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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

८५४ कथासरित्सागर

८५४ कथासरित्सागर तस्य यूथेन शशका गाहमानेन तत्र ते । शिलीमुखस्य बहवः शशराजस्य चूर्णिताः ॥३१॥ ततो गजपतौ तस्मिन् गते सोऽत्र शिलीमुखः । दुःखितो विजयं नाम शशं प्राह्याससन्निधौ ॥३२॥ लब्धास्वादो गजेन्द्रोऽयं पुनः पुनरिहैष्यति । निःशेषयिष्यत्यस्मांश्च तदुपायोऽत्र चिन्त्यताम् ॥३३॥ गच्छ तस्यान्तिकं पश्य युक्तिः काप्यस्ति चेन्न वा । त्वं हि कार्यमुपायं च वेत्सि वक्तुं च युक्तिमान् ॥३४॥ यत्र यत्र गतस्त्वं हि तत्र तत्राभवच्छुभम् । इति स प्रेषितस्तेन प्रीतस्तत्र ययौ शनैः ॥३५॥ मार्गानुसारात् प्राप्तं च वारेन्द्रं ददर्श तम् । यथा तथा च युक्तं स्यात् सङ्गो बलिनेति सः ॥३६॥ शशोऽद्रिशिखरासङ्गो धीमांस्तमवदद् गजम् । अहं देवस्य चन्द्रस्य दूतस्त्वां चवमाह सः ॥३७॥ शीतं चन्द्रसरो नाम निवासोऽस्ति सरो मम । तत्रासते शशास्तेषां राजाऽहं ते च मे प्रियाः ॥३८॥ अत एवास्मि शीतांशू शशी चेति गतः प्रभाम् । तत्सरो नाशितं ते च शशका मे हतास्त्वया ॥३९॥ भूयः कर्तासि चेदेवं मत् प्राप्स्यसि तत्फलम् । एतद्दूताच्छशाच्छ्रुत्वा गजेन्द्रः सोऽब्रवीद् भयात् ॥४०॥ नैवं करिष्ये भूयोऽहं मान्यो मे भगवान्छशी । तदेहि दर्शयामस्ते यावत् प्रार्थये सखे ॥४१॥ इत्यूचिबान् स नागेन्द्रमानीय सरसोऽन्तरे । तत्र तस्मै धणश्चन्द्रप्रतिबिम्बमदर्शयत् ॥४२॥ तद्दृष्ट्वा दूरतो मत्वा भयात् कम्पसमाकुलः । नतं द्विपैन्द्रं स ययौ भूयस्तत्र न चाययौ ॥४३॥ प्रत्यक्षं तच्च दृष्ट्वा स शशराजः शिलीमुखः । सम्मान्य तं शशं दूतमवसत्तत्र निर्भयः ॥४४॥ इत्युक्त्वा वायसो भूयः पक्षिणस्तानभाषत । एवं प्रभुः स्वनाम्नैव मस्य कश्चिन्न बाधते ॥४५॥

द्वादश लम्बक ८५५

द्वादश लम्बक ८५५ उसके झुंड के वहाँ आने पर शिलीमुख के बहुत-से अनुचर खरहे, उसके पैरों से रौंदे जाकर चूर्ण बिचूर्ण-हो गए ॥३६१॥ हाथी-सरदार के चले जाने पर, दुःखित शिलीमुख ने सभी खरहों की सभा में विजय नामक खरहे से कहा-॥३६२॥ 'यह गजराज यहाँ जल का आनन्द पाकर बार-बार आयगा और हमलोगों को निक्षेप कर डालेगा । इसलिए, इस विषय में कोई उपाय सोचो ॥३६३॥ उसके पास जाओ । देखो कोई युक्ति लगती है या नहीं। तुम कार्य और उपाय सब जानते हो और बोलने में भी कुशल हो ॥३६४॥ तुम जहाँ-जहाँ गये वहाँ-वहाँ शुभ ही हुआ। 'इस प्रकार कहकर शिलीमुख से भेजा हुआ विजय प्रसन्न होकर वहाँ गया ॥३६५॥ मार्ग के अनुसार जाते हुए उसने गजराज को देखा और सोचने लगा कि जैसे-तैसे इस बलवान् का समागम हो। तब वह विजय नामक खरहा पहाड़ की चोटी पर चढ़कर उस हाथी से बोला- मैं राजा चन्द्रमा का दूत हूँ। उसने मुझे यह सन्देश दिया है ॥३६६-३७॥ चन्द्रसर नाम का शीतल सरोवर मेरा निवास-स्थान है। वहाँ शश (खरगोश या खरहा) रहते हैं वे मेरे प्यारे हैं। इसीलिए, मेरा नाम शीतांशु और शशी है। तूने उस सर को गंदला कर दिया और मेरे प्यारे शशों को मार डाला है ॥३६८-६९॥ यदि तुम फिर ऐसा करोगे तो उसका फल (दंड) पाओगे। दूत के मुँह से यह सन्देश सुनकर वह गजराज भय से बोला -॥४० ॥ 'अब फिर मैं ऐसा न करूँगा । भगवान् चन्द्रमा मेरे पूज्य हैं। आओ मुझे चन्द्रमा का दर्शन कराओ । मैं उनसे प्रार्थना करूँ' ॥४१॥ ऐसा कहते हुए उसे विजय ने ले जाकर रात्रि के जल में चन्द्रमा की परछाईं दिखा दी । ॥४२॥ इसे देखकर और भय से काँपते हुए गजराज ने प्रणाम किया। फिर वह जंगल को लौट गया और उसके बाद वह कभी उधर न आया ॥४३॥ इस घटना को आँखों से देखकर शशों के राजा शिलीमुख ने विजय नामक दूत का बहुत सम्मान किया और वहाँ निडर होकर रहने लगा ॥४४॥ ऐसा कहकर वह चीला उन पक्षियों से फिर बोला-'राजा ऐसा होना चाहिए जिसके नाम से ही कोई कष्ट न दे ॥४५॥

[८५६] कथासरित्सागर

[८५६] कथासरित्सागर

तदुलूको दिवाभोज्यः क्षुद्रो राज्यं कुतोऽर्हति । क्षुद्रश्च स्यादविश्वास्यस्तत्र चैतां कथां शृणु ॥४६॥ शशकपिञ्जलकथा¹ कदाचित् क्वापि वृक्षऽद्रुमवस तत्र चाप्यथ । पक्षी कपिञ्जलो नाम वसति स्म कृतालयः ॥४७॥ स कदाचिद् गत क्वापि यावन्न दिवसान् बहून् । आयाति तावत्तन्नीडं ततस्त्यः शशकोऽवसत् ॥४८॥ दिने कपिञ्जलोऽत्रागात् ततोऽस्य शशकस्य च । नीडो मे तव नेत्येव विवाद उदभूद्द्वयोः ॥४९॥ निर्णेतारं ततः सम्यगन्वेष्टुं प्रस्थितावुभौ । तावहं कौतुकाद् द्रष्टुमन्वगच्छमलक्षितः ॥५०॥ गत्वा स्तोकं सरस्तीरेऽहिंसाधृतमृषाव्रतम् । ध्यानाधोमीलितदृशं मार्जारं तावपश्यताम् ॥५१॥ एतमेव च पृच्छाव किं न्यायमिह धार्मिकम् । इत्युक्त्वा तौ बिडालं तमुपेत्यैवमवोचताम् ॥५२॥ शृणु नौ भगवन्न्यायं तपस्वी त्वं हि धार्मिकः । श्रुत्वैतदल्पया वाचा बिडालस्तौ जगाद सः ॥५३॥ न शृणोमि तपः क्षामो दूरादायात मेऽन्तिकम् । धर्मो ह्यसम्यङ् निर्णीतो निहन्त्युभयलोकयोः ॥५४॥ इत्युक्त्वाश्वास्य तावप्रमानीय स बिडालकः । उभावप्यवधीत्क्षुद्रः साकं शशकपिञ्जलौ ॥५५॥ तदेवं नास्ति विश्वासः क्षुद्रकर्मणि दुर्जने । [L23: तस्मादुलूको राज्याय न कर्त्तव्योऽतिदुर्जनः ॥५६॥ इत्युक्ताः पक्षिणस्तेन वायसेन तथेति ते । अभिषेकमुलूकस्य निवार्यैतस्ततो ययुः ॥५७॥ अद्यप्रभृति यूयं च वयं चाप्योन्यशत्रवः । स्मर यामीत्युलूकस्तं काकमुक्त्वा क्रुधा ययौ ॥५८॥


