कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
४५२ कथासरित्सागर
४५२ कथासरित्सागर सापि तं सरसस्निग्धमुग्धेनालोक्य चक्षुषा। तदेकगतचित्ताभूद्विस्मृतस्वरधारणा ॥८॥ नरवाहनदत्तस्य चित्तज्ञो गोमुखस्ततः। केयं कस्य सुता चेति यावत्पृच्छति तत्सखी ॥९॥ तावच्च संमुखी तस्याः पूर्वं हेमारुणप्रभा। पश्चादवततारैका प्रौढा विद्याधरी दिवः ॥१०॥ सा चावतीर्य कन्यायास्तस्या पार्श्वे उपाविशत्। कन्याप्युत्थाय सा तस्याः पादयोरपतत्तदा ॥११॥ सर्वविद्याधराधीशं निर्विघ्नं पतिमाप्नुहि। इति प्रौढापि सा तस्यै कन्याया आशिषं ददौ ॥१२॥ नरवाहनदत्तोऽथ तामुपेत्य प्रणम्य च। दत्ताशिषं पर्यपृच्छत्सोम्यां विद्याधरीं शनैः ॥१३॥ केयं कन्या भवत्यम्ब त्वं का कथ्यतामिति। ततो विद्याधरी सा तमुवाच शृणु वच्म्यहम् ॥१४॥ अलङ्कारवती कथा अस्ति गौरीगुरोः शैले श्रीसुन्दरपुरं पुरम्। आस्तेऽलङ्कारशीलाख्यस्तत्र विद्याधरेश्वरः ॥१५॥ तस्योदारगुणन्यास्ति महिषी काञ्चनप्रभा। तस्यां तस्य च कालेन राज्ञः सूनुरजायत ॥१६॥ एष धर्मपरो भावीत्यादिष्टमुमया यया। स्वप्ने तदा धर्मशीलं नाम्ना तमकरोत्पिता ॥१७॥ क्रमेण यौवनप्राप्तं धर्मशीलं स तं सुतम्। राजा संयोज्य विद्याभिर्यौवराज्येऽभिषिक्तवान् ॥१८॥ ततः स यौवराज्यस्थो धर्मैकपरमो वशी। अरञ्जयद्धर्मशीलः पितुरप्यधिकं प्रजाः ॥१९॥ ततोऽलङ्कारशीलस्य राज्ञः सा काञ्चनप्रभा। अन्तर्वत्नी सती राज्ञी तस्य सूते स्म कन्यकाम् ॥२०॥ नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा चक्रवर्तिनः। कन्या भवित्रीति तदा दिव्या वागुदचोचयत् ॥२१॥
नवम लम्बक ४५३
नवम लम्बक ४५३ सरस और स्नेहपूर्ण आँखों से राजकुमार को देखती हुई वह दिव्यकुमारी भी स्वर संभाषण को भूलकर उसके प्रेम में मग्न हो गई ॥८॥ नरवाहनदत्त के हृदय को जाननेवाले उसके साथी गोमुख ने उस कन्या की सखियों से 'यह कौन है और किसकी कन्या है' आदि प्रश्न पूछने का जैसे ही विचार किया इतने में ही तपे हुए स्वर्ण के समान रक्तवर्णवाली एक प्रौढ़ा विद्याधरी आकाश से नीचे उतरी ॥९-१०॥ उतरकर वह उसी दिव्य कन्या के पास आकर बैठी। तब उस कन्या ने उठकर उसके चरणों में झुककर प्रणाम किया ॥११॥ तब उस प्रौढ़ा विद्याधरी ने आशीर्वाद दिया कि 'तू समस्त विद्याधरों के चक्रवर्ती को निर्विघ्न रूप से पति के रूप में प्राप्त कर' ॥१२॥ तब नरवाहनदत्त भी उसके पास जाकर और प्रणाम करके आशीर्वाद लेती हुई उस सौम्य विद्याधरी से पूछने लगा—॥१३॥ माता यह कन्या कौन है और तुम्हारी कौन होती है बताओ । तब वह विद्याधरी उससे कहने लगी—'सुनो मैं कहती हूँ ॥१४॥ अलंकारवती की कथा हिमालय पर्वत के ऊपर सुन्दरपुर नाम का एक नगर है। उस नगर में अलंकारशील नाम का विद्याधरों का राजा है॥१५॥ उदारगुणोंवाले उस राजा की कांचनप्रभा नाम की रानी है। समयानुसार उस रानी से राजा के एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१६॥ उसके उत्पन्न होने पर पार्वती ने स्वप्न में उसे यह आदेश दिया कि यह पुत्र अत्यन्त धर्मशील होगा। तभी राजा ने तदनुसार उसका नाम धर्मशील रख दिया ॥१७॥ क्रमशः युवावस्था में पहुँचे हुए उस पुत्र को पिता ने अपनी विद्याएँ पढ़ाकर युवराज-पद पर बैठा दिया ॥१८॥ युवराज-पद पर रहकर, एकमात्र धर्मपरायण और जितेन्द्रिय उस धर्मशील ने पिता से भी बढ़कर प्रजा को प्रसन्न किया ॥१९॥ तदनन्तर, राजा अलंकारशील की महारानी कांचनप्रभा ने गर्भवती होकर एक कन्या को जन्म दिया ॥२०॥ उस कन्या के उत्पन्न होने पर आकाशवाणी हुई कि यह कन्या विद्याधर चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की पत्नी होगी' ॥२१॥
४५४ कथासरित्सागर
४५४ कथासरित्सागर
ततोऽत्र तेनालङ्कारवतीति कृतनामिका। पित्रा क्रमणावर्धिष्ट भासा शशिकलेव सा॥२२॥ कालेन यौवनस्था च प्राप्तविद्या निजात्पितुः। तत्तदायतनं शम्भोर्भक्त्या भ्रमितुमुद्यता॥२३॥ तावच्च धर्मशीलोऽस्य भ्राता शान्तो युवापि सन्। रहोऽलङ्कारशीलं तं पितरं स्वं व्यजिज्ञपत्॥२४॥ न मां भोगा इमे तात प्रीणन्ति क्षणभङ्गुराः। किं तदस्ति हि संसारे पर्यन्तविरसं न यत्॥२५॥ तथा चैतत्त्वया किं न श्रुतं व्यासमुनेर्वचः। सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः॥२६॥ संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम्। तदेषु का रतिस्तात नश्वरेषु मनस्विनाम्॥२७॥ परत्र न सहायान्ति न भोगा मार्त्ससञ्चयाः। एकस्तु बान्धवो धर्मो न जहाति पदात्पदम्॥२८॥ तस्माद्वनं गत्वाहं साधयाम्युत्तमं तपः। आसादयेयं तद्येन शाश्वतं परमं पदम्॥२९॥ इत्युक्तवन्तं तं पुत्रं धर्मशीलं सगाकुलम्। राजाऽलङ्कारशीलोऽथ वक्ति स्मोदश्रुलोचनः॥३०॥ [L19: बालस्येव तवाकाण्डे कोऽयं पुत्र मतिभ्रमः। उपयुक्ते हि तारुण्ये प्रशमः सद्भिरिष्यते॥३१॥ कृतदारस्य धर्मेण राज्यं पालयतस्तव। भोगा भोक्तुमयं कालो न वैराग्यस्य साम्प्रतम्॥३२॥ एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा धर्मशीलोऽभ्यधात्पुनः। न शमाश्रमयोरेष नियमोऽस्ति वयःकृतः॥३३॥ ईश्वरानुगृहीतो हि कश्चिद्बालोऽपि शाम्यति। वृद्धोऽपि न शमं याति कश्चित्कापुरुषः पुनः॥३४॥ न च राज्ये रतिर्मेऽस्ति न वा दारपरिग्रहे। ममेतज्जीवितफलं यच्छिवारधनं तपः॥३५॥ इति ब्रुवाणं यत्नाप्यनिवार्यमवेक्ष्य तम्। पिताऽलङ्कारशीलोऽसौ विमुख्याप्यूच्यभाषत॥३६॥
नवम लम्बक ४५५
नवम लम्बक ४५५ तदनन्तर पिता ने उसका नाम अलंकारवती रखा और वह क्रमशः चन्द्रकला के समान बढ़ने लगी ॥२२॥ वह कन्या क्रमशः यौवनावस्था को प्राप्त कर, और पिता से विद्याओं को सीखकर, शिवभक्ति के कारण उन-उन शिव-मन्दिरों में भ्रमण करने लगी ॥२३॥ इसी अवसर पर इसके बड़े भाई धर्मशील ने युवा होने पर भी एक बार एकान्त में पिता से इस प्रकार निवेदन किया—॥२४॥ 'हे पिता ! ये क्षण-भंगुर सांसारिक भोग मुझे प्रसन्न नहीं करते। संसार में वह क्या है जो अन्त में नीरस नहीं हो जाता ॥२५॥ और, क्या तुमने व्यास मुनि का यह वचन नहीं सुना है कि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सभी का अन्त विनाश है। और, जितनी उन्नति है, उस सभी का अन्त पतन है ॥२६॥ सभी संयोगों का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मरण है। इसलिए, हे पिता, निश्चित रूप से विनाशवान् इन पदार्थों में मनस्वी विद्वानों को क्या प्रेम ? ॥२७॥ सांसारिक भोग और धन का संग्रह परलोक में सहायक नहीं हो सकते। अर्थात्, ये यहीं नष्ट हो जाते हैं॥२८॥ इसलिए, मैं वन में जाकर सर्वोत्तम तप करता हूँ जिसके द्वारा परम पद (मोक्ष) को प्राप्त कर सकूँ' ॥२९॥ राजा अलंकारशील पुत्र धर्मशील को इस प्रकार कहते हुए सुनकर व्याकुल हो उठा और आँखों में आँसू भरकर बोला—॥३०॥ पुत्र इस समय (यौवनकाल) में ही तुम्हें यह क्या बुद्धि भ्रम हो गया ! विद्वान् लोग युवावस्था का उपभोग हो जाने पर ही वैराग्य की कामना करते हैं ॥३१॥ यह समय विवाह करके धर्मपूर्वक राज्य के पालन करने का है। यह तुम्हारे लिए सांसारिक भोगों के भोगने का समय है, वैराग्य का नहीं' ॥३२॥ पिता के इस प्रकार वचन सुनकर धर्मशील फिर कहने लगा-'भोग और विराग का नियम वयस्था पर निर्भर नहीं है। ईश्वर की कृपा से अनुगृहीत कोई बालक भी विरक्त हो जाता है, किन्तु कोई कुत्सित पुरुष वृद्ध होने पर भी विरक्त नहीं हो पाता ॥३३-३४॥ राज्य पर मेरा प्रेम नहीं है और न मैं विवाह ही करना चाहता हूँ। शिव की आराधना करके तप करना ही मेरे जीवन का मुख्य ध्येय है ॥३५॥ ऐसा कहते हुए और विविध प्रयत्नों से भी न मानते हुए पुत्र को पिता ने आँसू बहाते हुए कहा—॥३६॥
यदि यूनोऽपि ते पुत्र वैराग्यमिदमीदृशम् । नास्ति वृद्धस्य मे सक्तिर्महमप्याश्रये वनम् ॥३७॥ इत्युक्त्वा मर्त्यलोकं च गत्वा भारायुतं ददौ । ब्राह्मणेभ्यो दरिद्रेभ्यो रत्नानां काञ्चनस्य च ॥३८॥ एत्य च स्वपुरं भार्यामुवाचैतत्काञ्चनप्रभाम् । त्वया मदाज्ञयैहैव स्थातव्यं नगरे निजे ॥३९॥ रक्षालङ्कारवत्येषा कन्या पूर्णे च वत्सरे । अस्ति यैवाह्नोऽस्यास्तिष्याख्यतने शुभे ॥४०॥ नरवाहनदत्ताय दास्याम्येतामहं तदा । स चक्रवर्ती जामाता पास्यतीदं पुरं च नः ॥४१॥ इत्युक्त्वा दत्तशपथां भार्यां राजा निवर्त्य सः । ससुतां विलपन्तीं तां सपुत्रः शिश्रिये वनम् ॥४२॥ सा तु स्वपुरमभ्यास्त तत्र भार्या काञ्चनप्रभा । दुहित्रा सह साध्वी स्त्री भर्त्राज्ञां का हि लङ्घयेत् ॥४३॥ सस्नुता च तया मात्रा सह स्नेहानुयातया । अलङ्कारवती भ्रान्ता बहून्यायतनानि च ॥४४॥ एकदा तां च वक्ति स्म विद्या प्रज्ञप्तिसंज्ञिका । कश्मीरेषु स्वयम्भूणि गत्वा क्षेत्राणि पूजय ॥४५॥ नरवाहनदत्तं हि निर्विघ्नं त्वं पतिं ततः । सर्वविद्याधरेन्द्रैकचक्रवर्तिनमाप्स्यसि ॥४६॥ इत्युक्ता विद्यया गत्वा काश्मीरात्सा समातृका । अलङ्कारवती शम्भुं पुण्यक्षेत्रेष्वपूजयत् ॥४७॥ नन्दिक्षेत्रे महादेवगिरावमरपर्वते । सुरेश्वर्याद्रिषु तथा विजये कपटेश्वरे ॥४८॥ एवमादिषु सम्पूज्य क्षेत्रेषु गिरिजापतिम् । विद्याधरेन्द्रकन्या सा तन्माता चागते गुहाम् ॥४९॥ तामेतां विद्ध्यलङ्कारवतीं सुभग कन्यकाम् । तां च मातरमप्येतस्या विद्धि मां काञ्चनप्रभाम् ॥५०॥ अद्य चैषा ममानुक्त्वेवागतेमं शिवालयम् । तत प्रज्ञप्तिविद्यातो विज्ञाय्याहमिहागता ॥५१॥
