कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ५५७ देवपुत्र सुप्रभ की कथा मैं दिव्यदृष्टि से भावी होनेवाले शुभ और अशुभ को जानती हूँ। जैसे स्वर्ग में स्थित देवपुत्र सुप्रभ जानता था ॥११७॥ उस दिव्य दृष्टिवाले सुप्रभ ने पुण्य-क्षय के कारण स्वर्ग से अपना पतन और एक सप्ताह तक शूकरी के पेट में रहना जान लिया था ॥११८॥ तब शूकरी के गर्भ में रहने के कष्ट की कल्पना करते हुए देवपुत्र अपने सातों स्वर्गीय सुखों के लिए चिन्ता करने लगा-'हाय स्वर्ग हाय अप्सराओ और हाय नन्दन-वन के लतागृहो हाय मैं अब तुम्हें छोड़कर शूकरी के गर्भ में कैसे रहूँगा और उसके पश्चात् कीचड़ में कैसे जीवन व्यतीत करूँगा' ॥११९-१२०॥ इस प्रकार, रोते हुए देवपुत्र को सुनकर, देवराज इन्द्र ने आकर उससे विलाप का कारण पूछा और उसने भी अपना दुःख उसे बता दिया ॥१२१॥ तब इन्द्र ने कहा कि 'तेरे लिए एक उपाय है सुन'। 'ओं नमः शिवाय' इस मन्त्र का जप करता हुआ भगवान् शिव की शरण में जा ॥१२२॥ तू उनकी शरण में जाकर पापों से छूटकर पुण्य प्राप्त करेगा और उस पुण्य के प्रभाव से सूकर की योनि तुझे न मिलेगी और न तू स्वर्ग से ही पतित होगा ॥१२३॥ देवराज के इस प्रकार कहने पर सुप्रभ ने उसे स्वीकार किया और 'ओंनमः शिवाय' कह कर शम्भु की शरण ली ॥१२४॥ छः दिनों तक तन्मय होकर शिवजी का जप करके वह सूकर-योनि से ही नहीं बच गया प्रत्युत स्वर्ग से भी ऊपर चला गया ॥१२५॥ सातवें दिन उसे स्वर्ग में न देखकर इन्द्र ने विशेष दृष्टि डाली तो देखा कि वह स्वर्ग से ऊपर दूसरे लोक में चला गया है ॥१२६॥ इस प्रकार, जैसे सुप्रभ ने भावी अशुभ के लिए शोक किया था उसी प्रकार मैं भी राजा की होनेवाली मृत्यु के लिए शोक कर रही हूँ ॥१२७॥ इस प्रकार, कहती हुई पृथ्वी से उस वीरवर ने कहा-'माता ! जैसे इन्द्र द्वारा मुक्ति बताने पर सुप्रभ पापमुक्त हो गया उसी प्रकार राजा के भी जीवित रहने का कोई उपाय हो तो बताओ।' वीरवर के ऐसा कहने पर पृथ्वी बोली- ॥१२८-१२९॥