१ क्षुद्रमर्थपतिं प्राप्य व्यापारवधतत्परौ । उभावपि क्षयं प्राप्तौ पुरा शशकपिञ्जलौ ॥ पञ्चतन्त्रे—

द्वादश लम्बक ८५७

द्वादश लम्बक ८५७ तब दिन का अन्धा और क्षुद्र उल्लू कैसे राजा बन सकता है। सभी क्षुद्र व्यक्ति अविश्वासी होते हैं। इस विषय में एक कथा सुनो' ॥४६॥ शश और कपिञ्जल की कथा किसी समय किसी वृक्ष पर मैं (कौआ) रहता था और उसी वृक्ष के नीचे अपना घर बनाकर कपिञ्जल नाम का पक्षी भी रहता था ॥४७॥ वह कपिञ्जल किसी समय दूर देश को जाकर, जब बहुत दिनों तक नहीं लौटा तब उसके घोंसले में एक शश आकर रहने लगा ॥४८॥ कुछ दिनों बाद कपिञ्जल लौट आया तब उसे घोंसले के विषय में 'यह मेरा है, तेरा नहीं' दोनों में इस प्रकार का झगड़ा हो गया। तब वे दोनों इसका निर्णय करने के लिए किसी निर्णायक को ढूंढने निकले। कौतुकवश मैं भी छिपे-छिपे उन दोनों के पीछे-पीछे गया ॥४९-५०॥ कुछ दूर जाकर, उन्होंने किसी तालाब के किनारे झूठा अहिंसा-व्रत धारण किये हुए और ध्यान में आधी आँखें बन्द किये हुए एक बिलाव को देखा ॥५१॥ इसी धार्मिक व्यक्ति से न्याय क्यों न पूछें ऐसा कहकर वे दोनों उसके पास जाकर बोले—॥५२॥ 'भगवन् तुम धार्मिक और तपस्वी हो हमारे न्याय को सुनो। यह सुनकर वह बिलाव बहुत थोड़े शब्दों में उन दोनों से बोला—॥५३॥ 'मैं तपस्या से दुर्बल होने के कारण ऊँचा सुनता हूँ। इसलिए, तुम दोनों दूर से मेरे समीप आ जाओ। भली भाँति न दिया गया न्याय दोनों लोकों का नाश करता है' ॥५४॥ ऐसा कहकर और उन दोनों को पास बैठाकर, उस क्षुद्र बिलाव ने शश तथा कपिञ्जल दोनों को साथ ही मार डाला ॥५५॥ इसलिए, नीच कर्म करनेवाले दुर्जन का विश्वास न करना चाहिए। और इसीलिए, अत्यन्त दुर्जन (कुष्ट) उल्लू को राजा नहीं बनाना चाहिए ॥५६। कौए से इस प्रकार कहे गये पक्षी उसकी बात मानकर उल्लू का राज्याभिषेक रोककर इधर-उधर उड़ गये ॥५७॥ वह उल्लू 'आज से हम और तुम दोनों परस्पर शत्रु हुए। याद रखना अब मैं जाता हूँ' क्रोध पूर्वक इस प्रकार मुझसे कहकर चला गया ॥५८॥ १८

ब्राह्मणस्य धूर्तानां च कथा

काकोऽपि युक्तमुक्तं तु मत्वा खिन्नस्ततोऽभवत्। वाङ्मात्रोत्पादितासङ्ख्येरात्को नानुवप्यते ॥५९॥ एव वाञ्चोपसम्भूत वर न कौशििकै सह। इत्युक्त्वा काकराज त चिरजीव्यब्रवत् पुन ॥६०॥ बह्ववो यस्मिन्स्ते श्व जेतु शक्या न कौशिका। बह्ववो हि जयन्तीह शृणु चात्र निदर्शनम् ॥६१॥ ब्राह्मणस्य धूर्तानां च कथा छाग क्रीत गृहीत्वांसे ग्रामात्कोऽपि व्रजन् द्विज। बहुभिर्ददृशे मार्गे धूर्तैश्छाग जिहीर्षुभि ॥६२॥ एकश्च तेम्य आगत्य तमुवाच ससम्भ्रमम्। ब्रह्मन्कथमय स्कन्धे गृहीत श्वा त्वया त्यज ॥६३॥ सच्छ्रुत्वा तमनादृत्य स द्विज प्राक्रमत्तदा। ततोऽन्यो द्वावुपेत्यान्रे तद्वदेव तमूचतु ॥६४॥ तत ससशमो यावद्याति च्छाग निरुपयन्। तावन्त्ये त्रयोऽभ्येत्य समेवमवदञ्छठाः ॥६५॥ क्वच यज्ञोपवीत त्व श्वानं च वहसे समम्। नून व्याधो न विप्रस्त्वं हन्त्यनेन शुना मृगान् ॥६६॥ तच्छ्रुत्वा स द्विजो दध्यौ नून भूतन् केनचित्। भ्रान्गितोऽह दुद्य ह्रुत्वा सर्वे पश्यन्ति वि मृषा ॥६७॥ इति विप्र स त त्यक्त्वा छागं स्नात्वा गृह ययौ। धूर्ताश्च नीत्वा तमजं यथेच्छं समभक्षयन् ॥६८॥ काकोलकीयकथाया शेषोऽशः इत्युक्त्वा चिरजीवी त वायसश्वरमब्रवीत्। तदेवं देव बह्वो यसवन्तदप दुर्जया ॥६९॥ तम्माद्यत्नविरोपण्डेस्मिन् यन्न्ं वष्मि तत्शृ। विक्षिप्यन्तश्छिप्रमन्डाश मां रक्तक्वाग्पंश्च सङ्गोप्य ॥७०॥ यूय गिर्गिमम यात श्लाथों यावदेम्यहम्। लब्ध्वत्वा स मयोपत्र त्रय्यात्ष्टिणगच्छ्म्॥७१॥ श्चत्वाधत्त गिरि प्रायात् वायसराज स मानुग। चिरञ्जीवी तु तत्राशीत् पतित्वा न्वन्तरोन्ममे ॥७२॥

