें उस पतिव्रता ने भेजा है? ॥१८५॥ यह सुनकर आश्चर्य से भरा हुआ ऋषि उस धर्मव्याध से कहने लगा- मांस बेचनेवाला होकर भी तुझे इतना ज्ञान कैसे हुआ ? ॥१८६॥ इस प्रकार, पूछते हुए ऋषि से उस धर्मव्याध ने कहा- मैं एकमात्र माता-पिता का भक्त हूँ। वे ही मेरे देवता हैं॥१८६॥ उन्हें स्नान कराकर स्नान करता हूँ उनके भोजन कर लेने पर भोजन करता हूँ और उनके सो जाने पर सोता हूँ इसलिए मुझे ऐसा ज्ञान है॥१८७॥ दूसरों के द्वारा मारे गये पशुओं का मांस अपनी आजीविका के लिए बेचता हूँ। यह कार्य भी अपना धर्म (कर्त्तव्य) समझकर करता हूँ धन कमाने के लिए नहीं। मैं और वह पतिव्रता स्त्री दोनों ज्ञान के विघ्न अहंकार को पास नहीं फटकने देते। इसलिए, हम लोगों को आसानी से यह ज्ञान होजाता है॥॥१८८-१८९॥ इसलिए, तुम भी मुनियों का व्रत धारण करके अपनी शुद्धि के लिए अहंकार का परित्याग कर अपने धर्म का पालन करो। इससे तुम्हें वह परम प्रकाश प्राप्त हो जायगा ॥१९०॥ इस प्रकार उस धर्मव्याध से आविष्ट मुनि उसके साथ उसके घर गया और उसकी दिनचर्या से प्रसन्न होकर (तप के लिए) वन को गया ॥१९१॥ उनके उपदेश से मुनि ने सिद्धि प्राप्त की और मुनि की धर्मचर्या से वह पतिव्रता और व्याध भी सिद्धि को प्राप्त हुए ॥१९२॥ माता और पिता में भक्ति रखनेवालों का ऐसा चमत्कारी प्रभाव होता है, इसलिए चलो और तुम्हें देखने के लिए कालापित अपनी माता को धीरज बँधाओ' ॥१९३॥ पिता चन्द्रस्वामी से इस प्रकार कहा गया महीपाल पिता के अनुरोध से अपने देश जाने को तैयार हुआ ॥१९४॥ महीपाल ने अपने धर्मपिता से सब बातें करके और राज्य का सारा प्रबन्ध उसे सौंपकर रात्रि के समय पिता के साथ अपने देश को प्रस्थान किया ॥१९५॥ क्रमश अपने गाँव में पहुँचकर उस महीपाल ने अपनी माता को उसी प्रकार प्रसन्न किया जैसे वसन्त कोकिल को प्रसन्न करता है॥१९६॥

१६२ कथासरित्सागर

१६२ कथासरित्सागर कञ्चित्काल महीपालस्तस्थौ बान्धवसत्कृतः । तत्र मातृयुतं पित्रा वृत्तान्ताख्यायिना सह ॥१९७॥ यावत्तारापुरे तत्र तद्भार्या तु नृपात्मजा। निशाक्षये बन्धुमती श्रान्त सुप्ता व्यबुध्यत ॥१९८॥ बुद्ध्वा च स पतिं क्वापि गत विरहविह्वला। न लेभे सा रतिं क्वापि प्रासादोपवनादिषु ॥१९९॥ द्विगुणीकृतहारेण बाष्पेण रुदती परम्। आसीत् प्रलापैकभयी वाञ्छन्ती मृत्युमा सुखम् ॥२००॥ यामि कार्येण केनापि शीघ्रमेष्यामि चेति मे। स्वैरमुक्त्वैव स गतस्तन्मा पुत्रि शुचः कृथाः ॥२०१॥ इत्याश्वासविधिर्भूरिरनन्तस्वामिना ततः। मन्त्रिणाश्वासिताप्येत्य कृच्छ्रात्सा धृतिमादधे ॥२०२॥ तत प्रवृत्तिज्ञानार्थं भर्तुर्देशान्तरागतानू। पूजयन्ती सर्वदासीद्दाने सा द्विजपुङ्गवान् ॥२०३॥ तेन सङ्क्रमदत्ताख्य दीन वामागतं द्विजम्। भर्तुः पप्रच्छ सा वार्त्तामुक्त्वाभिज्ञाननामनी ॥२०४॥ ततस्तां स द्विजोऽवादीद्दृष्टो नैवविधो मया। कश्चित्तथापि देव्यत्र कार्या नैवाधृतिस्त्वया ॥२०५॥ चिरादवाप्यतेऽभीष्टसंयोगः शुभकर्मभिः। सदा च यन्मया दृष्टमाश्चर्यं वच्मि तच्छृणु ॥२०६॥ तीर्थपर्यटनह प्राप हिमाद्रौ मानस सरः। तत्रादर्शमिवापश्यमन्तर्मणिमयं गृहम् ॥२०७॥ ततोऽकस्माच्च निर्गत्य खड्गपाणिः पुमान् गुहात्। अध्यारोहत्सरस्तीरे दिव्यनारीगजान्वितः ॥२०८॥ तत्रोद्याने सह स्त्रीभि सोऽक्रीडत् पानलीलया। दूरात् सकौतुकश्चाह पश्यन्नासमलक्षितः ॥२०९॥ तावत्कुतोऽपि तत्रागात् सुभगः पुरुषोऽपरः। मिलिताय च सतस्मै यथादृष्टं मयोदितम् ॥२१०॥ दर्शितश्च स सस्त्रीक पुमान् दूरात्कुतूहलात्। तद्दृष्ट्वैव स्ववृत्तान्तमेवमाख्यातवान् मम ॥२११॥

