भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक ४१७ बड़े भाई हिरण्याक्ष आदि ने स्वर्ग के लिए परस्पर विरोध किया था वे मारे गये और जब इन्द्र ही बड़ा है तो विरोध क्यों है ? इसलिए बैर रहित होकर आप लोग परस्पर भद्र व्यवहार करो जिससे कि हम लोगों को सन्तोष और तीनों लोकों का कल्याण हो ॥११४ ११५॥ सिद्धि के मुख से माता दनु के वचन सुनकर इन्द्र ने बृहस्पति की ओर देखा। तब बृहस्पति कहने लगे—'देवताओं को असुरों के प्रति कोई बैर नहीं है। इसलिए, देवता उनके प्रति कोई भी हानिकारक कार्य नहीं करते' ॥११६ ११७॥ बृहस्पति के ऐसा कहने पर दानवराज मय बोला-'यदि असुरों के मन में देवताओं के प्रति अनिष्ट-भावना होती तो नमुचि असुर, मूढों को जिलानेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़े को इन्द्र के लिए दान में कैसे दे देता और प्रवल दैत्य देवताओं को अपना शरीर कैसे दान कर देता ? बलि विष्णु को अपना शरीर दान करके कारागार में क्यों जाता और अयोदेह असुर विश्वकर्मा को अपना शरीर कैसे दे देता ॥११८—१२ ॥ और, अधिक क्या कहूँ नित्य ही देवताओं द्वारा पीड़ित असुर यदि छल-कपट द्वारा आतंकित न किये जायें तो उनके मन में कोई विकार नहीं हो' ॥१२१॥ मयासुर के इस प्रकार कहने पर सिद्धि ने कहा - 'तुम जो कहते हो, ठीक है। तदनन्तर, देवता और असुरों ने परस्पर के मित्रों से प्रेमपूर्वक मेल-मिलाप किया ॥१२२॥ इसी बीच भवानी पार्वती द्वारा भेजी गई प्रतीहारी जया भी वहीं आई। उसके आने पर सबने उसका स्वागत-सम्मान किया और वह सुमेरु से कहने लगी - 'मुझे देवी पार्वती ने भेजा है और तुम्हें यह सन्देश दिया है कि तुम्हारी कामचूड़ामणि नाम की कन्या है उसे तुम शीघ्र ही सूर्यप्रभ के लिए दे दो। वह कन्या मेरी भक्ता है। सुजया के इस प्रकार कहने पर सुमेरु ने नम्रता पूर्वक उससे कहा—॥१२३—१२५॥ 'भगवती ने मुझे जो आज्ञा दी यह मुझ पर उनका अनुग्रह है। भगवान् महादेव ने भी यह बात पहले मुझसे कही थी' ॥१२६॥ सुमेरु के इस प्रकार कहने पर जया ने सूर्यप्रभ से कहा- तुम इन (कामचूड़ामणि) को सभी रानियों में प्रधान बनाना। यह तुम्हारी सभी प्रिय पत्नियों में अधिक प्रिय होंगी। इस प्रकार स्वयं पार्वती ने तुम्हें भी आदेश दिया है ॥१२७-१ २८॥