'बेटा यदि तुम्हारी इस अवस्था में ही तुम्हें वैराग्य हुआ है तो क्या वह मुझ वृद्ध को नहीं होगा ? अतः मैं भी वन में जाऊँगा' ॥३७॥ ऐसा कहकर और मर्त्यलोक में जाकर राजा ने ब्राह्मणों को रत्नों और सुवर्णों के दस हजार भार दान में दे दिये ॥३८॥ और, अपने नगर में आकर पत्नी कांचनप्रभा से कहा कि 'तुम्हें मेरी आज्ञा से इसी नगर में रहना होगा ॥३९॥ यहाँ रहकर इस कन्या अलंकारवती की रक्षा करनी होगी और समय आने पर, एक वर्ष पूरा होने पर,—क्योंकि आज का दिन ही उसके विवाह के लिए शुभ है। यही दिन इसके विवाह के शुभ लग्नवाला है—इसी दिन मैं स्वयं आकर इसे जामाता नरवाहनदत्त के लिए दूँगा। वह चक्रवर्ती जामाता हमारे इस नगर की रक्षा करेगा' ॥४०-४१॥ ऐसा कहते हुए राजा रोती हुई पत्नी और पुत्री को धपय देकर और उन्हें अपने घर छोड़कर स्वयं पुत्र के साथ वन को चला गया ॥४२॥ तब वह रानी कांचनप्रभा अपनी कन्या के साथ अपने नगर में ही रहने लगी। सच है कौन पतिव्रता स्त्री पति की आज्ञा का उल्लंघन कर सकती है ॥४३॥ तब राजा मलंकारशील की वह कन्या अलंकारवती स्नेह के साथ तीर्थयात्रा करती हुई अपनी माता के संग बहुत-से शैव तीर्थों का भ्रमण करने लगी ॥४४॥ एक बार उस अलंकारवती को प्रज्ञप्ति नामकी विद्या ने कहा कि कश्मीर में बहुत से स्वयंभू तीर्थ हैं। उनमें जाकर तप पूजन आदि करो। तब तुम विद्याविष के सब विद्याधरों के चक्रवर्ती नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त कर सकोगी ॥४५ ४६॥ विद्या के द्वारा ऐसा आदेश मिलने पर अलंकारवती ने माता के साथ कश्मीर जाकर अनेक पुण्यतीर्थों में शिव की पूजा की ॥४७॥ नन्दिक्षेत्र में महादेव पर्वत पर, अमर पर्वत पर, सुरेश्वरी पर्वत पर, विजय पर्वत तथा कपटेश्वर आदि क्षेत्रों में पार्वती-पति शिव की पूजा करके वह कन्या और उसकी माता अपने घर लौट आई ॥४८ ४९॥ हे सुभट, इस कन्या को तुम वही अलंकारवती समझो और मुझे उसकी माता कांचनप्रभा ॥५०॥ आज यह अलंकारवती मुझे बिना कहे ही यहाँ चली आई। मैंने भी प्रज्ञप्ति विद्या के प्रभाव से इसका यहाँ आना जानकर, यहाँ आ गई हूँ ॥५१॥ ५८
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर समुत्खातेव च ज्ञातस्त्वमपीहागतो मया। तदेतां देवताविष्टामुपयच्छस्व मे सुताम्॥५२॥ प्रातश्च सोऽस्या पित्रोक्तः प्रातो वैवाहिकवासरः। तदद्य पुत्र कौशाम्बीं स्वामेव नगरीं व्रज॥५३॥ आवामितश्च गच्छावः प्रातरेत्य तपोवनात्। राजालङ्कारशीलस्ते दास्येतेां सुतां स्वयम्॥५४॥ एवं तयोस्तेऽलङ्कारस्यास्तस्याश्च तस्य च। नरवाहनदत्तस्य काप्यवस्था द्वयोरभूत्॥५५॥ अन्योन्यरजनीमात्रविश्लेषासहनात्मनो । चक्रवाक्योरिवासन्ने दिनान्ते साश्रुनेत्रयोः॥५६॥ दृष्ट्वा तौ तादृशौ द्वावप्यवादीत्काञ्चनप्रभा। किमेकरात्रिविश्लेषे ह्यधैर्यं युवयोरिदम्॥५७॥ अनिश्चितावधि धीराः सहन्ते विरहं चिरम्। श्रूयतां रामभद्रस्य सीतादेव्यास्तथा कथा॥५८॥ रामसीताकथा राज्ञो दशरथस्यासीदयोध्याधिपतेः सुतः। रामो भरतशत्रुघ्नलक्ष्मणानां पुराग्रजः॥५९॥ विष्णोरवतारांशो रावणोच्छेदनाय यः। सीता तस्याभवद् भार्या प्राणैष्टा जनकात्मजा॥६०॥ स पित्रा भरतन्यस्तराज्येन विधियोगतः। प्रेषितोऽभूद्वनं साकं सीतया लक्ष्मणेन च॥६१॥ तत्र तस्याहरत्सीतां मायया रावणः प्रियाम्। निनाय च पुरीं लङ्कां पथि हत्वा जटायुषम्॥६२॥ ततः स रामो मित्री सुग्रीवं वालिनो वधात्। स्वीकृत्य मारुतिं प्रेष्य तत्प्रवृत्तिमबुध्यत॥६३॥ गत्वा च सागरे सेतुं बद्ध्वा हत्वा च रावणम्। लङ्कां विभीषणे न्यस्य सीतां प्रत्याजहार सः॥६४॥ १ सुप्रसिद्धा रामकथा। उत्तरकथायामत्र किञ्चित्प्रसिद्धकथातो भेदो दृश्यते।
नवम लम्बक ४५९