नवम लम्बक

नवम लम्बक १६५

वह महीपाल बन्धु-बान्धवों से सत्कृत होकर समस्त वृत्तान्त सुनानेवाले पिता के साथ माता के पास कुछ दिनों तक रहा ॥१९७॥

उधर तारापुर में प्रातःकाल शयनागार में सोई हुई महीपाल की पत्नी बन्धुमती उठी ॥१९८॥

और यह जानकर कि 'उसका पति कहीं चला गया है' विरह से व्याकुल होकर महल में उद्यान में कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त कर सकी ॥१९९॥

आंसू की धार से हार को दुहरा भारवाला बना करके दिनरात रोती हुई और उसी के नाम पर प्रलाप करती हुई वह मृत्यु में ही सुख मांगने लगी ॥२००॥

"मैं किसी कार्य से जा रहा हूँ शीघ्र ही आऊँगा' ऐसा मुझे गुप्त रूप से कहकर वह महीपाल गया है, इसलिए बेटी सोच मत करो" ॥२०१॥

इस प्रकार धीरज देनेवाले मन्त्री अनन्तस्वामी की बातों से किसी प्रकार समझाने-बुझाने पर वह धैर्य रख सकी ॥२०२॥

तब भी पति का समाचार जानने के लिए दूसरे देशों से आनेवाले ब्राह्मणों को वह सदा सत्कार आदि से सन्तुष्ट करती थी ॥२०३॥

एक बार दान लेने के लिए आये हुए संगमदत्त नामक निर्धन ब्राह्मण से उसने चिह्न और नाम बताकर पति का समाचार पूछा ॥२०४॥

तब वह ब्राह्मण उससे बोला कि मैंने ऐसा व्यक्ति कहीं देखा तो नहीं है, तो भी महारानी तुम्हें अधीर न होना चाहिए ॥२०५॥

प्रिय का समागम शुभ कार्यों के कारण विलम्ब से ही होता है। इस सम्बन्ध में मैंने जो आश्चर्य देखा है वह तुम्हें कहता हूँ सुनो ॥२०६॥

एक बार तीर्थ-यात्रा करता हुआ मैं हिमालय पर स्थित मानस-सरोवर में पहुँचा। वहाँ पर मैंने मानो काँच से बने हुए मणि से रचित एक भवन को देखा ॥२०७॥

और देखा कि उस भवन से अकस्मात् ही निकलकर तलवार हाथ में लिये हुए एक पुरुष दिव्य नारियों से युक्त होकर मानस-सर के तट पर गया और मद्यपान आदि करके उन स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करने लगा। मैं भी बड़े ही कौतुक से छिपकर उसे देख रहा था। इतने में ही वहीं कहीं से दूसरा सुन्दर पुरुष आ निकला। उसके मिलने पर मैंने जो कुछ देखा सो सब उसे सुनाया ॥२०८-२१०॥

और, उन स्त्रियों-सहित पुरुष को भी उसे दिखाया। वह देखकर उस पुरुष ने अपना वृत्तान्त मुझे इस प्रकार सुनाया—॥२११॥

३६४ कथासरित्सागर

३६४ कथासरित्सागर पुरे त्रिभुवनाख्येऽहं राजा त्रिभुवनाभिधः। तत्र मे सुचिरं सेवामेकः पाशुपतो व्यधात् ॥२१२॥ । ॥२१३॥ स पृष्टः कारणं स्वैरं बिलखङ्गप्रसाधने। सहायं प्रार्थयत मां प्रतिपन्नं मया च तत् ॥२१४॥ ततो मया सहारण्यं गत्वा होमादिना निधि। प्रकटीकृत्य विवरं स मां पाशुपतोऽभ्यधात् ॥२१५॥ वीर प्रविश पूर्वं त्वं खड्गं प्राप्य च मामपि। प्रवेशयेस्त्वं निर्गत्य समयं चात्र मे कुरु ॥२१६॥ इत्युक्तस्तेन तस्याहं कृत्वा समयमाशु तत्। प्रविश्य विवरं प्रापमेकं रत्नमयं गृहम् ॥२१७॥ ततो निर्गत्य मां चैका प्रधानासुरकन्यका। अन्तः प्रावेशयत्प्रेम्णा प्रादात्खड्गं च सात्र म् ॥२१८॥ सर्वसिद्धिप्रदमिमं खड्गं खगतिदायिनम्। रक्षेत्युक्तवत्याहं तया तत्रावस सह ॥२१९॥ स्मृत्वाथ खड्गहस्तोऽहं निर्गत्य विवरेण तम्। प्रावेशयं पाशुपतं तस्मिन्नसुरमन्दिरे ॥२२०॥ सप्ताहमभव्या साकं तया सपरिवारया। सोऽपि द्वितीयया साकमासीदसुरकन्यया ॥२२१॥ एकदा पानमत्तस्य स मे पाशुपतःक्रमात्। हृत्वा पार्श्वस्थितं खड्गमकरोन्निजहस्तगम् ॥२२२॥ तस्मिन् हस्तस्थिते लब्धमहासिद्धिः स पाण्डितः। मामादायैव निष्कास्य विवरात् प्राक्षिपद्बहिः ॥२२३॥ ततो द्वावशवर्षाणि मया बिलमुखेषु सः। गवेषितः कदाचित् निर्गतं प्राप्नुयामिति ॥२२४॥ सोऽयमद्येह मे दृष्टिपथे निपतितः शठः। मदीययैतया साकं श्रीलक्षसुरकन्यया ॥२२५॥ इति यावत्त्रिभुवन स राजा वेत्रि ब्रक्ति माम्। तावत्पानमदाभिद्रामगात्पाशुपतोऽत्र सः ॥२२६॥