दशम लम्बक ८५९

दशम लम्बक ८५९ इस कारण कौआ भी 'कहा तो ठीक' ऐसा सोचकर व्याकुल हुआ। केवल वाणी से उत्पन्न हुए असह्य वैर से किसे पश्चात्ताप नहीं होता ॥५९॥ इस प्रकार वाणी के अपराध से हमारे और उल्लुओं के बीच वैर हो गया। काकराज से इस प्रकार कहकर चिरजीवी फिर बोला—॥६० ॥ 'महाराज वे उल्लू संख्या में बहुत हैं और हमसे बलवान् भी हैं। इसलिए, युद्ध के द्वारा जीते नहीं जा सकते। अधिक संख्यावाले ही विजय प्राप्त करते हैं। इस सम्बन्ध में एक उदाहरण सुनो' ॥६१॥ ब्राह्मण और धूर्तों की कथा एक कोई ब्राह्मण एक बकरा खरीदकर और उसे कन्धे पर रखकर जा रहा था। उसे मार्ग में बकरा ठग लेने की इच्छा रखनेवाले कई धूर्तों ने देखा ॥६२॥ उनमें से एक ने उसके पास आकर घबराहट के साथ कहा—'ब्राह्मण देवता तुमम इस कुत्ते को कन्धे पर क्यों रख लिया ? इसे छोड़ो' ॥६३॥ यह सुनकर उसकी परवाह न करके ब्राह्मण आगे चला। तब उसे दूसरे दो धूर्त आगे मिले और बोले-'अरे, तुम जनेऊ और कुत्ता दोनों को एक साथ कन्धे पर रखे हुए हो कैसा ब्राह्मण हो? तब वह बकरे को भली भांति देखता हुआ कुछ आगे गया तो तीन और धूर्त उसे मिले और बोले— तुम अवश्य बहेलिये हो ब्राह्मण नहीं। इस कुत्ते के द्वारा मृगों को मारते हो' ॥६४—६६॥ यह सुनकर ब्राह्मण ने सोचा कि अवश्य ही किसी भूत ने मेरी आंखों का हरण कर मुझे धोखा दिया है, अन्यथा क्या ये सभी व्यक्ति इसे झूठ देख रहे हैं? ॥६७॥ यह सोचकर बकरे को वहीं छोड़कर और स्नान करके वह घर गया और उधर वे धूर्त उस बकरे को लेकर आनन्दपूर्वक खा गए ॥६८॥ कौए और उल्लुओं की कथा का संबंध ऐसा कहकर चिरजीवी काकराज से बोला—'अतः महाराज बहुत और बलवान् दुर्जय होते हैं। इसलिए, मैं इन बलवान् के साथ विरोध में जो कहता हूँ वह करो। तुम लोग मेरे पंखों को कुछ नोचकर इसी पेड़ के नीचे फेंककर उस पहाड़ पर चले जाओ। तबतक मैं कार्य करके (सफल होकर) आता हूँ ॥६९—७१ ॥ यह सुनकर काकराज सोच में कुछ पंखों को नोचकर और चिरजीवी को नीचे फेंककर मंन्त्री अपने अनुयायियों के साथ पहाड़ की ओर चला गया और चिरजीवी स्वयं उल्लुओं के

८६ कथासरित्सागर

८६ कथासरित्सागर ततस्तत्राययौ रात्रौ सानुगः स उलूकराट्। अवमर्दो न चापश्यत्तत्रैकमपि वायसम्॥७३॥ तावत् स चिरजीव्यत्र मन्द मन्दं विरौत्यधः। श्रुत्वा चोलूकराजस्तमवतीर्य ददर्श सः॥७४॥ कस्त्वं किमवस्थोऽसीत्यपृच्छत्तं सविस्मयः। ततः स चिरजीवी तं रुजेवाल्पस्वरोऽवदत्॥७५॥ चिरजीवीत्यहं तस्य सचिवो वायसप्रभोः। स च दातुमवस्कन्दमच्छते मन्त्रिसम्मतम्॥७६॥ ततस्तन्मन्त्रिणोऽन्यांस्तान्निर्भर्त्स्याहं समब्रवम्। यदि पृच्छसि मां मन्त्रं यदि चाहं मतस्तव॥७७॥ तन्न कार्यो बलवता कौशिकेन्द्रेण विग्रहः। कार्यस्त्वनुनयस्तस्य नीतिं चेदनुमन्यसे॥७८॥ श्रुत्वैतच्छत्रुपक्षोऽयमिति क्रोधात्प्रहृत्य मे। स काकः स्वैः समं मित्रैर्मूर्खोऽवस्थामिमां व्यधात्॥७९॥ क्षिप्त्वा च मां तरुतले क्वापि सानुचरो गतः। इत्युक्त्वा चिरजीवी स श्वसन्नासीदधोमुखः॥८०॥ उलूकराजश्च ततः स पप्रच्छ स्वमन्त्रिणः। किमेतस्य विधातव्यमस्माभिश्चिरजीविनः॥८१॥ तच्छ्रुत्वा दीप्तनयनो नाम मन्त्री जगाद तम्। अवध्यो रक्ष्यते चोरोऽप्युपकारीति सज्जनैः॥८२॥ वृद्धवणिक्चौरस्य च कथा तथाहि पूर्वं क्वाप्यासीद् वणिक्कोऽपि स कामपि। वृद्धोऽप्यर्थप्रभावेण परिणिन्ये वणिज्सुताम्॥८३॥ सा तस्य शयने नित्यं जरात्तोऽभूत् पराङ्मुखी। व्यतीतपुष्पकालेऽत्र भ्रमरीव तरोर्वने॥८४॥ एकदा चाविशच्चोरो निधिं सम्भ्यासयोस्तयोः। तं दृष्ट्वा सा परावृत्य तमाश्लिष्यत् पतिं भयात्॥८५॥

दशम लम्बक ८६१

दशम लम्बक ८६१ तब रात में उल्लूकराज असमर्थ अपने सहयोगियों के साथ वहाँ आया और उसने वहाँ एक भी कौए को न देखा ॥७३॥ तब चिरंजीवी नीचे पड़ा हुआ धीरे-धीरे कराहने लगा । उसका कराहना सुनकर उल्लूकराज ने नीचे आकर उसे देखा ॥७४॥ और आश्चर्य के साथ उससे पूछा—'तू कौन है और तेरी ऐसी दशा क्यों है ? तब वह चिरंजीवी वेदना से लड़खड़ाती हुई वाणी में धीरे से बोला ॥७५॥ “मैं चिरंजीवी नाम का काकराज का सचिव हूँ । वह अन्य मन्त्रियों की सम्मति से तुम पर आक्रमण करना चाहता था ॥७६॥ तब मैंने उसे और उसके अन्य मन्त्रियों को डाँटते-फटकारते हुए कहा—'यदि तुम मुझसे सम्मति पूछते हो और मुझे मानते हो और यदि नीति को मानते हो तो उसके अनुसार उस बलवान् उल्लूकराज से विरोध न करना चाहिए प्रत्युत उससे अनुनय-विनय करनी चाहिए ॥७७-७८॥ यह सुनकर यह शत्रु का पक्षपाती है'—ऐसा कहकर और क्रोध से मुझपर प्रहार करके उस मूर्ख कौए ने अपने साथियों के साथ मेरी यह दुर्दशा कर डाली ॥७९॥ तदनन्तर मुझे वृक्ष के नीचे फेंककर अपने अनुयायियों के साथ वह कहीं भाग गया। कहकर चिरंजीवी ने लम्बी साँस लेकर अपना मुंह लटका दिया ॥८० ॥ यह सुनकर उल्लूकराज ने अपने मन्त्रियों से पूछा कि अब हमें इस चिरंजीवी का क्या करना चाहिए' ॥८१॥ उल्लूकराज का यह प्रश्न सुनकर उसका दीप्तनयन नाम का मन्त्री उससे बोला—'अरक्षणीय चोर भी उपकारी समझकर सज्जनों द्वारा रक्षा करने योग्य है ॥८२॥ वृद्ध बनिया और चोर की कथा प्राचीन समय में कहीं एक बनिया था। वृद्ध होने पर भी उसने धन के प्रभाव से किसी बनिये की कन्या से विवाह कर लिया ॥८३॥ वह वैश्य-कन्या रात में बिस्तर पर उस बनिये से इस प्रकार मुंह फेरकर सोती थी जैसे वन में वसन्त-काल के बीतने पर भ्रमरी वृत्त से विमुख हो जाती है ॥८४॥ एक बार, रात में जब वे दोनों शय्या पर सो रहे थे तब घर में चोर घुस आया। यह देखकर उस कन्या ने भय से (पति की ओर) करवट बदलकर उस वृद्ध पति का आलिंगन किया ॥८५॥