नवम लम्बक ४५९ इसी विद्या के द्वारा यह भी जाना कि तुम भी यहाँ आये हो। अतः देवता के आदेश से प्राप्त इस कन्या को ग्रहण करो ॥५२॥ इसके पिता का बताया हुआ विवाह-लग्न कल प्रातःकाल है। अतः आज तुम अपनी कौशाम्बी नगरी को जाओ और हम दोनों भी यहाँ से जाती हैं। प्रातःकाल इसके पिता धर्मकार धौत तपोवन से आकर, इस कन्या को स्वयं तुम्हें देंगे ॥५३-५४॥ कांचनप्रभा के इस प्रकार कहने पर, उस अलंकारवती और नरवाहनदत्त-दोनों की अवस्था अवर्णनीय हो गई ॥५५॥ वे दोनों चकवा-चकवी के समान परस्पर एक रात्रि का वियोग-दुःख भी सहन करने में असमर्थ हो रहे थे। अतः सायंकाल के समय उन दोनों की आँखों में आँसू थे ॥५६॥ उन दोनों को इस प्रकार आतुर देखकर कांचनप्रभा ने कहा—'एक रात्रि के ही वियोग में तुम दोनों को इतना अधैर्य क्यों हो रहा है ? ॥५७॥ धैर्यशाली व्यक्ति अनिश्चित अवधि तक चिरकालीन विरह का सहन करते हैं। इस सम्बन्ध में रामचन्द्र और सीतादेवी की कथा सुनो ॥५८॥ राम और सीता की कथा प्राचीन समय में अयोध्या-नरेश दशरथ के पुत्र राम भरत लक्ष्मण और शत्रुघ्न— इन चारों भाइयो में राम सबसे बड़ा था। वह रावण का विनाश करने के लिए विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ था। जनक राजा की सीता नाम की पुत्री उसकी प्राणप्यारी पत्नी थी ॥५९-६०॥ दैवयोग से भरत को राज्य देकर पिता ने राम को सीता और लक्ष्मण के साथ वन भेज दिया ॥६१॥ वहाँ वन में रावण ने कपट करके उसकी प्राणप्यारी सीता का हरण कर लिया और मार्ग में जटायु का वध करके वह उसे लंका को ले गया ॥६२॥ तब वियोगी राम ने बाली को मारकर और सुग्रीव से मित्रता की और हनुमान् को लंका भेजकर उसका समाचार प्राप्त किया ॥६३॥ तदनन्तर, राम ने समुद्र-तट पर जाकर उसमें पुल बाँधकर रावण को मारा और लंका का राज्य विभीषण को देकर सीता को प्राप्त किया ॥६४॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर अथावृत्तस्य वनात् शासतो भरतार्पितम् । तस्य राज्यमयोध्यायां सीता गर्भमधत्त सा ॥६५॥ तावच्चात्र प्रजाचेष्टां ज्ञातुमल्पपरिच्छदः । स्वैरं परिभ्रमन्नेकं सोऽपश्यत्पुरुषं प्रभुः ॥६६॥ हस्ते गृहीत्वा गृहिणीं निरस्यन्तं निशासु गृहात् । परस्येयं गृहमगादिति दोषानुकीर्तनात् ॥६७॥ रक्षोगृहोषिता सीता राघवेन नोज्झिता । अयमभ्यधिको भो मामुज्झति ज्ञातिवेश्मगाम् ॥६८॥ इति तद् गृहिणीं तां च ब्रुवतीं स्वं निज पतिम्। रामो राजा स शुश्राव क्षिप्रञ्चाभ्यन्तरं ययौ ॥६९॥ लोकापवादभीतश्च सीतां तत्याज तां वने। सहते विरहक्लेशं यशस्वी नायशः पुनः ॥७०॥ सा च गर्भालसा दैवाद्वाल्मीकेः प्रापदाश्रमम् । तेनर्षिणा समाश्वास्य तत्रैव ग्राहिता स्थितिम् ॥७१॥ नूनं सीता सदोषाऽयं त्यक्ता भर्त्राऽन्यथा कथम् । तदेतद्दर्शनाश्रित्य पापं संक्रामतीह नः ॥७२॥ वाल्मीकिः कृपया चैनां निर्वासयति नाश्रमात् । एतद्दर्शनजं पापं तपसा च व्यपोहति ॥७३॥ तदेत यावद् गच्छामो द्वितीयं कञ्चिदाश्रमम् । इति सम्मन्त्रयामासुस्तमभ्येत्य मुनयस्तदा ॥७४॥ तद् बुद्ध्वा तान्स वाल्मीकिरब्रवीत्तान् सदयः । शुद्धा प्रणिधानेन मया दृष्टा द्विजा इति ॥७५॥ तथाप्यप्रत्ययस्तेषां यदा सीता तदाभ्यधात् । भगवन्तो यथा विद्म तथा घोषयतेह माम् ॥७६॥ अशुद्धायाः शिरश्छेदनिग्रहः क्रियतां मम। तच्छ्रुत्वा जातकरुणा जगदुर्मुनयोऽथ ते ॥७७॥ अस्त्यत्र टीटिभरावा नाम तीर्थं महत्नु । टीटिभी हि पुरा कापि भर्तृत्यागद्रुतद्रुता ॥७८॥ मिथ्यैव दूषिता साध्वी चतन्दारणा भुषम् ।
नवम लम्बक ४६१
नवम लम्बक ४६१ लंका से लौटने के पश्चात् भरत द्वारा सौंपे गये राज्य का पालन करते हुए राम की पत्नी सीता ने गर्भ धारण किया ॥६५॥ उस अवसर पर प्रजा का समाचार जानने के लिए गुप्त रूप से अयोध्या में भ्रमण करते हुए राम ने एक पुरुष को देखा ॥६६॥ जो अपनी पत्नी को हाथ से खींचकर बाहर निकाल रहा था और वह उसका यह दोष घोषित कर रहा था कि उसकी स्त्री दूसरे व्यक्ति के घर पर जाकर रही ॥६७॥ राजा राम ने उस स्त्री को यह कहते हुए सुनकर अत्यन्त खेद और लज्जा का अनुभव किया कि 'राक्षस के घर में रही हुई सीता को रामचन्द्र ने नहीं छोड़ा। यह मेरा पति उससे भी बड़ा है, जो अपने ही बन्धु के घर में रही हुई मुझे त्याग रहा है, ॥६८ ६९॥ इस प्रकार, लोक-निन्दा के भय से राम ने सीता को वन में छोड़ दिया। सच है, यशस्वी व्यक्ति विरह-क्लेश का सहन करते हैं किन्तु निन्दा का सहन नहीं करते ॥७०॥ भय के कारण खिन्न सीता वन से वाल्मीकि के आश्रम में पहुँची और उस ऋषि ने उसे आश्वासन देकर वहीं ठहराया ॥७१॥ 'सीता अवश्य दुष्टा है अन्यथा उसका पति उसे क्यों छोड़ देता ? तो प्रतिदिन उसका दर्शन करने से लोगों को पाप चढ़ता है। वाल्मीकि तो दया के कारण उसे आश्रम से नहीं निकालते और उसके दर्शन से होनेवाले पाप को तप से नष्ट करते हैं। तो चलो किसी दूसरे आश्रम को चलें'-वाल्मीकि के आश्रम में रहनेवाले दूसरे मुनि इस प्रकार चर्चा करने लगे ॥७२-७४॥ दूसरे मुनियों के इन विचारों को सुनकर वाल्मीकि ने उनसे कहा-'इसमें सन्देह नहीं कि यह सीता चरित्र से शुद्ध है। हे मुनियों मैंने ध्यान से इसे देख लिया है। फिर भी जब उन मुनियों को अविश्वास रहा तब सीता ने कहा- 'आप लोग जैसा समझें उस प्रकार मेरी शुद्धि की जाँच करें। यदि मैं अशुद्ध होऊँ तो मेरा शिर काटकर मुझे दंड दें। यह सुनकर सभी दयाल मुनि कहने लगे। यहाँ घोर वन में टीटिभ सर नाम का तीर्थ है। प्राचीन समय में किसी टिट्टिहरी को उसके (नर) टिट्टिहरे ने दूसरे टिट्टिहरे के संगम का मिथ्या दोष लगाया था ॥७५-७८॥ इस कलंक के कारण दुःखित शरणहीन एवं अनाथा टिट्टिहरी पृथ्वी और लोकपालों का दुहाई देकर विलाप करने लगी। तब उन्होंने उसकी शुद्धि के लिए उस सरोवर की रचना की ॥७९॥
कथासरित्सागर
४६२ कथासरित्सागर
तत्रैषा राघववधूः परिशुद्धिं करोतु नः । इत्युक्तवद्भिस्तैः साकं जानकी तत्सरो ययौ ॥८०॥ यद्यार्यपुत्रादन्यत्र न स्वप्नेऽपि मनो मम। तदुत्तरेयं सरसः पारमम्ब वसुन्धरे ॥८१॥ इत्युक्त्वैव प्रविष्टा च तस्मिन्सरसि सा सती। नीता च पारमुत्सङ्गं कृत्वाविर्भूतया भुवा ॥८२॥ ततस्तां ते महासाध्वीं प्रणेमुर्मुनयोऽखिलाः। राघवं शप्तुमैच्छंश्च तत्परित्यागमन्युना ॥८३॥ युष्माभिरार्यपुत्रस्य न ध्यातव्यममङ्गलम्। शप्तुमर्हथ मामेव पापामभ्यञ्जलिरेष वः ॥८४॥ इति यद्वारयामास सीता तान्सा पतिव्रता। तेन ते मुनयस्तुष्टास्तस्याः पुत्राशिषं ददुः ॥८५॥ ततः सा तत्र तिष्ठन्ती समये सुषुवे सुतम्। तं च नाम्ना लवं चक्रे स वाल्मीकिमुनिः धियुम् ॥८६॥ बालमादाय तं तस्यां गतायां स्नातुमेकदा। तेन शून्यं तदुटजं दृष्ट्वा सोऽचिन्तयन्मुनिः ॥८७॥ स्थापयित्वार्भकं याति स्नातुं सा तत् क्व सोऽर्भकः । नीतः स श्वापदेनेह नूनमन्यं सृजामि तत् ॥८८॥ स्नात्वागतान्यथा सीता न प्राणान्धारयेदिह। इति ध्यात्वा कुशैः कृत्वा पवित्रं निर्ममेऽर्भकम् ॥८९॥ लवस्य सदृशं स च स तमास्थापयन्मुनिः। आगता तं च सा दृष्ट्वा मुनिं सीता व्यजिज्ञपत् ॥९०॥ स्वकोऽयं मे स्थितो बालस्तदेषोऽन्यः कुतो मुने। तच्छ्रुत्वा स यथावृत्तमुक्त्वा मुनिरुवाच ताम् ॥९१॥ भवितव्यं गृहाण त्वं द्वितीयमममे सुतम्। कुशसंज्ञं मयायं यत्स्वप्रभावात्कुशैः कृतः ॥९२॥ इत्युक्ता तन मुनिना सीता सबबुचो सुतौ। तेनैव कृतसंस्कारौ वर्धयामास तत्र तौ ॥९३॥ बालावेव च तौ दिव्यमस्त्रग्राममवापतुः। विद्याश्च सर्वाः वाल्मीकिमुनेः क्षत्रकुमारकौ ॥९४॥
नवम काण्डक ४६३ उसी सरोवर में राम की यह पत्नी अपनी निष्कलंकता का हमें प्रमाण दें।—इस प्रकार कहते हुए उन मुनियों के साथ सीता टीटिम-सर में गईं ॥८०॥ 'यदि आर्यपुत्र राम के सिवा स्वप्न में भी मेरा मन पर-पुरुष की ओर न गया हो तो हे वसुन्धरे ! मैं इस तालाब के पार हो जाऊँ ॥८१॥ ऐसा कहकर उस सरोवर में प्रविष्ट उस सती सीता को माता पृथ्वी ने गोद में उठाकर उस पार कर दिया ॥८२॥ इस घटना से विश्वस्त समस्त महामुनियों ने उस महापतिव्रता को प्रणाम किया और वे उसका त्याग करने के कारण क्रोध से राम को शाप देने के लिए तैयार हो गये ॥८३॥ तब सती सीता ने कहा—'आप लोगों को मेरे पति रामचन्द्र का अशुभ न सोचना चाहिए। आप लोग मुझे ही शाप दे सकते हैं। मैं आप लोगों को हाथ जोड़ती हूँ' ॥८४॥ इस प्रकार, जब सीता ने उन मुनियों को शाप देने से रोका तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर उसे पुत्र होने का आशीर्वाद दिया ॥८५॥ तदनन्तर, आश्रम में रहती हुई सीता ने वहाँ पुत्र प्रसव किया। मुनि वाल्मीकि ने उसका नाम लव रखा ॥८६॥ एक बार बालक को साथ लेकर वह सीता स्नान करने चली गई। इस कारण उसकी पर्णकुटी को खाली देखकर मुनि वाल्मीकि ने सोचा कि वह (सीता) बालक को सदा यहीं रखकर ही स्नान करने जाती थी तो अवश्य ही किसी हिंसक जन्तु ने बालक को मार खाया होगा। अतः मैं दूसरे बालक का निर्माण करता हूँ ॥८७-८८॥ नहीं तो नहाकर आई सीता अवश्य ही प्राण-त्याग कर देगी। यह सोचकर मुनि ने कुश की पवित्री बनाकर बालक की रचना कर दी ॥८९॥ और लव के समान ही उसे बनाकर उसके स्थान पर रख दिया। तदनन्तर, स्नान से लौट कर आई हुई सीता ने उस बालक को देखकर मुनि से कहा—॥९०॥ 'हे मुने मेरा बालक तो यह है फिर यह दूसरा बालक कैसा है? यह सुनकर मुनि ने सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया और कहा—'हे पवित्र सीते यह भवितव्य की बात है। अब इस दूसरे बालक को भी ग्रहण कर लो। इसका नाम कुश है क्योंकि मैंने अपने प्रभाव से इसे कुशों द्वारा निर्मित किया है ॥९१—९२॥ मुनि द्वारा इस प्रकार कही गई सीता ने मुनि द्वारा ही संस्कार किये गये उन दोनों बालकों का पालन-पोषण किया ॥९३॥ उन दोनों क्षत्रियकुमारों ने बालकपन में ही मुनि वाल्मीकि की कृपा से सभी दिव्य शस्त्रास्त्रों और विद्याओं को भली भाँति सीख लिया ॥९४॥