नवम लम्बक ६६५

नवम लम्बक ६६५ त्रिभुवनपुर नामक नगर में मैं त्रिभुवन नाम का राजा था। वहीं पर एक पाशुपत (शैव) ने बहुत दिनों तक मेरी सेवा की ॥२१२॥ २१३वां श्लोक त्रुटित है ॥२१३॥ एकबार मैंने एकान्त में उसकी सेवा का कारण पूछा तो उसने गुफा-स्थित खड्ग (तलवार) की सिद्धि के लिए मेरी सहायता माँगी और मैंने उसे स्वीकार भी किया ॥२१४॥ तब उसने मेरे साथ जंगल में जाकर रात्रि में हवन आदि करके एक गुफा प्रकट की और मुझसे कहा—॥२१५॥ 'हे वीर, पहले इस गुफा में प्रवेश करो। प्रवेश करने पर तुम्हें एक खड्ग मिलेगा। तब तुम बाहर निकलकर मुझे भी अन्दर ले जाना। मेरे साथ प्रतिज्ञा करो ॥२१६॥ उसके इस प्रकार कहने पर मैं प्रतिज्ञा करके उसके साथ उस बिल में घुसा और वहाँ जाकर मैंने रत्नों से बना एक भवन देखा ॥२१७॥ तब उस भवन से निकलकर एक असुर-कन्या मुझे प्रेम से अन्दर ले गई और वहाँ पर उसने मुझे एक खड्ग प्रदान किया ॥२१८॥ और कहा यह खड्ग सब सिद्धियों को देनेवाला तथा आकाश में गति प्रदान करनेवाला है। भली भाँति इसकी रक्षा करना। ऐसा कहती हुई उसके साथ मैं वहीं रहा ॥२१९॥ तदनन्तर, पाशुपत के साथ की गई प्रतिज्ञा स्मरण करके खड्ग हाथ में लिये हुए मैं उस बिल से बाहर निकला और मैं अपने साथ उस पाशुपत को भी उस असुर-मन्दिर में ले गया ॥२२०॥ उस मन्दिर में पहली असुर-कन्या के साथ मैं और दूसरी असुर-कन्या के साथ वह पाशुपत रहने लगा ॥२२१॥ एक बार मद्यपान से मत्त पाशुपत ने मेरी बगल में रखे हुए खड्ग को अपने हाथ में कर लिया। उस खड्ग के हाथ आते ही उस पाशुपत को महान् सिद्धि प्राप्त हुई और उसने मुझे हाथ से पकड़कर उस बिल से बाहर फेंक दिया ॥२२२-२२३॥ तब मैं बारह वर्षों तक बिल के बाहर उसकी प्रतीक्षा करता हुआ बैठा रहा कि कभी वह बाहर निकले और मैं उसे पकडूँ ॥२२४॥ सो वह दुष्ट आज मेरी ही असुर-कन्या के साथ क्रीड़ा करता हुआ दीख पड़ा है ॥२२५॥ हे देवि राजा त्रिभुवन जब मेरे साथ वार्तालाप कर ही रहा था कि इतने में ही मद्य के नशे में विह्वल पाशुपत पुरुष सो गया ॥२२६॥ ८४

