भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ७११ तब ईश्वरवर्मा का चित्त संशय में पड़ गया। उधर उसके शोक से ही मानों सुन्दरी के भोजन आदि की मात्रा भी घट गई। अर्थात् उसने शोक प्रकट करने के लिए अपना खाना-पीना कम कर दिया ॥१९२॥ अब नाचने गाने और बजाने में वह उतना प्रेम प्रदर्शित नहीं करती थी। ईश्वरवर्मा उसे विविध प्रकार से धीरज और आश्वासन देता था ॥१९३॥ तदनन्तर, मित्र के बताये हुए दिन वह ईश्वरवर्मा सुन्दरी के घर से यात्रा के लिए निकला और कुट्टनी ने यात्रा के शकुन आदि करके मंगलाचार किया ॥१९४॥ रोती हुई सुन्दरी माता के साथ उस कुएं तक उसे पहुँचाने के लिए गई जिसके ऊपर जाल बँधा हुआ था ॥१९५॥ तदनन्तर जब ईश्वरवर्मा सुन्दरी को लौटाकर आगे चला तब सुन्दरी ने अपने को उस बँधे हुए जालवाले कूप में गिरा दिया ॥१९६॥ तब 'हाय मालकिन! हाय बेटी! - इस प्रकार की चिल्लाहट उसकी सेविकाएँ और माता करने लगीं। चिल्लाहट सुनकर मित्र के साथ वह वैश्यपुत्र लौट आया और अपनी प्रेयसी को कुएँ में गिरा जानकर मूच्छित हो गया ॥१९७-१९८॥ तदनन्तर, प्रलाप के साथ कन्या के लिए शोक प्रकट करती हुई मकरकटी ने पहले से ही साधे हुए अपने सेवकों को रस्सी के सहारे उस कूप में उतारा। उन्होंने 'भाग्य से जी रही है जी रही है, इस प्रकार कहकर सुन्दरी को कुएँ से बाहर निकाला। वह अपने को मूर्च्छ के समान बनाये हुए थी। लौटे हुए ईश्वरवर्मा से उसने टूटे-फूटे शब्दों में धीरे-धीरे कुछ अस्पष्ट-सी बात कहीं ॥१९९-१११॥ कुछ समय के पश्चात् स्वस्थ हुई उस प्रेयसी को लेकर ईश्वरवर्मा प्रसन्नचित होकर अपने अनुयायियों के साथ लौटकर फिर सुन्दरी के ही घर में आ गया ॥११२॥ और, सुन्दरी के प्रेम का विश्वास प्राप्त कर उसने अपने जन्म को सफल समझा तथा उसकी प्राप्ति को ही सर्वप्राप्ति समझकर यात्रा का विचार त्याग दिया ॥११३॥ तब वहीं जमकर रहते हुए ईश्वरवर्मा को उसके मित्र अर्थदत्त ने फिर उससे कहा- 'मित्र मोह में पड़कर तुमने फिर अपना नाश कर लिया ॥११४॥ कूप में गिरने से तुम्हें सुन्दरी के स्नेह का विश्वास नहीं कर लेना चाहिए। कुट्टनी की माया-रचना को ब्रह्मा भी नहीं समझ सकता ॥११५॥