कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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और, युद्ध में उसकी सहायता के लिए अपने दो पुत्र भी प्रदान किये। तदनन्तर, सूर्यप्रभ सबके साथ अनीक के पास गया ॥२३॥ उसने भी वर प्राप्ति का समाचार जानकर प्रसन्न होकर अपनी दूसरी कन्या सुखावती का विवाह भी सूर्यप्रभ से कर दिया और युद्ध में सहायता के लिए उसने भी अपने दो पुत्र सूर्यप्रभ को दिये ॥२४॥ तदनन्तर, अन्यान्य असुर-सरदारों की सहायता के लिए सम्मान प्रकट करता हुआ सूर्यप्रभ पत्नियों के साथ वहाँ (पाताल में) कुछ दिन रह गया ॥२५॥ तब मय आदि के साथ सूर्यप्रभ ने सुना कि सुनीथ की तीनों स्त्रियाँ और उसकी सभी स्त्रियाँ गर्भवती हो गई हैं ॥२६॥ दोहद के लिए पूछने पर सबने एक ही इच्छा प्रकट की कि हम लोग महायुद्ध देखना चाहती हैं। यह सुनकर मयासुर प्रसन्न हुआ ॥२७॥ और, बोला कि जो असुर पहले देव-दानव-युद्ध में मारे गये थे वे सब अब इनके गर्भ में आ गये हैं ॥२८॥ इस प्रकार छह दिन व्यतीत हो गये और सातवें दिन मय सूर्यप्रभ आदि स्त्रियों के साथ रसातल से बाहर निकलकर गुफा के द्वार पर आये ॥२९॥ उनके आते ही विद्याधरों ने उनकी तैयारी में विघ्न करने के लिए जो मायामय उत्पात दिखलाये थे उन्हें स्मरण-मात्र से वहाँ आये हुए सुखानुकूलार ने नष्ट कर दिया ॥३०॥ तदनन्तर, राजा चन्द्रप्रभ के दूसरे पुत्र रत्नप्रभ को पृथ्वी के राज्य पर प्रतिष्ठित कर मय सूर्यप्रभ आदि भूतासन नामक विमान पर बैठकर सभी विद्याधरों के राजा सुमेरु के घर पर गये। वहाँ से मय के कथनानुसार वे पहले वंगारक के तपोवन में गये ॥३१-३२॥ वहाँ तपोवन में मित्र भाव से आये हुए उनका सुमेरु ने हार्दिक स्वागत-सम्मान किया। मय ने उसे पहले का सभी वृत्तान्त सुना दिया था और उसने भी पहले से प्राप्त शिवजी की आज्ञा का स्मरण किया ॥३३॥ उसी स्थान पर रहते हुए सूर्यप्रभ ने अपने मित्रों बन्धुओं और सेनाओं को कठिनाई से एकत्र किया ॥३४॥ वहाँ सबसे पहले विघ्नों को सिद्ध करके मय द्वारा प्रेरित होकर सेना-सहित सूर्यप्रभ के साने आये ॥३५॥ : वे हरिमट आदि सोलह थे जिनम एक-एक के साथ दस-दस हजार रथ और बीस-बीस : हजार पैदल सिपाही थे ॥३६॥ : उनके बाद पूर्व निश्चयानुसार भूप्रभ के श्वशुर, साले तथा अन्यान्य सम्बन्धी दैत्य-दानव : आये ॥३७॥