४६२ कथासरित्सागर

४६२ कथासरित्सागर सममभ्युदयमाश्चर्यं मत्वा यावन्निरीक्षते । विवस्तत्र वणिक्तावत्कोणे चौरं ददर्श तम् ॥८६॥ उपकार्यसि मे तत्त्वां न मृत्यवेऽतिसृजाम्यहम् । इत्युक्त्वा सोऽथ चौरं तं रक्षित्वा प्राहिणोद् वणिक् ॥८७॥ एवं रक्ष्योज्प्यमस्माकं चिरजीव्युपकारकः । इत्युक्त्वा दीप्तनयनो मन्त्री तूष्णीं बभूव सः ॥८८॥ ततोऽन्यं वक्रनासाख्यं मन्त्रिणं कौशिकेश्वरः । स पृच्छति स्म किं कार्यं सम्यग्वक्तुं भवानिति ॥८९॥ वक्रनासस्ततोऽवादीद्वध्योऽप्य परमम्बित् । अस्माकमेतयोर्वैरं श्रेयसे स्वामिमन्त्रिणोः ॥९०॥ राक्षसचौर्योः कथा निदर्शनायैषा दैव श्रूयतामत्र वच्मि ते । कश्चित्प्रतिग्रहेण द्वे गावो प्राप द्विजोत्तमः ॥९१॥ तस्य दृष्ट्वाथ चौरस्ते गावो नेतुमचिन्तयत् । तत्कालं राक्षसः कोऽपि समैच्छत् खादितुं द्विजम् ॥९२॥ तदद्य निशि गच्छन्तौ दैवात्तौ चौरराक्षसौ । मिलित्वाऽन्योन्यमुक्तार्थौ यत्र प्रययतुः समम् ॥९३॥ अहं धेनू हराम्यादौ त्वद्गृहीतो ह्ययं द्विजः । सुप्तो यदि प्रबुध्येतद्वेरयं गोयुगं कथम् ॥९४॥ मव हराम्ह पूर्वं विप्रं मोचेद्वृथा मम । भवद्गोपुरशब्देन प्रबुद्धेऽस्मिन् परिश्रमः ॥९५॥ इति प्रविश्य तद्विप्रसदनं चौरराक्षसौ । यावतौ कलहायेतं तावत्प्राबोधि स द्विजः ॥९६॥ उत्थायात्तकृपाणं च तस्मिन् रक्षोघ्नजापिनि । त्रासाणे जग्मतुश्चौरराक्षसौ द्वौ पलाय्य तौ ॥९७॥ एवं तयोर्मिथो भङ्गो हितायाभूद्द्विजन्मनः । तथा भेदो हितोऽस्माकं शत्रोश्चिरजीविनोः ॥९८॥ इत्युक्तो वक्रनासेन कौशिकेन्द्रः स्वमन्त्रिणम् । तं च प्राकारकर्णाख्यमपृच्छत्सोऽप्यवाच तम् ॥९९॥

दशम लम्बक ८६३

दशम लम्बक ८६३ इस आश्चर्यजनक अपने सौभाग्य को देखकर उस वृद्ध बनिये ने चारों ओर देखा तो एक कोने में उसे चोर दिखाई दिया ॥८६॥ 'तू मेरा उपकारी है इसलिए मैं तुझे अपने सेवकों से पिटवाऊँगा नहीं' उस चोर से ऐसा कहकर उस बनिये ने उसे सुरक्षित रूप से बाहर निकाल दिया ॥८७॥ इसी प्रकार, अपने उपकारी इस चिरजीवी की हमें रक्षा करनी चाहिए। यह कहकर दीप्तनयन नाम का मन्त्री चुप हो गया ॥८८॥ तब उलूकराज ने वक्रनास नामक अपने दूसरे मन्त्री से पूछा कि 'इसका क्या करना चाहिए, आप अच्छी तरह बताइए' ॥८९॥ तब वक्रनास ने कहा- शत्रुओं के मर्म (गुप्त भेद) को जाननेवाले इस चिरजीवी की रक्षा करनी चाहिए। शत्रु राजा और उसके मन्त्री का बैर, हमारे कल्याण के लिए होगा मैं कहता हूँ ॥९०॥ ब्राह्मण चोर और राक्षस की कथा इस विषय में उदाहरण के लिए एक कथा सुनो। किसी ब्राह्मण ने दान में दो गौएँ पाईं। यह देखकर चोर ने उसकी गायें चुराने की इच्छा की और उसी समय एक राक्षस ने उस ब्राह्मण को खाने की बात सोची ॥९१-९२॥ अपने-अपने कार्य के लिए, रात में बाहर जाते हुए दोनों (चोर और राक्षस) मिले और अपना-अपना प्रयोजन बताकर एक साथ हो लिये ॥९३॥ पहले मैं गायें चुरा लेता हूँ क्योंकि तुमसे पकड़ा हुआ ब्राह्मण यदि जाग उठा तो मैं कैसे गौएँ चुराऊँगा ? ऐसा नहीं पहले मैं ब्राह्मण को खा लेता हूँ। यदि गायों के खुरों की खट- पटाहट से ब्राह्मण जाग उठा तो मेरा परिश्रम व्यर्थ हो जायगा ॥९४-९५॥ जब ब्राह्मण के घर में पहुंचकर चोर और राक्षस इस प्रकार बोल-चालकर लड़ने लगे तो उनके शब्द से वह ब्राह्मण जाग उठा ॥९६॥ उसने उठकर, राक्षसों के नाश करने का मन्त्र जपते हुए हाथ में तलवार उठाई तो वे दोनों चोर और राक्षस भाग गये ॥९७॥ जिस प्रकार चोर और राक्षस का आपसी झगड़ा ब्राह्मण के लिए हितकर हुआ वैसे ही काकराज और चिरजीवी का झगड़ा हमारे लिए हितकर होगा ॥९८॥ वक्रनास के ऐसा कहने पर उलूकराज ने प्राकारकर्ण नाम के मन्त्री से पूछा और मन्त्री ने उससे कहा-॥९९॥