२६४ कुशाचरितसार एकदा आश्रममृगं हत्वा तन्मांसमादतुः । अर्धास्थिभिश्च वाल्मीकेरचक्रतुः क्रीडनीयकम् ॥९५॥ तत क्षिप्तो मुनिः सोऽथ सीतादेव्यानुनाधितः । प्रायश्चित्तं तयोरेवमादिक्षेत् कुमारयोः ॥९६॥ गत्वा कुबेरसरसः स्वर्णपद्मान्यथ लवः । तदुद्यानाच्च मन्दारपुष्प्याण्यानयतु द्रुतम् ॥९७॥ तैरेतौ भ्रातरावत्संल्लिङ्गमर्चयतामुभौ । तेनैतयोरिदं पापमुपशान्तिं गमिष्यति ॥९८॥ एतच्छ्रुत्वैव कैलासं स बालोऽपि लवो ययौ । आधस्कन्द कुबेरस्य सरस्तच्चोपवनं च तत् ॥९९॥ निहत्य यक्षानादाय पद्मानि कुसुमानि च । आगच्छन्नपि स श्रान्तो विशश्राम तरोस्तले ॥१००॥ अत्रान्तरं च रामस्य हयमेधे सुलक्षणम् । चिन्वन्मुख्यमागच्छत्तेन मार्गेण लक्ष्मणः ॥१०१॥ स लवं समराहूतं मोहनास्त्रेण मोहितम् । क्षत्रधर्मेण बद्ध्वा तमयोध्यामनयत्पुरीम् ॥१०२॥ तावच्च सीतामाश्वास्य लवागमनदुःखिताम् । वाल्मीकिः स्वाश्रमे तत्र ज्ञानी कुशमभाषत ॥१०३॥ भीतोऽयोध्यांमवष्टभ्य लक्ष्मणेन सुतो लवः । गच्छ मोधय तं तस्मादभिरस्त्रैर्विनिर्जितात् ॥१०४॥ इत्युक्त्वा दत्तदिव्यास्त्रस्तेन गत्वा कुशस्ततः । रोध्यमानामयोध्यायां यज्ञभूमिं सरोष सः ॥१०५॥ जिगाय लक्ष्मणं चात्र तन्निमित्तं प्रभाषितम् । युद्धे दिव्यैर्महास्त्रैस्तैस्ततो रामस्तमभ्यगात् ॥१०६॥ सोऽपि प्रभावाद्वाल्मीकेर्जेतुं नास्त्रं क्षमाक तम् । कुशं यत्नेन पप्रच्छ कोऽर्षस्ते को भवानिति ॥१०७॥ कुशस्ततोऽब्रवीद् बद्ध्वा लक्ष्मणेनाग्रजो मम । आनीतः इह तस्याहं मोचनार्थमिहागतः ॥१०८॥ आवां लवकुशौ रामतनयाविति जानकी । माता नौ वक्ति चेत्युक्त्वा तद्वृत्तान्तं शशंस सः ॥१०९॥
नवम लम्बक ४६५
नवम लम्बक ४६५
एक बार उन दोनों बालकों ने आश्रम के एक मृग को मारकर उसका मांस खा डाला और मुनि वाल्मीकि के पूजन करने के शिवलिङ्ग को बिछौना बनाकर खेल डाला ॥९५॥ इस कारण मुनि खिन्न हुए, तो सीतादेवी ने उनसे क्षमा-प्रार्थना की। तब मुनि ने उन दोनों के लिए इस प्रकार प्रायश्चित्त की आज्ञा दी ॥९६॥ 'यह लव कुबेर के सरोवर में जाकर सोने के कमल ले आवे और उसके उद्यान से मंदार के पुष्प। उनसे ये दोनों भाई इस शिवलिङ्ग की पूजा करें तो इस पाप की शान्ति होगी' ॥९७-९८॥ यह सुनते ही उस बालक लव ने कुबेर के सरोवर और उद्यान पर धावा बोल दिया और उसके रक्षक यक्षों को मारकर कमल और मन्दार-पुष्प प्राप्त किये। उन्हें लेकर लौटते समय मार्ग में श्रान्त होने के कारण उसने एक वृक्ष के नीचे विश्राम किया ॥९९-१००॥ इसी बीच राम के नरमेध यज्ञ में किसी अच्छे लक्षणोंवाले पुरुष को ढूँढ़ता हुआ लक्ष्मण उधर आ निकला ॥१०१॥ वह (लक्ष्मण) युद्ध के लिए ललकारे हुए लव को सम्मोहनास्त्र से मोहित करके क्षात्र धर्म के अनुसार उसे बाँधकर अयोध्या नगरी को ले गया ॥१०२॥ उधर लव के आने में विलम्ब होने पर दुःखित सीता को धैर्य देकर ज्ञानी वाल्मीकि ने अपने आश्रम में कुश से कहा—॥१०३॥ 'पुत्र! लव को लक्ष्मण पकड़कर अयोध्या ले गया है। तू जा और इन दिव्य अस्त्रों से उसको जीतकर और लव को छुड़ाकर ले आ' ॥१०४॥ मुनि के ऐसा कहने पर दिव्य अस्त्रों से युक्त कुश अयोध्या गया और युद्ध करते हुए उसने यज्ञभूमि को घेर लिया ॥१०५॥ और युद्ध करने के लिए आये हुए लक्ष्मण को उसने दिव्य महान् अस्त्रों से जीत लिया। तब राम ने उस पर आक्रमण किया किन्तु वाल्मीकि मुनि के प्रभाव से राम भी उसे अपने अस्त्रों से जीत न सके। तब राम ने कुश से पूछा-'तुम कौन हो ? ॥१०६-१०७॥ तब कुश ने कहा-'लक्ष्मण ने मेरे बड़े भाई लव को बाँध लिया है उसे यहाँ लाओ। मैं उसे छुड़ाने के लिए ही यहाँ आया हूँ ॥१०८॥ हम लव और कुश दोनों राम के पुत्र हैं। ऐसा माता जानकी कहती हैं। इतना कहकर फिर उसने अपना समाचार कहा ॥१०९॥ ५९
४६६ कथासरित्सागर