२६ कथासरित्सागर

२६ कथासरित्सागर सुप्तस्य तस्य गत्वथ पार्श्वान्खड्गं तमग्रहीत्। स राजा तेन भूयश्च प्रभावं दिव्यमाप्तवान्॥२२७॥ ततः पाशुपतं पादप्रहारेण प्रबोध्य तम्। निरभर्त्सयदवापच्च स वीरो नावधीत्सुतम्॥२२८॥ प्राविशच्चासुरं पुरं सपरिच्छदया तया। प्राप्तया स स्वया सार्धं सिद्धयवासुरकन्यया॥२२९॥ स च पाशुपतः सिद्धेर्भ्रष्टः कष्टमगात् परम्। कृतघ्नाश्चिरसिद्धार्था अपि भ्रश्यन्ति हि ध्रुवम्॥२३०॥ एवत्साक्षाद्विलोक्यैवाहमिह प्राप्तः परिभ्रमन्। तद्देवि प्रियसंगमस्तव भावी चिरादपि॥२३१॥ यथा त्रिभुवनस्याभूच्छुभङ्कन्नहि सीदति। इति तस्माद्द्विजाच्छ्रुत्वा सोप धन्धुमती ययौ॥२३२॥ चकार च कृतार्थं तं विप्रं दत्त्वा धनं बहु। अन्यद्युश्च द्विजोऽपूर्वस्तमागाद्दूरदेशजः॥२३३॥ तं च बन्धुमती सोत्का प्रोक्ताभिज्ञाननामका। भर्तुर्वार्त्तामपृच्छत्सा सोऽथ तां ब्राह्मणोऽभ्यधात्॥२३४॥ न स देवि मया दृष्टस्त्वद्भर्त्ता क्वापि किं त्वहम्। अन्वर्थं सुमनोनामा तवाद्य गृहमागतः॥२३५॥ तदाशु सौभगस्य ते भावीत्याख्याति मे मनः। भवत्येव च संयोगश्चिरविश्लेषिणामपि॥२३६॥ तथा च कथयाम्येतामत्र देवि कथां शृणु। नलदमयन्तीकथा निषधाधिपती राजा नलो नामाभवत्पुरा॥२३७॥ यस्य रूपेण विजितः कामो मन्येऽब्रमागतः। कोपितत्रिपुरारातिनेत्राग्नावजुहोत्तनुम् ॥२३८॥ तेनाभार्य्येण सदृशी भार्याद्यापि विचिन्वता। दमयन्तीति भीमस्य विदर्भाधिपतेः सुता॥२३९॥ १ अत्रोल्लिखिता नलकथा महाभारतविधेनितकथातो किञ्चिदिव भिन्ना विलोक्यते।

नवम लम्बक १६७

नवम लम्बक १६७ तब राजा त्रिभुवन ने सोये हुए उसके पास जाकर उस खड्ग को उठा लिया और उसके साथ ही उस राजा को दिव्य प्रभाव भी प्राप्त हो गया ॥२२७॥ तब राजा ने मदोन्मत्त होकर सोये हुए उस पाशुपत को लात मारकर उठाया और खूब डाँटा-फटकारा। किन्तु, वीर होने के कारण राजा ने उसका वध नहीं किया ॥२२८॥ और, सहेलियों के सहित अपनी उस असुर-कन्या के साथ वह बिल में चला गया ॥२२९॥ सिद्धि से भ्रष्ट वह पाशुपत अत्यन्त दुःखी हुआ। कृतघ्न व्यक्ति चिरकाल में निधि प्राप्त करके भी अवश्य भ्रष्ट हो जाते हैं ॥२३०॥ इस घटना को अपनी आँखों से देखकर भ्रमण करता हुआ मैं यहाँ आया हूँ। इसलिए, हे देवि चिरकाल के बाद भी तुझे पति का समागम अवश्य होगा ॥२३१॥ जैसे कि त्रिभुवन राजा को हुआ। क्योंकि कल्याण करनेवाला व्यक्ति कभी कष्ट नहीं पाता। इस प्रकार ब्राह्मण का उपदेश सुनकर बन्धुमती को कुछ सन्तोष हुआ ॥२३२॥ और उसने बहुत धन देकर उसे कृतार्थ किया। दूसरे दिन वहाँ दूर देश का रहनेवाला एक और ब्राह्मण रानी के पास आया ॥२३३॥ उत्कंठिता बन्धुमती ने परिचय और नाम बताकर उससे भी पति का समाचार पूछा। तब उस ब्राह्मण ने उससे कहा— ॥२३४॥ हे देवि मैंने तेरे पति को तो कहीं नहीं देखा किन्तु यथार्थ नामवाला मैं सुमन तेरे घर पर आया हूँ इसलिए शीघ्र ही तेरा मन प्रसन्न होगा। ऐसा मेरा मन कहता है। क्योंकि चिरकाल के वियोगियो का भी समागम होता ही है ॥२३५-२३६॥

नल और दमयन्ती की कथा

मैं इस सम्बन्ध में तुझे एक कथा सुनाता हूँ सुनो। प्राचीन काल में नल नाम का एक राजा था ॥२३७॥ वह राजा इतना सुन्दर था कि उसके रूप से अपमानित होकर कामदेव मानो (उसी दुःख से) क्रुद्ध शिवजी के नेत्र की आग में जलकर भस्म हो गया ॥२३८॥ पत्नी-रहित उस राजा ने अपने ही समान सुन्दरी पत्नी की खोज करते हुए विदर्भ देश के राजा भीम की कन्या दमयन्ती का नाम सुना ॥२३९॥