८६४ कथासरित्सागर

८६४ कथासरित्सागर चिरजीव्यनुकम्प्योऽयमापन्नः शरणागतः। शरणागतहन्तो प्राक्स्वमामिषमदाच्छिखि ॥१००॥ प्राकारकर्णञ्चैवन्तत्सजिवं क्रूरलोचनम्। उलूकराजः पप्रच्छ सोऽपि शुद्धदमापत ॥१०१॥ ततो रक्ताक्षनामानं सचिवं कौशिकेश्वरः। तमेव परिपप्रच्छ सोऽपि प्राज्ञोऽब्रवीदिदम् ॥१०२॥ राजन्नपनयेनैतैर्मन्त्रिभिर्नाधितो भवान्। प्रतीयन्त न नीतिज्ञाः कृतावज्ञस्य वैरिणः ॥१०३॥ मूर्खो दृष्टव्यलीकोऽपि व्याजसान्त्वेन तुष्यति। रथकारस्य तद्भार्यायाश्च कथा¹ तथा हि तक्षा कोऽप्यासीद् भार्याभूतस्य तु प्रिया ॥१०४॥ तां चान्यपुरुषासक्तां तक्षा बुद्धवायसोक्तः। तत्त्वं जिज्ञासमानस्तां भार्यामबददेकदा ॥१०५॥ प्रिये राजाज्ञया दूरं स्वव्यापाराय याम्यहम्। तत्त्वया मम सक्तवादि पाथेयं दीयतामिति ॥१०६॥ तथेति दत्तपाथेयस्तया निर्गत्य गेहतः। सशिष्यो गुप्तमागत्य तत्रैव प्रविवेश स ॥१०७॥ तद्दृष्टस्तु भद्वायास्तस्मौ शिष्ययुतस्तले। माप्यथानाययत स्वं तद्भार्या परपूरुषम् ॥१०८॥ तेन साकं च खट्वायां रममाणा पतिं पदा। स्पृष्ट्वा बध्यञ्चित पापा मेने तत्रस्थमेव तम् ॥१०९॥ क्षणाम्भोपपतिस्तत्र व्याकुलः पृच्छति स्म ताम्। ब्रूहि प्रिये किमधिकं प्रियोऽहं तव किं पतिः ॥११०॥ तच्छ्रुत्वा कूटकुशला तं जारं निजगाद सा। प्रिया मम पतिस्तस्य कृते प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥१११॥ इदं तु चापलं स्त्रीणां महजं क्रियतेऽत्र किम्। अभक्ष्यमपि भक्ष्यं स्यान्नासां स्युर्यन्ति नासिका ॥११२॥ १ पञ्चतन्त्रे इयमेव कथा—प्रत्यक्षेऽपि कृते दोषे मूर्खः सान्त्वा प्रसाद्यते। रथकारः स्वहां भार्यां सजार्रा शिरसा वहन्। —इत्यनेन श्लोकेन समुल्लिखिता।

दशम लम्बक ८६५

दशम लम्बक ८६५ 'आपकी शरण म आया हुआ आपत्तिग्रस्त यह चिरंजीवी दया करने के योग्य है। राजा शिबि ने शरणागत की रक्षा के लिए अपना मांस भी दे दिया था ॥१०॥ प्राकारकर्ण से यह सुनकर उलूकराज ने अपने क्रूरलोचन नाम के मंत्री से चिरंजीवी के सम्बन्ध में पूछा कि इसका क्या करना चाहिए ? क्रूरलोचन ने भी प्राकारकर्ण की ही बात दुहराई। तब उलूकराज ने रक्ताक्ष नाम के अपने मन्त्री से उसी प्रकार पूछा। वह बुद्धिमान् मन्त्री इस प्रकार बोला-॥१११२॥ 'राजन् इन मन्त्रियों ने उल्टी नीति से तुझे नष्ट कर दिया। ये नीतिज्ञ नही प्रतीत होते ॥१ ३ रथकार और उसकी पत्नी की कथा मूर्ख व्यक्ति अपराध को देखकर भी झूठी सान्त्वना देने पर प्रसन्न हो जाता है। (इस विषय मे एक कथा सुनो) कहीं एक बढ़ई रहता था उसकी पत्नी उसे बहुत प्रिय थी ॥१४॥ उसकी स्त्री पर-पुरुष का संग करती है दूसरे लोगो से यह जानकर वह उसका भेद लेने के लिए एक बार अपनी पत्नी से बोला- ॥१५॥ 'प्रिय मैं राजा की आज्ञा से व्यापार के लिए कहीं दूर देश को जाता हूँ। इसलिए, तू पाथेय (मार्ग का भोजन) के लिए मुझे सत्तू आदि दे दे' ॥१६॥ अच्छा ठीक है—कहकर दिये हुए उसके पाथेय को लेकर और अपने एक शिष्य के साथ घर से बाहर निकलकर वह चुपके-से फिर घर म ही आ घुसा ॥१७॥ घर में अपनी पत्नी के परोक्ष मे वह शिष्य के साथ चारपाई के नीचे जा छिपा। पति चला गया यह जानकर उसकी स्त्री ने भी अपने जार को बुलाया और उस जार के साथ उसी चारपाई पर रमण करती हुई उसकी स्त्री ने अपने पति के अंग का स्पर्श करके यह जान लिया कि पति यहीं है। कुछ समय बाद उसके जार ने व्याकुलता के साथ उससे पूछा—'प्रिय यह बताओ कि मैं तुम्हें अधिक प्यारा हूँ या तुम्हारा पति ? ॥१८॥११॥ यह सुनकर अत्यन्त चतुर उस स्त्री ने अपने यार से कहा—'मुझे अपना पति इतना प्यारा है कि मैं उसके लिए अपने प्राणों को भी छोड़ दूँ' ॥१११॥ पर पुरुष का संग कर लेना तो स्त्रियों का स्वाभाविक धर्म है। इसमें क्या किया जा सकता है। यदि स्त्रियों को नाफ़ न हो तो उनके लिए विष्ठा खा ना भी असम्भव नही ॥११२॥ ११

८९४ कथासरित्सागर

८९४ कथासरित्सागर एतत्तस्या वचः श्रुत्वा तुष्टात्मा स कृत्रिमम्। तुष्टः शय्यातलात्सद्यो निर्गतः शिष्यमभ्यधात् ॥११३॥ दृष्टं त्वयाद्य साक्षी त्वं मम भक्तेरमीष्विति। अमुमवाध्रिता कान्तं सदेतां मूर्ध्न्यहं वहे ॥११४॥ इत्युक्त्वा सहसोत्क्षिप्य खट्वास्थावेव तावुभौ। सशिष्यं स जडो जायात्तज्जारौ शिरसावहत् ॥११५॥ इत्थं प्रत्यक्षदृष्टेऽपि दोषे कपटसान्त्वतः। मूर्खस्तुष्यति हास्यत्वं निर्विवेकश्च गच्छति ॥११६॥ तदयं चिरजीवी ते रक्ष्यॊ नारिपरिग्रहः। उपेक्षितो ह्ययं ह्येव हन्याद्रोग इव द्रुतम् ॥११७॥ इति रक्ताक्षरा श्रुत्वा कौशिकन्द्रोऽब्रवीत्स तम्। कुर्वन्नस्मद्धितं साधु प्राप्तोऽवस्थामिमामयम् ॥११८॥ तत्कथं स्मादृशः संरक्ष्यं किं कुर्यादेककश्च न। इति तस्य निराचक्र मन्त्रिवाक्यमुलूकराट् ॥११९॥ आश्वासयामास च सं वायसं चिरजीविनम्। ततः स चिरजीवी तमुलूकेशं व्यजिज्ञपत् ॥१२०॥ किं ममैतदवस्थस्य जीवनेन प्रयोजनम्। तन्मे दापय काष्ठानि यावदग्निं विशाम्यहम् ॥१२१॥ उलूकयोनिं च वरं प्रार्थयेऽहं हुताशनम्। कर्तुं वायसराजस्य तस्य वैरप्रतिक्रियाम् ॥१२२॥ इत्युक्तवन्तं विहसन् रक्ताक्षो निजगाद तम्। अस्मत्प्रभोः प्रसादात्त्वं स्वस्थ एव किमग्निना ॥१२३॥ न च त्वं कौशिको भावी यावत्काकत्वमस्ति ते। यादृशो यः कृतो धात्रा भवेत्तादृश एव सः ॥१२४॥ तथा च प्राङ्मुनिः कश्चिच्छ्येनहस्तच्युतं शिशुम्। मूषिकां प्राप्य कृपया कन्यां चक्रे तपोबलात् ॥१२५॥ वर्धितामाश्रमे तां च स दृष्ट्वा प्राप्तयौवनाम्। मुनिर्बलवते दातुमिच्छन्नादित्यमाह्वयत् ॥१२६॥ वह्निमे दिक्षितामेतां कन्यां परिणयस्व मे। इत्युवाच स वधिस्तं ततस्तं सोऽब्रवीद्रविः ॥१२७॥

