भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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[Header] द्वादश लम्बक ७२५

'महाराज वेश्याओं में तो सच्चा प्रेम होता ही नहीं है फिर भी यह कुमुदिका तुम्हारे प्रति जो सद्भाव प्रकट कर रही है, पता नहीं इसमें क्या रहस्य है ? ॥२९॥ मन्त्री की बातें सुनकर राजा ने उससे कहा-'ऐसी बात नहीं है। कुमुदिका मेरे लिए प्राण भी दे सकती है। यदि तुम विश्वास नहीं करते तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ। मन्त्री को इस प्रकार कहकर राजा ने कपट-माया रची। राजा ने अपना भोजन-पान नियमित करके अपने को दुर्बल बना दिया और धीरे-धीरे अपने हाथ पैर ढीले करके अपने को मुर्दा बना लिया। तब दिखावटी दुःख प्रकट करते हुए मन्त्री अनन्तगुण की आज्ञा से सेवक राजा के शव को पालकी में डालकर, श्मशान ले गये ॥२७-१ ॥ और, राजा के शोक से बह कुमुदिका बन्धुओं से रोके जाने पर भी श्मशान में आकर राजा के साथ चिता पर चढ़ गई ॥३१॥ चिता फूंकने की तैयारी हो ही रही थी कि राजा कुमुदिका को सती होते जानकर जँभाई लेकर उठ गया ॥३२॥ तब ओह ! हमलोगों के भाग्य से यह (राजा) जी उठा इस प्रकार कहते हुए श्मशान में उपस्थित व्यक्ति कुमुदिका के साथ राजा को घर ले गये ॥३३॥ तदनन्तर, प्रसन्नता से उत्सव मनाये जाने पर राजा धीरे-धीरे स्वस्थ हो गया और उसने एकान्त में मन्त्री अनन्तगुण से कहा-'देखा तुमने कुमुदिका का प्रेम ! ॥३४॥ तब मन्त्री ने राजा से कहा-'राजन् मैं तो अब भी नहीं विश्वास करता। इसमें कुछ कारण अवश्य है। अब आगे और निश्चय करते हैं ॥३५॥ और जिसने इतना दिया उसके सामने अपने को प्रकट कर देना चाहिए, जिससे कि इसकी सेना और नगर मित्र की सेना लेकर युद्ध में शत्रुओं पर विजय की जाय ॥३६॥ मन्त्री अनन्तगुण ऐसा कह ही रहा था कि इतने में गुप्त रूप से भेजा हुआ एक गुप्तचर वहाँ आया। उससे पूछने पर उसने कहा-शत्रुओं ने देश को आक्रान्त कर लिया और रानी शशिप्रभा ने झूठे ही राजा के मरने का समाचार सुनकर अग्नि प्रवेश कर लिया। गुप्तचर के वे वचन सुनकर बाण से आहत के समान वह राजा विह्वल होकर 'हाय रानी! हाय रानी !'-इस प्रकार कहकर विलाप करने लगा ॥३७-१ ॥ तब वेश्या सब बात जानकर कुमुदिका राजा के पास आकर और उसे धीरज देकर बोली-॥४ ॥