कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउसे देखते ही महल्लिका का मन ऐसा विचलित हुआ कि मानों उसके इस अभिनय को देखकर क्रोध से आंगिक अभिनय भ्रष्ट-सा हो गया ॥२३८॥ सभा में बैठे हुए सभी सदस्यों ने उन दोनों को समझ लिया और 'राजकुमारी थक गई है' ऐसा कहकर उस दृश्य को स्थगित कर दिया ॥२३९॥ वह महल्लिका भी सूर्यप्रभ को तिरछी दृष्टि से देखती हुई पिता से जाने की आज्ञा पाकर, सभी सदस्यों को प्रणाम करके घर चली गई ॥२४ ॥ सभी दानवराज भी नृत्य के उपरान्त अपने-अपने घरों को चले गये। सायंकाल होने पर सूर्यप्रभ भी अपने निवास-स्थान पर लौट आया ॥२४१॥ रात होने पर पुनः शयन-गृह में आई हुई कलावती के साथ वह सो गया और उसके साथी मन्त्री भवन के बाहर अन्यत्र सो गये ॥२४२॥ इसी बीच सूर्यप्रभ से मिलने की लालसा से महल्लिका भी घबराती हुई दो सखियों को साथ लेकर वहाँ आई ॥२४३॥ कमरे के अन्दर जाती हुई उसे देखकर अकस्मात् जाग पड़े सूर्यप्रभ के मन्त्री प्रज्ञाढ्य ने उसे देखा ॥२४४॥ और उसे पहचानकर कहा-'रुको रुको। मैं अन्दर जाकर और लौटकर आता हूँ' ॥२४५॥ 'हम क्यों रोका गया और आप सब लोग बाहर क्यों हैं'—महल्लिका के इस प्रकार प्रश्न करने पर प्रज्ञाढ्य ने कहा—'क्या स्वतन्त्रता से सोए हुए किसी व्यक्ति के पास एकाएक चला जाना उचित है ? हमारे स्वामी किसी व्रत (नियम) के कारण अकेले सो रहे हैं ॥२४६-२४७॥ 'अच्छा भीतर जाओ'—लज्जिता महल्लिका के इस प्रकार कहने पर प्रज्ञाढ्य अन्दर गया ॥२४८॥ वहाँ कलावती को सोती देखकर उसने सूर्यप्रभ को जगाकर अपनी इच्छा से आई हुई महल्लिका का समाचार दिया ॥२४९॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ धीरे से उठकर बाहर निकल आया और दो सखियों के साथ आई हुई महल्लिका से बोला—॥२५ ॥ 'आपने इस अभ्यागत अतिथि को अपने शुभागमन से कृतार्थ किया अब आप इस स्थान को भी कृतार्थ करें, यह आसन स्वीकार कीजिए' ॥२५१॥ यह सुनकर महल्लिका दोनों सखियों के साथ बैठ गई। सूर्यप्रभ भी प्रज्ञाढ्य के साथ सामने बैठ गया ॥२५२॥