द्वादश लम्बक ८६७

द्वादश लम्बक ८६७ इस प्रकार, उस दुष्टा पत्नी की दगाबाजी बात सुनकर प्रसन्न वह बढ़ई खाट के नीचे से निकलकर अपने शिष्य से बोला- आज तुमने देख लिया इसलिए तुम साक्षी हो कि यह स्त्री मेरी कैसी भक्त है। यह मुझको ही अपना पति समझती है। उसने इसे तो अपने स्वभावानुसार अपना यार बनाया है। अतः मैं इसे अपने सिर पर उठा लेना चाहता हूँ ॥११३-११४॥ ऐसा कहकर शिष्य के साथ उसने यार-सहित अपनी स्त्री की चारपाई को सिर पर उठा लिया ॥११५॥ इस प्रकार, अपनी आँखों के सामने अपराध देखकर भी झूठी सान्त्वना से मूर्ख व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है। और वह विचारहीन व्यक्ति संसार में हँसी का पात्र बन जाता है ॥११६॥ इसलिए, शत्रु के व्यक्ति इस चिरजीवी की तुम्हें रक्षा न करनी चाहिए। यह उपेक्षित व्यक्ति है, रोग के समान शीघ्र नष्ट कर देना चाहिए ॥११७॥ रक्ताक्ष से इस प्रकार सुनकर, उलूकराज इस प्रकार उससे बोला- 'यह सज्जन चिरजीवी हमारा हित करता हुआ भी इस स्थिति को पहुँचा है ॥११८॥ तब इसकी रक्षा क्यों न की जाय फिर यह अकेला हमारा बिगाड़ ही क्या सकता है ? इस प्रकार बोलकर उलूकराज ने मंत्री का कथन काट दिया ॥११९॥ उसके बाद उलूकराज ने चिरजीवी कौए को आश्वासन दिया। तब चिरजीवी ने उलूकराज से निवेदन किया ॥१२०॥ 'इस अवस्था में मेरे जीने से क्या लाभ है ? इसलिए मुझे लकड़ियाँ दिलाओ जिससे मैं आग में जल मरूँ ॥१२१॥ और, मैं भगवान् से भी यही प्रार्थना करूँ कि काकराज का बदला लेने के लिए वह मुझे उलूक-योनि में जन्म दें' ॥१२२॥ ऐसा कहनेवाले चिरजीवी से रक्ताक्ष हँसकर बोला- 'हमारे स्वामी की कृपा से तू पूर्ण स्वस्थ है आग से क्या काम ?॥१२३॥ जबतक तू कौआ है तबतक उल्लू न बनेगा। विधाता ने जिसे जैसा बनाया है वह वैसा ही रहेगा' (इस प्रसंग में एक कथा सुनो।) ॥१२४॥ प्राचीन काल में किसी मुनि ने बाज के हाथ से छूटी हुई किसी चुहिया को पाकर दया करके अपने तपोबल से उसे कन्या बना दिया। अपने आश्रम में पालन-पोषण करके बढ़ाई गई और युवावस्था को प्राप्त उस कन्या को बलवान् पुरुष को देने के लिए मुनि ने सूर्य को बुलाया और कहा कि सबसे अधिक बलवान् को ही मैं यह कन्या देना चाहता हूँ। इसलिए तुम मेरी कन्या से विवाह करो। तब सूर्य ने ऋषि से कहा ॥१२५-१२७॥

८१८ कथासरित्सागर

८१८ कथासरित्सागर मत्तोऽपि बलवान् मेघ स मां स्थगयति क्षणात्। तच्छ्रुत्वा तं विसृज्याथ मेघमाहूतवान्मुनिः ॥१२८॥ तं तथैव च सोऽवादीत्तेनाप्येवमवादि सः। मत्तोऽपि बलवान् वायुर्यो विक्षिपति दिक्षु माम् ॥१२९॥ इत्युक्तो तेन स मुनिर्वायुमाह्वयति स्म तम्। स तथैव च तेनोक्तस्तमेवमवदन्मरुत् ॥१३०॥ मयापि ये न चाल्यन्ते मत्तस्ते बलिनोऽद्रयः। श्रुत्वैतदथ शैलेन्द्रमाह्वयन् मुनिसत्तमः ॥१३१॥ तस्मैव यावत्तद्वक्ति तावत्सोऽद्रिर्जगाद तम्। मूषका बलिनो मत्तो ये मे छिद्राणि कुर्वते ॥१३२॥ इति क्रमेण प्रत्युक्तो दैवतैर्ज्ञानिभिः स तैः। महर्षिराजुहावैकं मूषकं वनसम्भवम् ॥१३३॥ कन्यां गृहेतामित्युक्तस्तेनोवाच स मूषकः। कथं प्रवेक्ष्यति बिलं ममेषा दृश्यतामिति ॥१३४॥ पूर्ववन्मूषिकैवास्तु वरमित्यथ स ब्रुवन्। मुनिस्तां मूषिकां कृत्वा तस्मै प्रायच्छदाश्रमे ॥१३५॥ एवं सुदूरं गत्वापि भो यावृक्तानुगेन सः। त्वमुलूको न जातु त्वं चिरजीविन् भविष्यसि ॥१३६॥ इत्युक्तश्चिरजीवी स रक्ताक्षेण व्यचिन्तयत्। नीतिज्ञस्य न चैतस्य राज्ञानेन कृतं वचः ॥१३७॥ शेषा मूर्खा इमे सर्वे तत्कार्यं सिद्धमेव मे। इति सञ्चिन्तयन्तं तमादाय चिरजीविनम् ॥१३८॥ अविचार्यैव रक्ताक्षवाक्यं तद्बलमन्वितः। उलूकराजः स ययावथर्बो निजं पदम् ॥१३९॥ चिरजीवी च तहस्तमांसाद्यशनपोषितः। तत्पार्श्वस्थोऽचिरेणैव बर्हीबाभूत् सुपक्षतिः ॥१४०॥ एकदा तमुलूकेन्द्रमथवद्देश गाम्यहम्। आश्वास्य काकराजं तमानयामि स्वमास्पदम् ॥१४१॥ येन रात्रौ निपत्याथ युष्माभिः स निहन्यते। अह भवामि चैतस्य स्वप्रसादस्य निष्कृतिम् ॥१४२॥

