भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक १८१ उधर दमयन्ती के पिता भीम ने नल का समाचार जानकर, नल और दमयन्ती के कुशल जानने के लिए चारों ओर दूत भेजे ॥३३०॥ उन दूतों में सुदेव नाम का एक मन्त्री घूमता हुआ ब्राह्मण के वेश में सुबाहु की राजधानी में आ पहुँचा ॥३३१॥ वहाँ मन्त्री ने आगन्तुकों में अपने परिचितों को ढूँढ़ती हुई दमयन्ती को देखा और उस दुखिया दमयन्ती ने भी पिता के मन्त्री को देखा ॥३३२॥ वे दोनों परस्पर पहचानकर इस प्रकार रोने लगे कि सुबाहु राजा की रानी ने उन्हें जान लिया ॥३३३॥ जब उसने उन दोनों को अपने पास बुलाकर विस्तृत समाचार पूछा तब उसे पता चला कि वह उसकी बहन की कन्या दमयन्ती है ॥३३४॥ तब महारानी ने अपने पति से कहकर और दमयन्ती का सम्मान करके उसे रथ पर बैठाकर सैनिक सिपाहियों और सुदेव मन्त्री के साथ पिता के घर भेज दिया ॥३३५॥ पिता के घर पहुँचकर और अपने दोनों बच्चों को पाकर पिता के संरक्षण में पति की प्रतीक्षा करती हुई दमयन्ती वहीं रहने लगी ॥३३६॥ नल को पाक-विद्या और रथ चलाने की कला में विशेषज्ञ बताते हुए उसका परिचय देकर उसे ढूँढ़ने के लिए दमयन्ती के पिता भीम ने चारों ओर अपने गुप्तचर भेजे ॥३३७॥ और, गुप्तचरों से राजा भीम ने कहा—'जहाँ तुम्हें नल के होने का सन्देह हो वहाँ तुम इस आर्या को पढ़ना—वन में सोई हुई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर अम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र तू अदृश्य होकर कहाँ चला गया? ॥३३८-३३९॥ उधर, राजा नल उस वन में रात्रि के समय दमयन्ती को छोड़कर आधा दुपट्टा ओढ़े हुए दूर चला गया और आगे जाकर उसने वन में लगी हुई आग देखी ॥३४०॥ 'हे महापुरुष विचार मुझे जबतक यह दावाग्नि जला नहीं देती उसके पहले ही मुझे इससे निकाल लो' ॥३४१॥ ऐसा वचन सुनकर राजा ने ध्यान से देखा कि दावानल के पास कुण्डली मारे हुए एक नाग बैठा है ॥३४२॥ दवाग्नि की लपटों से उस नाग के फण की मणि की किरणें व्यंगित हो रही हैं मानों दवाग्नि ने हाथ में प्रचंड दण्ड लेकर उसकी मोरड़ी पकड़ ली हो ॥३४३॥ राजा नल ने दया करके उसके समीप जाकर और उसे कंधे पर रखकर दूर ले जाकर जैसे ही छोड़ना चाहा वैसे ही वह नाग बोला—॥३४४॥ ८१

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