४६६ कथासरित्सागर ततः सवाष्पो रामस्त मवमानाय्य तावुभौ । कण्ठे जग्राह सैषोऽहं पापो राम इति ब्रुवन् ॥११०॥ अथ सीतां प्रशंसत्सु वीरो पश्यत्सु तौ शिशू । पौरेषु मिलितञ्चक्र स तौ रामोऽग्रहीत्सुतौ ॥१११॥ आनाम्य सीतादेवीं च वाल्मीकेराश्रमात्ततः । तया सह सुखं तस्थौ पुत्रन्यस्तभरोऽथ सः ॥११२॥ एवं सहन्ते विरहं धीराश्चिरमपीदृशम् । न सहषे मुग्धां पुत्रीं कथमेकामपि क्षपाम् ॥११३॥ इत्यात्मजामलङ्कारवतीं परिणयोत्सुकाम् । नरवाहनदत्तं च तमुक्त्वा काञ्चनप्रभा ॥११४॥ नभसा प्रातरागन्तुमगादादाय तां सुताम् । नरवाहनदत्तोऽपि कौशाम्बीं विमना ययौ ॥११५॥ तत्रानिद्रं निशि स्माह गोमुखस्तं विनोदयन । पृथ्वीरूपकथां देव शृण्विमां कथयामि ते ॥११६॥ पृथ्वीरूपवरनृपतेः रूपलतायाश्च कथा अस्ति नाम्ना प्रतिष्ठानं नगरं दक्षिणापथे । पृथ्वीरूपाभिधानोऽभूद्राजा तत्रातिरूपवान् ॥११७॥ तं परिक्षितिनौ जातु श्रमणौ द्वावुपेयतुः । विलोक्याद्भुतरूपं च तावेव नृपमूचतुः ॥११८॥ द्वावावां पृथिवीं भ्रान्तौ न च रूपेण ते समम् । अन्यं पुमांस नारीं वा दृष्टवन्तौ क्वचित्प्रभो ॥११९॥ किं तु मुक्तिपुरद्वीपे राज्ञो रूपधरस्य या । अस्ति हेमप्रभादभ्यां जाता रूपलता सुता ॥१२ ०॥ सैका ते सदृशी कन्या तस्याश्चैको भवानपि । युवयोर्यदि संयोगो भवेत्स्यात्सुकृतं ततः ॥१२१॥ इति श्रमणवाक्येन समं मदनसायकाः । प्रविश्य श्रुतिमार्गेण रागस्तस्यांससञ्ज हृदि ॥१२२॥ ततः समुत्सुको राजा निजं चित्रकरोत्तमम् । कुमारदत्तनामानं पृथ्वीरूपः समादिशत् ॥१२३॥
नवम लम्बक ४१७
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तब रोते हुए राम ने सब को वहीं बैठाकर उन दोनों को गले लगाया और कहा कि वह पापी राम मैं ही हूँ। (तुम दोनों जिसके पुत्र हो) ॥११० ॥ तदनन्तर एकत्र नगर-निवासियों के सीता की प्रशंसा करने पर राम ने उन दोनों पुत्रों को स्वीकार किया ॥१११॥ तब सीतादेवी को बाल्मीकि के आश्रम से बुलाकर और पुत्रों को राज्य का भार सौंप कर राम सुखपूर्वक रहने लगे ॥११२॥ इस प्रकार, धैर्यशाली महापुरुष इतने भीषण विरहों का भी सहन करते हैं। पुत्रो तुम दोनों एक रात्रि का विरह भी सहन नहीं कर पा रहे हो ॥ ११३॥ इस प्रकार, विवाह के लिए उत्सुक पुत्री अलङ्कारवती और नरवाहनदत्त से कांचन- प्रभा ने कहा ॥११४॥ ऐसा कहकर और कन्या को साथ लेकर कांचनप्रभा प्रातःकाल आने के लिए आकाश मार्ग से उड़कर चली गई और दुखी चित्त नरवाहनदत्त भी कौशाम्बी लौट आया ॥११५॥ कौशाम्बी में रात्रि को निद्राहीन नरवाहनदत्त का मनोरंजन करते हुए गोमुख ने कहा- 'महाराज मैं तुम्हें पृथ्वीरूप राजा की कथा सुनाता हूँ सुनो'—॥११६॥
राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा
दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठान नाम का एक नगर है। वहाँ पृथ्वीरूप नाम का अत्यन्त रूपवान् राजा था ॥११७॥ किसी समय उसके समीप दो ज्ञानी श्रमण (बौद्ध भिक्षु) आये और राजा के आश्चर्यकारी सुन्दर रूप को देखकर बोले-॥११८॥ 'राजन्, हम दोनो सारे भू-मण्डल में घूमे किन्तु हे प्रभु, तुम्हारे जैसा रूपवान् पुरुष या स्त्री कहीं भी हमने नहीं देखा ॥११९॥ किन्तु, मुक्तिपुर द्वीप में राजा रूपधर की पत्नी हेमलता देवी से उत्पन्न रूपलता नाम की कन्या है ॥१२० ॥ वही एक तुम्हारे योग्य है और तुम्हीं एक उसके योग्य हो। यदि तुम दोनों का विवाह हो जाय तो बहुत अच्छा हो ॥१२१॥ इस प्रकार श्रमणों की बातों को सुनकर कामदेव के बाण राजा के कानों द्वारा घुसकर उसके हृदय में जा लगे ॥१२२॥ तब उत्कण्ठित राजा पृथ्वीरूप ने कुमारदत्त नामक अपने कुशल चित्रकार को आज्ञा दी ॥१२३॥
४६८ कथासरित्सागर
४६८ कथासरित्सागर
पटे यथावल्लिखितां समादाय मदाकृतिम्। एताभ्यां सह भिक्षुभ्यां द्वीप मुक्तिपुरं व्रज॥१२४॥ तत्र रूपधराख्यस्य राज्ञस्तद्दुहितुस्तथा। युक्त्या रूपलतायाश्च मदाकारं प्रवर्धय॥१२५॥ पश्य किं स नृपस्तो मे ददाति तनयां न वा। तां च रूपलतां चित्रे लिखिला त्वमिहानय॥१२६॥ एवमुक्त्वाभिलेक्ष्य स्वं रूपं चित्रपटे स तम्। सभिक्षुकं चित्रकरं द्वीप सं प्राहिणोन्नृपः॥१२७॥ ते च क्रमान्चित्रकरश्रमणाः प्रस्थितास्ततः। प्रापुः पत्नपुरं नाम नगरं वारिधेस्तटे॥१२८॥ ततः प्रवहणारूढा गत्वैवाम्बुधिवर्त्मना। ते तं मुक्तिपुरद्वीपमवापुः पञ्चमेऽहनि॥१२९॥ तत्र चित्रकरो गत्वा राजद्वारि स चीरिकाम्। मम चित्रकरस्तुल्यो नान्योऽस्तीत्युदसम्भयत्॥१३०॥ तद् बुद्ध्वैव समाहूतो राज्ञा रूपधरेण सः। प्रविश्य राजभवनं तं प्रणम्य व्यजिज्ञपत्॥१३१॥ पृथ्वीं भ्रान्त्वा मया देव न दृष्टश्चित्रकृत्समः। तद्देवासुरमर्त्यानामालिखामि क्रमादिश॥१३२॥ तच्छ्रुत्वानाय्य नृपतिः स तां रूपलतां पुरः। इमामालिख्य मत्पुत्रीं वद्येत्येत्याविशत् तम्॥१३३॥ ततः कुमारिकत्त स चित्रकृद्राजकन्यकाम्। आलिख्य वर्धयामास तद्रूपामेव तां पटे॥१३४॥ अथ रूपधरो राजा तुष्टो मत्वा विचक्षणम्। पृच्छति स्म स तं चित्रकरं जामातृलिप्सया॥१३५॥ भद्र पृथ्वी त्वया भ्रान्ता तद् ब्रूहि यदि कुत्रचित्। रूपे मद्दुहितुस्तुल्या दृष्टा स्त्री पुरुषोऽपि वा॥१३६॥ इत्युक्तस्तन राज्ञा स चित्रकृत्प्रत्युवाच तम्। नैतत्तुल्या मया दृष्टा नारी नाप्यथवा पुमान्॥१३७॥ एकस्तु पृथ्वीरूपाख्यः प्रतिष्ठाने महीपतिः। दृष्टः समोऽस्यास्तेनेपा युज्यते यदि साधु तत्॥१३८॥