दशम लम्बक ८६९

दशम लम्बक ८६९ 'मुझसे भी बलवान् मेघ है, जो क्षण-भर में मुझे ढक देता है'—यह सुनकर मुनि ने सूर्य को छोड़कर मेघ को बुलाया ॥१२८॥ उसे भी उसी प्रकार ऋषि ने कहा तो मेघ ने कहा—'मुझसे भी बलवान् वायु है जो क्षण भर में ही मुझे चारों दिशाओं में बिखेर देता है ॥१२९॥ उसके इस प्रकार कहने पर मुनि ने वायु को बुलाया। मुनि के उससे भी उसी प्रकार कहने पर वायु ने कहा—॥१३०॥ 'पर्वत मुझसे भी बलवान् हैं जो मुझसे भी हिलाये नहीं जा सकते। यह सुनकर मुनि ने एक पर्वतराज को बुलाया ॥१३१॥ उसी प्रकार जब मुनि ने पर्वतराज से कहा तब उसने कहा—'मुझसे भी बलवान् चूहे हैं जो मुझमें भी छेद कर देते हैं'॥१३२॥ इस प्रकार क्रमशः सभी देवताओं से कहे गये मुनि ने एक जंगली चूहे को बुलाया और उससे कहा— इस कन्या से विवाह करो। ऋषि के इस प्रकार कहने पर चूहे ने कहा—'यह मेरे बिल में प्रवेश कैसे करेगी यह देख लीजिए' ॥१३३-१३४॥ 'अच्छा तो ठीक है, यह कन्या पहले के ही समान चूहिया बन जाय' इस प्रकार मुनि ने उसे चूहिया बनाकर उस चूहे को दे दिया ॥१३५॥ 'इस प्रकार बहुत दूर जाकर भी जो जैसा है, वैसा ही है। इसलिए, हे चिरंजीविन्, तू कभी उल्लूक नहीं बन सकेगा' ॥१३६॥ रक्ताक्ष से इस प्रकार कहे गये चिरजीवी ने सोचा कि उल्लूकराज ने इस नीतिज्ञ रक्ताक्ष की बात नहीं मानी ॥१३७॥ शेष सभी मन्त्री मूर्ख हैं, इसलिए मेरा काम सिद्ध ही है। इस प्रकार सोचते हुए चिरजीवी को लेकर, बल से गर्वित उल्लूकराज असमर्थ रक्ताक्ष की बात न मानकर अपने निवासस्थान पर गया ॥१३८-१३९॥ उल्लूकराज से दिये गये मांस आदि पौष्टिक आहारों से पुष्ट होकर उसके पास रहते हुए चिरजीवी मोर के समान सुन्दर पंखोंवाला हो गया ॥१४०॥ एक बार वह चिरजीवी उल्लूकराज से बोला—'स्वामिन् मैं जाता हूँ और काकराज को विश्वास दिलाकर अपने स्थान पर ले आता हूँ ॥१४१॥ जिससे कि आप लोग रात में आक्रमण करके उसका नाश कर सकें। मैं आपकी (मुझ पर की गई) इस कृपा का प्रत्युपकार करना चाहता हूँ ॥१४२॥

८४० कथासरित्सागर

८४० कथासरित्सागर यूयं तृणाद्यैराच्छाद्य द्वारं नीडगुहान्तरे। दिवा तदापातभयात् सर्वे तिष्ठन्तु रक्षिताः ॥१४३॥ इत्युक्त्वा तृणपर्णादिच्छन्नद्वारगुहागतान्। कुरूलोलूकानन्यो पार्श्वं चिरजीवी निजप्रभोः ॥१४४॥ तद्युवत्पश्चायायातावत्त्वह्रवीपाधितोल्युकः । लब्ध्वा प्रज्वलितैरेककाष्ठिकैः सह वायसैः ॥१४५॥ आगत्यैव विवान्धानां तेषां छन्नं तृणादिभिः। उलूकानां गुहाद्वारं ज्वारयामास वह्निना ॥१४६॥ प्राक्षिपस्तत्रवैकस्तदानीं तादृशं काष्ठिकम् । समिध्याग्निं यदाहान् तानुलूकान् सराजकान् ॥१४७॥ विनाश्य शत्रू काकेन्द्रस्तुष्टोऽथ श्रुतोथ सः। समं काककुलेनागाभिज न्यग्रोधपादपम् ॥१४८॥ तत्रास्थाय द्विपमध्यवासवृत्तान्तमात्मनः। काकेन्द्रं मघवन्नं तं चिरजीव्यब्रवीदिदम् ॥१४९॥ रक्ताक्ष एव सन्मन्त्री तस्यासीत्स्वद्विषो प्रभो। तस्यापकुर्वता वाक्यं मदान्धेनाभ्युपेक्षितं ॥१५०॥ यदस्याकारणं मत्वा वचनं नाकरोच्छठः। अतः सोऽपनयी मूर्खो मया विश्वास्य वञ्चितः ॥१५१॥ व्याजानुवृत्त्या विश्वास्य मण्डूका अहिना यथा। भूयः कश्चित्सुखं प्राप्तुमशक्तः पुरुषाधमे ॥१५२॥ भेकवाहनसर्पस्य कथा भेकानहिः सरस्तीरे तस्मिंस्तस्थौ सुनििश्चलः। तथास्थितं च तं भेकाः पप्रच्छुर्दूरवर्तिनः ॥१५३॥ ब्रूहि किं पूर्ववन्नास्मान्स्नास्यद्य भवानिति। इति पृष्टस्तदा भेकैः स तेः प्रोवाच पन्नगः ॥१५४॥ मया ब्राह्मणपुत्रस्य मण्डूकमनुधावता। भ्रान्त्या दष्टो बतोऽङ्गुष्ठः स च पञ्चत्वमाययौ ॥१५५॥ तत्पित्रा चास्मि शापेन भेकानां वाहनीकृतः। तद्युष्मान् कथमश्नामि प्रत्युताहं वहामि वः ॥१५६॥ तच्छ्रुत्वा तत्र भेकानां राजा वाहसमुत्सुकः। जलादुत्तीर्य तत्पृष्ठमारोहदमतीर्मुदा ॥१५७॥

दशम लम्बक ८७१

दशम लम्बक ८७१ आप सब लोग दिन में उसके आक्रमण के भय से बचने के लिए अपने घोंसलों को घास फूस आदि से ढककर उसके अन्दर सुरक्षित रहें ॥१४३॥ ऐसा कहकर, उल्लुओं को घास तथा सूखे पत्तों से ढके हुए द्वारवाली गुफा के भीतर करके चिरजीवी अपने स्वामी काकराज मेघवर्ण के पास गया ॥१४४॥ और जलती हुई चिता से एक-एक जलती हुई लकड़ी चोंच में लटकाए हुए कौओं को साथ लेकर वह वहाँ आया ॥१४५॥ और आकर दिन में अन्धे उन उल्लुओं के घास-फूस से ढके हुए गुफा के द्वार पर आग लगा दी ॥१४६॥ वह आग लगाकर, एक-एक लकड़ी चोंच से उठाकर आग में छोड़ता जाता था। इस प्रकार उसने राजा के सहित सभी उल्लुओं को जलाकर भस्म कर डाला ॥१४७॥ तदनन्तर, कौओं का राजा शत्रुओं का नाश करके अपने काक-परिवार के साथ पुनः उसी वटवृक्ष पर सुखपूर्वक निवास करने लगा ॥१४८॥ इसके बाद चिरजीवी ने काकराज मेघवर्ण को शत्रुओं के बीच रहने का अपना सारा समाचार सुनाकर यह कहा-॥१४९॥ 'स्वामिन् वहाँ तुम्हारे छत्र का एक ही मन्त्री था उसी की बात न मानकर उस मदान्ध उलूकराज ने मेरी उपेक्षा की। उस मूर्ख ने रक्ताक्ष मन्त्री की बात नहीं मानी इसीलिए नीतिहीन उस मूर्ख को मैंने विश्वास दिलाकर ठग लिया ॥१५०-१५१॥ मेंढकों के वाहन सर्प की कथा जैसे कपट-वृत्ति से विश्वास दिलाकर साँप ने मेढक को ठग लिया था'। एक वृद्ध साँप अपना चारा प्राप्त करने में असमर्थ होकर एक तालाब के किनारे निश्चल होकर पड़ा था। इस प्रकार, दीन साँप को देखकर दूर खड़े हुए मेढकों ने पूछा- अब तुम पहले के समान हम लोगों को क्या नहीं खाते हो। मेढक के इस प्रकार पूछने पर साँप ने उनसे कहा- 'एक बार एक मेढक की ओर दौड़ते हुए मैंने भ्रम से एक ब्राह्मण के बालक को काट लिया और वह मर गया। तब उसके पिता ने शाप से मुझे मेढक का वाहन बना दिया। तब मैं तुम लोगों को कैसे खाऊँ ? बल्कि आओ तुम लोगों को ढोने का काम करूँ ॥१५२-१५६॥ यह सुनकर उस पर सवारी करने के लिए उत्सुक मेढकों का राजा पानी से निकलकर उसकी पीठ पर निर्भय होकर चढ़ बैठा ॥१५७॥

