कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक १४९ यह सब मैंने युक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष दिखा दिया। और तुम्हारे द्वारा फेंके गये नरकंकाल के बारे में भी अभिज्ञान के साथ वर्णन कर दिया। इसलिए, यह राज्य मैंने तुम्हें दिया था वही अब तुमने मुझे दिया। अतः तुम्हें अहंकार न करना चाहिए और मन को भी दुःखी नहीं करना चाहिए ॥१०७-१०८॥ पूर्वजन्म के कर्मों के सिवा कोई किसी को कुछ देनेवाला नहीं है। प्रत्येक प्राणी गर्भ में प्रवेश के समय से पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करता है ॥१०९॥ उस राजासे इस प्रकार कहा गया वैद्य तरुणचन्द्र असन्तोष छोड़कर आनन्द से राजा की सेवा में तत्पर होगया ॥११०॥ उस जातिस्मर राजा अजर ने भी उस वैद्य को समुचित धन-मान आदि देकर अनुगृहीत किया ॥१११॥ और, स्वयं मित्रा एवं रानियों के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ निष्कण्टक राज्य करने लगा ॥११२॥ इतनी कथा सुनकर तपन्तक ने युवराज नरवाहनदत्त से कहा-'स्वामी ! इसी प्रकार इस लोक में सभी प्राणियों का शुभ और अशुभ फल अपने-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार होता है। मैं समझता हूँ कि आप हमारे पूर्वजन्म के स्वामी हैं। नहीं तो अन्य बहुतेरों के होते हुए भी आप हम पर इतने प्रसन्न कैसे होते ? ॥११३-११४॥ इस प्रकार, अपूर्व रोचक एवं विचित्र कथा को अपनी नवीन पत्नी रत्नप्रभा के साथ तपन्तक के मुँह से सुनकर, नरवाहनदत्त स्नान करने के लिए चला गया ॥११५॥ स्नान करके पिता और माता की आँखों में अमृत की वर्षा करते हुए नरवाहनदत्त ने पत्नी और मित्रों के साथ मद्यपान आदि में वह दिन और रात व्यतीत की ॥११६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) तदनन्तर, किसी एक दिन रत्नप्रभा के साथ मन्त्रियों में विविध बातें करते हुए नरवाहन दत्त ने बाहर भवन के चौक में अकस्मात किसी पुरुष का रोना-चिल्लाना सुना ॥१-२॥