कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक ५३१
नवम लम्बक ५३१ अपने नाम से प्रसिद्ध और अपने ही बनाये हुए उस नगर को देखता हुआ वह राजा उसी मार्ग से आ निकला जिस मार्ग पर विजयवर्मा का घर था ॥३४६॥ राजा को उस मार्ग से जाते हुए जानकर उसे देखने के कौतूहल से अनंगप्रभा अपने भवन के छत पर जा चढ़ी ॥३४७॥ अनंगप्रभा और मदनप्रभ की कथा राजा को देखकर, उस पर इस प्रकार आकृष्ट हुई कि वह राजा की हस्तिनी पर चढ़े हुए महावत से छलपूर्वक कहने लगी—॥३४८॥ 'हे हाथीवान् मैं हाथी पर कभी नहीं चढ़ी हूँ। इसलिए, तुम मुझे चढ़ा लो जिससे मैं भी जानूँ कि हाथी पर चढ़ने से क्या सुख होता है॥३४९॥ यह सुनकर महावत जब राजा का मुँह देखने लगा तब राजा ने भी पृथ्वी पर स्वर्ग से गिरी हुई चन्द्रमा की कान्ति के समान सुन्दरी अनंगप्रभा की ओर देखा ॥३५०॥ और, चकोर के समान उसे अतृप्त नेत्रों से पीता हुआ राजा उसके पाने की लालसा से महावत को कहने लगा—'हस्तिनी को पास लेजाकर इसकी इच्छा पूर्ण करो। इस चन्द्रमुखी को शीघ्र ही हाथी पर बैठाओ' ॥३५१ ३५२॥ राजा के इस प्रकार कहने पर महावत द्वारा चलाई गई हस्तिनी उसी समय उस घर के नीचे आ गई ॥३५३॥ हस्तिनी को घर के समीप आई हुई देखकर अनंगप्रभा ने अपने को (जान-बूझकर) राजा की गोद में गिरा दिया ॥३५४॥ उसे कहाँ तो पहले पति बनाने में ही डर था और कहाँ अब नये-नये पतियों से भी तृप्ति नहीं होती ! खेद है कि माता-पिता के शाप से कितना उलट-फेर हो गया ? ॥३५५॥ गिरने का भय दिखाकर वह अनंगप्रभा राजा के गले से चिपक गई। राजा भी उसके शरीर स्पर्श-रूपी अमृत से सिञ्चत होकर परम आनन्द का प्राप्त किया ॥३५६॥ बड़ी युक्ति से अपने को राजा की गोद में डालती हुई और गले से चिपककर उसका चुंबन करने की इच्छा रखनेवाली उस अनंगप्रभा को लिये हुए राजा शीघ्र अपने महल में आया ॥३५७॥ महल में आकर अपना वृत्तान्त सुनाती हुई उस विद्याधरी को राजा ने अपने रनिवास में न जाकर उसी समय उस अपनी महारानी बना लिया ॥३५८॥ विजयवर्मा ने घर पर आकर और राजा द्वारा अनंगप्रभा का अपहरण जानकर अपने क्षत्रियपन की आन में आकर राजभवन के बाहर उसके रक्षकों से युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥३५९॥ और युद्ध में पीठ न दिखाकर वही उसने अपना शरीर त्याग दिया क्योंकि शूर लोग स्त्री के कारण होनेवाले अपमान को सहन नहीं करते ॥३६०॥
५१० कथासरित्सागर
५१० कथासरित्सागर स्वनामसदृशं स्ववृत्तं स पश्यंस्तत्पुरं नृपः। तेनाययौ पथा यत्र गृहं विजयवर्मणः ॥३४६॥ बुद्ध्वा च नृपमायान्तं तद्दर्शनकुतूहलात्। आरुरोहाथ सानङ्गप्रभा हर्म्यतलं तदा ॥३४७॥ अनंगप्रभानामवनप्रभयोः कथा दृष्ट्वैव सा तं राजानं तथाभूतस्तथा यथा। पृष्ठाद्राजकरेणुस्य हस्त्यारोहमभाषत ॥३४८॥ भो हस्त्यारूढ नैवाहमारूढा जातु हस्तिनम्। सदारोहय मामत्र वीक्षे तावत् कियत्सुखम् ॥३४९॥ सच्छत्राधोरणे तस्मिन् राजानमवलोकिनि। राजा ददर्श तामिन्दोर्दिवः कान्तिमिव च्युताम् ॥३५०॥ पिवंश्च तामतृप्तस्तं चकोर इव चक्षुषा। नृपस्तत्प्राप्तिबद्धाशो हस्त्यारोहमुवाच स ॥३५१॥ नीत्वा करेणुं निकटं पूरयास्या मनोरथम्। आरोपयन्दुवदनामेतामत्राविलम्बितम् ॥३५२॥ इति राज्ञोदितं तेन हस्त्यारोहेण चौक्षिता। अधस्तात्तस्य हर्म्यस्य तत्क्षणं सा करेणुका ॥३५३॥ दृष्ट्वा तां निकटप्राप्तां राज्ञ सागरवर्मेण। उत्सङ्गे तस्य सानङ्गप्रभात्मानमपातयत् ॥३५४॥ क्वापि स भर्तृविद्वेषः क्वेषा भर्तृज्जवृत्तता। हा तस्याः पितृशापेन दर्शितोऽतिविपर्ययः ॥३५५॥ निपातभीतेव च सा कण्ठे तं नृपमग्रहीत्। तत्स्पर्शामृतसिक्ताङ्गः सोऽपि प्राप परां मुदम् ॥३५६॥ मुक्त्वा समर्पितात्मानं परिचुम्बन्नलालसाम्। तां स राजा गृहीत्वैव जगामाशु स्वमन्दिरम् ॥३५७॥ तत्र तामुक्त्तवृत्तान्तां तदैव युवराङ्गनाम्। स चकार महादेवी प्रवेश्यान्तःपुरे नृपः ॥३५८॥ बुद्ध्वा राजहृतामेतामेत्य क्षत्रमिवाथ सः। गेहिविजयवर्मापि राजमुख्यानबोधयत् ॥३५९॥ युद्धे च तत्र सस्त्याज शरीरमपराङ्मुखः। न शूरा विषहन्ते हि स्त्रीनिमित्तं पराभवम् ॥३६०॥
नवम लम्बक ५३१
