भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 1079 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 378

देव गुरु के ऐसा कहने पर इन्द्र स्वयं देवताओं के साथ नमुचि से घोड़ा मांगने गया ॥२२८॥ मुझसे मांगनेवाला याचक कभी विमुख नहीं होता उसमें भी देवराज इन्द्र। तो मैं नमुचि होकर इसे घोड़ा क्यों न दूँ ? मैंने तीनों लोकों में चिरकाल से जो कीर्ति अर्जित की है, यदि वही मलिन हो गई, तो मेरे वैभव और जीवन से क्या लाभ ? ॥२२९-२३०॥ ऐसा सोचकर उदारहृदय नमुचि ने गुरु शुक्राचार्य के रोकने पर भी इन्द्र को घोड़ा दे दिया ॥२३१॥ उसके घोड़ा देने पर भी उसे निःशस्त्र बनाकर इन्द्र ने वज्र पर रखे हुए गंगा के फेन से उसे मार डाला क्योंकि वह अन्य अस्त्र-शस्त्रों से नहीं मारा जा सकता था ॥२३२॥ आश्चर्य है कि संसार में भोग की तृष्णा का अन्त नहीं है। इस तृष्णा के वशीभूत होकर देवता भी अनुचित कार्य करने से तथा अपयश से नहीं डरते ॥२३३॥ इस वृत्तान्त को जानकर दुःखित नमुचि की माता दनु ने अपने तपोबल से शोक की शान्ति के लिए यह संकल्प किया कि 'बलवान् नमुचि फिर मेरे गर्भ से उत्पन्न हो और वह युद्ध में देवताओं से अजेय रहे' ॥२३४-२३५॥ तदनन्तर, वह बलवान् नमुचि अत्यन्त बलशाली होने के कारण प्रबल नाम से पुनः दनु के गर्भ से उत्पन्न हुआ। उस प्रबल नामक दानवराज ने इन्द्र को सौ बार पराजित किया और वह याचकों के लिए जीवन तक देने के लिए सदा सन्नद्ध रहता था ॥२३६-२३७॥ उससे बार-बार पराजित होकर देवताओं ने मन्त्रणा करके उससे कहा—'हमलोग नरमेध यज्ञ करना चाहते हैं इसके लिए हमें अपना शरीर-दान करो ॥२३८॥ यह सुनकर उस प्रबल दानी दानव ने माँगने पर उन शत्रुओं को भी अपना शरीर दान में दे दिया। उदार व्यक्ति अपने प्राणों का दान कर देते हैं किन्तु याचक को विमुख नहीं होने देते ॥२३९॥ तदनन्तर देवताओं ने उस दानव के टुकड़े-टुकड़े कर डाला। वही प्रबल दानव आज प्रभास के रूप में मनुष्य-लोक में उत्पन्न हुआ है ॥२४०॥ यह पहले नमुचि तदनन्तर प्रबल रूप में जन्मा। वही आज प्रभास के रूप में है और पूर्व पुण्य के कारण शत्रुओं से अजेय है ॥२४१॥