कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रातःकाल सार्वजनिक सभा (आम दरबार) में वीरवर के उपस्थित होने पर, राजा ने रात्रि में हुआ वीरवर का सारा आश्चर्यमय वृत्तान्त सभ्या में कह सुनाया ॥१९०॥ तब राजा ने सभी सभ्या द्वारा प्रशंसा किए जाते हुए वीरवर को पुत्र के साथ बैठाकर, उसे अपने हाथ से पट्ट बाँधकर बहुत-से देश उसे दान में दिये और दस करोड़ सोने की मुहरें तथा साठगुनी मासिक वृत्ति उसे प्रदान की ॥१९१ १९२॥ वह वीरवर ब्राह्मण उसी समय राजा के समान होगया। उस पर श्वेत छत्र लग गया। इस प्रकार अपने कुटुम्ब के साथ वह सफल हुआ ॥१ ९३॥ मन्त्री गोमुख इस प्रकार नरवाहनदत्त का कथा सुनाकर उसका उपसंहार करते हुए कहने लगा- 'स्वामी इस प्रकार राजाओ क पुण्य के योग से ही कोई अनुपम वीर सेवक उन्हें मिलते हैं जो स्वामी के लिए अपने शरीर और प्राणों का मोह त्यागकर दातां लोकों को सिद्ध और सफल बनाते हैं ॥१९४ १९५॥ हे महाराज यह उत्तम ब्राह्मणवीर तुम्हारा उसी प्रकार का सेवक प्रतीत होता है क्योंकि यह नवीन वीर अचिन्त्य अधिक सत्त्व गुणवाला लम्बी भुजाओवाला और स्थिर एवं सुन्दर आकृतिवाला है ॥१९६॥ उदारहृदय नरवाहनदत्त अपने मुख्य मन्त्री गोमुख से इस प्रकार की उत्तम कथा सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥१९७॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का तीसरा तरङ्ग समाप्त
चतुर्थ तरङ्ग नरवाहनदत्त का मृगया-वर्णन तदनन्तर परम स्नेही गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ पिता वत्सराज के घर में रहता हुआ और प्राप्त के विघ्न को सहन न कर सकने के कारण प्रेम से सन्तुष्ट ईर्ष्यावाली अनुरागिणी अलंकारवती के साथ विहार करता हुआ नरवाहनदत्त पीछे बैठे हुए सामन्त के साथ रथपर बैठकर मृगया-वन (शिकारगाह) को गया ॥१-३॥ आगे-आगे चलते हुए नवीन ब्राह्मण सेवक प्रलम्बबाहु के तथा अनन्त सैनिकों के साथ वह आखेट करने लगा ॥४॥