कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ५०५ इस विषय में तुम्हारे इन साथियों की अब शक्ति नहीं है। यह तुम्हारा अवसर है। तुमने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि मैं मरी हुई को जिला देता हूँ ॥१५६॥ ता यदि तुममें विद्या का बल है तो इस मरी हुई मेरी कन्या को जिलाओ। जीवित हो जाने पर इस कन्या को तुम्हें दे दूंगा' ॥१५७॥ राजा की यह बात सुनकर जीवदत्त ने राजकन्या के मुंह पर जल का छींटा देकर इस आर्या को पढ़ा—॥१५८॥ अट्टात्टहासहसिते करङ्कमालाङ्कके दुरालोके। चामुण्डे विकराले साहाय्यं मे कुरु त्वरितम् ॥१५९॥ इस प्रकार, विद्या का प्रयोग करने पर भी जब वह कन्या जीवित न हुई, तब जीवदत्त ने दुःखी होकर कहा—॥१६०॥ विन्ध्यवासिनी द्वारा दी गई भी मेरी विद्या निष्फल हो गई। इसलिए, हँसने के योग्य मेरे इस जीवन से अब क्या लाभ है? ॥१६१॥ ऐसा कहकर जैसे ही जीवदत्त तलवार से अपना सिर काटने को उद्यत हुआ वैसे ही इस प्रकार की आकाशवाणी हुई—॥१६२॥ हे जीवदत्त साहस मत करो। सुनो यह अनंगरति विद्याधरकुमारी है॥१६३॥ माता-पिता के शाप से यह इतने दिनों तक मनुष्य-जीवन में रही। आज वह मनुष्य-देह छोड़कर अपने विद्याधर-देह में चली गई ॥१६४॥ अतः तुम जाकर फिर उसी विन्ध्यवासिनी देवी की आराधना करो। उसी की कृपा से तुम इस विद्याधरी को प्राप्त करोगे ॥ १६५॥ अब वह दिव्य भोगों को भोग रही है। अतः राजा और रानी को भी उसके लिए शोक न करना चाहिए। इतना कहकर दिव्य वाणी शान्त हो गई ॥१६६॥ तदनन्तर, रानी-सहित राजा ने कन्या का दाह आदि संस्कार करके उसका शोक त्याग दिया और वे तीनो वीर जहाँ से आये थे वहीं लौट गये ॥१६७॥ और जीवदत्त उस विद्याधरी की प्राप्ति में विश्वास करके विन्ध्यवासिनी की शरण में जाकर तपस्या करने लगा। विन्ध्यवासिनी ने स्वप्न में उसे आदेश दिया—॥१६८॥ अनंगप्रभा की कथा 'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ उठो और सुनो मैं तुमसे यह कहती हूँ। हिमालय में वीरपुर नाम का का नगर है। वहाँ समर नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी रानी अनंगवती में अनंगप्रभा नाम की कन्या उत्पन्न हुई ।१६९ १० ॥ ६४