नवम लम्बक ५३१ उस दुराचारिणी स्त्री से क्या करोगे ? आओ, नन्दन उद्यान में हमारा उपभोग करो।— मानो यह कहती हुई दिव्योगनाएँ आकर उसे (विजयवर्मा को) स्वर्ग ले गईं ॥३६१॥ वह अनंगप्रभा भी उस राजा के पास वैसे ही स्थिर हो गई, जैसे नदी सागर में आकर स्थिर हो जाती है ॥३६२॥ अनंगप्रभा से पतिसङ्गम के कारण उस पति (सागरवर्मा) से अपने को कृतार्थ समझा और राजा ने भी ऐसी सुन्दरी पत्नी पाकर अपना जन्म सफल समझा ॥३६३॥ कुछ दिनों पश्चात् सागरवर्मा की उस रानी ने राजा से गर्भ धारण किया और यथा समय पुत्र को जन्म दिया ॥३६४॥ पिता राजा ने उस बालक का नाम समुद्रवर्मा रखा और उदारता के साथ पुत्रजन्म का महोत्सव मनाया ॥३६५॥ क्रमशः बड़े हुए गुणवान्, युवा और बलशाली समुद्रवर्मा का राजा ने युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया ॥३६६॥ तदनन्तर उस समुद्रवर्मा के विवाह के लिए राजा ने समरवर्मा राजा की कमलमती नामक कन्या की माँग की ॥३६७॥ और विवाहित युवराज का उत्तर गुणों से आकृष्ट राजा सागरवर्मा ने अपना समस्त राज्य दे डाला ॥३६८॥ नीतिज्ञी और क्षत्रिय-धर्म का जाननेवाले समुद्रवर्मा ने भी पिता से राज्य लेकर उसे प्रणाम करते हुए निवेदन किया—॥३६९॥ 'हे पिता, मुझे आज्ञा दीजिए। मैं दिशाओं को जीतने के लिए जाता हूँ, क्योंकि पृथ्वी को जीतने की इच्छा न करनेवाला राजा पृथ्वी का वैसे ही प्रिय नहीं होता, जैसे स्त्री को नपुंसक पति ॥३७०॥ राजा की वही राजलक्ष्मी धर्मशीला और कीर्तिदायिनी होती है, जो शत्रुओं को जीतकर अपनी भुजाओं के बल से प्राप्त की जाती है ॥३७१॥ हे पिता, इस तरह दिशाओं का राज्य पाकर शास्त्रार्थ-चिन्तन के समान अपनी उन्नति के लिए अच्छी ही प्रज्ञा का मान रखिये ? ॥३७२॥ राजा यह सुन पुत्र के मन्त्रिगणों ने कहा—'हे महाराज, युवराज अभी युवा हैं। अतः इनका कहना ही ठीक होगा। धर्म से प्रजाओं का पालन करनेवाला राजा कभी कहीं पराजित नहीं होता। सभी दक्षिण और उत्तरों को जिन-सब-प्रजा समस्त राजाओं पर विजय प्राप्त करें' ॥ (३७३-३७४ ॥) इस पर पिता ने 'तथास्तु' कहा और तब युवराज ने राजा की अनुमति पाकर दिग्विजय का निश्चय कर शीघ्र ही उस पर विजय प्राप्त करने की तैयारी आरम्भ कर दी ॥३७५॥
५३२ कथासरित्सागर
५३२ कथासरित्सागर किमेतया वराक्या ते भजाम्मानेहि नन्दनम्। इतीव च सुरस्त्रीभि स नीतोऽभूत् सुरालयम् ॥३६१॥ साप्यनङ्गप्रभा तस्मिन् राज्ञि सागरवर्मणि। नदीव सागरे स्थैर्यं धत्तव्यानन्यगामिनी ॥३६२॥ भवितव्यबला मेने तेन परया कृतार्थताम्। सोऽपि जन्मफल प्राप्तं तयामन्यत भार्यया ॥३६३॥ दिनेषु तस्य राज्ञी सा राज्ञः सागरवर्मणः। दधेऽनङ्गप्रभा गर्भं काले च सुषुवे सुतम् ॥३६४॥ नाम्ना समुद्रवर्माणं त स राजा पिता शिशुम्। चकार विहितोदारपुत्रजन्ममहोत्सव ॥३६५॥ क्रमाच्च वृद्धिमायांतं सगूण प्राप्तयौवनम्। यौवराज्येऽभिषिञ्चत्त सुतं स भुजशालिनम् ॥३६६॥ विवाहहेतोस्तस्याथ सूनो समरवर्मणः। राज्ञः कमलवर्माख्यां सुतामाहरति स्म सः ॥३६७॥ कृतोद्वाहाय तस्मै च पुत्रायावर्जितो गुणैः। समुद्रवर्मणे राज्यं निजं प्राशात् स भूपतिः ॥३६८॥ सोऽपि प्राप्यैव तद्राज्यमोजस्वी क्षत्रधर्मवित्। समुद्रवर्मा पितरं प्रणतस्त व्यजिज्ञपत् ॥३६९॥ अनुजानीहि मां तात दिशो जेतुं व्रजाम्यहम्। अजिगीषु पतिर्भूमिर्निन्द्य क्लीब इव स्त्रिय ॥३७०॥ धर्म्या कीर्तिकरी सा च लक्ष्मीरिह महीभुजाम्। या जित्वा परराष्ट्राणि निजबाहूबलाज्जिता ॥३७१॥ किं तेषां तात राज्यस्य क्षुद्राणामभिभूतये। स्वप्रजामेव खादन्ति मार्जारा इव लोलुपा ॥३७२॥ इत्यूचिवान् स तेनोचे पित्रा सागरवर्मणा। नूतनं पुत्र राज्यं ते तत्तावत्त्वं प्रसाधय ॥३७३॥ नास्त्यपुण्यमकीर्तिर्वा प्रजा धर्मेण शासतः। अनवेक्ष्य च शक्तिं स्वां युक्तो राज्ञां न विग्रहः ॥३७४॥ वत्स यद्यपि शूरस्त्वं सैन्यमस्ति च ते बहु। तथापि नैव विश्वासो जयश्रीश्चपला रणे ॥३७५॥
नवम लम्बक ५३५