१६८ कथासरित्सागर

१६८ कथासरित्सागर

भीमेनापि विचित्य क्ष्मां ववृषे तेन राजसु। न नलादपरो राजा तुल्यः स्वदुहितुः पतिः ॥२४०॥ अत्रान्तरे स्वनगरं दमयन्ती सरोवरम्। भीमात्मजा जलक्रीडाहेतोरवततार सा ॥२४१॥ तत्रैकं राजहंस सा दृष्ट्वा दष्टोत्पलाम्बुजम्। बबन्ध क्रीडया बाला युक्तिक्षिप्तोत्तरीयका ॥२४२॥ स बद्धो दिव्यहंसस्तामुवाच व्यक्तया गिरा। राजपुत्र्युपकारं ते करिष्यामि विमुञ्च माम् ॥२४३॥ नैषधोऽस्ति नलो नाम राजा भुवि वहन्ति यम्। सद्गुणैर्गुम्फितं हारमिव दिव्याङ्गना अपि ॥२४४॥ तस्य त्वं सदृशी भार्या भर्ता स सदृशस्तव। तदत्र तुल्यसंयोगे कामदूतो भवामि वाम् ॥२४५॥ तच्छ्रुत्वा दिव्यहंसं सा मत्वा सत्याभिभाषिणम्। मुमोच दमयन्ती तमेवमस्त्विति वादिनी ॥२४६॥ न मया वरणीयोऽन्यो नलादिति जगाद च। श्रुतिमार्गप्रविष्टेन तेनापहृतमानसा ॥२४७॥ स च हंसस्ततो गत्वा निषधेष्वथ शिप्रिये। जलक्रीडाप्रवृत्तेन नलेनाध्यासितं सरः ॥२४८॥ नलः स राजा दृष्ट्वा तं राजहंसं मनोरमम्। बबन्ध स्वोत्तरीयेण लीलाक्षिप्तेन कौतुकात् ॥२४९॥ सोऽथ हंसोऽब्रवीन्मुञ्च नृपते मामहं यतः। इह त्वदुपकारार्थमागतः शृणु वच्मि ते ॥२५०॥ विदर्भेष्वस्ति भीमस्य राज्ञः क्षितितिलोत्तम। दमयन्तीति दुहिता स्पृहणीया सुरैरपि ॥२५१॥ त्वमेव च श्रवात्तद्गुणो बद्धानुरागया। तया भर्ता वृतस्त्वञ्च त्वाहं वक्तुमागतः ॥२५२॥ इति हंसोत्तमस्यास्य वचोभिः सत्कृतोऽभवत्। विधिवच्च स पुष्पोपेतेऽर्के सममभिष्यत ॥२५३॥ अब्रवीत् स च हंसं तं धन्योऽहं विहगोत्तम। यो मनोरथसम्पत्त्या मूर्त्येव वृतस्तया ॥२५४॥

नवम लम्बक ५९९

नवम लम्बक ५९९ सारी पृथ्वी पर ढूँढ़ते हुए राजा भीम को भी राजा नल के सिवा अपनी कन्या के योग्य दूसरा पति नही मिला ॥२४ ॥ इसी बीच एक बार राजा भीम की कन्या दमयन्ती जलक्रीड़ा के लिए एक तालाब में उतरी ॥२४१॥ उस सरोवर में उसने कमल की नाल को खाते हुए एक राजहंस को युक्ति से अपनी चादर फेंककर पकड़ लिया ॥२४२॥ उससे इस प्रकार पकड़ा गया वह दिव्य राजहंस मनुष्यों की वाणी में उससे कहने लगा- 'हे राजकुमारी मैं तेरा उपकार करूँगा। मुझे छोड़ दे। निषध देश का राजा नल है। अच्छे गुणों से गूँथे हुए हार के समान जिसे दिव्य रमणियाँ भी हृदय में धारण करती हैं ॥२४३-२४४॥ तू उसके समान पत्नी है और वह तेरे समान पति है। अतः यह समान पति-पत्नी-संयोग कराने में मैं तेरा प्रणय-दूत बनूँगा' ॥२४५॥ यह सुनकर और उस दिव्य हंस को सत्य बोलनेवाला समझकर, दमयन्ती ने 'ठीक है, तुम दूत बनो' यह कहते हुए उसे छोड़ दिया ॥२४६॥ और बोली कि 'मैं नल के सिवा दूसरे को नहीं करूँगी क्योंकि उसने कान के मार्ग से प्रविष्ट होकर, मेरा मन हर लिया है' ॥२४७॥ उस हंस ने वहाँ से चलकर शीघ्र ही जलक्रीडा में लगे हुए नलवाले सरोवर का आश्रय लिया ॥२४८॥ राजा नल ने भी उस मनोहर राजहंस को देखकर खिलाड़ के साथ फेंके हुए अपने दुपट्टे से उसे बाँध लिया ॥ २४९॥ तदनन्तर, वह हंस उससे बोला-'राजन् मुझे छोड़ दो। मैं तो तुम्हारे उपकार के लिए ही यहाँ आया हूँ। सुनो तुम्हें कहता हूँ—॥२५ ॥ विदर्भ देश में राजा भीम की पृथ्वी की तिलोत्तमा और देवताओं से भी चाही जानेवाली दमयन्ती नाम की कन्या है॥२५१॥ मेरे द्वारा तेरे गुणों का बखान करने पर तुझमें सुदृढ़ प्रेम रखनेवाली उस दमयन्ती ने तुझे ही अपने पति के रूप में वरण किया है। यही कहने के लिए मैं आया हूँ' ॥२५२॥ इस प्रकार शुभ फल को प्रकट करनेवाले हंस के वचनों से और कामदेव के पुष्प-बाणों से वह राजा नल एक साथ ही बिंध गया ॥२५३॥ और उस हंस से बोला-हे पक्षिश्रेष्ठ मैं धन्य हूँ मूर्तिमती मनोरथ-सम्पत्ति के समान जिसने मुझे वरण कर लिया है' ॥२५४॥

