कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 1079 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम लम्बक ४१५ यह सुनकर गुणशर्मा ने कहा—'ठीक है, ऐसी सुन्दर लक्षणोंवाली कन्या का वधुत्व ही क्यों होगा ? ॥२१०॥ इसी प्रसंग में अग्निदत्त के पूछने पर गुणशर्मा ने स्त्रियों और पुरुषों के भिन्न-भिन्न अंगों पर होनेवाले तिल आदि चिह्नों का पृथक्-पृथक् फल उसे बताया ॥२११॥ इधर वह सुन्दरी कन्या गुणशर्मा को देखकर चन्द्रमा को चकोरी जैसी आँखों से पी जाना चाहती थी ॥२१२॥ तब अग्निदत्त ने एकान्त में गुणशर्मा से कहा—'हे भाग्यशालिन्, मैं इस सुन्दरी नाम की कन्या को तुझे देता हूँ ॥२१३॥ विदेश न जाओ और यहीं मेरे घर में अपनी स्वतन्त्रता से रहो। उसकी यह बात सुनकर गुणशर्मा बोला—'सच है, ऐसा करने पर मुझे कौन-सा सुख प्राप्त नहीं हो सकता किन्तु राजा द्वारा किये गये झूठे अपमान की आग से जले हुए मुझे यह सब अच्छा नहीं लग रहा है॥२१४-२१५॥ सुन्दरी स्त्री चन्द्रमा का उदय (चाँदनी) और वीणा की पंचम ध्वनि ये सब सुखी जनों को आनन्द देते हैं॥२१५॥ स्वयं (अपने से) आसक्त और अनुरागिणी स्त्री व्यभिचारिणी नहीं होती जैसे अशोक- वती ॥२१६॥ और भी बात है कि उज्जयिनी नगरी यहाँ से समीप है। इसलिए, मुझे यहाँ जानकर वह (राजा) किसी समय भी उपद्रव कर सकता है ॥२१७॥ अतः तीर्थों का भ्रमण करके और अपने पापों का प्रक्षालन कर इस शरीर को छोड़ूँगा तब सुखी हूँगा ॥२१८॥ यह सुनकर अग्निदत्त हँसकर बोला—'शुद्ध हृदयवाले तुम्हारे, एक मूर्ख के द्वारा अपमानित होने में क्या हानि है ? आकाश में फेंका हुआ कीचड़ फेंकनेवाले के सिर पर ही गिरता है। वह राजा शीघ्र ही अपनी मूर्खता का फल पायेगा। मोह से अन्धे और विवेक से विहीन व्यक्ति के पास लक्ष्मी अधिक दिन नहीं रहती ॥२१९-२२१॥ यदि तुम दुष्टा अशोकवती को देखकर स्त्रियों से विरक्त हो गये हो तो सती स्त्री को देखकर श्रद्धा भी उन पर क्यों नहीं करते ? तुम तो सती और असती के लक्षणों को जानते हो ॥२२२॥ उज्जयिनी यदि समीप है, तो तुम्हारा ऐसा प्रबन्ध करूँगा कि तुम्हें यहाँ रहते कोई जान न सकेगा ॥२२३॥