भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम स्तबक ५८९ ... काम का ... श्मशान की भूमि ... इस प्रकार यह सब चरित्र सुनकर कहा ॥१५५॥ राजा शत्रुसुवर्ण की कथा श्यामावद नाम नगरका राजा शत्रुसुवर्ण नामका राजा था। उस नगर में दयाल नाम का ब्राह्मणधर्मी नाम का राजा था ॥१५६॥ उस स्त्री नाम का बड़ा सौख्य उसका गन्धर्व था। गजानन के ध्यान पर भी उस राजा का कभी पुत्र नहीं दिया ॥१५७॥ के निदान यह नगर इस प्रकार राज्य करते न रहा था जब एक बार राजा युगल का दिन आया तब उस पर चिन्ता करता कि इस कायायुक्त के कारण पुत्र नहीं प्राप्त हुआ ॥१५८॥ तब दोनों परस्पर कहने लगे कि जब बलि पुत्रादिकों का सुख संसार का सुख नहीं पाता तब दयार्थी कपटपूर्वक सन्तानहीन घर में रहता कि इस कारण दोनों का दैव भली देवे जब इस प्रकार दृढ़ चित्त से चिन्ता दे महर्षि व्यास मुनि दयालु ॥१५९॥ तब राजा एक बार नगरबहार जा कर मुनिराज का दर्शन करने गया और देखा कि मुनि ... ... ... ... ... ... ... ... ...