नवम लम्बक ५३५ पिता के इस प्रकार कहने पर भी तेजस्वी समुद्रवर्मा पिता से आज्ञा लेकर दिग्विजय के लिए निकल पड़ा ॥३७६॥ तदनन्तर, क्रमशः दिशाओं को जीतकर और राजाओं को वश में करके बहुत-से हाथी घोड़े सेना रत्न आदि प्राप्त करके अपने नगर को लौट आया ॥३७७॥ और, उसने भिन्न-भिन्न देशों में उत्पन्न होनेवाले विविध प्रकार के रत्नों से प्रसन्न माता-पिता के चरणों में प्रणाम कर उनकी पूजा की ॥३७८॥ उनकी आज्ञा से उस महायशस्वी समुद्रवर्मा ने ब्राह्मणों को हाथी घोड़े सोना रत्न आदि दान में दिये ॥३७९॥ उसने अपने सेवकों और सम्बन्धियों पर अर्थ की ऐसी वर्षा की कि एक केवल 'दरिद्र' शब्द ही अर्थहीन रह गया ॥३८०॥ इस प्रकार, पुत्र की महिमा देखकर अनंगप्रभा से युक्त राजा सागरवर्मा ने अपने को कृतकृत्य समझा ॥३८१॥ इस प्रकार सागरवर्मा ने उन दिनों को उत्सव के साथ व्यतीत करके मंत्रियों के सामने पुत्र समुद्रवर्मा से कहा— ॥३८२॥ 'बेटा मैंने इस जन्म में जो भी करना था कर लिया। राज्य का सुख देखा किन्तु शत्रुओं द्वारा पराजय नहीं देखा ॥३८३॥ और साम्राज्य प्राप्त तुम्हें भी देखा। अब मुझे क्या चाहिए। अतः जबतक यह शरीर है तबतक किसी तीर्थ का आश्रय लेता हूँ ॥३८४॥ यह शरीर नष्ट होनेवाला है। अब घर में मेरा क्या धरा है। देखो वृद्धावस्था मेरे कानों के पास आकर यही कह रही है ॥३८५॥ ऐसा कहकर पुत्र के न चाहते हुए भी वह सहृदय राजा सागरवर्मा पत्नी अनंगप्रभा के साथ प्रयाग चला गया ॥३८६॥ समुद्रवर्मा कुछ दूर तक पिता को छोड़ने आकर और फिर राजधानी में लौटकर न्यायपूर्वक अपने राज्य का शासन करने लगा ॥३८७॥ अनंगप्रभा-सहित राजा सागरवर्मा ने भी प्रयाग में जाकर तपस्या करके शिवजी को प्रसन्न किया ॥३८८॥ तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी ने रात्रि के अन्त में स्वप्न में आकर कहा- मैं मर्त्यजीव तेरे तप से प्रसन्न हूँ। अतः वर सुनो—॥३८९॥ यह अनंगप्रभा और तुम दोनों विद्याधर हो। अब तुम्हारा शाप क्षय होने से प्रातःकाल ही तुम दोनों विद्याधर-लोक को चले जाओगे ॥३९०॥
५३४ कथासरित्सागर
५३४ कथासरित्सागर इत्यादि पित्रा प्रोक्तोऽपि तमनुज्ञाप्य यत्नतः। समुद्रवर्मा स ययौ तेजस्वी दिग्विजयया ॥३७६॥ क्रमेण च दिशो जित्वा स्थापयित्वा वशे नृपान्। प्राप्तहस्त्यश्वहेमादिराययौ नगरं निजम् ॥३७७॥ तत्र पित्रोर्महारत्नैर्नानादेशोद्भवैश्च सः। चरणौ पूजयामास प्रणतः परितुष्टयोः ॥३७८॥ तदाज्ञया च प्रददौ ब्राह्मणेभ्यो महायशाः। महादानानि हस्त्यश्वहेमरत्नमयानि सः ॥३७९॥ ततो वसु सखिभ्यो भृत्यभ्यश्च ववर्ष सः। एको दरिद्रशब्दोऽत्र यथामूद्यर्थवर्जितः ॥३८०॥ तद्दृष्ट्वा पुत्रमाहात्म्यमात्मनः कृतकृत्यताम्। राजा सागरवर्मा स मेनेऽङ्गप्रभायुतः ॥३८१॥ उत्सवेन च नीत्वा तान्यहानि नृपतिः स तम्। पुत्रं समुद्रवर्माणमवोचन्मन्त्रिसन्निधौ ॥३८२॥ यन्मया पुत्र कर्तव्यं कृतं तदिह जन्मनि। भुक्तं राज्यसुखं दृष्टं परेभ्यो न पराभवः ॥३८३॥ दृष्टस्त्वत्तत्साम्राज्यं किमप्यत् प्राप्यमस्ति मे। तदाश्रयाम्यहं तीर्थं यावन्न ध्रियते तनुः ॥३८४॥ विनश्वरे शरीरेऽस्मिन् किमद्यापि गृहे तव। इतीवेषा जरा पश्य कर्णमूले ब्रवीति मे ॥३८५॥ इत्युक्त्वा स सुतेऽनिर्बन्धयत्यपि तस्मिन् नृपः कृती। ययौ सागरवर्माऽथ प्रयागं प्रियया सह ॥३८६॥ समनुव्रज्य पितरं स चागत्य निजं पुरम्। समुद्रवर्मा स्वं राज्यं यथाविधि शशास तत् ॥३८७॥ राजा सागरवर्माऽपि सोऽनङ्गप्रभया युतः। प्रयागे तपसा देवं वृषध्वजमतोषयत् ॥३८८॥ स स्वप्ने तमुवाचेव त्रिपुरारिनिशाक्षये। तुष्टोऽस्मि ते सभार्यस्य तपसा तदिदं शृणु ॥३८९॥ एषानङ्गप्रभा त्वं च युवां विद्याधरावुभौ। शापक्षयान्निजं लोकं प्रातः पुत्र गमिष्यथः ॥३९०॥
नवम लम्बक ५१७
नवम लम्बक ५१७
यह सुनकर राजा भी चौंक कर जाग पड़ा और स्वप्न देखती हुई रानी भी जाग उठी। तब दोनों आश्चर्य-चकित होकर परस्पर स्वप्न-समाचार कहने लगे ॥१३१॥ तब प्रसन्न अनंगप्रभा राजा से कहने लगी-महाराज, मैंने अभी अपना सम्पूर्ण जाति- स्मरण कर ली। मैं विद्याधरों के राजा गयर की कन्या हूँ। वीरपुर नाम के नगर में अनंगप्रभा नाम से मैं उत्पन्न हुई। पिता के शाप से मर्त्यलोक में आकर और मानुषी बनकर मैं अपने विद्याधरी भाव को भूल गई। अब मैं जान गई हूँ। जबतक वह ऐसा कह ही रही थी कि इतने में उसका पिता गयर विद्याधर आकाश से उतरा ॥१३२-१३५॥ राजा सागरवर्मा ने उसे नमस्कार किया और वह गयर पैरों पर पड़ी हुई पुत्री अनंग- प्रभा से कहने लगा-॥१३६॥ आजा बेटी, अपनी इन विद्याओं का स्मरण करो। तुम्हारा शाप नष्ट हो गया। तूने एक ही जन्म में आठ जन्मों का दुःख भोग लिया ॥१३७॥ इस प्रकार कहकर और उन आठों में उपकार गयर ने अपनी विद्याएँ प्रदान कीं। तब गयर ने राजा सागरवर्मा से कहा-'भूप, मदनवेग नाम का विद्याधर राजा है। मैं गयर नाम का विद्याधर राजा हूँ और यह अनंगप्रभा मेरी कन्या है ॥१३८-१३९॥ वर के इस दिन इसने विवाह के लिए माँगा या उत्सव से इस कन्यिशा ने किसी एक को भी नहीं चाहा ॥१४०॥ उसी समय इसने मद्यपान दूषितों के मुख से भी सुन ली थी। ईर्ष्यावश से उस समय इसने मुझे भी स्वीकार नहीं किया ॥१४१॥ तब मैंने इसे कटुतापूर्वक से शाप का दण्ड दिया। कर्मयोग के परिणाम इसी मुखे यह दशा सुनी इसे इस प्रकार का स्वरूप याद कराती शिव की आराधना की और द्वारा द्वारा अपने विद्याधर-शरीर को पा लिया ॥१४२-१४३॥ वह प्रसन्न हुआ और इस भाँति मेरी कन्या अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त कर निष्कण्टक रूप विद्याधराधिपति बनी। महासुख इस प्रकार बहु वर वरदानों से अपने पूर्वजन्म का स्मरण कर सुखपूर्वक गयर के आदेश से उसने उस कन्या का वरण किया और वह उसका आदरपूर्वक बन गया ॥१४४॥ ३८
५३६ कथासरित्सागर
५३६ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा स प्रबुबुधे राजानङ्गप्रभा च सा। तद्दर्शनाेकितस्वप्ना तच्चान्योन्यमृषोचतुः ॥३९१॥ ततश्च नृपतिं तं सा दृष्टानङ्गप्रभाम्यधात्। आर्यपुत्र मया जातिः कृत्स्नात्मीया स्मृताधुना ॥३९२॥ अह विद्याधरेन्द्रस्य समरस्यात्मसम्भवा। एषानङ्गप्रभा नाम पुरे वीरपुराभिधे ॥३९३॥ पितुःशापाविहागत्य विद्याभ्रशेन मानुषी। भूत्वा विद्याधरीभाव साऽह व्यस्मरमात्मनः ॥३९४॥ इदानीं च प्रबुद्धाहमिति यावच्च वक्ति सा। तावत् सोऽवततारात्र समरस्तत्पिता दिवः ॥३९५॥ नमस्कृतः स तेनाथ राज्ञा सागरवर्म्मणा। उवाच पादपतितां तामनङ्गप्रभां सुताम् ॥३९६॥ एहि पुत्रि गृहाणैता विद्याः शापः स ते गतः। त्वयाष्टजन्मयुक्त हि भुक्तमेकत्र जन्मनि ॥३९७॥ इत्युक्त्वोत्सङ्गमारोप्य विद्यास्तस्यै पुनर्द्ददौ। ततः सागरवर्म्माणं राजानं समभाषत ॥३९८॥ भवान् विद्याधराधीशो मदनप्रभसंज्ञकः। अह च समरो नाम सुतानङ्गप्रभा मम ॥३९९॥ प्रवेया पूर्वमेषा च वरैस्तैस्तैरयाच्यत। न च तेषां कमप्यच्छ्द् भर्त्तारं रूपगर्विता ॥४००॥ ततस्तुल्यगुणेनैषा त्वयाप्युत्केन याचिता। विधियागाच्च न तदा त्वमप्यङ्गीकृतोऽनया ॥४०१॥ मर्त्यलोकागमायास्यास्तेन शापमदामहम्। भूयान् मे मर्त्यलोकेऽपि भार्यैयमिति रागिणा ॥४०२॥ सङ्कल्प्य हृदये ध्यात्वा वरदं गिरिजापतिम्। योगेन स्वा तनुस्त्यक्ता ततो वैद्याधरी त्वया ॥४०३॥ ततस्त्वं मानुषो जातो जाता भार्या तवाप्यसौ। आगच्छतमिवानीं स्व लोकं मुक्तौ युवां मिथः ॥४०४॥ इति समरेण स उक्तः स्मृतजातिस्तां तनुं प्रयागजले। मुक्त्वा सागरवर्मा बभूव मदनप्रभः सद्यः ॥४०५॥
नवम लम्बक ५१७
नवम लम्बक ५१७ यह सुनकर राजा की नींद खुल गई और स्वप्न देखती हुई रानी भी जाग उठी। तब दोनों आश्चर्य-चकित होकर परस्पर स्वप्न-समाचार कहने लगे ॥१३६॥ तब प्रभात अनंगप्रभा राजा से कहने लगी-महाराज, मैंने अभी अपनी सम्पूर्ण शक्ति स्मरण कर ली। मैं विद्याधरों के राजा सुमेरु की कन्या हूँ। वीरपुर नाम के नगर में अनंगप्रभा नाम से उत्पन्न हुई। शाप के प्रभाव से मनुष्यलोक में आकर और मानुषी बनकर मैं अपने विद्याधरी भाव को भूल गई। अब मैं जान गई हूँ। मन्दराद्र पर पद्मा नाम की गौरी-पीठ है। वहाँ तपस्या द्वारा विद्याधर भाव प्राप्त करूँगी ॥१३७-१४५॥ राजा सागरवर्मा ने उसे अभयदान दिया तब वह गगन-पंथ पर चढ़ी हुई उसी समय सभा से कहने लगी-॥१४६॥ 'आओ, हम अपनी कुल-विद्याओं को प्राप्त करेंगे। हमारा शाप नष्ट हो गया। मुझे एक ही साथ दो भाइयों का दुःख प्राप्त हुआ' ॥१४७॥ इस प्रकार कहकर और आकाश में घूमकर समर ने अपनी विद्याएँ स्मरण कीं। तब समर ने राजा सागरवर्मा से कहा-'मुझे मन्दरदेव नाम के विद्याधर राजा का पुत्र समर नाम का विद्याधर जानो और इस अनंगप्रभा को मेरी भार्या ॥१४८-१४९॥ कन्या रूप लिए इस कन्या के विवाह के लिए कौन-सा पुरुष है' इस उत्प्रेक्षा से किसी तरह को भी (न पाया ॥१५०॥) ... ... ... ... ... ...
