भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक १६१ दूसरे दिन वह मुनि उस नगर में धर्मव्याध को ढूँढ़कर, दूकान पर बैठे हुए और मांस बेचते हुए उससे मिला ॥१८४॥ धर्मव्याध मुनि को देखते ही बोला- क्या तुम्हें उस पतिव्रता ने भेजा है? ॥१८५॥ यह सुनकर आश्चर्य से भरा हुआ ऋषि उस धर्मव्याध से कहने लगा- मांस बेचनेवाला होकर भी तुझे इतना ज्ञान कैसे हुआ ? ॥१८६॥ इस प्रकार, पूछते हुए ऋषि से उस धर्मव्याध ने कहा- मैं एकमात्र माता-पिता का भक्त हूँ। वे ही मेरे देवता हैं॥१८६॥ उन्हें स्नान कराकर स्नान करता हूँ उनके भोजन कर लेने पर भोजन करता हूँ और उनके सो जाने पर सोता हूँ इसलिए मुझे ऐसा ज्ञान है॥१८७॥ दूसरों के द्वारा मारे गये पशुओं का मांस अपनी आजीविका के लिए बेचता हूँ। यह कार्य भी अपना धर्म (कर्त्तव्य) समझकर करता हूँ धन कमाने के लिए नहीं। मैं और वह पतिव्रता स्त्री दोनों ज्ञान के विघ्न अहंकार को पास नहीं फटकने देते। इसलिए, हम लोगों को आसानी से यह ज्ञान होजाता है॥॥१८८-१८९॥ इसलिए, तुम भी मुनियों का व्रत धारण करके अपनी शुद्धि के लिए अहंकार का परित्याग कर अपने धर्म का पालन करो। इससे तुम्हें वह परम प्रकाश प्राप्त हो जायगा ॥१९०॥ इस प्रकार उस धर्मव्याध से आविष्ट मुनि उसके साथ उसके घर गया और उसकी दिनचर्या से प्रसन्न होकर (तप के लिए) वन को गया ॥१९१॥ उनके उपदेश से मुनि ने सिद्धि प्राप्त की और मुनि की धर्मचर्या से वह पतिव्रता और व्याध भी सिद्धि को प्राप्त हुए ॥१९२॥ माता और पिता में भक्ति रखनेवालों का ऐसा चमत्कारी प्रभाव होता है, इसलिए चलो और तुम्हें देखने के लिए कालापित अपनी माता को धीरज बँधाओ' ॥१९३॥ पिता चन्द्रस्वामी से इस प्रकार कहा गया महीपाल पिता के अनुरोध से अपने देश जाने को तैयार हुआ ॥१९४॥ महीपाल ने अपने धर्मपिता से सब बातें करके और राज्य का सारा प्रबन्ध उसे सौंपकर रात्रि के समय पिता के साथ अपने देश को प्रस्थान किया ॥१९५॥ क्रमश अपने गाँव में पहुँचकर उस महीपाल ने अपनी माता को उसी प्रकार प्रसन्न किया जैसे वसन्त कोकिल को प्रसन्न करता है॥१९६॥