भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ६२५

गणप ने उस धारा में महाविष मिला दिया और एक भीषण अजगर को उत्पन्न किया। किन्तु, उससे राजा जरा भी विचलित न हुआ ॥१५९॥ तब विनायक ने स्वयं आकर राजा के पेट में दाँतों से प्रहार किया। जिस प्रहार का देवता भी सहन नहीं कर सकते थे राजा ने उसका भी सहन किया ॥१६०॥ तब राजा कनकवर्ष ने गणेशजी को दुर्जय जानकर उस दन्त-प्रहार का सहन करने के उपरान्त उनकी स्तुति प्रारम्भ की— ॥१६१॥ 'हे सभी इच्छित अर्थों की सिद्धि के कोष-स्वरूप कुम्भ के भगवान् गजपति तुम्हारे लिए नमस्कार है। हे लम्बोदर, हे विघ्नविनाशक, हे सर्प का यज्ञोपवीत धारण करनेवाले, तुम्हें प्रणाम करता हूँ ॥१६२॥ झींझा (क्रीडा) करते समय अपनी सूँड़ से ब्रह्मा के भी आसन-कमल को कँपानेवाले गजानन तुम्हारी जय हो ॥१६३॥ तुम्हारे अप्रसन्न होने पर देवता, दैत्य और मुनिजनों को भी सिद्धियाँ प्राप्त नहीं हो सकतीं। अतः हे समस्त लोकों के एकमात्र शरण देनेवाले शंकर के दुलारे, तुम्हें प्रणाम है ॥१६४॥ हे महोदर, हे शूर्पकर्ण, हे गणाध्यक्ष, हे महोत्कट, हे पाशहस्त, हे अम्बरीष, हे अम्बक और हे त्रिशिखायुध, इस प्रकार उन-उन स्थानों में प्रसिद्ध अड़सठ नामों से देवता और दैत्य तुम्हारा स्मरण और स्तुति करते हैं। इन नामों से तुम्हारी स्तुति करनेवाले को संग्राम, राजकुल, जूआ, चोर, अग्नि और हिंस्र जन्तुओं का भय नहीं रहता' ॥१६५—१६७॥ उस राजा कनकवर्ष ने इस प्रकार की बहुसंख्य स्तुतियों से विघ्नेश्वर गणेश की प्रार्थना की ॥१६८॥ 'मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ। अब विघ्न न करूँगा। तू पुत्र प्राप्त कर।' राजा से इस प्रकार कहकर गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥१६९॥ तब कुमार-धारा का सहन किये हुए उस राजा को दर्शन देकर स्वामी कार्तिकेय ने कहा—'हे वीर मैं तुझसे प्रसन्न हूँ, वर माँग' ॥१७०॥ यह सुनकर हर्षित राजा ने उनसे निवेदन किया—'हे प्रभो आपकी कृपा से मुझे पुत्र-प्राप्ति हो' ॥१७१॥ ऐसा ही हो। तुझे मेरे गण के मध्य से पुत्र-प्राप्ति होगी। वह संसार में हिरण्यवर्ष नाम से विख्यात होगा ॥१७२॥ ऐसा कहकर मयूरवाहन कार्तिकेय ने उस पर विशेष कृपा करने की इच्छा से राजा को मन्दिर के गर्भगृह में बुलाया ॥१७३॥ ७९

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