कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक ३ प्रथम तरंग मंगलाचरण शिव और पार्वती की प्रेम-क्रीड़ा के समय शिव का केश ग्रहण करती हुए पार्वती के हाथों के नखों में प्रतिबिम्बित अनेक चन्द्रमाओं से युक्त उनका (शिव का) मस्तक आपका कल्याण करे ॥१॥१ मदजल से गीली और सिकुड़ी हुई सूंड को फैलाकर मानो सिद्धि प्रदान करते हुए गण- पति आपकी रक्षा करें ॥२॥ रत्नप्रभा की कथा पूर्वोक्त प्रकार से प्राणप्यारी मदनमंचुका के साथ धूमधाम से विवाह करके सफलमनोरथ युवराज नरवाहनदत्त गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ कौशाम्बी नगरी में सुख पूर्वक निवास करने लगा ॥३-४॥ एक बार, मदोन्मत्त कोयल के कूकने से मनोहर, लताओं को नचाते हुए मलय-पवन से सुरभित और गुनगुनाते हुए भौरों के गुंजन से मुखरित वसन्त-समय के प्राप्त होने पर, राज- कुमार, अपने साथी मन्त्रियों के साथ उद्यान-विहार के लिए गया ॥५-६॥ उद्यान-विहार करके आया हुआ और प्रसन्नता से विकसित नेत्रोंवाला तपन्तक२ सहसा युवराज के पास आकर बोला—॥७॥ 'युवराज ! यहाँ से कुछ समीप ही मैंने आकाश से उतरकर अशोक-वृक्ष के नीचे खड़ी किसी कन्या को देखा है ॥८॥ सहेली के साथ आई हुई और अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई उसी कन्या ने मेरे पास आकर तुम्हें बुलाने के लिए मुझे तुम्हारे पास भेजा है' ॥९॥ यह सुनकर नरवाहनदत्त अपने साथी मन्त्रियों के साथ उस कन्या को देखने के लिए शीघ्र ही अशोक वृक्ष के नीचे गया ॥१०॥ वहाँ उसने जन-लोचनों के लिए भ्रमरी के समान लाल ओठोंवाली एवं उभरे हुए स्तनों से शोभित उस सुन्दरी को देखा ॥११॥ पुष्यवृक्ष के समान गौर अंगोंवाली अपनी छाया से सन्ताप हरनेवाली और सुन्दर आकृतिवाली वह सुन्दरी उस उपवन की साक्षात् देवी-सी मालूम हो रही थी ॥१२॥ १ इस मंगलाचरण में संभोग-शृंगार रस है। पार्वती स्वाधीनभर्तृका नायिका हैं और यहाँ उत्प्रेक्षालंकार है। २ युवराज का नर्मसचिव वलनामक का पुत्र।