८७२ कथासरित्सागर

८७२ कथासरित्सागर ततस्तं वाहनसुखैरावश्यं सन्निधौभृतम्। कृत्वावसन्नमात्मानमुवाच स सकेतवम् ॥१५८॥ आहारं विना देव न गन्तुमहमुत्सहे। तन्मे दशाशनं भृत्याद्देववृत्तितस्तत् कथम् ॥१५९॥ तच्छ्रुत्वा भेकराजस्तमवाचद्वाहनप्रियः। काञ्चित् परिमितांस्तर्हि भुङ्क्ष्व मदनुचरानिति ॥१६०॥ ततः क्रमात् स मण्डूकानहिः स्वेच्छमभक्षयत्। सद्वाहनाभिमानाच्च सेहे भेकपतिः स तत् ॥१६१॥ एवं मध्यप्रविष्टेन मूर्खः प्राज्ञेन वञ्च्यते। मयाप्यनुप्रविश्यैव तव स्वद्विषवो हताः ॥१६२॥ तस्मान्नीतिविदा राज्ञा भवितव्यं कृतात्मना। यथैष मुच्यते मृत्योर्ह्रियते च परर्द्धयः ॥१६३॥ श्रीरियं च सदा देव द्यूतलीलेव सञ्चला। वारिणीवोर्मिचपला मदिरेव विमोहिनी ॥१६४॥ सा धीरस्य सुमन्त्रस्य राज्ञो निर्व्यसनस्य च। विशेषज्ञस्य सोत्साहा पार्श्वतश्चैव तिष्ठति ॥१६५॥ तदिदानीमवहितस्त्वं विद्वद्वचने स्थितः। निहतारातिसुस्थितः पाथि राज्यमकण्टकम् ॥१६६॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा मेघवर्णः स चिरजीविना। सम्भाव्य तं काकराजश्चक्रे राज्यं तथैव तम् ॥१६७॥ इत्युक्त्वा गोमुखो भूयो वत्सराजसुतमब्रवीत्। तदेवं प्रज्ञया राज्यं तिर्यग्भिरपि भुज्यते ॥१६८॥ निष्प्रज्ञास्त्ववसीदन्ति काकोपहसिताः सदा। तथा च जाह्नवीभृत्या बभूवाश्वस्य कस्यचित् ॥१६९॥ साऽजानन्नपि तस्याज्ञां जानामीत्यभिमानतः। स्फारं कुर्वन् मौर्व्याबलात्प्रभोस्त्वचमपाटयत् ॥१७०॥ ततस्त्वेनं परित्यक्तं स्वामिभाववशाद सः। अजानानॊ ह्यतत्कुर्वन् प्राप्तमानी विनश्यति ॥१७१॥ इतश्च श्रूयतामन्यत् मासन्वै भ्रातरावुभौ। विप्रावभूतानामद्वय तयोः पित्र्यमभूद्धनम् ॥१७२॥

षष्ठम लम्बक ८०३

षष्ठम लम्बक ८०३ तब साँप ने भंगियों के साथ उस राजा को विविध प्रकार की बातों से प्रसन्न करके कपट से अपने को थका-हारा-सा प्रकट किया और मेढकराज से बोला-॥१५८॥ 'स्वामी भोजन के बिना अब मैं नहीं चल सकता। इसलिए, मुझे भोजन दो। सेवक बिना भोजन के कैसे रह सकता है ?॥१५९॥ यह सुनकर सवारी का शौकीन मेढकराज ने उस साँप से कहा—'तो कुछ थोड़े-से मेरे अनुचर मेढ़कों को खा लो' ॥१६०॥ तब वह सर्प अपनी इच्छानुसार मेढ़कों को क्रमशः खाने लगा। सवारी के आनन्द से अन्धा मेढकराज यह सब सहन करता था॥१६१॥ 'इस प्रकार मूर्खों के भीतर घुसा हुआ बुद्धिमान् मूर्खों को ठग लेता है। इसी प्रकार, महाराज मैंने भी शत्रुओं में घुसकर ही तुम्हारे शत्रुओं का नाश किया॥१६२॥ अतः बुद्धिमान् राजा को नीतिज्ञ भी होना चाहिए। अन्यथा सेवक मूर्ख राजा का मनमाना मूँछते-खसोटते और नष्ट कर डालते हैं॥१६३॥ यह लक्ष्मी जुए के छल के समान छल से भरी जल-तरंग के समान चंचल और मदिरा के समान मदीली होती है। इसलिए यह (लक्ष्मी) धैर्यशाली नीतिज्ञ व्यसनहीन और विशेषज्ञ राजा के पास जाल से बँधी हुई-सी स्थिर रहती है ॥१६४-१६५॥ अतः अब तुम सावधान होकर नीतिज्ञ विद्वानों की बात मानकर, शत्रु के नाश हो जाने से सुखी होकर निष्कण्टक राज्य का पालन करो' ॥१६६॥ मन्त्री चिरंजीवी से इस प्रकार कहा गया काकराज मेघवर्ण उस मन्त्री का सम्मान करके उसी प्रकार राज्य करता रहा ॥१६७॥ ऐसा कहकर गोमुख ने वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त से कहा- स्वामिन् इस प्रकार बुद्धिबल से पशु-पक्षी भी राज्य करते हैं किन्तु बुद्धिहीन व्यक्ति धोखा में ही फँस जाते हैं और कष्ट पाते हैं। इस प्रसंग में एक कथा सुनो॥१६८-१६९॥ किसी धनी सेठ का एक मूर्ख सेवक था जो शरीर में मालिश करना नहीं जानता था। किन्तु 'जानता हूँ' इस अभिमान से बलपूर्वक मालिश करते हुए उसने स्वामी के शरीर की चमड़ी उधेर दी॥१७०॥ तब स्वामी ने उसे निकाल दिया और वह दुःखी हुआ। इस प्रकार न जानते हुए भी हठ- पूर्वक जो जानकारी का ढोंग रचता है वह नष्ट हो जाता है ॥१७१॥ और भी सुनो। मालव देश में दो ब्राह्मण-बन्धु रहते थे। उनके पैतृक धन का बँटवारा नहीं हुआ था॥१७२॥ ११