५३८ कथासरित्सागर
५३८ कथासरित्सागर सा पुनरधिगतविद्या दीप्तानङ्गप्रभापि तनैव। देहेनान्येन वभौ जाता विद्याधरी झगिति ॥४ ६॥ सानन्दो मदनप्रभ स च ततः सा चाप्यनङ्गप्रभा। दिव्यान्योन्यवपुर्विलोकनरुसवोढानुरागावुभौ । स श्रीमान् समरश्च खेचरपतिः सर्वे समुत्पत्य खम्। जग्मुर्वीरपुरं सहैव किल तं वेद्याधरं तत्पुरम् ॥४०७॥ स तत्र समरो यथाविधि सुतामनङ्गप्रभां तदैव मदनप्रभप्रचुरभूमृते तां ददौ ॥ स च क्षपितशापया सममथैतया प्रीतया जगाम मदनप्रभः स्वपुरमत्र चासीत् सुखम् ॥४०८॥ इत्थं स्वदुर्नयविपाकवशेन दिव्याः शापच्युता ह्यवतरन्ति मनुष्यलोके । भुक्त्वा फलं तदुचितं च निजां गतिं ते पूर्वार्जितेन सुकृतेन पुनः प्रयान्ति ॥४ ९ इति स कथां नरवाहनदत्त सचिवान्निराम्य गोमुखतः । सालङ्कारवतीकस्तुतोष चक्रं सततश्च दिनकृत्यम् ॥४१ ॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरेऽलङ्कारवतीकम्बके द्वितीयस्तरङ्गः। तृतीयस्तरङ्गः नरवाहनदत्तस्य कार्पटिकस्य च कथा ततोऽप्यथुरलङ्कारवतीपार्श्वस्थितं सखा। नरवाहनदत्तं तं मरुभूतिर्व्यजिज्ञपत् ॥१॥ पश्य पश्य वराकोऽयं देव कार्पटिकस्तव। चर्मसण्डैकवसनो जटाभ्रः कृशधूसरः ॥२॥ सिंहद्वाराद्विवारात्रं शीते वाप्यातपेऽपि वा। न चलत्येव तन्नास्य किमद्यापि प्रसीदसि ॥३॥ काले दत्तं वरं ह्यल्पमकाले बहुनापि किम्। तद्यावन्न्म्रियते नैष तावदस्य कृपां कुरु ॥४॥
नवम लम्बक ५३१
नवम लम्बक ५३१ वह अनंगप्रभा भी अपनी विद्याओं को पुनः प्राप्त करके दिव्य शोभा धारण की हुई उसी शरीर में वह दूसरी के समान प्रतीत होती हुई विद्याधरी बन गई ॥४०६॥ शाप-मुक्त वह दम्पती मदनप्रभ और अनंगप्रभा परस्पर शरीर को देखने से अत्यधिक प्रसन्न और अनुरागी तथा विद्याधर-पति समर य तीनों आकाश में उड़कर विद्याधरों के वीरपुर नामक नगर को चले गये ॥४०७॥ वहाँ जाकर समर ने अपनी कन्या अनंगप्रभा को विद्याधराधिपति मदनप्रभ के लिए विधिपूर्वक प्रदान कर दिया। वह मदनप्रभ भी शाप-मुक्त और प्रसन्न अनंगप्रभा के साथ अपने नगर में सुखपूर्वक रहने लगा ॥४०८॥ इस प्रकार, अपनी दुर्नीति के फलस्वरूप दिव्य व्यक्ति मनुष्य-लोक में अवतीर्ण होते हैं और उसके अनुरूप फल भोगकर पूर्वजन्म के पुण्यों के प्रभाव से फिर से अपनी गति को प्राप्त होते हैं ॥४०९॥ अलंकारवती के साथ नरवाहनदत्त अपने मन्त्री गोमुख से इस प्रकार कथा सुनकर सन्तुष्ट हुआ और उसके अनन्तर उसने दैनिक कृत्य (स्नान संध्या आदि) के लिए उठ गया ॥४१०॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त तीसरा तरंग नरवाहनदत्त और कार्पटिक (भिखारी) की कथा किसी दिन अलंकारवती के साथ बैठे हुए नरवाहनदत्त से उसके मन्त्री मरुभूति ने कहा--॥१॥ देखिए स्वामी ! चमड़े के वस्त्र, जटाओं और दुबले-सूखे शरीरवाला यह बेचारा भिखारी दिन-रात शीत हो या धूप आपके राजद्वार से जरा भी हटता नहीं। इस पर आप कृपा क्यों नहीं करते ? ॥२-३॥ समय पर थोड़ा दिया हुआ भी बहुत होता है। असमय में बहुत देने पर भी क्या लाभ ? अतः जबतक यह मरता नहीं तबतक इस पर कृपा करो ॥४॥
५४० कथासरित्सागर
५४० कथासरित्सागर सञ्चूङ्क्ष्वा गोमुखोऽथावीत्साधूक्तं मरुभूतिना। किं पुनर्निराशोऽस्ति तव देवात्र कश्चन ॥५॥ क्षयो यावन्न वृत्तो हि पापस्य परिपन्थिनः। तावद्दानप्रवृत्तोऽपि दातुं शक्नोषि न प्रभुः ॥६॥ परिक्षीणे पुनः पापे वार्यमाणोपि यत्नतः। ईश्वरः प्रददात्येव कर्णाभरणमिदं किल ॥७॥ तथा च रूक्षदत्तस्य राज्ञः कार्पटिकस्य च। लब्धदत्तस्य देवेतां कथामाख्यामि ते शृणु ॥८॥ राज्ञो रूक्षदत्तस्य लब्धदत्त कार्पटिकस्य च कथा अभूल्लक्षापुरं नाम नगरं वसुधातले। तत्रासील्लक्षदत्ताख्यस्त्यागिनामग्रणीर्नृपः ॥९॥ रूक्षादूनं न दातुं स जानाति स्म किमार्थिने। सम्भ्रमात् तु य तस्मै ददौ लक्षाणि पञ्च सः ॥१०॥ तुष्टोप यस्मै स पुनर्निर्दारिद्र्यं चकार तम्। रूक्षदत्त इति ख्यातं नाम तस्यात एव तत् ॥११॥ तस्यैको लब्धदत्ताख्यः सिंहद्वारे दिवानिशम्। तस्थौ कार्पटिकश्चर्मखण्डैककटिकर्पटः ॥१२॥ स निवस्त्रटः शीतवर्षे ग्रीष्मातपेऽपि वा। न चचाल ततः क्षिप्रं स राजा च ददर्श तम् ॥१३॥ तथा तस्य चिरं तत्र तिष्ठतः क्लेशवर्तिनः। न स राजा ददौ किञ्चिद्दातापि सकृपोऽपि सन् ॥१४॥ अथैकदा स नृपतिर्जगामासन्नकाटवीम्। स च तं लगुडं बिभ्रदन्वक्कार्पटिको ययौ ॥१५॥ तत्र तस्य ससैन्यस्य वाहनस्थस्य धन्विनः। व्याघ्रान्वराहान्हरिणान्बाणवर्षेण निघ्नतः ॥१६॥ अग्रत पादचारी सन्न कार्पटिक एककः। जघान लगुडेनैव वराहाम्हरिजान्वहून् ॥१७॥ स दृष्ट्वा विक्रमं तस्य चित्रं धूर्तः कियानयम्। इति दध्यौ स राजाऽन्तर्न त्वस्मै किञ्चिदप्यदात् ॥१८॥
नवम लम्बक ५४१
नवम लम्बक ५४१ यह सुनकर गोमुख ने कहा—'स्वामिन् मरुभूति ने ठीक ही कहा है। किन्तु महाराज ! इसमें आपका कुछ भी अपराध नहीं है। जबतक धन के विरोधी उसके पाप का क्षय न होगा तबतक देनेवाला स्वामी चाहने पर भी उसकी दरिद्रता को दूर नहीं कर सकता ॥५६॥ पाप के नष्ट हो जाने पर बलपूर्वक रोकने पर भी ईश्वर, किसी-न-किसी प्रकार दे ही देता है। यह सब कर्म के अधीन है ॥५७॥ इस सम्बन्ध में राजा लक्षदत्त और कार्पटिक लब्धदत्त की कथा १ सुनो ॥५८॥ राजा लक्षदत्त और लब्धदत्त भिखारी की कथा पृथ्वी पर मत्तपुर नाम का एक नगर था। उसमें दानियों में अग्रणी लक्षदत्त नाम का राजा था ॥५९॥ वह राजा याचक को एक लाख से कम देना जानता ही न था। जिस याचक से वह बात कर लेता था उसे पाँच लाख देता था ॥६०॥ जिस पर वह प्रसन्न हो जाता था उसकी तो वह जन्म भर की दरिद्रता ही दूर कर देता था। इसीलिए, उसका नाम लक्षदत्त था ॥६१॥ उस राजा के सिंहद्वार पर एक चमड़े के टुकड़े से शरीर को ढके हुए एक भिखारी दिन-रात बैठा रहता था ॥६२॥ सिर पर जटाओं को बाँधे हुए वह भिखारी शीत में वर्षा में और कड़ी धूप में भी राजद्वार से जरा भी हिलता न था और राजा सदा उसे उसी स्थिति में देखता था ॥६३॥ इस प्रकार, बहुत समय कष्ट के साथ व्यतीत करने पर राजा ने दयालु और दानी होने पर भी कुछ नहीं दिया ॥६४॥ एक बार, वह राजा शिकार खेलने के लिए घने जंगल में गया। उसके पीछे लट्ठ लेकर वह भिखारी भी गया ॥६५॥ जब कि सेना के साथ वाहन पर बैठा हुआ राजा धनुष धारण किये हुए बाघों सूअरों और मृगों को बाणों से मार रहा था तब वह भिखारी कार्पटिक राजा के आगे रहकर सुदृढ़ (मजबूत) डंडे के प्रहार से ही उन हिंस्य पशुओं को मार डालता था ॥६६-६७॥ उस दरिद्र कार्पटिक के अद्भुत पराक्रम को देखकर उसे वीर मानता हुआ भी राजा ने उसे कुछ नहीं दिया ॥६८॥ १ बोकेशियो वोन्ते मर की दसवें दिन की कथा इससे मिलती-जुलती है।—अनु.
