भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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[Page-header] षष्ठम लम्बक १५७ सावित्री के साथ ब्रह्मा तथा उनके साथ मूर्तिमान् वेद और महर्षि भी आये ॥४७॥ और लक्ष्मी कीर्ति जया आदि के साथ चक्रधारी भगवान् विष्णु भी गरुड़वाहन पर बैठ- कर वहाँ आये ॥४८॥ अपनी सभी पत्नियों के साथ महर्षि कश्यप द्वादश आदित्य अष्ट वसु, यक्षों, राक्षसों और नागों के राजा एवं प्रह्लाद आदि असुरों के राजा भी युद्ध देखने के लिए वहाँ एकत्र हुए ॥४९॥ इन दर्शकों के कारण आकाश-मण्डल भर जाने पर, शस्त्रों की झनझनाहट से भीषण और महान् कोलाहल दोनों ओर की सेनाओं में फैल गया। सारी दिशाओं के आकाश बादलों के समान बाणों के जाल से छा गये। दोनों ओर से फंकते हुए बाणों के आपस में टकराने पर अग्नि-रूपी बिजली चमकने लगी ॥५०-५१॥ नीचे भूमि पर शस्त्रों से काटे गए हाथी-घोड़ों के वीरों के रक्त की नदियाँ बह चलीं। वीरों के शरीर-रूपी ग्राह उस नदी में बह रहे थे। नाचते कूदते और रक्त की नदी में तैरते तथा चिल्लाते हुए शूरों-वीरों पर टूटते हुए पियासों और भूत-प्रेतों के लिए वह युद्ध अत्यन्त उत्सव और आनन्द का कारण बन गया था ॥५२-५३॥ असंख्य सैनिकों के कट जाने और उस घोर संग्राम के शनै-शनै शान्त होने पर शेष सैनिक धीरे-धीरे अपने और शत्रु के पक्ष को भली भाँति जान सके ॥५४॥ तब सुमेरु द्वारा शत्रु-पक्ष के वीरों के नाम सूर्यप्रभ आदि ने सुने और उन्हें पहचाना ॥५५॥ सबसे पहले उत्तर के एक राजा सुबाहु तथा विद्याधरों के राजा अट्टहास का परस्पर द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥५६॥ बहुत समय तक युद्ध करते हुए और बाणों से छिदे हुए सुबाहु के सिर को अट्टहास ने अर्धचन्द्राकार बाण से काट दिया ॥५७॥ सुबाहु को मृत देखकर मुष्टिक नामक राजा अट्टहास पर टूट पड़ा। अट्टहास ने उसे भी छाती में बाण मारकर धराशायी बना दिया ॥५८॥ मुष्टिक के मारे जाने पर प्रलम्ब नामक राजा ने आगे बढ़कर अट्टहास को बाणों की वर्षा से छा दिया ॥५९॥ अट्टहास ने उसकी सेना को मारकर और उसके मर्मस्थानों पर प्रहार करके प्रलम्ब को भी रथ पर ही सुला दिया ॥६०॥

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