१७० कथासरित्सागर

१७० कथासरित्सागर इत्युक्त्वा तेन मुक्तः स हंसो गत्वा शशंस तत् । दमयन्त्यै यथावस्तु यथाकामं जगाम च ॥२५५॥ दमयन्ती च सोत्कण्ठा युक्त्या मातर्मुखेन सा। पितुः स्वात्प्रार्थयामास नलप्राप्त्यै स्वयंवरम् ॥२५६॥ अनुमेने स तस्याश्च स्वयंवरकृते पिता। भीमः पृथिव्यां सर्वेषां राज्ञां दूतान्विसृष्टवान् ॥२५७॥ प्राप्तदूताश्च निश्चिक्यू विदर्भान्प्रति भूमिपाः। व्रजन्ति स्म नलोऽप्युत्को रथास्तम्भनचारु सः ॥२५८॥ ततश्च दमयन्त्यास्तो नलप्रेमस्वयम्बरौ। इन्द्रादयो लोकपालाः शुश्रुवुर्नारदाम्मुनेः ॥२५९॥ तपा च भसमिद्धायुर्यमाग्निवरुणास्ततः। सम्मन्त्र्य दमयन्त्युक्त्वा नलस्याभ्यान्तिकं ययुः ॥२६०॥ ऊचुश्च प्राप्य तं प्रह्वं विदर्भान्प्रस्थितं पथि। गत्वास्मद्वचनाद् ब्रूहि दमयन्तीमिदं नृप ॥२६१॥ पञ्चानां वरयैकं नः किं मर्त्येन नलेन ते। मर्त्या मरणधर्माणस्त्रिदशास्त्वमरा इति ॥२६२॥ अस्मत्प्रभावाच्च तत्पार्श्वमदृष्टोऽन्यैः प्रवेक्ष्यसि। तथेत्येतां च वशाज्ञां प्रतिपदे नलोऽथ सः ॥२६३॥ गत्वा चान्तःपुरं तस्याः प्रविष्ट्यावृष्ट एव च। दमयन्त्या शशंसेच देवादेशं तथैव तम् ॥२६४॥ सा तं श्रुत्वाब्रवीत्साध्वी देवास्ते सन्तु तादृशाः। तथापि मे नलो भर्त्ता न कार्यं त्रिदशैर्मम ॥२६५॥ इति सम्यग्वचस्तस्याः श्रुत्वात्मानं प्रकाश्य च। नलो गत्वा तथैवैतदिन्द्रादिभ्यः शशंस सः ॥२६६॥ वश्या वयमिदानीं ते स्मृतमात्रोपगामिनः। तथ्यवादित्विति च ते तुष्टास्तस्मै ददुर्वरान् ॥२६७॥ ततो हृष्टे नले याते विदर्भान्बिम्बसत्सुभिः। दमयन्त्याः सुरेशाद्यैर्नलरूपमकारि तैः ॥२६८॥ गत्वा च भीमस्य सभां मर्त्यधर्मानुपाश्रिताः। स्वयम्बरे प्रस्तुते ते नलसान्तिक उपाविशन् ॥२६९॥

नवम लम्बक १७१

नवम लम्बक १७१ ऐसा कहकर राजा से छोड़े गये उस हंस ने उसी समय विदर्भ देश में जाकर दमयन्ती से सच्ची बात बता दी और वह इच्छानुसार चला गया ॥२५५॥ नल के लिए उत्कण्ठित दमयन्ती ने माता द्वारा नल की प्राप्ति के लिए पिता से अपना स्वयंवर कराने की प्रार्थना की ॥२५६॥ राजा ने भी इस बात की स्वीकृति देकर, दमयन्ती के स्वयंवर के लिए, पृथ्वी के सभी राजाओं के पास दूत भेज दिये ॥२५७॥ दूतों के द्वारा स्वयंवर-समाचार प्राप्त होने पर सभी राजा विदर्भ के प्रति जाने लगे और उत्कण्ठित नल भी रथ पर सवार होकर विदर्भ के लिए चला ॥२५८॥ तदनन्तर, नल-दमयन्ती के प्रेम-स्वयंवर का समाचार इन्द्र आदि सभी लोकपालों ने नारद मुनि से सुना। यह सुनकर इन्द्र वायु यम आदि बहल पाँचों लोकपाल आपस में सम्मति करके नल के पास गये ॥२५९-२६०॥ और, विदर्भ को जाते हुए विप्रलम्भ नल से मार्ग में ही मिलकर वे बोले— तुम हमारी ओर से हमारे सन्देश दमयन्ती को जाकर सुना दो ॥२६१॥ कि तू हम पाँचों में से किसी एक लोकपाल को वर ले। मानव नल से तुझे क्या सुख मिलेगा ? क्योंकि मनुष्य मरणधर्मा होते हैं और देवता अमर हैं ॥२६२॥ और तू हमारे वरदान से अदृश्य होकर उसके पास जा सकेगा। दूसरे व्यक्ति तुझे न देख सकेंगे। नल ने देवताओं की इस आज्ञा को 'ठीक है' कहकर मान लिया ॥२६३॥ और, दमयन्ती के भवन में अदृश्य रूप से जाकर उसे देवताओं का सन्देश उसी प्रकार उसने सुना दिया ॥२६४॥ यह सुनकर वह पतिव्रता बोली—'वह देवता भले ही अमर हों मेरा पति तो नल ही होगा। मुझे देवताओं से क्या प्रयोजन ? ॥२६५॥ दमयन्ती का यह उत्तर सुनकर नल ने उसके सामने अपने को प्रकट कर दिया फिर जाकर इन्द्र आदि लोकपालों से उसका उत्तर उसी प्रकार कह दिया ॥२६६॥ तब प्रसन्न देवताओं ने नल से कहा—हे सत्यवादी हमलोग तेरे वश में हैं। तू जब भी हमें स्मरण करेगा तभी हम तेरे समीप आयेंगे। इस प्रकार का वर उसे देकर वे देवता चले गये ॥२६७॥ तब नल के प्रसन्न होकर विदर्भ की ओर चले जाने पर दमयन्ती को ठगने की इच्छा से देवताओं ने नल का रूप धारण कर लिया ॥२६८॥ और राजा भीम की सभा में जाकर मनुष्यों का-सा व्यवहार करनेवाले वे देवता स्वयंवर प्रारम्भ होने पर, नल के पास ही बैठ गये ॥२६९॥