५४२ कथासरित्सागर
५४२ कथासरित्सागर
कृतादरः स नगरं स्वसुखायानिशम्भूपः। स च कार्पटिकस्तस्थौ सिंहद्वारे च पूर्ववत् ॥११९॥ कदाचिदेकसीमन्तगोत्रजायतयाय सः। लक्षदत्तो ययौ राजा युद्धं चास्याभवन्महत् ॥१२०॥ तत्र युद्धे स तस्याग्रे राज्ञः कार्पटिको बहून्। युद्धत्वादिरदण्डाग्रप्रहारैरवधीत्परान् ॥१२१॥ जितशत्रुः स राजा च निजं प्रत्याययौ पुरम्। न च तस्मै ददौ किञ्चित्तदपि दृष्टपराक्रमः ॥१२२॥ एवं कार्पटिकस्याथ लक्षदत्तस्य तिष्ठतः। व्यतीयुः पञ्च वर्षाणि तस्य कष्टेन जीवतः ॥१२३॥ षष्ठे प्रवृत्ते दृष्ट्वा तमेकदा दैवयोगतः। स राजा जातकरुणो लक्षदत्तो व्यचिन्तयत् ॥१२४॥ नाद्याप्यस्य मया दत्तं चिरक्लिष्टस्य किञ्चन। तद्यन्मया किञ्चिदेतस्मै दत्त्वा पश्याम्यहं न किम् ॥१२५॥ किं नामास्य वराकस्य वृत्तं पापक्षयो न वा। किं ददाति न वाद्यापि लक्ष्मीरस्य च दर्शनम् ॥१२६॥ इत्यालोच्य भूपः स्वैरं भाण्डागारं प्रविश्य सः। रत्नगर्भ मातुलुङ्गं समुद्गकमिव व्यधात् ॥१२७॥ चकार सर्वस्थानं च स विधाय बहिः सभाम्। तत्र च प्राविशन्सर्वे पौरसामन्तमन्त्रिणः ॥१२८॥ तन्मध्ये च प्रविष्टं तं राजा कार्पटिकं स्वयम्। इतो निकम्मेहीति जगाद स्निग्धया गिरा ॥१२९॥ ततः कार्पटिकः श्रुत्वा सम्मदस्तं प्रहर्षवान्। अग्रे सविधमागत्य राज्ञस्तस्योपविष्टवान् ॥१३०॥ ततस्तमब्रवीद्राजा ब्रूहि किञ्चित्सभाषितम्। तदाकर्ण्य पपाठैवामार्या कार्पटिकोऽथ सः ॥१३१॥ 'पूरयति पूणमेषा तरङ्गिणीसंहतिः समुद्रमिव। मदभीरधमस्य पुनर्मोधनमार्गेऽपि नायाति' ॥१३२॥ श्रुत्वतत्पाठयित्वा च भूयस्तुष्टः स भूपतिः। सद्रत्नपूर्णं तस्मै तन्मातुलुङ्गफलं ददौ ॥१३३॥
नवम लम्बक ५४५
नवम लम्बक ५४५ इस प्रकार, जंगली पशुओं का शिकार कर राजा अपने नगर में लौट आया और वह भिखारी भी पूर्ववत् सिंहद्वार पर आकर टिक गया ॥१९॥ एक बार, सीमान्तवर्ती एक राजा को जीतने के लिए राजा रूपदत्त गया। वहाँ दोनों में घमसान युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा रूपदत्त के सामने ही उस भिखारी ने मजबूत खैरा के डंडे के प्रहार से अनेक शत्रुओं को मार डाला। इस प्रकार, शत्रुओं को जीतकर राजा अपने नगर लौट आया किन्तु दरिद्र भिखारी के अद्भुत पराक्रम को देखकर भी राजा ने उसे कुछ नहीं दिया ॥२०-२२॥ इस प्रकार, निरन्तर राजद्वार पर रहते हुए और ककड़ियाँ चबाकर अपना जीवन व्यतीत करते हुए उसे पाँच वर्ष बीत गये ॥२३॥ छठा वर्ष प्रारम्भ होने पर दैवयोग से एक बार उसे देखकर राजा रूपदत्त को दया उत्पन्न हुई और उसने सोचा - ॥२४॥ बहुत दिनों से कष्ट पाते हुए इसको मैंने आज तक कुछ भी नहीं दिया। तो इसे किसी युक्ति से कुछ देकर क्यों न देखूँ ॥२५॥ कि इस बेचारे के पापों का नाश हुआ या नहीं। अब भी लक्ष्मी इसे दर्शन देती है या नहीं ॥२६॥ ऐसा सोचकर राजा अपने कोषागार में गया वहाँ से उसने एक बिजौरा नींबू में रत्न भरकर के एक डिब्बे के समान उसे बन्द किया ॥२७॥ और, महल के बाहर उसने एक सार्वजनिक दरबार किया। उस दरबार में सभी नागरिक सामन्त और मन्त्री एकत्र हुए ॥२८॥ उन लोगों में आये हुए उस कार्पटिक को राजा ने स्नेह-भरी वाणी से कहा-'यहाँ निकट आओ' ॥२९॥ यह सुनकर लब्धदत्त कार्पटिक प्रसन्न हुआ और राजा के पास आकर उसके आगे बैठ गया ॥३०॥ तब राजा ने उससे कुछ सुभाषित सुनाने के लिए कहा। राजा के यह कहने पर कार्पटिक ने एक आर्या पढ़ी (जिसका अर्थ है-) ॥३१॥ 'जिस प्रकार नदियों का समूह जल से भरे समुद्र को ही भरता है (और, तालाब आदि सूखे ही रहते हैं) उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी भरे हुए (धनवान्) को ही भरती है और निर्धन की आँखों के सामने भी नहीं आती' ॥३२॥ यह सुनकर और इस आर्या को फिर से उससे पढ़वाकर राजा ने प्रसन्न होकर रत्न से भरा हुआ एक बिजौरा नींबू जो डिब्बे के समान उस ने दिया ॥३३॥
५४४ कथासरित्सागर ९
