कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक २४९ संगीत नृत्य और वाद्य के साथ भारी महोत्सव मनाया और ब्राह्मणों तथा समागत राजाओं का समुचित सम्मान किया ॥१३३॥ इतने में ही सारा आकाश देखते-देखते पीला हो गया मानों भविष्य में रक्त से लाल होने की सूचना दे रहा हो ॥१३४॥ चारों दिशाओं में भीषण हाहाकार मच गया मानो शत्रुओं की सन्तानों से डरी हुई दिशाएँ दौड़ी जा रही थीं ॥१३५॥ उसी क्षण मानो भू चरों को गे पैरों के साथ उड़ाने के लिए ऊपर की ओर फेंकती हुई महावायु (आँधी) चलने लगी ॥१३६॥ इतने में ही आकाश में अपनी चमक से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई और वेगवती विद्याधरों की सेना दिखाई पड़ी ॥१३७॥ उस सेना के मध्य में चकित सूर्यप्रभ आदि ने अत्यन्त सुन्दर और तेजस्वी एक विद्याधर कुमार को देखा ॥१३८॥ आषाडम्बर के पुत्र युवराज दामोदर की जय हो! अरे, पृथ्वी के रहनेवाले मनुष्य सूर्यप्रभ इसके चरणों में नत होओ ॥१३९॥ अरे जनमेजय तू भी इसके चरणों में पड़कर क्षमा प्रार्थना कर, तूने अपनी कन्या को अवाच्य स्थान में क्यों दिया। इसलिए इस दामोदर देव को प्रसन्न कर। अन्यथा यह तुम्हें कदापि क्षमा न करेगा ॥१४०॥ इस प्रकार आकाश से विद्याधर के बन्दी (चारण भाट) ने उस दामोदर के आगे चलते हुए ऊँचे स्वर से कहा ॥१४१॥ यह सुनकर, विद्याधरों की सेना को देखकर और हाथ-तलवार लेकर सूर्यप्रभ अपनी विद्या के प्रभाव से आकाश में उड़ा॥१४२॥ उसके पीछे उसके सभी मन्त्री प्रहस्त प्रभास सिद्धार्थ प्रह्लादन सर्वदमन वीतभीत और शुभकर भी शस्त्रों को लिए हुए आकाश में उड़े और उनके साथ विद्याधरों का महान् युद्ध छिड़ गया ॥१४३-१४४॥ सूर्यप्रभ ऊपर ही छूटा जिधर दामोदर था वह अपने बाणों से शत्रुओं का संहार कर रहा था और उसके बाणों को अपनी ढाल पर रोक रहा था ॥१४५॥ इधर युद्ध ही इने-गिने कवच और उधर लाखों की संख्या में सशस्त्र सादी विद्याधर। किन्तु, ये आपस में लड़ते हुए भी अपने को सशस्त्र सैकड़ों के समान थे ॥१४६॥ रक्त से सनी और लाल रंग की चमकती हुई मंत्री तलवार विद्याधर सेना की के रुधिर से सराबोर शस्त्रों से रणभूमि का कर रही थी ॥१४७॥ ३२