भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५६९

रथ के घोड़ों के पूरे प्राण लगाकर भागे जाने पर भी प्रलम्बबाहु उनके वेग को जीतकर सदा उनके आगे ही रहता था ॥५॥ नरवाहनदत्त रथ में बैठकर सिंह, व्याघ्र आदि पशुओं को मारता था किन्तु प्रलम्ब- बाहु पैदल ही चलता हुआ तलवार से ही उन्हें मार डालता था ॥६॥ नरवाहनदत्त प्रलम्बबाहु के कौतुक को देख-देखकर आश्चर्यचकित होता था और कहता था— अहो क्या इसकी धीरता है और कितना इसकी जांघों में बल है ॥७॥ अन्त में प्रलम्बबाहु के आगे रहते-रहते ही नरवाहनदत्त गोमुख और सारथी के साथ आखेट करके थक गया और रथ पर चढ़ा हुआ ही प्यास से व्याकुल होकर पानी ढूंढते-ढूंढते जंगल में चला गया ॥८-९॥ उस वन में उसने खिले हुए सोने के कमलों से शोभित एक सुन्दर सरोवर देखा जो मानो अनेक सूर्यों से युक्त पृथ्वी पर उतरे आकाश के समान प्रतीत होता था। उस सरोवर में स्नान करके और पानी पीकर बैठे हुए नरवाहनदत्त ने उस वन के एक ओर, चार पुरुषों को देखा ॥१०-११॥ दिव्य रूपवाले दिव्य वस्त्रों और अलंकारों से आभूषित चारों व्यक्ति उस सरोवर से सोने के कमलों को चुन-चुनकर ला रहे थे ॥१२॥ कौतुकवश नरवाहनदत्त उनके समीप गया और उनके यह पूछने पर कि तू कौन है, उसने अपने नाम, वंश आदि का पूरा परिचय दे दिया ॥१३॥

चार दिव्य पुरुषों की कथा

उनके दैवत में प्रथम उन चारों ने परिचय पूछने पर कहा—महासमुद्र के मध्य में बहुत समग्र और विशाल सुन्दर द्वीप है, जो संसार में नारिकेल द्वीप के नाम से विख्यात है। उसमें चार पर्वत मैनाक, वृषभ, चक्र और बलाहक हैं, जो दिव्य भूमिवाले हैं। उन चारों पर्वतों पर हम चारों निवास करते हैं ॥१४-१६॥ हमलोगों में एक का नाम रूपसिद्धि है, जो विविध प्रकार के रूप धारण करता है। दूसरा प्रमाणसिद्धि है, जो दूर ही सूक्ष्म प्रमाणों को देखता है ॥१७॥ तीसरा ज्ञानसिद्धि है, जिसे भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीनों का ज्ञान है और चौथा देवसिद्धि है, जिसे सभी देवताओं की सिद्धि प्राप्त है ॥१८॥

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