५४४ कथासरित्सागर ९ यस्मै तुष्यति राजायं दारिद्र्यं तस्य कृन्तति। सोऽथ कार्पटिकस्त्वेवं समाहूयैवमादरात् ॥३४॥ मातुलुङ्गमिदं दत्तं तुष्टेनानेन भूभृता। कल्पवृक्षोऽप्यभव्यानां प्रायो याति पलाशताम् ॥३५॥ इति सर्वेऽपि तद्दृष्ट्वा तत्रास्थाने विषादिनः। अज्ञातपरमार्थत्वात्स्वैरमूचुः परस्परम् ॥३६॥ स तु कार्पटिको मातुलुङ्गमादाय निर्ययौ। आययौ चाग्रतस्तस्य भिक्षुरेको विपीदतः ॥३७॥ स राजवन्दिनामा तद्दृष्ट्वा शाटकमग्रहीत्। तस्मात्कार्पटिकान् मातुलुङ्गं दृष्ट्वा मनोरमम् ॥३८॥ प्रविश्य च स भिक्षुस्तद्राज्ञः फलमढौकयत्। राजा च तत्परीक्षाय श्रमणं पृच्छति स्म तम् ॥३९॥ मातुलुङ्गं कुत इदं भदन्त भवतामिति। सतं कार्पटिकं सोऽस्म वदातारं शशंस चम् ॥४०॥ अथ राजा विषण्णश्च विस्मितश्च बभूव सः। अहो अद्यापि न क्षीणं पापं तस्येति चिन्तयन् ॥४१॥ स्वीकृत्य मातुलुङ्गं तदुत्थायास्थानतः क्षणात्। चकार दिनकर्त्तव्यं *रक्तदत्तं स भूपतिः ॥४२॥ सोऽपि कार्पटिको गत्वा सिंहद्वारे यथास्थितः। कृतभोजनपानादिरासीद्विक्रीतशाटकः ॥४३॥ द्वितीयेऽह्नि स राजा च सर्वास्थानं तथैव तत्। विदधे तत्र सर्वे च सपोराः प्राविशन् पुनः ॥४४॥ दृष्ट्वा कार्पटिकं स च प्रविष्टं सोऽथ भूमिभृत्। तथैवाहूय पुनरप्युपावेशयदन्तिके ॥४५॥ पाठयित्वा च भूयोऽपि तामेवार्याँ प्रसादतः। गूढरत्नं ददौ तस्मै मातुलुङ्गं तदेव सः ॥४६॥ अहो द्वितीये दिवसे तुष्टोऽस्यायं वृथा प्रभुः। किं तावदेतदित्यत्र सर्वे दध्युः सविस्मयाः ॥४७॥
यह राजा जिस पर प्रसन्न होता है, उसके जीवन-भर की दरिद्रता दूर कर देता है। किन्तु यह कार्पटिक शोचनीय (अभागा) है, जिसे इस प्रकार आदर से बुलाकर भी इस प्रसन्न राजा ने यह बिजौरा नींबू दिया। सच है, कि अभागों के लिए कल्पवृक्ष भी पलाश का वृक्ष बन जाता है' ॥३४-३५॥ इस प्रकार, वास्तविक बात को न जानते हुए वहाँ बैठे हुए सभी लोग विषाद के साथ आपस में ऐसी बातें करने लगे ॥३६॥ वह कार्पटिक नींबू को लेकर जैसे ही बाहर निकला वैसे ही विषाद करते हुए उसके सामने एक याचक आया ॥३७॥ उसका नाम राजवल्लिक था। उसने कार्पटिक को एक साड़ी देकर बदले में वह नींबू उससे ले लिया ॥३८॥ और उस याचक ने सभा में जाकर राजा को वह बिजौरा नींबू भेंट कर दिया। तब राजा ने उसे पहचानकर विस्मय से पूछा—॥३९॥ 'भद्र! यह नींबू तुम्हें कहाँ मिला ?' तब उसने उस कार्पटिक को उसका देने वाला बताया ॥४०॥ तब राजा खिन्न और चकित होकर सोचने लगा कि इस कार्पटिक का पाप अभी समाप्त नहीं हुआ है ॥४१॥ तब राजा ने उस नींबू की भेंट स्वीकार की और वह उठकर अपने दैनिक कार्यों में लग गया ॥४२॥ याचक की दी हुई साड़ी को बेचकर अपने भोजन आदि का प्रबन्ध करके वह कार्पटिक रूक्ष्मदत्त फिर राजा के सिंहद्वार पर सदा की भाँति आकर खड़ा हो गया ॥४३॥ दूसरे दिन राजा ने फिर उसी प्रकार सार्वजनिक सभा की और उसमें पहले के समान नागरिक, दरबारी और मन्त्री एकत्र हुए ॥४४॥ उसी प्रकार उस सभा में आये हुए कार्पटिक को देखकर और पास बुलाकर उसने बैठाया और उसी आर्या को पुनः पड़वाकर प्रसन्नतापूर्वक दूसरा नींबू उसे प्रदान किया ॥४५-४६॥ आज दूसरे दिन भी राजा इस प्रकार व्यर्थ ही प्रसन्न हुआ, यह क्या बात है, इस प्रकार सभी उपस्थित व्यक्ति आपस में आश्चर्य के साथ कहने लगे ॥४७॥ ६९
५४६ कथासरित्सागर
५४६ कथासरित्सागर स च कार्पटिको विम्नो' हस्तं कृत्वा तु तत्फलम्। राजप्रसादं सफलं मन्वानो निर्ययौ बहिः ॥४८॥ तावत्तस्याययौ कोऽपि विषयाधिकृतो'ऽग्रतः। प्रविविक्षुस्तदास्थानं द्रष्टुकामो महीक्षितम् ॥४९॥ स दृष्ट्वा मातुलुङ्गं तदुपवव्रे कार्पटिकात्ततः। आददे शकुनापेक्षी दत्त्वास्मै वस्त्रयोर्युगम् ॥५०॥ प्रविश्य च नृपास्थानं पावनम्रो नृपाय तत्। मातुलुङ्गं ददावादौ ततोऽन्यत् प्राभृतं' निजम् ॥५१॥ परिज्ञाय च तद्राज्ञा फलं स विषयाधिपः। कुत एतत्तवेत्युक्तोऽवोचत्कार्पटिकादिति ॥५२॥ अहो वदति नाद्यापि लक्ष्मीस्तस्येह दर्शनम्। इत्यन्तश्चिन्तयन्सोऽथ राजाऽभून्मना भृशम् ॥५३॥ उत्सस्र्जो मातुलुङ्गं तद् गृहीत्वास्थानतश्च सः। सोऽपि कार्पटिको वस्त्रयुग्मं प्राप्यापणं ययौ ॥५४॥ चक्रे भोजनपानादि विक्रीत्यैकं च शाटकम्। द्वितीयं च द्विधा कृत्व वाससी द्वे व्यधत्त सः ॥५५॥ ततस्तृतीयेऽपि दिने सर्वास्थानं स पार्थिवः। व्यधात्तथैव सर्वेभ्यः प्रविशेन्न पुनर्जने ॥५६॥ तस्मै प्रविष्टाय च तन्मातुलुङ्गं तथैव सः। भूपोऽप्याहूय तामायां पाठयित्वा नृपो ददौ ॥५७॥ विस्मितेष्वथ सर्वेषु सोऽपि कार्पटिको बहिः। गत्वा राजविलासिन्यै तददाद्बीजपूरकम् ॥५८॥ सा तस्मै राजसम्मानतत्स्वस्तीव जङ्गमा। जातरूपं ददौ पुष्पमिवाग्रफलसूचकम् ॥५९॥ १ व्याकुलः। २ विषयस्य - देशस्य अधिकृत - अधिकारी प्रशासकः। ३ प्राभृतम् - राज्ञे प्रदेयमुपहारम् यत् शुभोदर्कल्पितमासीत्।
