भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक ११५ इस स्थिति में सभी प्रजाओं ने भी उस शृंगभुज के ऐसे विशिष्ट गुण को देखा और उसके प्रति उनका अनुराग दृढ़मूल हो गया ।।२४१।। तब दूसरे दिन उस पिता राजा वीरभुज ने उसके दूसरे जेठे भाइयों के रहने पर भी गुणों से ज्येष्ठ उस शृंगभुज को ही युवराज-पद पर अभिषिक्त किया ।।२४२ ।। और तब वह शृंगराज युवराज-पद पर अभिषिक्त होकर पिता की आज्ञा लेकर घनी प्रकार की सेना के साथ दिग्विजय के लिए चला गया ।।२४३।। वह अपने बाहु-बल से समग्र पृथ्वी के राजमण्डल को जीत कर वापस चला आया साथ ही अपनी कीर्त्तिश्री को भी दिग्दिगन्त में बिखेर आया ।।२४४।। तत्पश्चात् कृतकृत्य वह शृंगभुज अपने विप्रज्ञ भाइयों के साथ राज्य-भार को सँभालता हुआ निश्चिन्त होकर भोग-सुख में लगे हुए माता-पिता को अनुरञ्जित करता रहा ब्राह्मणों को दान देता रहा और अर्थसिद्धि के समान रूपवती रूपशिखा के साथ दिन बिताने लगा ।।२४५-२४६।। इस प्रकार पतिव्रता स्त्रियाँ सभी अवस्थाओं में अपने पतियों की अनन्य भक्ति से उपासना करती हैं, जैसे ये दोनों सास-पतोहू गुणवरा और रूपशिखा करती थीं ।।२४७।। इस प्रकार, नरवाहनदत्त हरिमुख के मुख से इस कथा को सुनकर रत्नप्रभा के साथ मिलकर 'साधु-साधु' कहता हुआ अत्यन्त संतुष्ट हुआ ।।२४८।। तब वह उठकर और शीघ्र दैनिक कृत्य करके अपनी पत्नी के साथ पिता वत्सराज के पास गया। तानन्तर अपराह्न में संगीत से दिन बिताकर उसने प्रियतमा के साथ अपने अन्त पुर में रात बिताई ।।२४९।। महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का पंचम तरंग समाप्त षष्ठ तरंग भवभूति और गोमुख का पारस्परिक वाक्कलह तदनन्तर प्रातः काल रत्नप्रभा के महल में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास गोमुख आदि मन्त्री पुनः आये ॥१॥

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