कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम लम्बक २५३
बैठकर उसने कहा—'हे सुन्दरी तुमने सभा में अन्तिम समय सभासदों को सम्मान-सहित देखती हुई यद्यपि मेरा अपमान किया है, तथापि पंचमलयने तुम्हारे सौन्दर्य के समान ही तुम्हारे नृत्य से मेरी आँखें सफल हो गई हैं॥२५३-२५४॥
सूर्यप्रभ द्वारा इस प्रकार कही गई वह प्रह्लाद की कन्या बोली—'इसमें मेरा अपराध नहीं है, इसमें तो उसी का अपराध है, जिसने मेरे अभिनय को विकृत करके मुझे लज्जित किया है। यह सुनकर सूर्यप्रभ ने हर्ष से कहा—मेरी विजय हुई ॥२५५-२५६॥
और उसका हाथ अपने हाथ से पकड़ लिया जो मानों बलात्कार के भय से पसीने- पसीने होकर काँप रहा था ॥२५७॥
'आर्यपुत्र छोड़ो अभी मैं कुमारी हूँ और पिता के वश में हूँ। ऐसा कहती हुई राजपुत्री को प्रज्ञाढ्य ने कहा—'देवि क्या कन्याओं का गान्धर्व विवाह नहीं होता ? पिता तुम्हारे हार्दिक भाव को जानकर अब दूसरे को प्रदान नहीं करेंगे ॥२५८-२५९॥
वे इस सूर्यप्रभ का सम्मान अवश्य करेंगे। इसलिए घबराओ नहीं तुम्हारा विभ्रम व्यर्थ न हो ॥२६०॥
उधर बाहर जब प्रज्ञाढ्य इस प्रकार महस्तित्त्वा से कह रहा था इसी बीच अन्दर सोई हुई कलावती जाग उठी। उसने शय्या पर सूर्यप्रभ को न देखकर कुछ समय प्रतीक्षा की और फिर घबराकर वह बाहर निकल आई ॥२६१-२६२॥
बाहर आकर अपने पति को महस्तित्त्वा के साथ देखकर उसे कुछ क्रोध कुछ लज्जा और कुछ भय हो आया ॥२६३॥
महस्तित्त्वा भी उसे देखकर कुछ डरी तथा कुछ लज्जित हुई और सूर्यप्रभ तो चित्र में लिखा- सा निश्चल हो गया ॥२६४॥
'मुझे सबने देख लिया है, अब मैं यहाँ से भागूँ तो कैसे ? कैसे लज्जा करूँ और कैसे ईर्ष्या प्रकट करूँ—ऐसा सोचकर कलावती महस्तित्त्वा के पास ही जा बैठी ॥२६५॥
और उससे बोली—सखि कुशल तो है ? तुम इस रात में इस प्रकार यहाँ कैसे आई हो ? तब महस्तित्त्वा ईर्ष्या के साथ उससे बोली—'यह लोक तो मेरा है और मेरा घर भी यहीं है। तू दूसरे पाताल-गृह से यहाँ आई है। इसलिए तू मेरी अतिथि है' ॥२६६-२६७॥