प्रथम काण्ड ४१९ (नोट: इस पृष्ठ का मूल पाठ अत्यधिक धुंधला/खंडित (heavily degraded/pixelated) होने के कारण केवल शीर्ष भाग “प्रथम काण्ड ४१९” के अतिरिक्त शेष पंक्तियों के अक्षर स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं हैं।)
४७० कथासरित्सागर
४७० कथासरित्सागर तुल्यरूपा यदा तेन न प्राप्ता राजकन्यका। तदा नवेऽपि तारुण्ये स तिष्ठत्यपरिग्रहः ॥१३९॥ मया च देव दृष्ट्वैव स राजा लोचनप्रियः। अभिलिख्य पटे सम्यग्गृहीतो रूपकौतुकात् ॥१४०॥ सच्छ्रुत्वा किं पटः सोऽस्तीत्युक्तस्तेन स भूभृता। अस्तीत्युक्त्वा च तं चित्रकरः पटमदर्शयत् ॥१४१॥ तत्र दृष्ट्वा स तद्रूपं पृथ्वीरूपस्य भूपतेः। राजा रूपधरो दध्रे विस्मयाघूर्णितं शिरः ॥१४२॥ जगाद च वयं धन्या यैरत्र लिखितोऽप्ययम्। दृष्टो राजा नमस्तेभ्यः साक्षात्पश्यन्ति ये त्वमुम् ॥१४३॥ एतत्पितृवचः श्रुत्वा दृष्ट्वा चित्रे च तं नृपम्। सोत्का स्मरलता भाम्यञ्चुक्षोभ न ददर्श च ॥१४४॥ तां मारमोहितां दृष्ट्वा सुतां स नृपतिस्तदा। कुमारदत्तं तं चित्रकरं रूपधरोऽभ्यधात् ॥१४५॥ नास्त्यालेख्यविसंवादस्तव तद्दुहितुर्मम। एतस्याः प्रतिरूपः स पृथ्वीरूपनृपः पतिः ॥१४६॥ तदेतं मत्सुताचित्रपटं नीत्वाद्य सत्वरम्। पृथ्वीरूपनृपायेतां मत्सुतां गच्छ दर्शय ॥१४७॥ आख्याय च यथावृत्तं सतस्मै यदि रोचते। यदिह द्रुतमायातु परिणेतुं मदात्मजाम् ॥१४८॥ इत्युक्त्वा पूजयित्वार्थैः स सहस्थितभिक्षुकम्। राजा चित्रकरं तं च स्वदूतं च विसृष्टवान् ॥१४९॥ ते गत्वाम्बुधिमुत्तीर्य चित्रकृद्दूतभिक्षुकाः। सर्वे प्रापुः प्रतिष्ठानं पृथ्वीरूपनृपान्तिकम् ॥१५०॥ तत्र प्राभृतकं दत्त्वा कार्यं शंसे यथाकृतम्। स रूपधरसंदेशं राज्ञे तस्मै न्यवेदयत् ॥१५१॥ स च चित्रकृदेतस्मै भूभृते तामदर्शयत्। कुमारदत्तश्चित्रस्थां प्रियां दम्पततां गतः ॥१५२॥ राज्ञस्तस्य वपुष्यस्या लावण्यसरसीकृतः। मग्ना दृष्टिस्तथा नैतामुद्धर्तुमशकत्तथा ॥१५३॥
नवम लम्बक ४०१
नवम लम्बक ४०१
उस राजा को अपने समान सुन्दरी कन्या नहीं मिली इसीलिए उसने अभी तक विवाह ही नहीं किया ॥१३९॥ महाराज मैंने तो नयनों के प्यारे उस राजा को देखकर ही उसके सौन्दर्य के कौतूहल से पत्र पर उसका चित्र भी बना दिया है, ॥१४०॥ उसके इस प्रकार कहने पर राजा ने पूछा कि 'क्या उसका चित्रपट तुम्हारे पास है ?' उत्तर में चित्रकार ने 'हैं'—ऐसा कहकर राजा को वह चित्र दिखा दिया ॥१४१॥ उस चित्रपट पर राजा पृथ्वीरूप का रूप देखकर राजा रूपधर ने आश्चर्य के साथ अपना सिर हिलाया ॥१४२॥ और प्रसन्न होकर वह बोला—'हम धन्य हैं। जिन्होंने वस्त्र पर लिखे राजा के इस रूप को देखा और जो लोग इसे प्रत्यक्ष देखते हैं, उन्हें हम प्रणाम करते हैं ॥१४३॥ पिता के ऐसे वचन सुनकर और चित्र में राजा को देखकर उत्कण्ठित रूपलता ने और कुछ देखा न सुना ॥१४४॥ तदनन्तर, अपनी कन्या को काम-मोहित देखकर राजा रूपधर ने उस चित्रकार से कहा—॥१४५॥ यदि तुम्हारे चित्रपट में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है तो राजा पृथ्वीरूप इस कन्या के अनुकूल पति है। इसलिए मेरी इस कन्या के चित्रपट को ले जाकर उन्हें दिखा दो ॥१४६-१४७॥ और, यह सब समाचार सुनकर यदि उचित समझें तो मेरी कन्या का वरण करने के लिए शीघ्र ही यहाँ आवें ॥१४८॥ इतना कहकर और चित्रकार का धन से सत्कार करके राजा रूपधर ने विदूषक के साथ उसे विदा किया और अपने एक दूत को भी उनके साथ भेजा ॥१४९॥ कुछ ही दिनों में वे चित्रकार, विदूषक और दूत समुद्र को पारकर प्रतिष्ठान नगर में राजा पृथ्वीरूप के पास पहुँचे ॥१५०॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने राजा पृथ्वीरूप को राजा रूपधर के भेजे हुए उपहार आदि देकर मुक्त्तिपुर का सब समाचार और राजा रूपधर का सन्देश सुनाया ॥१५१॥ और, उस चित्रकार कुमारदत्त ने चित्रपट पर लिखा रूपलता का चित्र भी राजा पृथ्वीरूप को, दिखा दिया ॥१५२॥ लावण्य की विलासस्थली उस रूपलता के शरीर का चित्र में देखता हुआ राजा इस प्रकार मग्न हो गया कि वह वहाँ से अपनी दृष्टि हटा नहीं सका ॥१५३॥