नवम लम्बक ५४७
नवम लम्बक ५४७ वह व्याकुल कार्पटिक भी उस फल को हाथ में लेकर उसे ही राजा की कृपा समझता हुआ सभा से बाहर निकला ॥४८॥ उसके बाहर निकलते ही उसके सामने किसी ग्राम का एक अधिकारी राजा के दर्शन के लिए सभा में आता हुआ आ गया ॥४९॥ उसने कार्पटिक के हाथ में नीबू देखकर और उसे अच्छा शकुन समझकर तथा कार्पटिक को धोती-दुपट्टे के दो जोड़े दे कर उसने उससे नींबू ले लिया और राजसभा में जाकर राजा के चरणों में झुककर उसको पहले नींबू ही उसने भेंट-स्वरूप रखा और उसके पश्चात् दूसरी वस्तुएं राजा को अर्पित कीं ॥५०-५१॥ राजा ने उस नींबू को पहचानकर उस ग्रामाधिकारी से पूछा कि यह फल तुम्हें कहाँ से प्राप्त हुआ ? उत्तर में उसने कहा—'कार्पटिक से'। यह सुनकर—'आश्चर्य है कि उस अभागे को लक्ष्मी अब भी दर्शन नहीं देना चाहता'—ऐसा सोचता हुआ राजा बहुत खिन्न हुआ ॥५२-५३॥ और, उस नींबू को लेकर वह सभा से उठ गया। उधर उस कार्पटिक ने उन कपड़ों के जोड़ों में एक को दूकान में बेचकर अपने भोजन-पानी का प्रबन्ध किया और बचे हुए जोड़े के दो हिस्से करके अपने पहनने के काम में लिया ॥५४-५५॥ तब तीसरे दिन राजा ने उसी प्रकार सभा की और सभी लोग पहले की भाँति वहाँ एकत्र हुए ॥५६॥ और, सभा में आये हुए कार्पटिक को पहले की भाँति आर्या पढ़वाकर नींबू का फल पुनः उसे प्रदान किया ॥५७॥ यह देखकर सभी उपस्थित व्यक्ति चकित हुए और कार्पटिक ने उस फल को राजा की वेश्या को ले जाकर दिया ॥५८॥ राजा के सम्मान-वृक्ष की चलती-फिरती लता के समान उस वेश्या ने उस कार्पटिक को भारी फलसूचक सोना उसके बदले में दिया ॥५९॥
५४८ कथासरित्सागर
५४८ कथासरित्सागर
तस्य विक्रीय तद्धस्तस्थं कार्पटिकः सुखम्। विलासिनीमपि सा राज्ञः प्रविशद्यान्तिकं तदा॥६०॥ तस्मै च स्फूरद्रम्यं तन्मातुलुङ्गमदीदृशत्। सोऽपि तत्प्रत्यभिज्ञाय तां पप्रच्छ तदागमम्॥६१॥ ततो जगाद सा दत्तमिव कापटिकेन मे। तच्छ्रुत्वा स नृपो दध्यौ लक्ष्म्या सोऽद्यापि नेक्षितः॥६२॥ मन्दपुण्यो न यो वेत्ति मत्प्रसादमनिष्फलम्। मामेव घतान्यायान्ति महार्हरत्नान्यहो मुहुः॥६३॥ इति ध्यात्वा गृहीत्वा तस्यापयित्वा च रक्षितम्। मातुलुङ्गं स उत्थाय चक्रे भूपतिराह्निकम्॥६४॥ चतुर्धेऽह्नि च साज्रापार्द्राजास्थानं तथैव सत्। पूर्यते स्म च तत्सर्वैः सामन्तसचिवादिभिः॥६५॥ ततस्तत्र तमायान्तं भूयः कार्पटिकं नृपः। उपवेश्याग्रतः प्राग्वत् तामायामपाठयत्॥६६॥ ददौ च मातुलुङ्गं सतस्मै तच्च द्रुतोन्मिषत्। तस्य हस्तार्थसम्प्राप्तं द्विधामूत्पतितं भुवि॥६७॥ पिधानसन्धिभग्नाच्च तस्माद्रत्नानि निर्ययुः। भासयन्ति तदास्थानं महार्घाणि बहूनि च॥६८॥ तानि दृष्ट्वाब्रुवन् सर्वे परमार्थमजानताम्। व्यह्र मुपा भ्रमोऽभून्न प्रभावस्त्वीदृशः प्रभो॥६९॥ एतच्छ्रुत्वावब्रवीद्राजा मया युक्त्यानया ह्ययम्। दर्शनं धीरौदार्यस्य किं न वेत्ति परीक्षितः॥७०॥ पापान्तश्च न्यहं नास्य प्राप्तं प्राप्तोऽस्य राज्यं तु। तन्नद्य दर्शनं रुद्ध्वा दत्तमत्तस्य साम्प्रतम्॥७१॥ इत्युक्त्वा तानि रत्नानि ग्रामान् हस्त्यश्वकाञ्चनम्। दत्त्वा चकार सामन्तं स तं कार्पटिकं प्रभुः॥७२॥ उत्तस्थौ च ततः स्नातुमास्थानात् संस्तुवञ्जनात्। ययौ कार्पटिकः सोऽपि कृतार्थो वसतिं निजाम्॥७३॥ १ संस्तुवन्तः राज्ञ औदार्यं जनाः = तस्या यस्मिन् तदास्थानं तत्संस्तुवञ्जनादित्यर्थः। आस्थानं सभा। माघभर्तौ वनीयमास्थानं रमीषपूर्लस्यो तत्र - 'इत्याद्यः।