भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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पृष्ठ 154, कुल 1079 में से

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सप्तम लम्बक १९१ इतने में ही अशोकलत्ता रानी के द्वारा झूठा कलंकित किया गया रनिवास का अध्यक्ष सुरक्षित तीर्थयात्रा करके आ पहुँचा ॥२२४॥ प्रतिहार से सूचित और पैरों पर गिरे हुए उस प्रशंसित सुरक्षित को सच्ची बात जानते हुए राजा वीरभुज ने बहुत सम्मानित किया ॥२२५॥ सारी दुष्ट रानियों को बुलाकर वहीं पर राजा ने उस सुरक्षित से कहा—'जाओ इन सब को भू-गृह में डाल दो। यह सुनकर उन सब को ले जाकर भू-गृह (तहखान) में डाल देने पर दया- वती रानी गुणवरा राजा के चरणों में गिरकर प्रार्थना करने लगी—'हे आर्यपुत्र ! तुम फिर मुझे ही भू-गृह में डाल दो प्रसन्न हो जाओ ! मैं इन डरी हुई सौतों को नहीं देख सकती' ॥२२६-२२८॥ इस प्रकार, प्रार्थना करके महारानी ने उन्हें बन्धन से छुड़ा लिया। उच्च कोटि के व्यक्तियों की विरोधियों पर कृपा ही बदला लेने के रूप में होती है ॥२२९॥ रानी गुणवरा का अनिष्ट चाहती हुई भी उसके द्वारा बचाई गई सभी रानियां लज्जित होकर अपने-अपने भवन को लौट गईं ॥२३०॥ राजा उदारहृदय उस गुणवरा रानी को भी बहुत मानने लगा और उस पत्नी के कारण अपने-आपको पुण्यवान समझने लगा ॥२३१॥ तब युक्तिपूर्वक निर्वासित करने के निमित्त निर्वासभुज आदि दूसरे पुत्रों को बुलाकर उस राजा ने यह बनावटी बात कही—॥२३२॥ 'मैंने सुना है कि आप अधम बनिकों ने एक पथिक को मार डाला है। इसलिए, आप सभी तीर्थ में घूमने के लिए चले जायें यहाँ न रहें' ॥२३३॥ यह सुनकर वे राजकुमार राजा को (निर्दोष होने का) विश्वास नहीं दिला पाये। क्योंकि प्रभु के हठ पकड़ लेने पर किसको विश्वास दिखाया जा सकता है ? २३४॥ तत्पश्चात् शृंगभुज ने भाइयों को जाते हुए देखा और उसकी आँखें दया से भर आईं। तब उसने अपने पिता से प्रार्थना की—॥२३५॥ 'पिता जी मेरे एक अपराध को आप क्षमा कर दें। इनपर कृपा करें'। यह कहकर वह उस राजा के चरणों पर गिर पड़ा ॥२३६॥ वह राजा भी उस पुत्र को राज्य-भार के उठाने में समर्थ और बचपन में भी यश और दया का आश्रय जानकर समझने लगा कि यह बचपन में गोवर्धन पर्वत के भार को उठानेवाले यशोदा माता से आश्रित भगवान् कृष्ण का अवतार है ॥२३७॥ गंभीर-हृदयवाले उस राजा ने बेटे को बचाने के लिए उसकी प्रार्थना मान ली। उन सभी भाइयों ने भी उस भाई को अपना प्राणदाता मान लिया ॥२३८॥

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