भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ४८५ 'क्षीण चन्द्रमा अम्बर (वस्त्र और आकाश) के एक देश से दूसरे (मुख-मंडल) मंडल में जाकर यदि कुमुदिनी के लिए अदृश्य हो जाता है, तो उसमें उसकी क्या क्रूरता है ? ॥३६०॥ यह उत्तर सुनकर और उसे विपत्ति के कारण विक्लव रूपवाला नल समझकर वह गुप्तचर वहाँ से चला गया ॥३६१॥ और विदर्भ की राजधानी में पहुँचकर उसने महारानी के सहित राजा भीम तथा दमयन्ती से जो कुछ उसने देखा-सुना था सब कह सुनाया ॥३६२॥ यह सुनकर दमयन्ती एकान्त में अपने पिता से बोली—'पाचक के रूप में छिपा हुआ यह अवश्य ही मेरा पति है ॥३६३॥ अब उसके यहाँ बुलाने में मेरी युक्ति कीजिए। उस राजा ऋतुपर्ण के पास दूत भेजिए, वह दूत राजा ऋतुपर्ण के पास पहुँचते ही राजा से यह कहे कि राजा नल कहीं चला गया है। उसका पता अब नहीं लग रहा है ॥३६४-३६५॥ अब दमयन्ती प्रातःकाल ही फिर स्वयंवर करेगी। इसलिए, आप स्वयंवर के लिए आज ही विदर्भ देश में पधारें ॥३६६॥ यह सुनकर वह राजा रथ चलाने में कुशल आर्यपुत्र (नल ) के साथ एक दिन में अवश्य ही यहाँ आ जायगा' ॥३६७॥ पिता के साथ उसने इस प्रकार विचार कर और तदनुसार उसने कोसलराज के पास उपयुक्त दूत को भिजवाया ॥३६८॥ उस दूत ने राजा ऋतुपर्ण को उसी प्रकार जाकर सन्देश दे दिया। उत्सुक राजा ऋतुपर्ण ने भी सूत के रूप में अपने पास में स्थित नल से कहा ॥३६९॥ हे ह्रस्वबाहु तुमने मुझसे कहा था कि मुझे रथ चलाने का ज्ञान भी है, तो यदि तुम्हें उत्साह है, तो मुझे आज ही विदर्भ देश की राजधानी में पहुँचा दो ॥३७० ॥ यह सुनकर नल ने कहा 'ठीक है पहुँचाता हूँ। इस प्रकार कहकर और अच्छे-अच्छे घोड़ों को जोड़कर उसने एक उत्तम रथ तैयार किया ॥३७१॥ यह स्वयंवर का प्रचार, मेरी प्राप्ति के लिए एक बहाना मात्र है, ऐसा मैं समझता हूँ क्योंकि दमयन्ती तो स्वप्न में भी ऐसी नहीं है (कि वह पुनः स्वयंवर करे) ॥३७२॥ तो अब वहाँ जाकर देखता हूँ—ऐसा सोचकर उसने राजा ऋतुपर्ण के लिए, सजा- [L29: सजाया तैयार रथ ला दिया ॥३७३॥ राजा के रथ पर आरूढ हो जाने पर नल ने गरुड को जीतनेवाले वेग से रथ को हाँका ॥३७४॥

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