कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम लम्बक २९५ यह सुनकर कलावती हँसकर बोली— यह तो सत्य ही दीख रहा है कि तू यहाँ आये हुए सबका या किसी विशेष अतिथि का आतिथ्य-सत्कार करती है' ॥२६८॥ कलावती द्वारा इस प्रकार कही गई महल्लिका बोली—'यदि मैंने प्रेम से तुम्हें कुछ कह दिया तो तुम द्वेष से कठोर बातें क्यों कर रही हो ? हे निर्लज्जे क्या मैं तेरी तरह निर्लज्ज हूँ? ॥२६९-२७० ॥ कि माता-पिता द्वारा बिना दिये हुए ही दूर से दूसरे के घर में आकर रात के समय एकान्त में दूसरे की शय्या पर अकेली सोई हूँ ? ॥२७१॥ मैं तो अपने पिता के अतिथि से अपनी दो सखियों के साथ आतिथ्य-सत्कार के रूप में मिलने आई हूँ। जब हम लोगों को रोककर यह मन्त्री अन्दर गया तभी मैंने जान लिया था फिर तुमने उसे स्वयं ही स्पष्ट कर दिया ॥२७२-२७३॥ महल्लिका द्वारा इस प्रकार फटकारी गई कलावती तिरछी और क्रोध से रक्त दृष्टि से सूर्यप्रभ को देखती हुई वहाँ से चली गई ॥२७४॥ तब महल्लिका ने सूर्यप्रभ से कहा—'हे बहुला के प्यारे, अब मैं भी जाती हूँ' और इस प्रकार कहकर वह चली गई ॥२७५॥ उस समय मन से हीन सूर्यप्रभ भी खिन्न हो गया यह उचित ही था; क्योंकि दोनों प्रेयसियों पर आसक्त उसका मन भी उन्हीं के साथ चला गया था ॥२७६॥ इसके पश्चात् कलावती के कलह करके चले जाने पर उसकी चेष्टा जानने के लिए सूर्यप्रभ ने शीघ्र ही उठकर प्रभास नामक अपने मन्त्री को भेजा ॥२७७॥ उधर महल्लिका का समाचार जानने के लिए प्रहस्त मन्त्री को भेजा और स्वयं प्रज्ञाढ्य के साथ उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा ॥२७८॥ तदनन्तर, कलावती का समाचार लेकर प्रभास उसके पास आया और पूछने पर बोला— 'मैं अपनी विद्या के प्रभाव से अदृश्य होकर कलावती के वासस्थान—दूसरे पाताल—में उसके घर पर गया ॥२७९-२८० ॥ वहाँ मैंने बाहर बैठी हुई दो देवियों की बातचीत सुनी। उनमें एक कहने लगी—'अरी आज कलावती घबराई हुई-सी क्यों है? तब दूसरी ने कहा—'सखि इसका कारण सुनो। सुपुण्डरीक का अवतार आज चौथे पाताल में हैं ॥२८१-२८२॥