१७२ कथासरित्सागर

१७२ कथासरित्सागर अथैत्य दमयन्ती सा भ्रात्रा स्वनेकशो नृपान्। आवेद्यमानानुज्झन्ती क्रमात् प्राप नलान्तिकम् ॥२७०॥ दृष्ट्वा छायानिमेषादिगुणांस्तत्र च पञ्चसान्। सा भ्रातरि समुद्भ्रान्ते व्याकुला समचिन्तयत् ॥२७१॥ नूनं मे लोकपालैस्तैर्मयिषा पञ्चभिः कृता। षष्ठो मये नलो ह्यत्र न चान्यत्रास्ति मे गतिः ॥२७२॥ इत्यालोच्यैव साध्वी सा नलैकासक्तमानसा। आदित्याभिमुखी भूत्वा दमयन्त्येवमब्रवीत् ॥२७३॥ भो लोकपालाः स्वप्नेऽपि नलादन्यत्र चेन्न मे। मनस्तत्तेन सत्येन स्वं दर्शयत मे वपुः ॥२७४॥ वरात्पूर्ववृताच्चान्ये कन्यायाः परपूरुषाः। परदाराश्च सा तेषां तत्कथं मोह एष वः ॥२७५॥ श्रुत्वैतच्च शक्राद्याः स्वेन रूपेण तेऽभवन्। षष्ठः सत्यनलश्चाभूत्स्वरूपस्य स भूपतिः ॥२७६॥ तस्मिन् सा दमयन्ती तां फुल्लन्दीवरसुन्दरीम्। बुध्वा वरणमालां च सृष्टा राज्ञि नले व्यधात् ॥२७७॥ पपात पुष्पवृष्टिश्च नभोमध्यात्ततो नृप । विवाहमङ्गलं भीमश्चक्रे तस्या नलस्य च ॥२७८॥ विहितोचितपूजाश्च तेन वैदर्भभूभृता। नृपा यथागतं जग्मुर्देवाः शक्रादयश्च ते ॥२७९॥ शक्रादयस्तु ददृशुर्द्वा कलिद्वापरौ पथि। श्रुत्वा च दमयन्त्यर्थमागतौ तौ च तेऽब्रुवन् ॥२८०॥ न गन्तव्यं विदर्भेषु तत एवागता वयम्। वृत्तः स्वयंवरो राजा दमयन्त्या नलो वृतः ॥२८१॥ तच्छ्रुत्वैवोदतुः पापौ तौ कलिद्वापरौ रुषा। देवानामस्मदादीनांत्यक्त्वा यत्स मर्त्यो वृतस्तया ॥२८२॥ तदवश्यं करिष्यावो वियोगमुभयोस्तयोः। एवं कृतप्रतिज्ञौ तौ निवत्र्य ययतुस्ततः ॥२८३॥ नलश्च सप्त दिवसान् स्थित्वा श्वशुरवेश्मनि। दमयन्त्या समं बध्वा कृतार्थो निजधामगात् ॥२८४॥

