कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ विषय सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएँ करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूँढ़ता रहा॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया॥२२ ॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला जहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रविष्ट किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदत्ता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवां दिन है॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा—॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियदत्ता उससे बोली—'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुषों को मैं पुत्रों और भाइया के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५