भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम काण्डक ४६३ उसी सरोवर में राम की यह पत्नी अपनी निष्कलंकता का हमें प्रमाण दें।—इस प्रकार कहते हुए उन मुनियों के साथ सीता टीटिम-सर में गईं ॥८०॥ 'यदि आर्यपुत्र राम के सिवा स्वप्न में भी मेरा मन पर-पुरुष की ओर न गया हो तो हे वसुन्धरे ! मैं इस तालाब के पार हो जाऊँ ॥८१॥ ऐसा कहकर उस सरोवर में प्रविष्ट उस सती सीता को माता पृथ्वी ने गोद में उठाकर उस पार कर दिया ॥८२॥ इस घटना से विश्वस्त समस्त महामुनियों ने उस महापतिव्रता को प्रणाम किया और वे उसका त्याग करने के कारण क्रोध से राम को शाप देने के लिए तैयार हो गये ॥८३॥ तब सती सीता ने कहा—'आप लोगों को मेरे पति रामचन्द्र का अशुभ न सोचना चाहिए। आप लोग मुझे ही शाप दे सकते हैं। मैं आप लोगों को हाथ जोड़ती हूँ' ॥८४॥ इस प्रकार, जब सीता ने उन मुनियों को शाप देने से रोका तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर उसे पुत्र होने का आशीर्वाद दिया ॥८५॥ तदनन्तर, आश्रम में रहती हुई सीता ने वहाँ पुत्र प्रसव किया। मुनि वाल्मीकि ने उसका नाम लव रखा ॥८६॥ एक बार बालक को साथ लेकर वह सीता स्नान करने चली गई। इस कारण उसकी पर्णकुटी को खाली देखकर मुनि वाल्मीकि ने सोचा कि वह (सीता) बालक को सदा यहीं रखकर ही स्नान करने जाती थी तो अवश्य ही किसी हिंसक जन्तु ने बालक को मार खाया होगा। अतः मैं दूसरे बालक का निर्माण करता हूँ ॥८७-८८॥ नहीं तो नहाकर आई सीता अवश्य ही प्राण-त्याग कर देगी। यह सोचकर मुनि ने कुश की पवित्री बनाकर बालक की रचना कर दी ॥८९॥ और लव के समान ही उसे बनाकर उसके स्थान पर रख दिया। तदनन्तर, स्नान से लौट कर आई हुई सीता ने उस बालक को देखकर मुनि से कहा—॥९०॥ 'हे मुने मेरा बालक तो यह है फिर यह दूसरा बालक कैसा है? यह सुनकर मुनि ने सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया और कहा—'हे पवित्र सीते यह भवितव्य की बात है। अब इस दूसरे बालक को भी ग्रहण कर लो। इसका नाम कुश है क्योंकि मैंने अपने प्रभाव से इसे कुशों द्वारा निर्मित किया है ॥९१—९२॥ मुनि द्वारा इस प्रकार कही गई सीता ने मुनि द्वारा ही संस्कार किये गये उन दोनों बालकों का पालन-पोषण किया ॥९३॥ उन दोनों क्षत्रियकुमारों ने बालकपन में ही मुनि वाल्मीकि की कृपा से सभी दिव्य शस्त्रास्त्रों और विद्याओं को भली भाँति सीख लिया ॥९४॥

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