नवम लम्बक १७४

नवम लम्बक १७४ तदनन्तर, अपने भाई के द्वारा एक-एक करके परिचित कराये जाते हुए अनेक राजाओं को छोड़ती हुई दमयन्ती क्रमशः नल के पास पहुँची ॥२७०॥ वहाँ जाकर छाया (परछाई) पलक गिरना आदि मानव गुणों से युक्त छह नलों को देखकर भाई के व्याकुल हो जाने पर दमयन्ती सोचने लगी-॥२७१॥ अवश्य ही उन पाँचों लोकपालों ने यह माया फैलाई है। इसलिए, इनमें छठे को ही मैं वास्तविक नल समझूँ और कोई दूसरा उपाय नहीं है ॥२७२॥ ऐसा सोचकर एकमात्र नल में लगे हुए मनवाली दमयन्ती सूर्य की ओर मुंह करके इस प्रकार बोली-॥२७३॥ 'हे लोकपालो यदि स्वप्न में भी मेरा मन नल को छोड़कर किसी दूसरे पुरुष में न गया हो तो इसी सत्य के प्रभाव से मुझे अपना स्वरूप दिखलाओ ॥२७४॥ विवाह से पहले ही वर लिये गये पुरुष के अतिरिक्त कन्या के लिए और सभी पर-पुरुष हैं और दूसरों के लिए, वह कन्या परस्त्री के समान है। तब तुम लोगों का यह कैसा अज्ञान है ॥२७५॥ यह सुनकर इन्द्र आदि पाँचों लोकपाल अपने वास्तविक रूप में आ गये और छठा राजा नल अपने यथार्थ रूप में स्पष्ट हुआ ॥२७६॥ तब प्रसन्न दमयन्ती ने खिले हुए नीलकमलों के समान अपनी दृष्टि और वरमाला दोनों ही राजा नल को डाल दिये ॥२७७॥ इतने में आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई। तब राजा भीम ने दमयन्ती का नल के साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया ॥२७८॥ इसके बाद भीम के द्वारा उचित शिष्टाचार और सत्कार किये गये अन्यान्य राजा और इन्द्र आदि देवता भी अपने-अपने स्थानों को गये ॥२७९॥ इन्द्र आदि देवताओं ने जाते हुए मार्ग में द्वापर और कलियुग को देखा। उन दोनों को दमयन्ती के स्वयंवर के निमित्त आये हुए जानकर उनसे वे देवता बोले-॥२८०॥ 'अब तुमलोग विदर्भ की ओर न जाओ। हम लोग वहीं से आ रहे हैं। स्वयंवर हो गया और दमयन्ती ने राजा नल को वर लिया ॥२८१॥ यह सुनते ही वे दोनों भारी क्रोध से बोले-'आप लोगों के समान देवताओं को छोड़कर उसने मनुष्य का वरण किया इसलिए हम उन दोनों का वियोग अवश्य करायेंगे' इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे दोनों वहीं से लौट गए ॥२८२-२८३॥ उधर राजा नल सात दिनों तक ससुराल में रहकर नई वधू दमयन्ती के साथ निषध देश को आ गया ॥२८४॥ ८५

१७४ कथासरित्सागर

१७४ कथासरित्सागर

तत्रासीत् प्रेम दम्पत्योर्गौरीशर्वोर्बिकं तयोः। शर्वस्य गौरी देहार्धं तस्य त्वात्मैव साभवत् ॥२८५॥ कालेन चन्द्रसेनाख्यं दमयन्ती नखात्सुतम्। प्रसूते स्म तदन्वेकामिन्द्रसेनां च कन्यकाम् ॥२८६॥ तावच्च स कलिश्छिद्रं तस्यामुच्छास्त्रवर्तिनः। मस्र्स्यासीच्चिरं चिन्वन्प्रतिज्ञातार्थनिश्चितः ॥२८७॥ वर्षेकवानुपास्यैव सन्ध्यामक्षालिताङ्घ्रिकः। स सुष्वाप नलः पानमदेन मुषितस्मृतिः ॥२८८॥ छिद्रमेतदवाप्यैव दत्तदृष्टिर्दिवानिशम्। कलिस्तस्य शरीरान्तर्नलस्य प्रविवेश सः ॥२८९॥ तेन देहप्रविष्टेन कलिना स नलो नृपः। विहाय धर्म्यमाचारमाचचार यथारुचि ॥२९०॥ मक्षैरदीव्यद्दासीभिररस्तासत्यमब्रवीत् । असेवत दिवा स्वप्नं स जगागार रात्रिषु ॥२९१॥ अकारात्कारणं कोपमन्यायेमार्थमाददे। अवमानं सतां चक्रे सम्मानमसतां च सः ॥२९२॥ तद्भावं पुष्करास्मै सथैवोक्तास्तत्सखम्। छिद्रं प्राप्य शरीरान्तःप्रविष्टो द्वापरो व्यधात् ॥२९३॥ कदाचित्पुष्कराख्यस्य गृहे तस्यानुजस्य सः। नलो ददर्श दान्ताख्यं सुन्दरं धवलं वृषम् ॥२९४॥ लोभामृग्यमानाय त तस्मै ज्यायसे न सः। द्वापरप्रस्ततद्बुद्धिः पुष्कराख्यो वृषं ददौ ॥२९५॥ जगाद च यद्यस्ति वाञ्छास्मिन्वृषभे तव। तद्द्यूतेन विजित्यैनं मस स्वीकुरु मा चिरम् ॥२९६॥ तच्छ्रुत्वा स नलो मोहान् प्रतिपेदे तथेति तत्। घत प्रवृत्ते द्यूतं तयोर्भ्रात्रोः परस्परम् ॥२९७॥ पुष्कराख्यस्य स वृषो नलस्यैमादय पणः। जिगाय पुष्कराख्यश्च नलो मुहुर्जीयत ॥२९८॥ न्निदेद्मित्रबले कोष हारितेऽपि दुरोदरात्। न नलो वार्यमाणोऽपि चचाल कलिबिप्लुतः ॥२९९॥